05 जुलाई 2026

नहीं रहीं पंडवानी की पर्याय तीजन बाई

70 साल की उम्र में एम्स में उपचार के दोरान हुआ निधन, पैरालिसिस से थीं पीडि़त


छत्तीसगढ़ में पंडवानी की पर्याय रहीं तीजन बाई नहीं रहीं। पद्मविभूषण तीजन बाई ने राजधानी रायपुर के एम्स में आज तड़के करीब सवा 3 बजे अंतिम सांस ली। 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग के गनियारी गाँव में जन्मीं डॉ. तीजन बाई 70 साल की थीं।

लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही तीजन हुकुमचंद परधा और सुखवाती बाई की बेटी थीं। बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी को छत्तीसगढ़ी और हिंदी में महाभारत की कहानियां गाते सुनकर उन्हें ये कहानियां याद हो गई थीं, जिसके बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से इसका अनौपचारिक प्रशिक्षण भी लिया।

तीजन बाई के अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में कलाकारों, साहित्यकारों, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों के पहुंचने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण तीजन बाई को श्रद्धासुमन अर्पित किया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सुबह एम्स पहुंचकर तीजन को श्रद्धांजलि अर्पित की। विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर चरणदास महंत, पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव सहित अनेक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।प्रधानमंत्री मोदी ने प्रख्यात पंडवानी गायिका तीजन के निधन पर सोशल मीडिया पर जारी संदेश में कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाई। प्रधानमंत्री ने उनके निधन को कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए परिजनों और प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

मात्र 13 साल की उम्र में अपना पहला मंचीय प्रदर्शन करने वाली तीजन बाई पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली को चुना और खड़े होकर प्रदर्शन करना शुरू किया, जबकि उस दौर में महिलाएँ बैठकर पंडवानी गाती थीं। तीजन बाई ने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के सामने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दीं थीं। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की और मॉरीशस सहित 17 से अधिक देशों में छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का डंका बजाने वाली तीजन बाई को 1988 में पद्म श्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 2018 में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जापानी पुरस्कार ‘फुकुओका पुरस्कार’ और 2019 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से विभूषित तीजन बाई को बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डी. लिट की मानद उपाधि भी दी गई थी।

जीवन के आखिरी पड़ाव में काफी कठिन दौर से गुजरने वालीं तीजन ने बड़े बेटे की मौत के सदमे के बाद अपनी बीपी की दवाई लेना बंद कर दिया था। जिसके कारण साल 2024 में उन्हें अचानक पैरालिसिस यानी लकवा मार गया। तब से वह लगातार बीमारी से जूझ रही थीं, जिसकी वजह से उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया था और वह लंबे समय से बेड पर थीं। हाल ही में फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत होने के बाद उन्हें 27 मई को एम्स रायपुर के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान रात 3:15 बजे उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।

तीजन बाई को सुनना केवल गायन सुनना नहीं था। वह एक ऐसा अनुभव था जिसमें श्रोता धीरे धीरे महाभारत के कथा संसार में प्रवेश करता चला जाता था। उनके हाथ में तंबूरा रहता था, लेकिन प्रस्तुति के दौरान वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुशासन के अहंकार को चुनौती देता प्रतीक और कभी किसी असहाय पात्र की वेदना का सहारा बन जाता।

 पंडवानी छत्तीसगढ़ के लोकमानस में पीढ़ियों से प्रवाहित होती रही है। महाभारत की कथा जब लोक में उतरती है तो वह केवल राजवंशों के संघर्ष की कथा नहीं रहती। उसमें गांव का जीवन प्रवेश कर जाता है। उसमें किसान की पीड़ा, स्त्री की वेदना, अन्याय के विरुद्ध आक्रोश और सामान्य मनुष्य की आशाएं शामिल हो जाती हैं। तीजन बाई ने इसी लोक महाभारत को अपना स्वर दिया। 

29 जून 2026

रायपुर के नकटी गाँव पर चला बुलडोजर



प्रशासन ने गरीबों के मकानों को किया जमींदोज, बनेगा विधायकों, सांसदों का आवास

राजनांदगाँव। राजधानी रायपुर के माना इलाके में स्थित नकटी गांव में प्रशासन की सख्त कार्रवाई के बाद तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई है। प्रशासन के अनुसार, ग्राम नकटी के वार्ड क्रमांक 16 और 17 में कुल 48 मकान सरकारी भूमि पर अवैध रूप से निर्मित पाए गए हैं। इन मकानों को पहले ही राजस्व विभाग की ओर से बेदखली का नोटिस जारी कर चस्पा किया जा चुका था। निर्धारित समय सीमा पूरी होने के बाद प्रशासन ने बुलडोजर की मदद से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई शुरू कर दी। इस जगह को विधायकों और सांसदों का आवास बनाने के लिए खाली कराया जा रहा है।


प्रशासन ने कार्रवाई शांतिपूर्ण ढंग से चले और किसी भी अप्रिय घटना से निपटा जा सके, इसके लिए आधी रात से ही गांव को छावनी में बदल दिया था और 1,000 से ज़्यादा पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया है। सुबह चार बजे से अलग-अलग टीमें गांव पहुंचनी शुरू हो गईं। प्रत्येक टीम ने चिन्हित मकानों पर कार्रवाई शुरू की।
ग्रामीणों ने कार्रवाई का विरोध किया। पुलिस की घेराबंदी तोड़ने के प्रयास में दोनों पक्षों के बीच धक्कामुक्की भी हुई। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया गया है, इसलिए बेदखली की कार्रवाई की जा रही है।
 
दूसरी ओर कार्रवाई का विरोध कर रहे ग्रामीणों का तर्क है कि वे इस जमीन पर सालों से रह रहे हैं। इनमें से कई मकान को पीएम आवास योजना के तहत बनाए गए हैं। इलाके में तनाव को देखते हुए गांव के आसपास बैरिकेडिंग और निगरानी भी बढ़ा दी गई है। शासन की योजना यहां 55 एकड़ में विधायक कॉलोनी विकसित करने की है। बेदखली को लेकर प्रशासन और ग्रामीणों के दावों-प्रतिदावों के बीच पूरे गांव में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी लगातार मौके पर मौजूद हैं तथा पूरे क्षेत्र की निगरानी की जा रही है। 

गौरतलब है कि रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने दो दिन पूर्व ही यानि 27 जून को नकटी के ग्रामीणों से मुलाकात कर आश्वासन दिया था कि उनका मकान उनके व्यवस्थापन होने तक नहीं टूटेगा, लेकिन सांसद का यह आश्वासन भी प्रशासन के बुलडोजर के आगे नहीं टिक पाया। यहाँ यह भी गौर करने वाली बात है कि सिर्फ प्रधानमंत्री आवास ही नहीं, नकटी के ग्रामीणों को बिजली, पानी सहित सारी सुविधाएं बरसों से मिल रही थी। यदि ये मकान अवैध थे तो बरसों तक प्रशासन और शासन क्या इस इंतजार में था कि जब माननीयों के मकान के लिए जमीन की जरूरत पडे़गी, तब इन अवैध कब्जे को हटाया जाएगा?

09 मई 2026

वतन पर जो फिदा होगा अमर वो नौजवां होगा.........


शहीद श्री वीके चौबे और जवान(पूरे जवानों की तस्‍वीरें नहीं मिल पाईं)
नक्‍सलवाद का नासूर। न जाने कितने घरों को तबाह करेगा। कभी किसी मां की गोद सूनी होती है।  कभी किसी की मांग का सिंदूर मिट जाता है। कभी किसी बच्‍चे के सिर से उसके पिता का साया उठ जाता है तो कभी कोई बहन रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी लिए अपने भाई का इंतजार करती रह जाती है। यूं तो नक्‍सल शब्द आया पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्‍सलबाडी से। भाकपा नेता चारू मजूमदार और कानू सान्‍याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। सत्‍ता में परिवर्तन के लिए सशस्‍त्र क्रांति जरूरी है, ऐसे नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी मौजूदा समय में  देश के 9 राज्यों के सामने सीधी चुनौती बनकर सामने है । अब नक्‍सलवाद का चेहरा बदल गया है। सत्‍ता परिवर्तन की इच्‍छा या व्‍यवस्‍था में बदलाव की ख्‍वाहिशें दफ्न हो गई हैं और नक्‍सली लूटेरों और हत्‍यारों के गिरोह में तब्‍दील हो गए हैं।
वैसे तो छत्‍तीसगढ, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, उडीसा, पश्चिम बंगाल,  झारखंड, उत्‍तरप्रदेश और उत्‍तराखंड में नक्‍सलियों  ने कई वारदातों को  अंजाम देकर अपनी दरिंदगी का सबूत दिया है लेकिन एक घटना  है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, उसका जिक्र यहां करूंगा। छत्‍तीसगढ में सबसे बडी वारदात कर नक्‍सलियों ने पुलिस को सीधे चुनौती दी।
12 जुलाई 2009। रविवार का दिन। रविवार होने के कारण देर तक सोने की चाह थी पर सुबह छह बजे फोन की घंटी ने उठा दिया। पहली खबर मिली मानपुर (राजनांदगांव जिले का नक्‍सल प्रभावित इलाका) के मदनवाडा में नक्‍सलियों ने सुरक्षा बल के दो जवानों को गोली मार दी है। सबसे पहले यह खबर अपने चैनल में ब्रेक की। इसके बाद बिस्‍तर से उठा और तैयारी करने लगा मानपुर जाने की। शायद तब तक राजनांदगांव जिले के एसपी श्री वी के चौबे जो एक ऐसे अफसर थे जो किसी भी नक्‍सली वारदात होने पर मौके पर पहुंचकर जवानों की हौसला आफजाई करते थे, मानपुर के लिए कूच कर गए थे। बारिश का मौसम था सो टैक्‍सी काल की। टैक्‍सी आती तब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ। अपने लैपटाप को तैयार किया। कैमरा और बैटरी चेक की।  मोबाईल की बैटरी को देखा।  उस दिन शायद मेरा देर से निकलना लिखा था इसलिए जो टैक्‍सी वाला बुलाने के आधे घंटे में ही हाजिर हो जाता था डेढ घंटे  में पहुंचा। साथ में मैंने अपने सहयोगी को लिया और निकल पडा।  
घर से निकलकर टैक्‍सी में सवार हुआ ही था कि दूसरा फोन आया,  शहीदों का आंकडा  बढ सकता है। मन विचलित हुआ। फिर खबर को  अपडेट किया, चैनल में। सुबह आठ बजे पहला फोनो दिया। फोनो के लिए शहर में  ही रूका, कहीं रास्‍ते में नेटवर्क मिले न मिले। फोनो से निपटकर  जैसे ही गाडी आगे बढी एक और खबर मिली। एसपी श्री वीके चौबे की गाडी पर नक्‍सलियों ने फायरिंग कर दी है लेकिन एसपी नक्‍सलियों की गोलीबारी को पार कर सुरक्षित निकल गए हैं। चिंता और बढी। हम आगे बढते ही रहे। बीच बीच में खबर मिलती रही। इसके बाद सारी खबर अपुष्‍ट ही मिलती रही। सौ किलोमीटर का सफर तय कर मानपुर पहुंचे। मानपुर में पहुंचते ही खबर  मिली कि कुछ जवानों के शव अस्‍पताल में लाए जा चुके हैं। अस्‍पताल पहुंचने पर देखा अफरातफरी का माहौल था। अंदर जाकर देखा तो एक दो नहीं दस बारह जवानों के शव। बिस्‍तर कम था सो जमीन पर ही रख दिये गए थे। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। खबर बडी होती जा रही थी।
करीब 12 बज  गए होंगे। फिर से चैनल में खबर अपडेट की। लैपटाप औ  इवीडीओ की मदद से अब प्रारंभिक विजुअल्‍स भेजने के बाद घटनास्‍थल पर जाने की कोशिश की। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मैं इकलौता पत्रकार था जो वहां पहुंचा था। घटनास्‍थल से कुछ पहले पुलिस के जवानों ने रोक दिया। यह कहकर कि आगे गोली चल रही है न जाएं। पर अपने रिस्‍क में हम आगे बढे। कुछ  दूर जाने के बाद गाडी छोडकर पैदल ही जाना पडा। आगे मिल गए, आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता। उनसे बात करता उससे पहले एक पुलिस वाले ने मुझे गले लगा लिया, यह कहकर कि हर तरफ खून से सराबोर वर्दी..... तुम पहले व्‍यक्ति हो जिसे  देख रहा हूं यहां....  वरना ऐसी ही तस्‍वीरें.... उसने ही मुझे एक संकेत दिया कि शायद एसपी श्री वी के चौबे..........
डेढ बजे होंगे। मैं आगे बढा। जवानों के शव मौके से उठाकर ट्रेक्‍टर में डाले जा रहे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब जो खुद कीचड से लथपथ थे, उन्‍हें देखकर लग रहा था कि जमकर  मुकाबला किया है उन्‍होंने भी नक्‍सलियों का..... लगातार निर्देश दिए जा रहे थे और आर आई  गुरजीत सिंह जवानों के शवों को मौके से उठाकर अस्‍पताल भिजवाने की व्‍यवस्‍था में लगे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब से बात की। उन्‍होंने मौके पर ही बाईट देने में सहमति बताई। करीब 20 मिनट तक वो लगातार बोलते रहे। कहीं कहीं वो रूकते, जिससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था कि कुछ समय पहले ही जिस जगह पर जिस व्‍यक्ति ने नक्‍सलियों से खूनी लडाई लडी हो, इस वक्‍त उसकी मन: स्थिति कैसी रही होगी। खैर वो बोलते रहे।  हमने भी उन्‍हें नहीं टोका।  वो सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम को बयां करते रहे और आखिरी में उन्‍होंने जो कहा, उसने झकझोर कर रख दिया, मुझे याद है उनके वो शब्‍द, ‘नक्‍सलियों ने दोनो ओर से फायरिंग की, हमने भी जमकर मुकाबला किया, नक्‍सलियों को कडा टक्‍कर देते देते  एसपी साहब शहीद हो गए हैं। करीब दो बजे ये लाईनें हमने सुनी। ढाई बजे के आसपास हम वहां से निकले और पांच छह मिनट में ही मानपुर पहुंच गए। जैसे ही नेटवर्क मिला तुरंत चैनल में यह खबर दी। ‘एसपी श्री वी के चौबे शहीद। उनके साथ 29 पुलिस जवान शहीद।’
वो पूरा वाक्‍या अब तक नहीं भूला है मुझे। अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी लाशें एक साथ नहीं देखी मैंने। और जब देखने मिलीं तो जवानों की। करीब दो साल से राजनांदगांव में एसपी रहे श्री वीके चौबे साहब एक ऐसे पुलिस अफसर थे जो आम इंसान की तरह ही रहते थे और उनका दरबार हर वक्‍त आम लोगों के लिए खुला रहता था। अपने मातहतों के लिए उनके मन में जो प्रेम था, उसी प्रेम ने उन्‍हें हर दिल अजीज बनाया था और उसी प्रेम के चलते वो शहीद हो गए।
दरअसल,  मानपुर क्षेत्र का मदनवाडा पहले नक्‍सलियों का गढ हुआ करता था। यहां नक्‍सली अपनी ट्रेनिंग कैम्‍प चलाते थे। इस क्षेत्र में नक्‍सलियों के वजूद को खत्‍म करने के लिए आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता और एसपी श्री वी के चौबे ने मदनवाडा में ही पुलिस कैम्‍प स्‍थापित किया। इससे नक्‍सली बौखला गये। उन्‍होंने एक बडी साजिश तैयार की। 12 जुलाई को सुबह उन्‍होंने सातवीं वाहिनी सीएएफ के दो जवानों को तब गोली मारी जब वो जवान शौच के लिए गए थे। ये नक्‍सलियों की साजिश का हिस्‍सा मात्र था, उनका निशाना कुछ और था। नक्‍सलियों को मालूम था कि यह खबर जिला मुख्‍यालय तक जाएगी और एसपी मौके पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। नक्‍सलियों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी और मानपुर से महज छह किलोमीटर दूर पक्‍की सडक पर बारूदी सुरंग लगा रखा था। एसपी  थे ही ऐसे,  वो अपने मातहतों के पास पहुंचते थे। इस खबर को सुनकर वो निकले..... पर नक्‍सलियों ने रास्‍ते में ही उन्‍हें रोक लिया। एसपी साहब एक बार नक्‍सलियों के चक्रव्‍यूह को भेदते हुए आगे निकल गए थे लेकिन फिर बीच में फंसे अपने जवानों के लिए वो फिर से मौके  पर पहुंचे और फिर दोबारा  वहां से नहीं निकल सके।
इस घटना में एसपी श्री वी के चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू,  उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वटटी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधानआरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी भी शहीद हो गए।
शहीद एसपी श्री चौबे की शहादत को सलाम करने आज राजनांदगांव में उनकी मूर्ति की स्‍थापना की जा रही है। चौबे साहब और शहीद जवानों को सलाम.................

07 सितंबर 2025

केदार और रेस्ट हाउस

छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री केदार कश्यप को लेकर एक नया बवाल खडा़ हो गया है। केदार पर जगदलपुर के सरकारी रेस्ट हाउस के एक कर्मचारी को पीटने का आरोप लगा है। हालाँकि केदार कश्यप ने खुद पर लगे आरोपों को गलत बताते हुए इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है। 

जगदलपुर रेस्ट हाउस के कर्मचारी जितेन्द्र पांडे ने आरोप लगाया है कि वो बीते 20 साल से दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहा है। उसने कहा है कि जगदलपुर रेस्ट हाउस में पहुंचे मंत्री केदार कश्यप ने कमरा नहीं खोलने का आरोप लगाते हुए उससे मारपीट की और उसे धमकाया। कर्मचारी का कहना है कि मंत्री जी ने उसे बेदम पीटा जबकि वो मंत्री जी के लिए ही भोजन तैयार कर रहा था।

इस मामले में विपक्षी कांग्रेस पार्टी आक्रमक हो गई है और उसने मंत्री केदार कश्यप के इस्तीफे की माँग की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज का कहना है कि एक गरीब कर्मचारी को पीटना भाजपाई संस्कृति का हिस्सा है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मंत्री केदार कश्यप को मंत्रीपद से हटाए जाने की माँग की है।

खुद पर लगे आरोपों पर केदार कश्यप का कहना है कि सब कुछ झूठा है, उन्होंने किसी कर्मचारी को नहीं मारा है। केदार ने इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है।

कांस्टीट्यूशन क्लब और संसद

संसद में सवाल पूछने के बदले रूपए लेने के आरोप में साल 2005 में संसद से बर्खास्त हुए राजनांदगाँव के तत्कालीन सांसद प्रदीप गाँधी इन दिनों फिर चर्चा में हैं। प्रदीप गाँधी हाल ही में दिल्ली में सांसदों और पूर्व सांसदों के लिए बने क्लब कांस्टीट्यूशन क्लब आफ इंडिया में निर्वाचित हुए हैं। 

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव आमतौर पर सचिव (प्रशासन), खेल सचिव, संस्कृति सचिव, कोषाध्यक्ष और 11 कार्यकारी सदस्यों के लिए कराया जाता है। 

कांस्टीट्यूशन क्लब के पदेन अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष  होते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इसके अध्यक्ष हैं। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर उपाध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश महासचिव के पद पर हैं। राजीव प्रताप रूड़ी सचिव (प्रशासन), राजीव शुक्ल सचिव(खेल), तिरुची शिवा सचिव (संस्कृति), एपी जीतेंद्र रेड्डी कोषाध्यक्ष हैं। कार्यकारिणी सदस्यों में सुरेंद्र नागर,  केसी त्यागी, संदीप दीक्षित, केआर मोहन राव, डी राजा, एपी जीतेंद्र रेड्डी, केएन सिंह देव, अजय संचेती, सुप्रिया सुले, तारीक अनवर और सतीश चंद्र मिश्रा. अरविंद कुमार इसके निदेशक हैं।

इस बार खेल सचिव के पद पर कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला और बीजेपी के राज्यसभा सांसद प्रदीप कुमार वर्मा की दावेदारी थी लेकिन अंतिम समय में बीजेपी के उम्मीदवार पीछे हट गए। इससे शुक्ल निर्विरोध खेल सचिव का चुनाव जीत गए। इसी तरह डीएमके सांसद तिरुचि सिवा बीजेपी के पूर्व सांसद प्रदीप गांधी की उम्मीदवारी वापस लेने के बाद संस्कृति सचिव चुने गए। डीएमके सांसद पी विल्सन कोषाध्यक्ष चुने गए हैं। टीआरएस के पूर्व सांसद एपी जितेंद्र रेड्डी ने कोषाध्यक्ष पद पर अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी इससे विल्सन कोषाध्यक्ष बने।

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव जीतने के बाद राजनांदगाँव लौटने पर प्रदीप गाँधी का सम्मान किया गया। सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष और राजनांदगाँव के विधायक डा रमन सिंह ने कहा कि प्रदीप गाँधी ने विधायक रहते हुए डोंगरगाँव विधानसभा की सीट उनके लिए छोडी़ थी और फिर सांसद रहते हुए संघर्षशीलता बनाए रखी। डा रमन ने कहा कि अब कांस्टीट्यूशन क्लब के   चुनाव में जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि सतत गतिशील रहकर कार्य करने वाला व्यक्ति नए मुकाम हासिल करता है। गाँधी की सम्मान सभा में राजनांदगाँव के मौजूदा सांसद संतोष पांडे, पद्मश्री डा पुखराज बाफना सहित कई गणमान्यजन मौजूद रहे।

गाँधी से जुडा़ एक बडा़ मामला साल 2005 में हुआ था। 2005 में 11 सांसदों को पैसे लेकर सवाल पूछने का दोषी पाए जाने के बाद उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी। इनमें एक राज्यसभा सांसद भी शामिल थीं। 12 दिसंबर 2005 को एक निजी चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें खुफिया कैमरों में कुछ सांसद संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेते हुए कैद हुए थे। देश के संसदीय इतिहास में ये पहली घटना थी। ये 11 सांसद किसी एक पार्टी के नहीं थे। इनमें से छह बीजेपी से, तीन बसपा से और एक-एक राजद और कांग्रेस से थे। बीजेपी से सांसद सुरेश चंदेल, अन्ना साहेब पाटिल, चंद्र प्रताप सिंह, छत्रपाल सिंह लोध, वाई जी महाजन और  प्रदीप गांधी, बीएसपी से नरेंद्र कुमार कुशवाहा और राजा राम पाल और लालचंद्र, आरजेडी से मनोज कुमार और कांग्रेस से राम सेवक सिंह शामिल थे।

उस समय स्टिंग ऑपरेशन के दौरान कुछ पत्रकारों ने एक काल्पनिक संस्था के प्रतिनिधि बनकर सांसदों से मुलाकात की थी। पत्रकारों ने सांसदों को उनकी संस्था की ओर से सवाल पूछने की बात कही और रिश्वत लेते हुए सांसदों का वीडियो बना लिया था।

इस पूरे कांड के सामने आने के 12 दिन बाद ही 24 दिसंबर 2005 को इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने को लेकर संसद में वोटिंग कराई गई थी। बाकी सभी पार्टियां आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के पक्ष में थीं पर बीजेपी ने वॉक-आउट कर दिया था। उस समय विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सांसदों ने जो किया, वो बेशक भ्रष्टाचार का मामला है, लेकिन निष्कासन की सजा ज्यादा है।

पिछली लोकसभा यानि 2019 से 2024 के दौरान भी 'कैश फॉर क्वेरी' का एक मामला हुआ था। साल 2023 की दिसम्बर में त्रिणमूल सांसद महुआ मोइत्रा को पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था। महुआ के निष्कासन के संसद के एथिक्स कमेटी की सिफारिश पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सहमति जताते हुए महुआ की उस मांग को ठुकरा दिया था जिसमें उन्होंने लोकसभा में अपनी बात रखने समय मांगा था। इसके बाद उन्हें निष्कासित कर दिया गया था।