03 जनवरी 2016

सफर 2015 से 2016 का...

2016 आ गया। यह साल कैसा होगा, यह तो समय के गर्भ में हैं लेकिन हर कोई अपने अपने अंदाज में इसकी व्याख्या करने में लगा हुआ है। कोई खुद को २० का होना और अपनी प्रेयसी को १६ का हो जाने का शायराना अंदाज दिखा रहा है तो कोई सुफियाना अंदाज में कह रहा है, 21 वीं सदी को सोलहवाँ साल लग गया। कोई कहता है, वक्त वक्त की बात है, कभी कैलेंडर तारीख बदलता था और आज तारीख ने कैलेंडर बदल दी है।

नए साल का तीसरा दिन बीत रहा है। इस नए साल के आने के पहले से 365 दिनों तक साथ निभाने वाले 2015 पर कुछ लिखने का मन था, लेकिन ऐसा कम ही हो पाता है कि जो मन मे हो, वो हो जाए। सो विलंब होता रहा। चलो देर से ही सही, आज कुछ वक्त चुराकर अपने 'साथी' 2015 के लिए कुछ लिख ही लिया जाए।

वैसे तो हर दिन खास होता है। हर महीना खास होता है। हर साल खास होता है। सभी कुछ न कुछ अच्छे अनुभव दे जाते हैं। बुरे हालात पैदा करते हैं। पर यदि 2015 की बात करूँ तो इस साल ने कुछ उपलब्धियाँ मेरे नाम करने का काम किया है। बीते लगभग 21 सालों से  यानि अपनी उम्र का तकरीबन आधा हिस्सा जिस पेशे को दिया, उसका एक दस्तावेज रूप तैयार इसी 2015 में हुआ। मेरी सालों की मेहनत किताब रूप में सामने आई। नई दिल्ली के ब्लू बॅक पब्लिकेशन्स के माध्यम से 'फ्रंट पेज' नाम से मेरी किताब इस साल के आखिर में यानि धनतेरस के दिन आई।

2015 में एक और बड़ा बदलाव आया। पिछले एक दशक से ज्यादा समय तक इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने के बार इस साल के मध्य में फिर से प्रिंट में जाने का मौका मिला। दो दशक पहले पत्रकारिता की शुरूआत प्रिंट से ही करने के बाद करीब दस साल तक अलग अलग अखबारों में काम करने के बाद 2004 में सहारा समय (अब समय) में कैमरे के साथ आंखमिचौली की और अब अगस्त से फिर से कलम थाम ली है, 'पत्रिका' के जरिए, कोशिश है कि जनसरोकार की पत्रकारिता पर टिके रहने का काम करता रहूंगा।


2015 ने एक और उपलब्धि दिलाई। हर साल विश्व के अलग अलग देशों में अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन आयोजित करने वाली संस्था 'परिकल्पना' ने इस साल थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में होने वाले अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन में मेरा चयन 'परिकल्पना ब्लॉग सम्मान' के लिए किया है। सितम्बर महीने में इस सम्मान की घोषणा हुई। 2015 की यह घोषणा 2016 के प्रारंभ यानि जनवरी में पूरी होगी। तो स्वागत है 2016, तुम्हारे साथ जनवरी का पहला पखवाड़ा थाईलैंड में बिताना है और लेना है ब्लॉग सम्मान...!

उम्मीद है यह पूरा साल खुशगवार गुजरेगा!

08 दिसंबर 2015

इस पर बोलिए हुजूर...

लोकसभा में सांसद अभिषेक सिंह
बड़े दिनों बाद टीवी पर लोकसभा की कार्रवाई का सीधा प्रसारण देखा, देखने की वजह थी, सांसद (राजनांदगांव) कार्यालय से आया एसएमएस।

इस एसएमएस में लिखा गया था कि सांसद अभिषेक सिंह संसद में छत्तीसगढी़ भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखने की मांग रखेंगे।

राजनांदगांव के सांसद सोमवार को लोकसभा में प्रश्नकाल पर बोले। करीब दो से तीन मिनट, या शायद साढ़े तीन मिनट। कागज हाथ में था और बोलते समय ज्यादातर समय उनकी आंखें कागज पर थी। शायद लिखकर लाए थे और उसे पढ़ रहे थे।

संसद में सोमवार को एक और युवा को सुना। ज्योतिरादित्य सिंधिया। सूखे पर करीब आधा-पौन घंटा वो बोले। छत्तीसगढ़ के सूखे पर भी सिंधिया ने काफी कुछ कहा। देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सूखे, ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से कुल रकबे के २० फीसदी से ज्यादा के प्रभावित हो जाने पर चिंता जताते हुए उन्होंने कई आंकड़े प्रस्तुत किए।

छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर संसद में बोला गया उनका वक्तव्य पर आपत्ति नहीं लेकिन जब पेट भरा न हो तो पेट भरने के विषय पर चर्चा हो तो ज्यादा बेहतर। सूखे की मार के चलते छत्तीसगढ़ के अधिकांश इलाके त्रस्त हैं। राजनांदगांव के सभी ब्लाक सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं, ऐसे में यदि अपने सांसद को सूखे पर बोलते सुनता तो अच्छा लगता और यदि सासंद इस विषय पर बोलते तो शायद उनको लिखकर लाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि सूखे के कारण अपनी जान दे चुके एक किसान के घर होकर वो खुद आ चुके हैं।

कितनी अजीब बात है ना?
राजनांदगांव जिले में सूखे के कारण करीब आठ किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यहाँ के सूखे पर यहाँ से काफी दूर दूसरे प्रदेश गुना के सांसद बोल रहे हैं और हमारे सांसद इस पर नहीं, किसी और विषय पर...!!!

शायद इसलिए कि राज्य में और केन्द्र में सरकार उसी पार्टी की है, जिस पार्टी के सांसद हमारे प्रतिनिधि हैं, पर कुछ विषय पार्टी और विचारधारा से हटकर होना चाहिए, ये सामाजिक सरोकार के विषय हैं, इस पर बोलने से परहेज नहीं करना चाहिए।

01 दिसंबर 2015

ऑपरेशन कीजिए डॉक्टर साहब!

साभार के साथ पत्रिका अखबार में इस आशय की छपी खबर
कुछ समय पहले मैंने लिखा था कि प्रदेश का शिक्षा मंत्री प्रदेश भर में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के लिए रोल मॉडल होता है... पर माफ करें, ये तो कतई रोल मॉडल नहीं हो सकते, यह उस समय भी तय था और इन महाशय ने अपनी हरकतों से इस बात पर फिर से मुहर लगाने का काम कर दिया है। शिक्षा हर किसी का अधिकार होता है और बेहतर शिक्षा के लिए किसी मेधावी बच्चे को यदि उसके मजहब के आधार पर आंका जाए तो माफ करें, इनकी बुद्धि पर तरस आता है।
छत्तीसगढिय़ा सबले बढिय़ा का नारा बुलंद किया जाता है यहां, पर माफ करें प्रदेश के शिक्षा मंत्री महोदय आपकी हरकतें आपको बढिय़ा नहीं, घटिया साबित कर रही हैं। प्रदेश के शिक्षा मंत्री केदार कश्यप को लेकर एक खबर आई है कि उन्होंने एक मेधावी बच्ची की शिक्षा के लिए मदद मांगे जाने पर उस बच्ची और मदद मांगने गईं उसकी शिक्षिका दोनों को उठाकर बाहर फेंक देने का आदेश दे दिया!
खबर का सार यह है कि एक सामाजिक कार्यकर्ता जो कोचिंग सेंटर चलाती हैं, के यहां एक मुस्लिम बच्ची (बच्ची का नाम कुछ भी हो सकता है) पढ़ती है। यह बच्ची होनहार है। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं, पर आगे पढऩे की ललक है। यह सामाजिक कार्यकर्ता उस बच्ची को लेकर शिक्षा मंत्री के पास जाती हैं। उनसे बच्ची की शिक्षा के लिए मदद की गुहार लगाती हैं लेकिन जैसे ही मंत्री महोदय बच्ची के आवेदन में उसका समुदाय देखते हैं, उनके मुंह से निकलता है, अच्छा ये मुस्लिम है। वे अपने सुरक्षा कर्मियों को बुलाते हैं और दोनों को उठाकर बाहर फेंक देने का आदेश दे देते हैं।
ये वही शिक्षा मंत्री हैं, जिनकी पत्नी ने कुछ समय पहले 'मुन्नीबाई' का दर्जा हासिल किया था। जी हां! इनकी पत्नी को कॉलेज पास करने का कीड़ा काटा था, पर उनमें योग्यता नहीं थी तो उन्होंने सिर्फ परीक्षा के लिए फार्म भरा था और परीक्षा किसी और ने दी थी। मामला पकड़ में आ गया और पूरे प्रदेश में बवाल मच गया था। अब ऐसे शिक्षा मंत्री से और बेहतर की क्या उम्मीद की जा सकती है।
पर प्रदेश के मुखिया। पेशे से चिकित्सक रहे प्रदेश के मुखिया को अपनी टीम के ऐसे साथियों की गंभीर बीमारी पर कोई ठोस इलाज करना चाहिए। न जाने क्या मजबूरी है, वो ऐसा नहीं कर रहे हैं। पहले मामले में मुखिया ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया था कि परीक्षा मंत्री ने थोड़े ही दिया है। इस बार हालांकि उन्होंने अपने मंत्रियों को संयम बरतने की सलाह दी है। डाक्टर साहब, अब ऐनासीन, क्रोसीन से काम नहीं चलने वाला... आपके मंत्रियों की बीमारी गंभीर हो गई है, ऑपरेशन कीजिए, तभी सुधार होगा।

04 सितंबर 2015

सब पर भारी एक डाक्टर

राजनांदगांव के जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिल गया है। पिछले साल बड़ी तेजी से काम कर ऐसा किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इसके लिए तब के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल और स्वास्थ्य विभाग के राजधानी में बैठे अफसरों की खूब पीठ थपथपाई थी। काम भी अच्छा था। पर मुख्यमंत्री के माननीय मंत्री और उनके अफसरों की कार्यक्षमता पर उस समय सवाल खड़े हो जाता है, जब यह खबर सामने आती है कि मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में ही एक डॉक्टर का प्रकरण छह साल से बिना जांच के पड़ा हुआ है। वह डाक्टर निलंबित हो जाता है। सरकार से 75 प्रतिशत गुजारा भत्ता लेना शुरू कर देता है और फिर जिला अस्पताल के सामने ही नर्सिंग होम खोलकर सरकारी अस्पताल की खामियों का फायदा उठाते हुए वहां के मरीजों को अपने यहां खींचना शुरू कर देता है। 
राजनांदगांव के जिला अस्पताल में भेषज्ञ विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर रंगारी को सितम्बर 2009 में मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने के बदले रिश्वत लेने के आरोप में अक्टूबर 2009 में निलंबित किया गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने जांच बिठा दी। जांच न जाने किस मुहुर्त में बिठाई गई, वह अब  तक शुरू ही नहीं हो पाई है। व्यवस्था की खामी ऐसी है कि अब डॉ. रंगारी का 'अपराध' सामान्य लगने लगा है। छह सालों में जांच क्यों शुरू नहीं हो पाई, इस पर यदि जांच हो जाए तो संभवत: राजनांदगांव से लेकर राजधानी तक के स्वास्थ्य अमले के कई अफसरों पर गाज गिर सकती है। सबने इस प्रकरण को लटकाकर सरकारी धन की बर्बादी में अपना अपना पर्याप्त योगदान दिया है।
डॉ. दिवाकर रंगारी का प्रकरण अपने आप में अजूबे की तरह है। पूरा शहर चर्चा करता है कि डॉ. रंगारी अपने निलंबन को बनाए रखने हर जतन करते हैं। कलक्टर शासन को पत्र लिखकर कहते हैं कि प्रकरण में कोई जांच करना नहीं चाहता। वो यह भी कहते हैं कि डॉ. रंगारी खुद सबसे फायदे की स्थिति में हैं। तीन साल पहले जीवनदीप समिति की बैठक में स्वास्थ्य मंत्री के सामने मामला लाया जाता है। मंत्री जल्द से जल्द निपटारे का निर्देश देते हैं, पर होता कुछ नहीं। डॉ. रंगारी कहते हैं कि वो खुद याचक की भूमिका में हैं। वो तर्क देते हैं कि यदि जांच को वो रोक सकते हैं तो समझ लीजिए कि सरकार में डॉ. रंगारी की कितनी चलती है। 
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक डॉक्टर मेडिकल सर्टिफिकेट लेने के आरोप में निलंबित होता है और उसके प्रकरण में छह साल तक जांच ही शुरू नहीं हो पाती। सवाल यह भी नहीं है कि वह डॉक्टर बिना काम किए आधे से ज्यादा पगार पा रहा है। सवाल यह भी नहीं है कि वह सरकारी अस्पताल के सामने ही निजी नर्सिंग होम खोलकर सरकारी अस्पताल के मरीजों को अपने यहां खींचने का काम कर रहा है। सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री के क्षेत्र में स्वास्थ्य जैसे मसले पर अफसर इस तरह से लापरवाही से काम करते हैं, तो प्रदेश के दूसरे इलाकों में क्या होता होगा? विभागों में क्या होगा? लगता है, अफसरों पर सीएम का डर खत्म हो गया है। यह हाल तब है, जब सीएम के पुत्र अभिषेक  सिंह  स्वयं राजनांदगांव के सांसद हैं। 

06 अगस्त 2015

एमपी नहीं, सीजी गजब है...!

इस महिला ने दी मंत्री की पत्नी की जगह परीक्षा
पड़ौसी राज्य मध्यप्रदेश का एक विज्ञापन टीवी पर अक्सर देखने मिलता है, 'एमपी गजब है'... एमपी यानि मध्यप्रदेश के छोटे भाई सीजी यानि छत्तीसगढ़ ने खुद को 'गजब' साबित कर दिया है! हम आभारी हैं, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का, जिनके  'अथक प्रयास' से ऐसा हो पाया है!!! किसी समय देश की एक राष्ट्रीय मेग्जिन ने डॉ. रमन सिंह को नंबर वन सीएम का दर्जा दिया था। बाद में छत्तीसगढ़ की जनता ने उनको एक दर्जा दिया, देश में सबसे ज्यादा श्रद्धांजलि देने वालों में सबसे अव्वल सीएम होने का। अब मुख्यमंत्री एक नए 'अवतार' में सामने आए हैं। अपने मंत्रियों के लिए 'तारणहार' के अवतार में सामने आए हैं! हाल की दो घटनाओं के बाद  मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रियों के बचाव में जिस तरह की बयानबाजी की है, उसने यही कहने मजबूर कर दिया है, गजब है...!!!!!
प्रदेश का शिक्षामंत्री प्रदेश भर में शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थियों के लिए रोल मॉडल की तरह होता है। गजब है... यह रोल मॉडल, जिनकी पत्नी की जगह कोई दूसरा परीक्षा देने बैठ जाता है। शिक्षामंत्री का बयान आता है, उनकी जानकारी में नहीं था यह! गजब है...! कौन पति होगा, जिसे पता नहीं होगा कि उसकी पत्नी परीक्षा दे रही है और परीक्षा के लिए उसने क्या तैयारी की होगी! गजब है...! साली को आधी घरवाली कहा जाता है! केदार बाबू, ये सिर्फ कहा जाता है, सिर्फ कहा जाता है, आपने तो...!!! गजब है...!
एक फिल्म आई थी, मुन्नाभाई एमबीबीएस। इस फिल्म में नायक नकल कर एमबीबीएस की परीक्षा देता है। राजकुमार हिरानी ने ऐसे कृत्यों को करने वालों के लिए जाने अनजाने एक शब्द दे दिया, मुन्ना भाई! लो हमने हिरानी को एक नया टाईटल दे दिया फिल्म बनाने के लिए, मुन्नीबाई, ...गजब है...! याद करें, एक और फिल्म आई थी, इंकलाब। इस फिल्म के नायक को तंत्र के चक्रव्यूह में पड़कर अपनी सरकार में ऐसे लोगों को मंत्री बनाना पड़ता है, जो उस अनूठे थे। मसलन, गृहमंत्री वो बना, जिसका अपना परिवार नहीं टिक पाया। शिक्षामंत्री वो बना, जो अंगूठा छाप था। आदि आदि। गजब है...!!! आपके पास तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं, फिर ऐसा क्यों सीएम साहब! गजब है...!
छत्तीसगढ़ में नसबंदी कांड हुआ था। नसबंदी के दौरान कई महिलाओं की जान चल गई थी। स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की बात हुई तो मुख्यमंत्री महोदय का बयान आया कि मंत्री ने थोड़े ऑपरेशन किया था। गजब है...! अब जब शिक्षामंत्री की पत्नी के स्थान पर कोई दूसरी परीक्षा देते हुए पकड़ी गई। एक बार फिर इस्तीफे की मांग हुई। मुख्यमंत्री को अपना पुराना बयान रटा-रटाया था। रिपीट कर दिया। मंत्री ने परीक्षा थोड़े दी है! गजब है...!