15 मई 2012

सवाल ही सवाल???



...और नक्सली घटनाएं हो रहीं हैं। एक तरफ सरकार नक्सलियों से बात करने का दावा कर रही है। सरकार की बनाई हाईपावर कमेटी नक्सलियों की रिहाई के रास्ते तलाश करने में जुटी है तो दूसरी ओर नक्सली बुलेट का साथ छोड़ ही नहीं रहे हैं। रविवार को मदर्स डे था। मदर्स डे के दिन कई मांओं की गोदें सूनी हो गईं। ये कैसी बातचीत है? ये कैसी शांति है?
छत्तीसगढ़ किस दिशा में जा रहा है। नक्सली एक कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं। पूरा प्रदेश, पूरा देश हिल जाता है। सरकार नक्सलियों के सामने गिड़गिड़ाती नजर आती है।  करीब पखवाड़े भर हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता है।  दिगर जगहों से आयातित कर वार्ताकार बुलाए जाते हैं। ये वार्ताकार नक्सलियों की मांद तक पहुंच जाते हैं। सरकार नहीं पहुंच पाती। सरकार के सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते। आम आदमी जानना चाहता है आखिर छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार है?
क्या आम छत्तीसगढिय़ा ये मान ले कि उसे दो सरकारें मिली हैं। एक सरकार जो बैलेट के माध्यम से आई है और दूसरी सरकार जो बुलेट से चल रही है। बस्तर के कुछ इलाकों में बैलेट के जरिए आने वाली सरकार मेमने की तरह होती है। जंगल में शेर की तरह यहां का राजा बुलेट के जरिए सरकार चलाता है। संघ के समय से भगवा पार्टी में रहे और अब भाजपा से किनारा कर चुके एक नेता व्यंग्य करते हैं कि बस्तर में नक्सली हमले के बाद मुख्यमंत्री आवास की दीवारें कुछ इंच ऊंची कर दी जाती हैं! मुख्यमंत्री और उनके सिपहसलार इस व्यंग्य पर खामोश क्यों हैं?
बड़ी खामोशी से नक्सली एक सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता की हत्या कर देते हैं। पहले उसका अपहरण करते हैं। फिर जन अदालत लगाते हैं।  उसी सुकमा में जहां हाईप्रोफाइल ड्रामा खेला गया था। न कहीं कोई मोमबत्ती जलती है। न कहीं कोई रैली निकलती है। जी हरगोपाल, ब्रम्हदेव शर्मा, निर्मला बुच और सुयोग्य मिश्र भी नजर नहीं आते। सब अपने घरों में इस गरमी के मौसम में एयरकंडीशंड कमरों में आराम कर रहे होते हैं। पुनेम पोदिया एक आम इंसान था। कोई आईएएस थोड़ी था  जिसके लिए ये लोग धूप में जंगल की खाक छानते। मीडिया को भी पूनेम पोदिया कोई टीआरपी नहीं देता! इसलिए मीडिया भी आराम के मूड में थी। जाहिर है, एक आईएएस के अपहरण और रिहाई के बीच मीडिया को एक सुपर टीआरपीमामला मिल गया था, जब तक यह चला भुनाते रहे सब! खत्म हुआ तो सब लौट गए अपने ठिएं में, मानो कुछ दिन की पिकनिक मन गई! मीडिया के लिए यह रोमांचक कव्हरेज था लेकिन शायद ही कोई समझ सकता है कि बस्तर के लोगों के लिए उनका रोमांच हर दिन के जीने मरने जैसा है। बात हो रही थी, पुनेम पोदिया की। बेचारा फरवरी महीने से नक्सलियों के चंगुल में था। इस बीच के ड्रामे में  इसका कहीं नाम नहीं आया। इसका यही हाल होना था। हो गया। मारा गया। उधर एक के बाद एक नक्सलियों की रिहाई की कोशिशें हो रही हैं। नक्सली वारदात पर वारदात कर रहे हैं। सरकार शहीदों के शवों के लिए तिरंगे का आर्डर देने में ही लगी है! क्या उसका जमीर नहीं जगता?
बैलाडीला में जो सात जवान मारे गए, वो कौन थे? आम सिपाही। एक एएसआई गोलियों से भून दिया गया। उनकी मौत का किस पर असर पड़ा है। उन जवानों की मां, बहन, बच्चे, पिता पर। नक्सलियों से बातचीत चल रही है। रिहाई के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में इनका जाना क्या सरकार की कमजोरी और नक्सलियों की दादागिरी नहीं है? हर हादसे के बाद हादसे की निंदा का रटा-रटाया बयान जारी कर प्रदेश के मुखिया क्या अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? क्या उनकी घटना की निंदा कर देने से जवान जिंदा लौट आ सकते हैं?
कब तक? आखिर कब तक? इस तरह की नक्सल वारदातें कब तक छत्तीसगढ़ को रूलाती रहेंगी? कब तक मांओं की गोदें सूनी होते रहेंगी? कब तक बहनें अपने भाईयों की कलाई के लिए तरसेंगी? कब तक एक पिता अपने बेटे की लाश को कांधे पर ढोने मजबूर होता रहेगा? कब तक कोई अबोध बच्चा अपने पिता के शव के आसपास लोगों को रोते देखते हुए सहमा सा रहेगा? कब तक हम इस तरह के हादसे के बाद अफसोस जाहिर  कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएंगे? क्या खून नहीं खौलता हमारा? या फिर इंतजार उस दिन का है जब हर घर में एक शहीद हो? क्या सरकार को शर्म नहीं आती? क्या सारे सवालों का जवाब किसी के पास है?????????

17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दुखद हैं ऐसी घटनाएँ ....सरकार की उदासीनता जाने कब तक बनी रहेगी.....

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  2. Abhi Haal hi mein Kirandul mein 6 logon ki mouta....kya kara rahi hai Sarakaara....???Kya iska koi bhi Upaaya nahin?....Afasosa.....

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  3. Dukhad daastan hai .

    Please see

    दशक का ब्लॉगर, एक और गड़बड़झाला
    http://blogkikhabren.blogspot.in/2012/05/blog-post_14.html

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  4. कब तक? आखिर कब तक? इस तरह की नक्सल वारदातें कब तक छत्तीसगढ़ को रूलाती रहेंगी? कब तक मांओं की गोदें सूनी होते रहेंगी? कब तक बहनें अपने भाईयों की कलाई के लिए तरसेंगी? कब तक एक पिता अपने बेटे की लाश को कांधे पर ढोने मजबूर होता रहेगा? कब तक कोई अबोध बच्चा अपने पिता के शव के आसपास लोगों को रोते देखते हुए सहमा सा रहेगा? कब तक हम इस तरह के हादसे के बाद अफसोस जाहिर कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएंगे? क्या खून नहीं खौलता हमारा? या फिर इंतजार उस दिन का है जब हर घर में एक शहीद हो? क्या सरकार को शर्म नहीं आती? क्या सारे सवालों का जवाब किसी के पास है?????????

    धूमिल के संगीन सवालों की याद दिलाती हैं ये पंक्तियां...पर ये सवाल संसद से नहीं जनता है हैं..


    संसद मौन है- कहते हैं धूमिल।

    आपके सवाल जनता से है..
    एक भयावह सवाल यह है कि
    जनता कौन है....यह हम किससे पूछे?

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  5. यदि सरकार सकारात्मक कदम उठाये तो निश्चय ही सुखद परिणाम आयेंगे, लेकिन अफ़सोस की सरकार के पास यह सब सोचने की फुर्सत कहाँ है.

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  6. ये हालात बेहद अफसोसजनक हैं ...
    कल 16/05/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!


    ...'' मातृ भाषा हमें सबसे प्यारी होती है '' ...

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  7. दुखद स्थिति .... सरकार की धूल मूल नीतियाँ ही इसे बढ़ावा दे रही हैं ....

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  8. sarkar ko is par uchit kadam uthana chahiye..

    --------------------------------------------
    खुल के हंसिये ..

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  9. बहुत दुखद घटना,.....सरकार अगर सोच ले,तो एक ही दिन में नक्सलवाद खत्म किया जा सकता है,....

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बेटी,,,,,

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  10. बहुत सारगर्भित आलेख...सरकार की इच्छा शक्ति की कमी ही नक्सलवाद को बढ़ावा दे रही है...उसे कहाँ चिंता है गरीब आदमी या उन सिपाहियों की जो अपनी जान की बाज़ी लगा कर वहां नक्सलियों से मुकाबला कर रहे हैं...शोचनीय स्तिथि...

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  11. दिव्या जी की बात से सहमत हूँ।

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  12. अच्छी प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  13. बहुत बेहतरीन व प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  14. बहुत ही दुखद घटना है..
    पता नहीं सरकार कब कोई उचित कदम उठाये गी....

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  15. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से आभार।

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  16. बहुत ही शोचनीय एवं संवेदनशील प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट कबीर पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  17. सरकार कोई भी हो ऐसी वारदातों पर सिर्प अफसोसो जता कर रह जाती है । नक्सली एक समानांतर सरकार चला रहे हैं उनके कानून, उनकी सत्ता उनके ही नियम ।

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