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05 जुलाई 2026

नहीं रहीं पंडवानी की पर्याय तीजन बाई

70 साल की उम्र में एम्स में उपचार के दोरान हुआ निधन, पैरालिसिस से थीं पीडि़त


छत्तीसगढ़ में पंडवानी की पर्याय रहीं तीजन बाई नहीं रहीं। पद्मविभूषण तीजन बाई ने राजधानी रायपुर के एम्स में आज तड़के करीब सवा 3 बजे अंतिम सांस ली। 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग के गनियारी गाँव में जन्मीं डॉ. तीजन बाई 70 साल की थीं।

लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रही तीजन हुकुमचंद परधा और सुखवाती बाई की बेटी थीं। बचपन में अपने नाना ब्रजलाल पारधी को छत्तीसगढ़ी और हिंदी में महाभारत की कहानियां गाते सुनकर उन्हें ये कहानियां याद हो गई थीं, जिसके बाद उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से इसका अनौपचारिक प्रशिक्षण भी लिया।

तीजन बाई के अंतिम दर्शन और अंतिम संस्कार में बड़ी संख्या में कलाकारों, साहित्यकारों, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों के पहुंचने की संभावना है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल मीडिया के माध्यम से पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण तीजन बाई को श्रद्धासुमन अर्पित किया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सुबह एम्स पहुंचकर तीजन को श्रद्धांजलि अर्पित की। विधानसभा अध्यक्ष डॉक्टर रमन सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर चरणदास महंत, पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव सहित अनेक हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।प्रधानमंत्री मोदी ने प्रख्यात पंडवानी गायिका तीजन के निधन पर सोशल मीडिया पर जारी संदेश में कहा कि तीजन बाई ने अपनी अद्भुत प्रस्तुतियों से छत्तीसगढ़ की लोककला को विश्वभर में विशिष्ट पहचान दिलाई। प्रधानमंत्री ने उनके निधन को कला और संस्कृति जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताते हुए परिजनों और प्रशंसकों के प्रति संवेदना व्यक्त की।

मात्र 13 साल की उम्र में अपना पहला मंचीय प्रदर्शन करने वाली तीजन बाई पहली ऐसी महिला थीं, जिन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाली कापालिक शैली को चुना और खड़े होकर प्रदर्शन करना शुरू किया, जबकि उस दौर में महिलाएँ बैठकर पंडवानी गाती थीं। तीजन बाई ने देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर दुनिया के कई राष्ट्राध्यक्षों के सामने अपनी शानदार प्रस्तुतियां दीं थीं। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की और मॉरीशस सहित 17 से अधिक देशों में छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति का डंका बजाने वाली तीजन बाई को 1988 में पद्म श्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। 2018 में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जापानी पुरस्कार ‘फुकुओका पुरस्कार’ और 2019 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से विभूषित तीजन बाई को बिलासपुर विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डी. लिट की मानद उपाधि भी दी गई थी।

जीवन के आखिरी पड़ाव में काफी कठिन दौर से गुजरने वालीं तीजन ने बड़े बेटे की मौत के सदमे के बाद अपनी बीपी की दवाई लेना बंद कर दिया था। जिसके कारण साल 2024 में उन्हें अचानक पैरालिसिस यानी लकवा मार गया। तब से वह लगातार बीमारी से जूझ रही थीं, जिसकी वजह से उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया था और वह लंबे समय से बेड पर थीं। हाल ही में फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत होने के बाद उन्हें 27 मई को एम्स रायपुर के क्रिटिकल केयर यूनिट में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान रात 3:15 बजे उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।

तीजन बाई को सुनना केवल गायन सुनना नहीं था। वह एक ऐसा अनुभव था जिसमें श्रोता धीरे धीरे महाभारत के कथा संसार में प्रवेश करता चला जाता था। उनके हाथ में तंबूरा रहता था, लेकिन प्रस्तुति के दौरान वही तंबूरा कभी भीम की गदा बन जाता, कभी अर्जुन का गांडीव, कभी दुशासन के अहंकार को चुनौती देता प्रतीक और कभी किसी असहाय पात्र की वेदना का सहारा बन जाता।

 पंडवानी छत्तीसगढ़ के लोकमानस में पीढ़ियों से प्रवाहित होती रही है। महाभारत की कथा जब लोक में उतरती है तो वह केवल राजवंशों के संघर्ष की कथा नहीं रहती। उसमें गांव का जीवन प्रवेश कर जाता है। उसमें किसान की पीड़ा, स्त्री की वेदना, अन्याय के विरुद्ध आक्रोश और सामान्य मनुष्य की आशाएं शामिल हो जाती हैं। तीजन बाई ने इसी लोक महाभारत को अपना स्वर दिया। 

25 अक्टूबर 2012

काश यह खबर भी 'उल्टा पुल्टा' हो

हास्य और व्यंग्य को एक नई पहचान देने वाले  जसपाल भट्टी का निधन हो गया। बीती रात बुराई पर अच्छाई के प्रतीक पर्व विजयादशमी पूरे  देश भर में धूम धाम से मनाई गई और प्रतीक रूप में रावण के पुतले का 'वध' किया गया। सुबह हुई तो एक 'उल्टा पुल्टा' खबर ने चौंका दिया। जालंधर के पास शाहकोट में एक सड़क हादसे में हास्य और व्यंग्य को एक नया रूप देने वाले कलाकार जसपाल भट्टी की मौत ने स्तब्ध कर रख दिया।
पंजाब के अमृतसर में 3 मार्च 1955 को पैदा हुए जसपाल भट्टी एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। वे जिस क्षेत्र में भी रहे, उन्होंने अपनी अमिट छाप छोड़ी। चंडीगढ़ के पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने वाले जसपाल का मुख्य शौक अभिनय था। ... और अभिनय में भी ऐसा काम कि जो कोई संदेश दे। हल्के फुल्के अंदाज में लोगों तक बात को पहुंचाए। अपनी इसी सोच के चलते कॉलेज के दिनों में ही भट्टी ने नॉनसेंस क्लब बनाकर नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत की। वे एक अच्छे कार्टूनिस्ट भी थे।  द ट्रिब्यून अखबार में कार्टूनिस्ट के तौर पर भी अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का काम करते रहे। हालांकि तब तक उनका काम सीमित था। बाद में वे पूरे देश के ध्यान में तब आए जब दूरदर्शन में उन्होंने कामेडी शो 'उल्टा पुल्टा' लेकर आए। इस शो के माध्यम से उन्होंने उल्टी पुल्टी बातें कर सीधी और सच्ची सलाह लोगों तक पहुंचाने का काम किया और विशुद्ध कॉमेडी और बिना द्विअर्थी संवाद के ही एक नई मिसाल पेश की। दूरदर्शन में 80 के दशक में शुरू हुए इस शो को लेकर लोगों में गजब की दीवानगी थी और लोग सुबह सुबह इस शो का बेसब्री से इंतजार करते थे।
'उल्टा पुल्टा' के साथ भट्टी ने जो शुरूआत की तो फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद आया उनका 'फ्लॉप शो'। इस शो में  वे अपनी पत्नी के साथ नजर आए। ये भटटी ही थे जिन्‍होंने 'फ्लॉप शो' को अपनी प्रतिभा से 'हिट' कर दिया। एक्टिंग में पूरी तरह सफल होने के बाद भट्टी ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। छोटे परदे पर उनके दूसरे शोज थैंक्यू जीजा जी, हॉय जिंदगी-बॉय जिंदगी, फुल टैंशन भी खासा चर्चित हुए। एक्टिंग के साथ साथ जसपाल भट्टी ने सब टीवी के शो कॉमेडी का किंग कौन में जज के भूमिका भी निभाई। कुछ साल पहले अपनी पत्नी सविता के साथ डांस शो नच बलिए में उन्होंने अपने डांस का हुनर भी दिखाया।
जसपाल भट्टी ने छोटे परदे के अलावा बड़े परदे में भी अपने ही अंदाज में कॉमेडी के रंग दिखाए। इनमें फना, कुछ मीठा हो जाए, कुछ ना कहो, कोई मेरे दिल से पूछे, हमारा दिल आपके पास है, आ अब लौट चलें, इकबाल, कारतूस जैसी कई फिल्में शामिल हैं। हाल के समय में वो अपने बेटे के साथ पावर कट नाम की फिल्म में व्यस्त थे। अपनी इसी फिल्म के प्रचार के लिए वे मोगा से जालंधर जा रहे थे कि उनकी कार एक पेड़ से टकरा गई। कार उनके बेटे चला रहे थे। उनके बेटे को जख्मी हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया है।
मौजूदा समय  की सबसे ज्वलंत समस्या भ्रष्टाचार और कम होती देशभक्ति की भावना को दो दशक पहले से भट्टी भांप गए थे और उस समय से वे इस पर प्रहार कर रहे थे और सार्थक संदेश देने का काम कर रहे थे। भट्टी ने हास्य और व्यंग्य के जरिये न सिर्फ लोगों का मनोरंजन किया बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद की और हमेशा समसामयिक ज्वलंत मुद्दों को उठाने का काम किया। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने भट्टी ने कभी भी फूहड़ भाषा या द्विअर्थी संवादों का सहारा नहीं लिया। भट्टी ने जिस अंदाज में कॉमेडी की शुरुआत की आखिर तक उस स्तर को बरकरार रखने का काम किया। जसपाल भट्टी की मौत... इस खबर को मानने का मन नहीं हो रहा और ऐसा लग रहा है कि यह खबर भी जसपाल भट्टी के अंदाज में 'उल्टा पुल्टा' निकल जाए...!
जसपाल भट्टी को श्रद्धांजलि...।