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07 अगस्त 2017

आखिर कब तक????



दो और जवान शहीद हो गए। राखी के‍ एक दिन पहले दो बहनों ने अपने भाईयों को खो दिया। राखी की सुबह दोनों शहीदों को गार्ड आफ ऑनर दिया गया। पुलिस, प्रशासन और शहीदों के परिजनों की आंखों से आंसू बहता देख हर आंखें नम रहीं। पर एक बात तय हो गई कि राजनीति क्षेत्र में संवेदनाएं मर गई हैं। शहीदों को अंतिम‍ बिदाई देने भी उंगलियों में गिने जाने वाले नेता मौजूद थे। क्‍या हुआ, मुख्‍यमंत्री ने अपने विधानसभा क्षेत्र में पांच पांच लालबत्तियां बांटी है। उपस्थिति एक की ही रही। 

आज रक्षाबंधन का त्‍यौहार है। हम सब इतराएंगे... सब अपनी कलाई पर अपनी बहनों का प्रेम देख इतराएंगे 

बहनें भी इतराएंगी कि हमारी रक्षा करने वाले भाई की कलाई पर मैंने डोर बांधी है और मेरा भाई हमेशा मेरे लिए, मेरी हर मुश्किल हालात में मेरे साथ होगा, लेकिन उस बहन का क्या, जिसके लिए रक्षाबंधन का त्योहार उसके भाई की मौत की खबर लेकर आया। 






नक्सल आतंक से जूझ रहे छत्तीसगढ़ में एक बार फिर शहादत हुई है! राजनांदगाँव जिले में रविवार को नक्सलियों के हमले में दो जवान शहीद हो गए!! एक एसआई और एक आरक्षक नक्सलवाद की बलि चढ़ गए!!! कब तक? आखिर कब तक?? 

फिर वही निंदा! फिर वही चेतावनी!! फिर वही शहादत व्यर्थ नहीं जाने देने के बयान!!! आखिर कब तक???? 

शहीद हुए एसआई युगल किशोर वर्मा के संबंध में पता चला है कि वे दो भाई थे और उनकी एक बहन थी... अब क्या बहन कभी रक्षाबंधन का त्योहार मना पाएगी? शहीद आरक्षक कृष साहू के परिवार में त्योहार की खुशी मनेगी?? सिर्फ कल नहीं, सालों साल इनके घरों में मातम रहेगा!!! 

सोमवार की सुबह हम जुटेंगे, शहादत को नमन करेंगे, पुलिस विभाग गाड आफ आनर देगा और इसके बाद फिर अगली शहादत का इंतजार....

बस, आप और हम इतराएँ कि हम रक्षाबंधन का त्योहार मना रहे हैं!!! हर दिन बहनों से भाई छिन रहा है!!!! सुहागिनों की मांग का सिंदूर मिट रहा है!!!!! माँ की गोद सूनी हो रही है!!!!! बच्चों के सिर से पिता का साया उठ रहा है!!!!!! इससे क्या...!!!!!!!!

जवाब बहुत छोटा हो सकता है (यदि देना चाहें), पर सवाल बहुत बडा़ है कि क्या नक्सल आतंक कभी खत्म होगा?????

#हिन्‍दी_ब्‍लाॅगिंग 

15 मई 2012

सवाल ही सवाल???



...और नक्सली घटनाएं हो रहीं हैं। एक तरफ सरकार नक्सलियों से बात करने का दावा कर रही है। सरकार की बनाई हाईपावर कमेटी नक्सलियों की रिहाई के रास्ते तलाश करने में जुटी है तो दूसरी ओर नक्सली बुलेट का साथ छोड़ ही नहीं रहे हैं। रविवार को मदर्स डे था। मदर्स डे के दिन कई मांओं की गोदें सूनी हो गईं। ये कैसी बातचीत है? ये कैसी शांति है?
छत्तीसगढ़ किस दिशा में जा रहा है। नक्सली एक कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं। पूरा प्रदेश, पूरा देश हिल जाता है। सरकार नक्सलियों के सामने गिड़गिड़ाती नजर आती है।  करीब पखवाड़े भर हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता है।  दिगर जगहों से आयातित कर वार्ताकार बुलाए जाते हैं। ये वार्ताकार नक्सलियों की मांद तक पहुंच जाते हैं। सरकार नहीं पहुंच पाती। सरकार के सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते। आम आदमी जानना चाहता है आखिर छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार है?
क्या आम छत्तीसगढिय़ा ये मान ले कि उसे दो सरकारें मिली हैं। एक सरकार जो बैलेट के माध्यम से आई है और दूसरी सरकार जो बुलेट से चल रही है। बस्तर के कुछ इलाकों में बैलेट के जरिए आने वाली सरकार मेमने की तरह होती है। जंगल में शेर की तरह यहां का राजा बुलेट के जरिए सरकार चलाता है। संघ के समय से भगवा पार्टी में रहे और अब भाजपा से किनारा कर चुके एक नेता व्यंग्य करते हैं कि बस्तर में नक्सली हमले के बाद मुख्यमंत्री आवास की दीवारें कुछ इंच ऊंची कर दी जाती हैं! मुख्यमंत्री और उनके सिपहसलार इस व्यंग्य पर खामोश क्यों हैं?
बड़ी खामोशी से नक्सली एक सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता की हत्या कर देते हैं। पहले उसका अपहरण करते हैं। फिर जन अदालत लगाते हैं।  उसी सुकमा में जहां हाईप्रोफाइल ड्रामा खेला गया था। न कहीं कोई मोमबत्ती जलती है। न कहीं कोई रैली निकलती है। जी हरगोपाल, ब्रम्हदेव शर्मा, निर्मला बुच और सुयोग्य मिश्र भी नजर नहीं आते। सब अपने घरों में इस गरमी के मौसम में एयरकंडीशंड कमरों में आराम कर रहे होते हैं। पुनेम पोदिया एक आम इंसान था। कोई आईएएस थोड़ी था  जिसके लिए ये लोग धूप में जंगल की खाक छानते। मीडिया को भी पूनेम पोदिया कोई टीआरपी नहीं देता! इसलिए मीडिया भी आराम के मूड में थी। जाहिर है, एक आईएएस के अपहरण और रिहाई के बीच मीडिया को एक सुपर टीआरपीमामला मिल गया था, जब तक यह चला भुनाते रहे सब! खत्म हुआ तो सब लौट गए अपने ठिएं में, मानो कुछ दिन की पिकनिक मन गई! मीडिया के लिए यह रोमांचक कव्हरेज था लेकिन शायद ही कोई समझ सकता है कि बस्तर के लोगों के लिए उनका रोमांच हर दिन के जीने मरने जैसा है। बात हो रही थी, पुनेम पोदिया की। बेचारा फरवरी महीने से नक्सलियों के चंगुल में था। इस बीच के ड्रामे में  इसका कहीं नाम नहीं आया। इसका यही हाल होना था। हो गया। मारा गया। उधर एक के बाद एक नक्सलियों की रिहाई की कोशिशें हो रही हैं। नक्सली वारदात पर वारदात कर रहे हैं। सरकार शहीदों के शवों के लिए तिरंगे का आर्डर देने में ही लगी है! क्या उसका जमीर नहीं जगता?
बैलाडीला में जो सात जवान मारे गए, वो कौन थे? आम सिपाही। एक एएसआई गोलियों से भून दिया गया। उनकी मौत का किस पर असर पड़ा है। उन जवानों की मां, बहन, बच्चे, पिता पर। नक्सलियों से बातचीत चल रही है। रिहाई के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में इनका जाना क्या सरकार की कमजोरी और नक्सलियों की दादागिरी नहीं है? हर हादसे के बाद हादसे की निंदा का रटा-रटाया बयान जारी कर प्रदेश के मुखिया क्या अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? क्या उनकी घटना की निंदा कर देने से जवान जिंदा लौट आ सकते हैं?
कब तक? आखिर कब तक? इस तरह की नक्सल वारदातें कब तक छत्तीसगढ़ को रूलाती रहेंगी? कब तक मांओं की गोदें सूनी होते रहेंगी? कब तक बहनें अपने भाईयों की कलाई के लिए तरसेंगी? कब तक एक पिता अपने बेटे की लाश को कांधे पर ढोने मजबूर होता रहेगा? कब तक कोई अबोध बच्चा अपने पिता के शव के आसपास लोगों को रोते देखते हुए सहमा सा रहेगा? कब तक हम इस तरह के हादसे के बाद अफसोस जाहिर  कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएंगे? क्या खून नहीं खौलता हमारा? या फिर इंतजार उस दिन का है जब हर घर में एक शहीद हो? क्या सरकार को शर्म नहीं आती? क्या सारे सवालों का जवाब किसी के पास है?????????

26 फ़रवरी 2012

लाल क्रांति के लिए दो अपने लाल!


‘’हर घर से एक युवक दो या फिर मौत के लिए तैयार हो जाओ......’’ ये फरमान जारी किया है नक्‍सलियों ने और इस फरमान का असर है कि लोग  अपनी  धरती, अपना जन्‍मस्‍थान और अपनी कर्मस्‍थली को छोडकर शरणार्थी बन गए हैं। वैसे तो छत्‍तीसगढ का तकरीबन आधा हिस्‍सा नक्‍सल हिंसा की चपेट में है लेकिन कुछ इलाकों में तो ऐसा लगता है कि नक्‍सलियों की ही सरकार है.....! ऐसा लगता है उन इलाकों में लोकतांत्रित तरीके से काम कर रही सरकार की पहुंच से ज्‍यादा नक्‍सलियों की पहुंच है! ! उन इलाकों में नक्‍सली जो चाहते हैं, कर जाते हैं और इसके बाद सरकार लकीर पीटती नजर आती  है! ! ! लोगों में सरकार पर विश्‍वास से ज्‍यादा नकसलियों का भय है! ! ! ! स्‍िथति देखकर लगता है कि हम जो सुरक्षित हैं, वो इसलिए नहीं कि सुरक्षातंत्र तगडा है, इसलिए कि नक्‍सली कुछ करना नहीं चाहते.... वरना.......!!!!!!! छत्‍तीसगढ में नक्‍सल हिंसा ने उन इलाकों में रहने वाले लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। तकरीबन हर दिन कहीं न कहीं से नक्‍सल आतंक से धरती लाल हो रही है।

ताजा मामला है राजनांदगांव और कवर्धा जिले से जुडा। इस इलाके के नक्‍सल प्रभावित गांव बकरकट्टा का करीब 25 परिवारों वाला गांव कांशीबहरा इस समय वीरान हो गया है। इन 25 परिवारों में करीब 115 सदस्‍य हैं। सबके सब अपना गांव छोड चुके हैं और कवर्धा जिले के वनांचल के गांव  तेंदूटोला में खुले मैदान में शरणार्थी की हैसियत से रह रहे हैं। वजह यह कि नकसलियों ने इस गांव के हर परिवार से एक एक सदस्‍य की मांग अपने संगठन के विस्‍तार के‍ लिए की, वरना अंजाम भुगतने की धमकी दी। नकसलियों के इस फरमान के चलते ग्रामीण अपना बरसो पुराना आशियाना छोड खुले मैदान के नीचे जीवन काटने मजबूर है। तकरीबन दस दिनों से ये ग्रामीण इस हालात में हैं पर प्रशासन की आंख नहीं खुली। प्रशासन जागा आज, जब मीडिया ने इन ग्रामीणों के दर्द को सामने रखा और अब आनन फानन में प्रशासन के नुमाइंदे इन ग्रामीणों के पास पहुंचे और उन्‍हें गांव वापस लौटने कहा, पर ये ग्रामीण किसी कीमत पर वापस गांव नहीं जाना  चा‍हते। 

इस पूरे मामले का सबसे दुर्भाग्‍यजनक पहलू यह है कि राजनांदगांव प्रदेश के मुख्‍यमंत्री का निर्वाचन जिला है और कवर्धा गृह जिला। इसके बाद भी इन ग्रामीणों की सुध लेने के लिए प्रशासन को मीडिया में सुर्खियों बनने तक का  इंतजार करना पडा। एक दुर्भाग्‍यजनक तथ्‍य यह भी कि शुक्रवार को इन पीडित ग्रामीणों का एक दल राजनांदगांव जिला मुख्‍यालय पहुंचा था,  सांसद से मिलने और साथ में मुख्‍यमंत्री से मिलने पर शुक्रवार को सांसद और मुख्‍यमंत्री राजनांदगांव में ही रहते हुए भी इनसे नहीं मिले। दरअसल में ये दोनों एक जलसे में व्‍यस्‍त थे। जलसा था राजनांदगांव में करीब 70 लाख रूपए (विपक्षी पार्टी कांग्रेस के आरोपों की मानें तो करीब तीन करोड रूपए) की लागत से बने एक और सीएम हाऊस में मुख्‍यमंत्री के गृह-प्रवेश का। एक और सौ से ज्‍यादा ग्रामीण अपने आशियाने को छोड भटक रहे थे और दूसरी ओर प्रदेश के मुखिया नए आवास में प्रवेश का जश्‍न मना रहे थे.......!!!!!!! हालांकि सांसद ने यह सफाई जरूर दी कि उन्‍होंने उनके कार्यालय में पहुंचे ग्रामीणों से मिलने के लिए अफसरों को वहां भेजा था, पर वे खुद क्‍यों नहीं मिले ग्रामीणों से ये वो नहीं बता पाए। 

कवर्धा में काम कर रहे पत्रकार साथी सतीश तंबोली से मिली जानकारी के मुता‍बिक खुले मैदान और पेड के नीचे अपना जीवन निर्वाह कर रहे आदिवासी ग्रामीण दरअसल बरसों से नक्‍सलियों के आतंक को सहते आ रहे हैं। अब नक्सलियों ने इन ग्रामीणों के प्रत्येक घर से एक सदस्य  को अपने संगठन में शामिल होने का दबाव बना रहे हैं। इनकी बात नही मानने पर इन्हे प्रताडित कर रहे  हैं और गोली मारकर हत्या करने की बात कह रहे हैं। नक्सलियों के आतंक और धमकी के चलते इन्‍हें अपना आशियाना छोडना पडा। नक्सलियों के डर से ग्रामीणों ने गांव खाली कर दिया है और अपने साथ जरूरी सामान और कुछ आनाज साथ लेकर आये हैं जिनसे उनका गुजारा हो रहा हैसाथ लाया अनाज कुछ दिन ही और चल पाएगा। उसके बाद क्‍या होगा, इस बात की चिंता इन्हे अभी से सता रही है।

नक्सलियों ने स्कूली बच्चों को भी नही बक्शा है। उन्हे अपने साथ चलने को कहा जाता हैमना करने पर इनसे मारपीट की जाती है।  नक्सलियों का खौफ उनके चेहरो पर देखा और जुबान से सुना जा सकता है । बच्चे नक्सली संगठन मे शामिल नहीं होना चाहते, पढाई कर नेक रास्ते में चलना चाहते हैं। नक्सलियों के लगातार परेशान करने के बाद भी यहां के लोगों को वहां के पुलिस से कोई सहायता नही मिल पा रही है। ग्रामीणों की माने तो इन इलाकों में तैनात सुरक्षाकर्मी भी इनका कोई सुध नही लेते। यहां बताना लाजमी होगा कि इस वनांचल क्षेत्र में जंगली जानवर बहुतायत हैं। आये दिन जंगली जानवरों द्वारा यहां के पालतू मवेशियों को अपना आहार बना लिया जाता है।  ऐसे में खुले मैदान में छोटे छोटे बच्चों के साथ इनका जीवन कितना सुरक्षित है इसका अंदाजा लगया जा सकता है। 

दस दिनों बाद जब मीडिया के माध्‍यम से यह खबर सुर्खियों में आया, इसके बाद राजनांदगांव और कवर्धा के प्रशासन की नींद खुली और आनन फानन में कुछ प्रशासनिक नुमाइंदे इन ग्रामीणों के पास पहुंचे पर अब ये ग्रामीण किसी कीमत पर अपने गांव नहीं लौटना चाहते। उनका कहना है कि वे किसी भी तरह किसी और जगह अपनी जिंदगी काट लेंगे पर उस जगह नहीं लौटेंगे जहां उनके सिर में नक्‍सलियों के फरमान की तलवार  लटकी है। क्षेत्र के तहसीलदार स्‍वीकार करते हैं कि ग्रामीण अब कांशीबहरा नहीं जाना चाहते। उन्‍होंने बताया  कि प्रभावित ग्रामीणों में से करीब 40 लोगों को वहां से लाकर साल्‍हेवारा के पंचायत भवन में रखा गया है और उन्‍हें साल्‍हेवारा से लगे कुछ गांवों में बसाने की कोशिश की जाएगी और बाकी लोगों को भी कहीं और बसाने के लिए लाया जाएगा लेकिन ग्रामीण अपने गांव में नहीं लौटना चाहते। तहसीलदार का कहना है कि फिलहाल तो ग्रामीणों की व्‍यवस्‍था कहीं और की जाएगी पर उम्‍मीद है कि समय बीतने के साथ वे अपने गांव लौट जाएंगे।
बहरहाल, नक्‍सलियों के भय के चलते पूरे गांव के गांव के खाली हो जाने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई इलाकों के ग्रामीण अपना घर छोडकर दूसरी जगह जा चुके हैं। यह अलग बात है कि काफी समय बीतने के बाद वो अपने आशियाने में लौटे भी, पर सरकार, सुरक्षा तंत्र और  लोकतंत्र पर सवालिया निशान छोड जाते हैं इस तरह के वाक्‍ये.....!!!!!!!!!  

16 अक्टूबर 2011

वेलडन बंगाल टाईगर......


मान गए आपको। जज्‍बा हो तो ऐसा। आपके जज्‍बे को देखकर लगता है कि आपको बंगाल टाईगर ऐसे ही नहीं कहा जाता। पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी ने नक्‍सलियों को सीधे तौर पर चेतावनी देते हुए कहा है कि वे विकास या हिंसा में से किसी एक रास्ते को चुन लें। उन्‍होंने नक्‍सलियों को सात दिनों का अल्‍टीमेटम देते हुए कहा है कि उनकी सरकार बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन बातचीत और हिंसा एक साथ नहीं चल सकता।
इसी तरह के जज्‍बे की जरूरत है। नक्‍सल इलाकों का दर्द क्‍या है, यह मैं  अच्‍छी तरह समझता हूं। कई मांओं की गोद सूनी होते मैंने देखी है। सुहागिनों की मांग का सिंदूर मिटते देखा है। मासूम बच्‍चों के सिर से पिता का साया उठते देखा है। इसके अलावा विकास की दौड में ये इलाके किस कदर पीछे रह जाते हैं इस दर्द को भी करीब से जाना है। छत्‍तीसगढ के कई इलाके नक्‍सल हिंसा के आंतक से जूझ रहे हैं और इस प्रदेश को भी ऐसे ही जज्‍बे की जरूरत है पर अफसोस कि यहां के रहनुमाओं को ज्‍यादा फिक्र होती नहीं दिखती। जवानों की हर शहादत के बाद सिर्फ एक ही रटा-रटाया बयान सुनाई दे जाता है, ‘शहीदों की शहादत व्‍यर्थ  नहीं जाएगी’ .... बस..... इसके बाद इंतजार अगली शहादत का......
ममता बनर्जी ने शनिवार को पश्चिम मिदनापुर जिले के झारग्राम स्टेडियम में एक रैली को सम्बोधित करते हुए कहा, ‘’मैं आप सबको सात दिनों का समय देती हूं।  इस पर विचार कीजिए।  यदि आप समस्या का शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं तो फिर कोई मुद्दा नहीं है।  हम चाहते हैं कि बातचीत का दरवाजा खुला रहे।‘’  उन्‍होंने साफ कहा कि यह अंतिम मौका है और खूनी संघर्ष और बातचीत एकसाथ संभव नहीं। हमें विकास और हत्यायों में से एक को चुनना होगा। अगर आप विकास चाहते हैं तौ में स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, सड़कें और सभी प्रकार का आधारभूत ढांचा उपलब्ध कराने के लिए तैयार हूं, लेकिन खून की बूंद नहीं।
ममता ने भावनात्मक अंदाज में भाषण देते हुए कहा कि शांति की प्रक्रिया में रुकावट डालने के लिए सुपारी हत्यारोंका प्रयोग किया जा रहा है लेकिन ऐसे मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया जायेगा। उन्होंने इस अवसर पर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए कई विकास परियोजनाएं शुरू करने की घोषणा की। बनर्जी ने क्षेत्र के लोगों का आह्वान किया कि वे नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षा बलों का साथ दें। उन्होंने कहा, "लोगों को आगे आना चाहिए और नक्सलियों के खिलाफ खड़े होना चाहिए। वे बाहर से आते हैं,  और लोगों की हत्या करने के लिए भाड़े के हत्यारों का इस्तेमाल करते हैं।  वे केवल बंदूक के बल पर धन उगाही करते हैं।"
छत्‍तीसगढ में नक्‍सल हिंसा ने कई जानें ली हैं। बस्‍तर में सीआरपीएफ के 70 जवानों को एक साथ मार डालने के अलावा राजनांदगांव में एसपी सहित 30 जवानों की शहादत और तकरीबन हर दिन किसी न किसी क्षेत्र में सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने, सरकारी सम्‍पत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसी घटनाएं नक्‍सली करते रहे हैं पर हमारे नेताओं ने शहीदों के तिरंगे में लिपटे ताबूत पर फूल मालाएं डालने और घटना पर अफसोस जाहिर कर भविष्‍य में ऐसा न होने का झूठा ढांढस बंधाने के अलावा कुछ नहीं किया। 
नक्‍सल मोर्चों पर पुलिस के सिपाही किन परिस्थितियों में तैनात हैं और उनकी मन:स्थिति क्‍या है.... यह जानने का प्रयास शायद ही किसी नेता ने किया हो.... प्रदेश के गृहमंत्री का हाल तो और भी जुदा है.... उनको सट्टा और  जुआं के प्रकरणों पर ‘बहादुरी’ दिखाने से फुर्सत नहीं.... पुलिस अमले को मजबूत करने और अमले के मनोबल को मजबूत करने की दिशा में कुछ करना तो दूर... उन्‍हें विभाग की गतिविधियों की भी जानकारी नहीं। शनिवार को जब ममता बनर्जी बंगाल में दहाड रहीं थीं, संभवत: उसी समय प्रदेश के गृहमंत्री राजनांदगांव में थे और उनसे मैंने एक सवाल किया, पुलिस इंस्‍पेक्‍टरों की डीपीसी और नक्‍सल इलाकों में तैनात पुलिस अफसरों के तबादले और इस पर होने वाली राजनीति को लेकर... इस पर उनका जवाब था कि डीपीसी के बाद प्रमोशन की सूची जारी कर दी गई है और तबादलों में कोई भेदभाव नहीं किया जाता जबकि हकीकत यह है कि जून महीने में डीपीसी होने के बाद अब तक प्रमोशन की सूची जारी नहीं की गई है.... ऐसे में नक्‍सल मोर्चों में तैनात पुलिस अफसरों का मनोबल कैसे ऊंचा रहेगा यह सोचने वाली बात है। गृहमंत्री के बयान से यह भी साबित होता है कि या तो वो सफेद झूठ बोल रहे हैं  या फिर उनको उनके ही विभाग की जानकारी नहीं।
करीब सवा दो साल पहले का एक वाक्‍या मुझे याद आ रहा है, जब राजनांदगांव जिले के मानपुर इलाके में एसपी सहित 30 जवान शहीद हो गए थे। इसके बाद जंगलों के थानों में पुलिस के जवान बेहद घटिया माहौल में रहने मजबूर थे। बारिश का समय था, टूटी छतों से पानी के टपकने के कारण जवान बसों में सोने मजबूर थे।  उनके लिए खाने के समानों का अभाव था। उस समय वारदात के बाद प्रदेश के गृहमंत्री क्षेत्र के दौरे पर थे, उनसे जब जवानों की तकलीफों पर बात की गई थी तो उनके जवाब देने से पहले पुलिस के एक अफसर ने जवाब दे दिया था कि हमने जंगल में थाने खोले हैं..... टेंट  डाले हैं... फाईव स्‍टार होटल नहीं खोले हैं....!!!! ऐसे गृहमंत्री और ऐसे अफसरों के सामने मनोबल की उम्‍मीद  बेमानी थी.... पर फिर भी जवानों ने हौसले का परिचय दिया और डटे रहे मोर्चों पर। 
पश्चिम बंगाल के छोटे से गांव नक्‍सलबाडी से 1967 में भूमि सुधार के नाम पर शुरू हुआ एक आंदोलन इस समय देश के अधिकतर राज्‍यों के लिए एक बडी समस्‍या बन गया है पर इससे निपटने के लिए उस जीजिविषा के दर्शन अब तक नहीं हुए हैं जो सरकार में दिखाई देना चाहिए। ऐसे में ममता बनर्जी का यह बयान न सिर्फ नक्‍सल आंदोलन को कमजोर करने की दिशा में एक बडा कदम साबित हो सकता है बल्कि सुरक्षा बलों के हौसलों को भी बुलंद कर सकता है।

29 मई 2011

आत्‍मसमर्पित नक्‍सली की कहानी........ उसी की जुबानी


उसकी उमर कोई 21 साल है। वैसे तो 21 साल की उमर कोई बडी उमर नहीं होती लेकिन इस कम उम्र में उसने काफी कुछ झेला है। उसका  नाम संध्‍या है। आज से पहले यदि उसका नाम मेरे जेहन में आया होता तो शायद उसे लेकर मन में क्रोध और नफरत का भाव आता पर आज ये भाव नहीं आ रहे... आज उस पर दया आ रही है और सोच रहा हूं कि उसने न जाने कितनी तकलीफें देखी होंगी.... क्‍या क्‍या सहा होगा.... पर अब उम्‍मीद है कि उसकी जिंदगी सामान्‍य हो जाए।
संध्‍या उर्फ शिबा जिसे नक्‍सलियों ने नाम दिया था उर्मिला.... किस इलाके की रहने वाली है स्‍थान का नाम मायने नहीं रखता पर मायने  रखता है स्‍थान का परिवेश। आदिवासी इलाका जहां की रहने वाली थी संध्‍या.... उसके गांव में अक्‍सर नक्‍सलियों की धमक होती रहती और नक्‍सलियों के बैनर पोस्‍टर गांव में लगे होते.... ऐसे ही किसी पोस्‍टर को पढकर प्रभावित होकर संध्‍या ने नक्‍सली बनने का मन बनाया। वर्ष 2005 की बात है। तब वह दसवीं कक्षा में पढती थी।  उसने गांव में रहने वाले अपने कुछ सहपाठियों से नक्‍सलियों के बारे में  बात की तो उसे पता चला  कि फलां दिन नक्‍सली गांव में बैठक लेने वाले हैं। वो भी पहुंच गई। उसने नक्‍सलियों की बातें सुनीं। क्रांति, जन जागृति और  समाज में फैले अंतर को मिटाने की बातें.... संध्‍या प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकीं। वो पहुंच गई नक्‍सलियों के पास.... पर नक्‍सलियों ने उसे पुलिस का  मुखबिर समझा और उस पर यकायक भरोसा नहीं किया.... काफी सवाल जवाब के संध्‍या आखिर समाज को बदलने(?) का ईरादा  लेकर नक्‍सलियों के साथ हो गई। उसे नया नाम दिया गया, उर्मिला। अब उर्मिला  वहां बन गई दलम एवं मोबाइल मास एकेडमी शिक्षिका। उसका काम था  कम पढे लिखे नक्‍सलियों को पढाना और नक्‍सलियों के पोस्‍टर पाम्‍पलेट का मैटर लिखना। वो घायल नक्‍सलियों का उपचार भी करती, उन्‍हें दवाएं भी देतीं और इंजेक्‍शन भी लगाती। बाद में मास टीम को भंग कर दिया गया, पर उर्मिला का काम जारी रहा।
नक्‍सलियों के साथ रहते ही उसकी मुलाकात सुभाष से हुई। सुभाष जिसका नक्‍सली नाम आयतु था, नक्‍सलियों की दर्रकसा दलम का कमांडर था। सुभाष से उसकी शादी हो गई, लेकिन उनका वैवाहिक जीवन ज्‍यादा नहीं चला और 2007 में आयतु पुलिस के हाथ लग गया। वो अभी जेल में है। उधर जिस विचारधारा को लेकर संध्‍या नक्‍सलियों के साथ गई थी वो  हवा होने लगे और धीरे धीरे उसे समझ आने लगा कि हकीकत क्‍या है।
संध्‍या के ही शब्‍दों में, नक्‍सलियों की जिन विचारधाराओं, भगत सिंह के अधूरे सपने को साकार करने, गरीब आदिवासियों को भूमि और वनोपज का लाभ दिलाने जैसे कई काम करने वह संगठन में शामिल हुई थी लेकिन कुछ ही दिनों में उसे वास्‍तविकता का आभास होने लगा। वो कहती है कि नक्‍सली जो बातें करते हैं और   जो काम करते हैं उसमें जमीन आसमान का  अंतर है.... सब ढोंग है.... महिला उत्‍थान की बात करते हैं  पर ये सरासर गलत है।  वो कहती है कि युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर उनका शोषण किया जाता है और पार्टी फंड के नाम पर अवैध वसूली की  जाती है। वो यह भी खुलासा करती है कि नक्‍सलियों के उपरी कैडर में आंध्र प्रदेश और अन्‍य राज्‍यों के लोग  हावी हैं और छत्‍तीसगढ के आदिवासियों को  सिर्फ शोषण और काम के लिए रखा जाता है।
संध्‍या बताती है कि दल में रहने वाली महिलाओं की स्थिति तो  और भी खराब है। महिलाओं का शारीरिक शोषण किया जाता है और उनके साथ अमानवीय बर्ताव किया  जाता है। बीमार होने पर ईलाज नहीं कराया जाता। वो बताती है कि परिवार वालों से मिलने नहीं दिया जाता।
छत्‍तीसगढ में सरकार ने नक्‍सलियों के पुनर्वास के लिए पुनर्वास नीति बनाई है जिसके तहत नक्‍सलियों का साथ छोडकर मुख्‍य धारा में आने वाले नक्‍सलियों को रोजगार और समाज की मुख्‍य धारा में  जुडने के लिए आवश्‍यक संसाधन दिए जाते हैं। कहीं से यह पता चलने पर उर्मिला ने नक्‍सलियों का साथ छोडने का मन बनाया और आज ही वह उनके चंगुल से छूटकर आत्‍मसमर्पण किया।
नक्‍सली दुर्दांत होते हैं... उनका कोई इमान नहीं होता..... वो वहशी होते हैं..... उनकी हरकतों से ऐसा ही लगता है लेकिन आज उर्मिला जब संध्‍या के रूप में रूबरू हुई तब समझ आया कि वहां भी शोषण और अत्‍याचार की कहानी है।