70 साल की उम्र में एम्स में उपचार के दोरान हुआ निधन, पैरालिसिस से थीं पीडि़त
छत्तीसगढ़ में पंडवानी की पर्याय रहीं तीजन बाई नहीं रहीं। पद्मविभूषण तीजन बाई ने राजधानी रायपुर के एम्स में आज तड़के करीब सवा 3 बजे अंतिम सांस ली। 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग के गनियारी गाँव में जन्मीं डॉ. तीजन बाई 70 साल की थीं।
लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही तीजन हुकुमचंद परधा और सुखवाती बाई की बेटी थीं। बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी को छत्तीसगढ़ी और हिंदी में महाभारत की कहानियां गाते सुनकर उन्हें ये कहानियां याद हो गई थीं, जिसके बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से इसका अनौपचारिक प्रशिक्षण भी लिया।
तीजन बाई के अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में कलाकारों, साहित्यकारों, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों के पहुंचने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण तीजन बाई को श्रद्धासुमन अर्पित किया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सुबह एम्स पहुंचकर तीजन को श्रद्धांजलि अर्पित की। विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर चरणदास महंत, पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव सहित अनेक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।प्रधानमंत्री मोदी ने प्रख्यात पंडवानी गायिका तीजन के निधन पर सोशल मीडिया पर जारी संदेश में कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाई। प्रधानमंत्री ने उनके निधन को कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए परिजनों और प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।
मात्र 13 साल की उम्र में अपना पहला मंचीय प्रदर्शन करने वाली तीजन बाई पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली को चुना और खड़े होकर प्रदर्शन करना शुरू किया, जबकि उस दौर में महिलाएँ बैठकर पंडवानी गाती थीं। तीजन बाई ने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के सामने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दीं थीं। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की और मॉरीशस सहित 17 से अधिक देशों में छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का डंका बजाने वाली तीजन बाई को 1988 में पद्म श्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 2018 में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जापानी पुरस्कार ‘फुकुओका पुरस्कार’ और 2019 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से विभूषित तीजन बाई को बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डी. लिट की मानद उपाधि भी दी गई थी।
जीवन के आखिरी पड़ाव में काफी कठिन दौर से गुजरने वालीं तीजन ने बड़े बेटे की मौत के सदमे के बाद अपनी बीपी की दवाई लेना बंद कर दिया था। जिसके कारण साल 2024 में उन्हें अचानक पैरालिसिस यानी लकवा मार गया। तब से वह लगातार बीमारी से जूझ रही थीं, जिसकी वजह से उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया था और वह लंबे समय से बेड पर थीं। हाल ही में फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत होने के बाद उन्हें 27 मई को एम्स रायपुर के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान रात 3:15 बजे उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।
तीजन बाई को सुनना केवल गायन सुनना नहीं था। वह एक ऐसा अनुभव था जिसमें श्रोता धीरे धीरे महाभारत के कथा संसार में प्रवेश करता चला जाता था। उनके हाथ में तंबूरा रहता था, लेकिन प्रस्तुति के दौरान वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुशासन के अहंकार को चुनौती देता प्रतीक और कभी किसी असहाय पात्र की वेदना का सहारा बन जाता।
पंडवानी छत्तीसगढ़ के लोकमानस में पीढ़ियों से प्रवाहित होती रही है। महाभारत की कथा जब लोक में उतरती है तो वह केवल राजवंशों के संघर्ष की कथा नहीं रहती। उसमें गांव का जीवन प्रवेश कर जाता है। उसमें किसान की पीड़ा, स्त्री की वेदना, अन्याय के विरुद्ध आक्रोश और सामान्य मनुष्य की आशाएं शामिल हो जाती हैं। तीजन बाई ने इसी लोक महाभारत को अपना स्वर दिया।
