09 मई 2026

वतन पर जो फिदा होगा अमर वो नौजवां होगा.........


शहीद श्री वीके चौबे और जवान(पूरे जवानों की तस्‍वीरें नहीं मिल पाईं)
नक्‍सलवाद का नासूर। न जाने कितने घरों को तबाह करेगा। कभी किसी मां की गोद सूनी होती है।  कभी किसी की मांग का सिंदूर मिट जाता है। कभी किसी बच्‍चे के सिर से उसके पिता का साया उठ जाता है तो कभी कोई बहन रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी लिए अपने भाई का इंतजार करती रह जाती है। यूं तो नक्‍सल शब्द आया पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्‍सलबाडी से। भाकपा नेता चारू मजूमदार और कानू सान्‍याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। सत्‍ता में परिवर्तन के लिए सशस्‍त्र क्रांति जरूरी है, ऐसे नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी मौजूदा समय में  देश के 9 राज्यों के सामने सीधी चुनौती बनकर सामने है । अब नक्‍सलवाद का चेहरा बदल गया है। सत्‍ता परिवर्तन की इच्‍छा या व्‍यवस्‍था में बदलाव की ख्‍वाहिशें दफ्न हो गई हैं और नक्‍सली लूटेरों और हत्‍यारों के गिरोह में तब्‍दील हो गए हैं।
वैसे तो छत्‍तीसगढ, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, उडीसा, पश्चिम बंगाल,  झारखंड, उत्‍तरप्रदेश और उत्‍तराखंड में नक्‍सलियों  ने कई वारदातों को  अंजाम देकर अपनी दरिंदगी का सबूत दिया है लेकिन एक घटना  है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, उसका जिक्र यहां करूंगा। छत्‍तीसगढ में सबसे बडी वारदात कर नक्‍सलियों ने पुलिस को सीधे चुनौती दी।
12 जुलाई 2009। रविवार का दिन। रविवार होने के कारण देर तक सोने की चाह थी पर सुबह छह बजे फोन की घंटी ने उठा दिया। पहली खबर मिली मानपुर (राजनांदगांव जिले का नक्‍सल प्रभावित इलाका) के मदनवाडा में नक्‍सलियों ने सुरक्षा बल के दो जवानों को गोली मार दी है। सबसे पहले यह खबर अपने चैनल में ब्रेक की। इसके बाद बिस्‍तर से उठा और तैयारी करने लगा मानपुर जाने की। शायद तब तक राजनांदगांव जिले के एसपी श्री वी के चौबे जो एक ऐसे अफसर थे जो किसी भी नक्‍सली वारदात होने पर मौके पर पहुंचकर जवानों की हौसला आफजाई करते थे, मानपुर के लिए कूच कर गए थे। बारिश का मौसम था सो टैक्‍सी काल की। टैक्‍सी आती तब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ। अपने लैपटाप को तैयार किया। कैमरा और बैटरी चेक की।  मोबाईल की बैटरी को देखा।  उस दिन शायद मेरा देर से निकलना लिखा था इसलिए जो टैक्‍सी वाला बुलाने के आधे घंटे में ही हाजिर हो जाता था डेढ घंटे  में पहुंचा। साथ में मैंने अपने सहयोगी को लिया और निकल पडा।  
घर से निकलकर टैक्‍सी में सवार हुआ ही था कि दूसरा फोन आया,  शहीदों का आंकडा  बढ सकता है। मन विचलित हुआ। फिर खबर को  अपडेट किया, चैनल में। सुबह आठ बजे पहला फोनो दिया। फोनो के लिए शहर में  ही रूका, कहीं रास्‍ते में नेटवर्क मिले न मिले। फोनो से निपटकर  जैसे ही गाडी आगे बढी एक और खबर मिली। एसपी श्री वीके चौबे की गाडी पर नक्‍सलियों ने फायरिंग कर दी है लेकिन एसपी नक्‍सलियों की गोलीबारी को पार कर सुरक्षित निकल गए हैं। चिंता और बढी। हम आगे बढते ही रहे। बीच बीच में खबर मिलती रही। इसके बाद सारी खबर अपुष्‍ट ही मिलती रही। सौ किलोमीटर का सफर तय कर मानपुर पहुंचे। मानपुर में पहुंचते ही खबर  मिली कि कुछ जवानों के शव अस्‍पताल में लाए जा चुके हैं। अस्‍पताल पहुंचने पर देखा अफरातफरी का माहौल था। अंदर जाकर देखा तो एक दो नहीं दस बारह जवानों के शव। बिस्‍तर कम था सो जमीन पर ही रख दिये गए थे। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। खबर बडी होती जा रही थी।
करीब 12 बज  गए होंगे। फिर से चैनल में खबर अपडेट की। लैपटाप औ  इवीडीओ की मदद से अब प्रारंभिक विजुअल्‍स भेजने के बाद घटनास्‍थल पर जाने की कोशिश की। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मैं इकलौता पत्रकार था जो वहां पहुंचा था। घटनास्‍थल से कुछ पहले पुलिस के जवानों ने रोक दिया। यह कहकर कि आगे गोली चल रही है न जाएं। पर अपने रिस्‍क में हम आगे बढे। कुछ  दूर जाने के बाद गाडी छोडकर पैदल ही जाना पडा। आगे मिल गए, आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता। उनसे बात करता उससे पहले एक पुलिस वाले ने मुझे गले लगा लिया, यह कहकर कि हर तरफ खून से सराबोर वर्दी..... तुम पहले व्‍यक्ति हो जिसे  देख रहा हूं यहां....  वरना ऐसी ही तस्‍वीरें.... उसने ही मुझे एक संकेत दिया कि शायद एसपी श्री वी के चौबे..........
डेढ बजे होंगे। मैं आगे बढा। जवानों के शव मौके से उठाकर ट्रेक्‍टर में डाले जा रहे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब जो खुद कीचड से लथपथ थे, उन्‍हें देखकर लग रहा था कि जमकर  मुकाबला किया है उन्‍होंने भी नक्‍सलियों का..... लगातार निर्देश दिए जा रहे थे और आर आई  गुरजीत सिंह जवानों के शवों को मौके से उठाकर अस्‍पताल भिजवाने की व्‍यवस्‍था में लगे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब से बात की। उन्‍होंने मौके पर ही बाईट देने में सहमति बताई। करीब 20 मिनट तक वो लगातार बोलते रहे। कहीं कहीं वो रूकते, जिससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था कि कुछ समय पहले ही जिस जगह पर जिस व्‍यक्ति ने नक्‍सलियों से खूनी लडाई लडी हो, इस वक्‍त उसकी मन: स्थिति कैसी रही होगी। खैर वो बोलते रहे।  हमने भी उन्‍हें नहीं टोका।  वो सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम को बयां करते रहे और आखिरी में उन्‍होंने जो कहा, उसने झकझोर कर रख दिया, मुझे याद है उनके वो शब्‍द, ‘नक्‍सलियों ने दोनो ओर से फायरिंग की, हमने भी जमकर मुकाबला किया, नक्‍सलियों को कडा टक्‍कर देते देते  एसपी साहब शहीद हो गए हैं। करीब दो बजे ये लाईनें हमने सुनी। ढाई बजे के आसपास हम वहां से निकले और पांच छह मिनट में ही मानपुर पहुंच गए। जैसे ही नेटवर्क मिला तुरंत चैनल में यह खबर दी। ‘एसपी श्री वी के चौबे शहीद। उनके साथ 29 पुलिस जवान शहीद।’
वो पूरा वाक्‍या अब तक नहीं भूला है मुझे। अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी लाशें एक साथ नहीं देखी मैंने। और जब देखने मिलीं तो जवानों की। करीब दो साल से राजनांदगांव में एसपी रहे श्री वीके चौबे साहब एक ऐसे पुलिस अफसर थे जो आम इंसान की तरह ही रहते थे और उनका दरबार हर वक्‍त आम लोगों के लिए खुला रहता था। अपने मातहतों के लिए उनके मन में जो प्रेम था, उसी प्रेम ने उन्‍हें हर दिल अजीज बनाया था और उसी प्रेम के चलते वो शहीद हो गए।
दरअसल,  मानपुर क्षेत्र का मदनवाडा पहले नक्‍सलियों का गढ हुआ करता था। यहां नक्‍सली अपनी ट्रेनिंग कैम्‍प चलाते थे। इस क्षेत्र में नक्‍सलियों के वजूद को खत्‍म करने के लिए आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता और एसपी श्री वी के चौबे ने मदनवाडा में ही पुलिस कैम्‍प स्‍थापित किया। इससे नक्‍सली बौखला गये। उन्‍होंने एक बडी साजिश तैयार की। 12 जुलाई को सुबह उन्‍होंने सातवीं वाहिनी सीएएफ के दो जवानों को तब गोली मारी जब वो जवान शौच के लिए गए थे। ये नक्‍सलियों की साजिश का हिस्‍सा मात्र था, उनका निशाना कुछ और था। नक्‍सलियों को मालूम था कि यह खबर जिला मुख्‍यालय तक जाएगी और एसपी मौके पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। नक्‍सलियों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी और मानपुर से महज छह किलोमीटर दूर पक्‍की सडक पर बारूदी सुरंग लगा रखा था। एसपी  थे ही ऐसे,  वो अपने मातहतों के पास पहुंचते थे। इस खबर को सुनकर वो निकले..... पर नक्‍सलियों ने रास्‍ते में ही उन्‍हें रोक लिया। एसपी साहब एक बार नक्‍सलियों के चक्रव्‍यूह को भेदते हुए आगे निकल गए थे लेकिन फिर बीच में फंसे अपने जवानों के लिए वो फिर से मौके  पर पहुंचे और फिर दोबारा  वहां से नहीं निकल सके।
इस घटना में एसपी श्री वी के चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू,  उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वटटी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधानआरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी भी शहीद हो गए।
शहीद एसपी श्री चौबे की शहादत को सलाम करने आज राजनांदगांव में उनकी मूर्ति की स्‍थापना की जा रही है। चौबे साहब और शहीद जवानों को सलाम.................

07 सितंबर 2025

केदार और रेस्ट हाउस

छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री केदार कश्यप को लेकर एक नया बवाल खडा़ हो गया है। केदार पर जगदलपुर के सरकारी रेस्ट हाउस के एक कर्मचारी को पीटने का आरोप लगा है। हालाँकि केदार कश्यप ने खुद पर लगे आरोपों को गलत बताते हुए इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है। 

जगदलपुर रेस्ट हाउस के कर्मचारी जितेन्द्र पांडे ने आरोप लगाया है कि वो बीते 20 साल से दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहा है। उसने कहा है कि जगदलपुर रेस्ट हाउस में पहुंचे मंत्री केदार कश्यप ने कमरा नहीं खोलने का आरोप लगाते हुए उससे मारपीट की और उसे धमकाया। कर्मचारी का कहना है कि मंत्री जी ने उसे बेदम पीटा जबकि वो मंत्री जी के लिए ही भोजन तैयार कर रहा था।

इस मामले में विपक्षी कांग्रेस पार्टी आक्रमक हो गई है और उसने मंत्री केदार कश्यप के इस्तीफे की माँग की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज का कहना है कि एक गरीब कर्मचारी को पीटना भाजपाई संस्कृति का हिस्सा है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मंत्री केदार कश्यप को मंत्रीपद से हटाए जाने की माँग की है।

खुद पर लगे आरोपों पर केदार कश्यप का कहना है कि सब कुछ झूठा है, उन्होंने किसी कर्मचारी को नहीं मारा है। केदार ने इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है।

कांस्टीट्यूशन क्लब और संसद

संसद में सवाल पूछने के बदले रूपए लेने के आरोप में साल 2005 में संसद से बर्खास्त हुए राजनांदगाँव के तत्कालीन सांसद प्रदीप गाँधी इन दिनों फिर चर्चा में हैं। प्रदीप गाँधी हाल ही में दिल्ली में सांसदों और पूर्व सांसदों के लिए बने क्लब कांस्टीट्यूशन क्लब आफ इंडिया में निर्वाचित हुए हैं। 

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव आमतौर पर सचिव (प्रशासन), खेल सचिव, संस्कृति सचिव, कोषाध्यक्ष और 11 कार्यकारी सदस्यों के लिए कराया जाता है। 

कांस्टीट्यूशन क्लब के पदेन अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष  होते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इसके अध्यक्ष हैं। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर उपाध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश महासचिव के पद पर हैं। राजीव प्रताप रूड़ी सचिव (प्रशासन), राजीव शुक्ल सचिव(खेल), तिरुची शिवा सचिव (संस्कृति), एपी जीतेंद्र रेड्डी कोषाध्यक्ष हैं। कार्यकारिणी सदस्यों में सुरेंद्र नागर,  केसी त्यागी, संदीप दीक्षित, केआर मोहन राव, डी राजा, एपी जीतेंद्र रेड्डी, केएन सिंह देव, अजय संचेती, सुप्रिया सुले, तारीक अनवर और सतीश चंद्र मिश्रा. अरविंद कुमार इसके निदेशक हैं।

इस बार खेल सचिव के पद पर कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला और बीजेपी के राज्यसभा सांसद प्रदीप कुमार वर्मा की दावेदारी थी लेकिन अंतिम समय में बीजेपी के उम्मीदवार पीछे हट गए। इससे शुक्ल निर्विरोध खेल सचिव का चुनाव जीत गए। इसी तरह डीएमके सांसद तिरुचि सिवा बीजेपी के पूर्व सांसद प्रदीप गांधी की उम्मीदवारी वापस लेने के बाद संस्कृति सचिव चुने गए। डीएमके सांसद पी विल्सन कोषाध्यक्ष चुने गए हैं। टीआरएस के पूर्व सांसद एपी जितेंद्र रेड्डी ने कोषाध्यक्ष पद पर अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी इससे विल्सन कोषाध्यक्ष बने।

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव जीतने के बाद राजनांदगाँव लौटने पर प्रदीप गाँधी का सम्मान किया गया। सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष और राजनांदगाँव के विधायक डा रमन सिंह ने कहा कि प्रदीप गाँधी ने विधायक रहते हुए डोंगरगाँव विधानसभा की सीट उनके लिए छोडी़ थी और फिर सांसद रहते हुए संघर्षशीलता बनाए रखी। डा रमन ने कहा कि अब कांस्टीट्यूशन क्लब के   चुनाव में जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि सतत गतिशील रहकर कार्य करने वाला व्यक्ति नए मुकाम हासिल करता है। गाँधी की सम्मान सभा में राजनांदगाँव के मौजूदा सांसद संतोष पांडे, पद्मश्री डा पुखराज बाफना सहित कई गणमान्यजन मौजूद रहे।

गाँधी से जुडा़ एक बडा़ मामला साल 2005 में हुआ था। 2005 में 11 सांसदों को पैसे लेकर सवाल पूछने का दोषी पाए जाने के बाद उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी। इनमें एक राज्यसभा सांसद भी शामिल थीं। 12 दिसंबर 2005 को एक निजी चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें खुफिया कैमरों में कुछ सांसद संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेते हुए कैद हुए थे। देश के संसदीय इतिहास में ये पहली घटना थी। ये 11 सांसद किसी एक पार्टी के नहीं थे। इनमें से छह बीजेपी से, तीन बसपा से और एक-एक राजद और कांग्रेस से थे। बीजेपी से सांसद सुरेश चंदेल, अन्ना साहेब पाटिल, चंद्र प्रताप सिंह, छत्रपाल सिंह लोध, वाई जी महाजन और  प्रदीप गांधी, बीएसपी से नरेंद्र कुमार कुशवाहा और राजा राम पाल और लालचंद्र, आरजेडी से मनोज कुमार और कांग्रेस से राम सेवक सिंह शामिल थे।

उस समय स्टिंग ऑपरेशन के दौरान कुछ पत्रकारों ने एक काल्पनिक संस्था के प्रतिनिधि बनकर सांसदों से मुलाकात की थी। पत्रकारों ने सांसदों को उनकी संस्था की ओर से सवाल पूछने की बात कही और रिश्वत लेते हुए सांसदों का वीडियो बना लिया था।

इस पूरे कांड के सामने आने के 12 दिन बाद ही 24 दिसंबर 2005 को इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने को लेकर संसद में वोटिंग कराई गई थी। बाकी सभी पार्टियां आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के पक्ष में थीं पर बीजेपी ने वॉक-आउट कर दिया था। उस समय विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सांसदों ने जो किया, वो बेशक भ्रष्टाचार का मामला है, लेकिन निष्कासन की सजा ज्यादा है।

पिछली लोकसभा यानि 2019 से 2024 के दौरान भी 'कैश फॉर क्वेरी' का एक मामला हुआ था। साल 2023 की दिसम्बर में त्रिणमूल सांसद महुआ मोइत्रा को पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था। महुआ के निष्कासन के संसद के एथिक्स कमेटी की सिफारिश पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सहमति जताते हुए महुआ की उस मांग को ठुकरा दिया था जिसमें उन्होंने लोकसभा में अपनी बात रखने समय मांगा था। इसके बाद उन्हें निष्कासित कर दिया गया था।

06 सितंबर 2025

विघ्नविनाशक के भक्‍तों को बचाएं विघ्‍न से...

दस दिनों तक उत्साह और उमंग का पर्याय रहे गणपति बप्पा की विदाई हो गई। विदाई भी पूरे जोशोखरोश के साथ हुई। जगह जगह जुलूस और झांकियां निकाली गईं और अगले बरस तू जल्दी आ के बुलंद नारों के बीच भक्तों ने विघ्नहर्ता को विदाई दी। यह हर साल का क्रम है। हर साल अनंत चतुर्थी को बुद्धि के दाता भगवान गणेश की प्रतिमा की स्थापना घरों और सार्वजनिक स्थानों में विभिन्न मंडल और समितियों द्वारा किया जाता है और फिर दस दिनों तक गणपति बप्पा की धूम मचने के बाद अनंत चतुर्दशी को बाजे गाजे के साथ विसर्जन की प्रक्रिया पूरी की जाती है।
इस पूरे पर्व का एक महत्वपूर्ण संदेश यह रहता है कि समवेत सहयोग से गणपति की स्थापना की जाती है और फिर पूरे धार्मिक परंपरा के अनुरूप उनकी आराधना की जाती है लेकिन मौजूदा दौर में देखें तो इस पर्व में कुछ खामियां भी आ गई हैं। विघ्नहर्ता  लोगों के विघ्न को हरने का काम करते हैं लेकिन उनकी प्रतिमा स्थापित करने वाले उत्साही युवकों के कारण कई लोगों को विघ्न का सामना करना पड़ता है। लोग पर्व की आड़ में जबरन चंदा उगाही करने से भी बाज नहीं आते और पर्व शुरू होने के बाद, गणपति प्रतिमा पंडाल  में स्थापित हो जाने के बाद तेज आवाजों वाले स्पीकर के जरिए फिल्मी गाने बजाकर, बेवजह का धूम धड़ाका कर लोगों को परेशान ही करते हैं। गणपति पंडालों में यदि भक्ति गीतों के बजाय फूहड़ फिल्मी गाने बजाएं जाएं तो यह बेहूदगी ही कहलाएगी और ऐसा ही अक्सर होता है। गणपति पंडालों को सड़क खोदकर लगाना भी एक तरह से लोगों को प्रभावित करना ही है। सड़कों को जाम कर दिया जाता है और बीच में पंडाल लगा दिए जाते हैं। मसला धार्मिक होता है, इसलिए इस पर ज्यादा कुछ कोई नहीं कहता लेकिन समितियों को इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि वे गणपति की आराधना करने के बहाने किसी को परेशान न करें।
कुछ जगहों पर विसर्जन झांकियों  की परंपरा है। इस मामले में राजनांदगांव सहित छत्तीसगढ़ के कई जिले प्रसिद्ध हैं। विसर्जन झांकियों में धार्मिक प्रसंगों पर आधारित चित्रण से न सिर्फ लोगों की धर्म को लेकर जानकारी का विस्तार होता है बल्कि आस्था बढ़ती है और मनोरंजन भी होता है लेकिन विसर्जन  झांकियों में जिस तरह से डीजे की कानफोड़ू आवाज और उसमें नशे की हालत में झूमते कथित भक्त नजर आते हैं, वह परंपरा के नाम पर खिलवाड़ की तरह ही है।
गणपति पर्व मनाए जाने का इतिहास देश की आजादी से जुड़ा हुआ है। जिस वक्त देश में अंग्रेजों का शासन था, उस वक्त लोगों में देशभक्ति जागृत करने के लिए महाराष्ट्र से इस पर्व की शुरूआत बाल गंगाधर तिलक ने की थी और फिर धीरे धीरे यह पर्व देश का पर्व बन गया, लेकिन अब यह पर्व कुछ इस तरह हो गया है कि देश और धर्म का भाव खत्म होकर सिर्फ उत्साह और उत्साह के नाम पर भी दिखावा नजर आने लगा है। इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए।
पर्व का समापन हो गया है।  इस मौके पर हम गणपति बप्पा की आराधना कर उनसे आग्रह करते हैं कि वे अगले बरस जल्दी आएंगे और अपने भक्तों को फिर से अपनी भक्ति के माहौल में सरोबोर करेंगे, ऐसे समय में हमें भी यह वादा खुद से करना होगा कि हम इस पर्व की प्रासंगिकता को और महत्व को बरकरार रखेंगे और ऐसा कोई काम नहीं करेंगे कि विघ्न विनाशक  के भक्तों को किसी तरह का विघ्न हो।

30 मई 2020

जोगी बनना आसान है, अजीत बनना भी, पर अजीत जोगी बनना असंभव


शीर्षक चौंका सकता है, लेकिन बकौल अजीत जोगी ठान लो तो कुछ भी असंभव नहीं। और छत्तीसगढ़ के एक बेहद पिछडे़ इलाके गोरेला-पेंड्रा के जोगीसार गांव में देश की आजादी के करीब सवा साल पहले पैदा हुए एक बच्चे ने ठान लिया और वो अजीत जोगी बन गया।

अजीत जोगी अब इस दुनिया में नहीं हैं। छत्तीसगढ़ के तकरीबन हर शख्स के पास जोगी से जुडी़ स्मृतियाँ हैं और जोगी के जीवन से जुडी़ कई सारे बातें इस वक्त हो रही हैं। जोगी को पसंद करने वाले और नापसंद करने वाले सब आज जोगी की ही बातें कर रहे हैं। 

जोगी को लेकर एक बात होती थी कि या तो आप उन्हें पसंद करेंगे या नापसंद, पर आप उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। जोगी को मैंने दूसरी बार तब नोटिस किया था जब उनका नाम अचानक नए बने छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्यमंत्री के लिए उनका नाम दिल्ली से आया। पहली बार जोगी से मुलाकात इससे काफी पहले तब हुई थी जब वे पदयात्रा पर निकले थे और राजनांदगांव पहुंचे थे। उस वक्त उनके पुराने समर्थक फ्रांसिस के घर उनका साक्षात्कार लेने का मौका मिला था। सीएम बनने के बाद जोगी की खासियत यह रही कि उनको फोन करो तो वो खुद उठाते थे और सीधे नाम से संबोधित करते थे। उनके समय मिडिएटर का जमाना नहीं था।

 तमाम तरह के विवादों में रहने के बावजूद (राजनीति में प्रवेश से लेकर अब तक) मैं अजीत जोगी से बहुत प्रभावित हूँ... 

 इंसान अपनी जिंदगी में एक अफसर बनना चाहता है, एक इंसान प्रोफेसर, कोई पुलिस वाला तो कोई वकील, कोई राजनीतिज्ञ तो कोई मजदूर रहकर खुश है...

एक इंसान एक उम्र में यदि ये सब हासिल कर ले और फिर भी जूझने की प्यास बाकी रहे, तो उसे अजीत जोगी ही कहा जाएगा...

इंजीनियर, प्रोफेसर, वकील, कलेक्टर, एसपी, थानेदार, विधायक,सांसद, मुख्यमंत्री, देश की सबसे पुरानी पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता और इन सबसे पहले तेंदूपत्ता तोड़ने वाला मजदूर... ये सब अनुभव रहा है अजीत जोगी के पास...

जोगी अपने आप में एक विश्वविद्यालय हैं...