29 जनवरी 2011

आखिरी खत...


प्रिय मीनू,
          
हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैंने कभी भी तुम्‍हारा दिल दुखाना नहीं चाहा था, लेकिन जो कुछ भी हुआ, उसका मुझे जरा सा भी अहसास नहीं था। हां यह जरूर सच है कि उस वाक्‍ये से तुम्‍हे तकलीफ हुई होगी और तुम्‍हारे दिल को ठेस लगी होगी। तुम मुझे बेवफा भी समझ रही होगी। कुछ हद तक यह सच भी है लेकिन वास्‍तविकता क्‍या है इसे सिर्फ और सिर्फ मैं ही जानता हूं। 
मुझे याद है वह दिन, जब हम मिले थे। तुमसे पहले भी कई लडकियां मिलीं लेकिन उनसे सिर्फ दोस्‍ताना रहा। तुममे मुझे एक अलग ही कशिश दिखी। फिर क्‍या था, मैं तुम्‍हारी ओर आ‍कर्षित होता चला गया। हमारी मुलाकातें बढती चली गईं। दिल तो चाहता था कि तुमसे बहुत कुछ कहूं पर तुम्‍हारे सामने आने पर मानो जुबान पर ताले पड जाते। कहते हैं न कि जो बात मुहब्‍बत में जुबान नहीं कह पाती वह नजरें कह जाती हैं। यही हमारे साथ हुआ। समय गुजरता रहा। जुबां खामोश रही। नजरों से बात होती रही। और एक दिन...।
क्‍या तुम भूल सकती हो उस दिन को। हम एकांत में बैठे थे और मैंने हौले से तुम्‍हारे हाथों को अपनी हथेली से दबाकर तुम्‍हारे कानों में अपने प्‍यार का इजहार किया था। इसके बाद हमारे दिलों में प्‍यार का जो लावा था वह फूट पडा था। तुमने भी अपने दिल की बातें कहीं। फिर हमने एक दूसरे के साथ जिंदगी की खुशियां को बांटने की ख्‍वाहिशो और गम को साथ साथ जीने की कसम ली। समय पंख लगाकर उडने लगा। दिन महीनों में और महीनें साल में बदलने लगे। हां पूरे तीन साल हो रहे थे हमें मिले हुए। एक दूसरे के साथ ये तीन साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। इन गुजरे सालों में हमारे दरमियां प्‍यार और तकरार का खेल चलता रहा। एक दूसरे से रूठना और मान जाना, सच में इसका भी अलग ही मजा है।
कितनी हंसी शाम थी वह जब तुम मेरी पसंदीदा रंग की प्‍यारी सी सलवार और कुर्ते में मुझसे मिलने आई थी। साथ में मेरे उसी पसंदीदा गुलाबी रंग की जैकेट और उस पर काले धागे की कसीदाकारी, तुम्‍हे और भी खूबसूरत बनाए दे रही थी। मुझे अच्‍छी तरह याद है, तुम्‍हारा जन्‍मदिन था उस दिन। मैं यह भी नहीं भूला कि जन्‍मदिन पर नायाब तोहफा देने का वादा किया था मैंने तुमसे। मुझे यकीन है, मेरे उस तोहफे को तुमने आज भी सहेज कर रखा होगा। आज भले की हमारे बीच दूरियां बढ गईं हों, लेकिन यह सच है कि हम कभी एक दूसरे के करीब थे, बहुत करीब। वक्‍त गवाह है हमारी मुहब्‍बत का। मैं चाहता था कि तुम्‍हे कभी किसी चीज की कमी न हो। इसके लिए चाहिए था पैसा। पैसे के लिए काम। मैं अब तुम्‍हे कम समय दे पाता था। मेरा अधिकांश समय काम में निकल जाता था। वैसे भी मैं उस पेशे से जुडा था जिसमें समय की कोई पाबंदी या बंदिश नहीं थी पर किसी भी समय कोई काम निकल जाता था और मुझे जाना पडता था। हमें मिले तीन साल तो हो गए थे और तुम्‍हारे घर में भी तुम्‍हारी शादी के लिए दबाव बढता जा रहा था। ऐसे में मुझे जल्‍द ही स्‍वयं को अच्‍छी तरह से स्‍थापित कर तुम्‍हारे घरवालों से बात भी करनी थी।
अब हम पहले की तरह रोज नहीं मिल पाते थे। हमारी मुलाकात मेरी साप्‍ताहिक छुटटी के दिन ही हो पाती थी। एक दिन तुम्‍हारे घर जाने पर मुझे मालूम हुआ कि तुम अपने मामा के घर दूसरे शहर गई हो और अब वहीं रहोगी। तुम्‍हारी सहेलियों से मुझे मालूम चला कि तुमने अपने मामा के शहर के कालेज में प्रवेश ले लिया है। मुझे बहुत आश्‍चर्य हुआ, यह सोचकर कि किस रंग के कपडे पहनूं से लेकर हर काम मुझसे पूछकर करने वाली लडकी ने इतना बडा फैसला ले लिया और मुझे इसकी जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा।
... खैर मैं यह सोचकर चुप हो गया कि शायद तुम्‍हारी कोई मजबूरी रही होगी। मैंने सोचा तुमने मुझे इतने बडे फैसले से अलग क्‍यों रखा यह तो तुमसे मिलने पर ही पता चलेगा। मैंने तुम्‍हारे मामा के घर का पता तुम्‍हारी सहेलियों से लिया और वहां जाने का मन बनाने लगा। एक शाम जब आफिस से लौटकर मैंने घर का दरवाजा खोला तो चौखट पर एक खत पडा मिला। खत के  लिफाफे में तुम्‍हारी लिखावट में अपना नाम और पता देखकर मैंने खुद को एक पल भी रोक नहीं पाया और लिफाफा फाडकर खत को पढने लगा। खत में लिखे एक एक वाक्‍य मुझे कांटों की तरह चुभने लगे और मुझे दुनिया घूमती हुई नजर आने लगी। तुम्‍हारी बेरूखी और मुझ पर बेवफाई का इलजाम लगाने का कारण मुझे समझ नहीं आया। तुम्‍हारे खत का मजनून कुछ ऐसा ही था ना...,

‘’राज ,

मैं तुमसे दूर जा रही हूं। हमेशा हमेशा के लिए। जी तो चाहता है कि खुद को खत्‍म कर लूं और मुक्‍त हो जाऊं इस दुनिया से लेकिन फिर यह सोचकर जीना कबूल किया कि बेवफाई तुमने की तो मैं अपनी जिंदगी क्‍यों समाप्‍त करूं। हां, मैं जीऊंगी और दिखा दूंगी कि प्‍यार में धोखा खाने के बाद भी जिया जा सकता है। एक वह समय था जब हम दोनों रोज मिलते थे, फिर हमारे दरमियां दूरियां बढती गईं। कभी कभी मेरे मन में यह विचार आता था कि कहीं तुम मुझसे ऊब तो नहीं गए फिर एक ही पल में अपने विचारों को झटक देती थी और अपने ही आप से कह उठती, नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मैं यह कैसे सोचने लगी। मैंने तुम्‍हारी हर बात पर आंख बंद कर विश्‍वास किया। मैं यही सोचती कि तुम्‍हारा पेशा ही ऐसा है जिसमें वक्‍त की कोई पाबंदी नहीं रहती, कभी भी काम निकल आता है लेकिन तुम...?

तुम्‍हारी हर गलती को मैं यह सोचकर नजरअंदाज कर देती कि अब तुम सुधर जाओगे। कभी कभी गुस्‍से में आकर तुम मुझे उल्‍टा सीधा कह देते तो मैं अवाक रह जाती। सोचती कि तुम कितने बदल गए हो? हां, बहुत बदल गए थे तुम इन तीन सालों में। तुम्‍हारे स्‍वभाव में मुझे चिडचिडापन साफ झलकने लगा था, फिर भी मैं तुम्‍हारा विरोध नहीं करती थी। आखिर हमने प्‍यार किया था और प्‍यार में सहना पडता है सब। तुम ही कहते थे न कि प्‍यार में ‘मैं’ और ‘तुम’ की भाषा नहीं चलती। प्‍यार में मैं और तुम को मिलाकर हम बनाना पडता है। मैंने तो ‘हम’ में जीना सीख लिया, पर तुम क्‍यों भूलने लगे?

मैं नहीं जानती थी कि तुम बेदर्द होने के साथ साथ बेवफा भी हो सकते हो। उस दिन जब तुम्‍हारे एक दोस्‍त ने मुझे तुम्‍हारे बारे में कुछ बातें बताईं तो मैं सन्‍न रह गई। पूरी बात मैं सुन नहीं सकी और उठकर चली गई। भले ही मैंने पूरी बातें नहीं सुनीं पर सारी बातें स्‍पष्‍ट हो गई थी। तुम्‍हारा वो रूखा व्‍यवहार, तुम्‍हारी चिडचिडाहट, मुझसे बढती दूरियां... और अब सुनने समझने के लिए क्‍या रह जाता है। तुम जानते थे कि मैं सब कुछ सह सकती हूं किंतु यह नहीं सह सकती कि तुम पर मेरे अलावा कोई और अपना हक जताए। तुमने मेरे विश्‍वास को ठेस पहुंचाया है... मैं जा रही हूं... तुमसे दूर... बहूत दूर...। नई जिंदगी की तो अब तलाश नहीं है, लेकिन पुरानी जिंदगी भी काटने लगी है मुझे।

अलविदा।

-मीनू’’

मीनू,

तुमने मुझ पर बेवफाई का इल्‍जाम तो लगा दिया पर एक बार तुम्‍हे मुझसे बात तो करनी थी। इतना बडा फैसला तुमने स्‍वयं ले लिया। क्‍या तुम्‍हे मुझ पर यकीन नहीं था? अरे, तुम कहती हो मैं ‘हम’ को भूल गया, नहीं, मुझे आज भी याद है, शायद तुम भूल गई तभी तो तुम चली गई, अकेले ही फैसला लेकर। जिंदगी में कई मौके ऐसे आते हैं, जब इंसान को कई बातें सुननी पडती हैं। कुछ सही होती हैं, कुछ गलत। दुनिया में बनाने वाले बहुत कम होते हैं जबकि बिगाडने वालों की संख्‍या असंख्‍य होती है। तुमने मुझ पर बेवफाई का इल्‍जाम लगा दिया, कैसी बेवफाई का?  खुलासा तुमने नहीं किया। मेरी समझ में नहीं आता कि मेरे किस दोस्‍त ने तुम्‍हे मेरे खिलाफ भडकाया है। प्‍यार की डोर विश्‍वास के कच्‍चे धागे से बंधी होती है, जो हल्‍की सी चोंट पर टूट जाती है। मैं तुम्‍हे कोई सफाई नहीं दे रहा हूं। सफाई की स्थिति तो तब आती है जब कोई गल्‍ती की गई हो। हां इतना जरूर है कि मेरी जिंदगी में तुम्‍हारे सिवा कोई दूसरी नहीं है।
तुमने लिखा है कि दूर जा रही हूं, बहुत दूर, जबकि मुझे नहीं लगता कि हम दूर हैं। प्‍यार का अहसास हमें एक दूसरे से जोडा हुआ है। यदि तुम्‍हे मेरी बातों का यकीन हो गया हो तो इस खत के मिलते ही मुझे खत लिखना वरना मैं यह समझूंगा कि मेरा यह आखिरी खत है तुम्‍हे।
                                   
                                                              तुम्‍हारा 
                                                                राज


18 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया है, लम्बी कहानी रही!

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  2. जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था..लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है..प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है...यक़ींनन यह ग़ज़ल इस पोस्ट पर निहायत फिट बैठती है..पूराने ज़ख्म क्यों छेड़ रहे हो अतुल जी....

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  3. अच्छा अन्दाज़े जुदा है....पर कारण क्या था. कहां स्पष्ट हुआ.....

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  4. atul ji shukriyaa shukriyaa is liyen ke aapne aayna dikhaya or chehra sudharne kaa moqaa diyaa dusri baat yeh behtrin aakhri kht chaahe ho aapkaa lekin aap pliz aakhri tippni mt krna mujhe smbhalte or sudhaarte rhnaa mhrbaani hogi . aek baar or shukriya . akhtar khan akela kota rajsthan

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  5. प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है,बढ़िया .....

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  6. मन को झिंझोड़ती हुई संवेदनात्मक कहानी ....अपने उदेश्य में सफल है ...आपका आभार

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  8. Hey Atul,

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  9. बहुत ही बेहतरीन कहानी........... दिल को छूती हुई सुंदर प्रस्तुति.
    सृजन _ शिखर पर आपका स्वागत है.

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  10. आपसे अपडेट्स मिलते रहें ऐसी व्यवस्था कर ली है ! पहली मर्तबा आया हूं सो उद्धृत प्रेम पर कमेन्ट नहीं कर रहा हूं ! इस ब्लॉग का लिंक देने के लिए आपका आभार !

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  11. .

    प्यार में धोखा खाने के बाद बाद भी लोग जिया करते हैं हैं...बहुत खूब !

    " प्रेम और नफरत कुछ भी स्थाई नहीं होता "

    .

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  12. Behtreen Prastuti......seedha man mandir me uter gayi..........
    http://amrendra-shukla.blogspot.com

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  13. अच्छी कहानी है, खतोँ के जरिए बखूबी बात कही गई है। पर जैसा डॉ श्याम जी ने कहा अलगाव का कोई स्पष्ट कारण नहीं दिख रहा है।

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  14. दिल को छूती हुई सुंदर प्रस्तुति|

    आप को बसंत पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएँ|

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  15. आखिरी खत पर टिप्‍पणी करने वाले सभी साथियों का आभार। डा श्‍याम जी का सवाल अपनी जगह सही है। पर जहां तक कहानी के नायक 'राज' की बात है, उसके समक्ष भी कहां कोई कारण स्‍पष्‍ट हो पाया। वह भी उहापोह में रहा कि आखिर उसका प्रेम उससे रूठ कैसे गई। बहरहाल, आप सभी का एक बार और आभार।

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  16. कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी. यूँ कोई बेवफा नहीं होता .लड़कियों को समझना टेढ़ी खीर है. ये भावुक लोगों को मूर्ख समझती हैं. मामा के यहाँ जाने के पहले खुद उसने ये बात छुपाई. इसे "समय चक्र" का खेल मनो . डिप्रेशन ज्यादा दिन साथ नहीं रहता. जब वो अपने रास्ते खुद तय कर सकती है तो हमें भी कठोर होना ही पड़ता है. इश्वर की इस अनमोल कृति का हमेशा सम्मान करना. उसके साथ गुजारे ज़िंदगी के हसीन पल को हमेशा जिंदा रखना. वो तुम्हे आतंरिक ताकत देगा.

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