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01 अगस्त 2026

नई बोतल में पुरानी शराब छोड़ कुछ नया लाईए पांडे जी

डोंगरगढ़-कटघोरा रेल लाईन के नाम पर हर बार मजाक ठीक नहीं 

राजनांदगाँव। साल 2018। विधानसभा चुनाव की अधिसूचना लगने के कुछ समय पहले का वक्त। 6 अक्टूबर 2018 को कवर्धा के स्वामी करपात्री जी आउटडोर स्टेडियम में एक कार्यक्रम आयोजित होता है। कार्यक्रम था, डोंगरगढ़ से कटघोरा तक बनने वाली नई रेलवे लाईन के शिलान्यास का। देश के रेलमंत्री पीयूष गोयल, मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और सांसद अभिषेक सिंह सहित अनेक अतिथियों की मौजूदगी में शिलान्यास हुआ। इस नई रेल परियोजना को कुछ समय पहले ही रेल मंत्रालय ने स्वीकृति दी थी और इसके बाद यह कार्यक्रम आयोजित किया गया। अब 30 जुलाई 2026 को मौजूदा सांसद और भाजपा के मुख्य प्रदेश प्रवक्ता संतोष पांडे फिर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के साथ दिल्ली में मौजूदा रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव से मिलकर डोंगरगढ़ कटघोरा रेल लाईन को नई परियोजना बताकर स्वीकृति कराकर ले आए हैं।


अक्टूबर 2018 और जुलाई 2026 के दोनों घटनाक्रम ने बडा़ सवाल खडा़ कर दिया है कि उस वक्त रेलमंत्री पीयूष गोयल सही थे या अब रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव सही हैं। उस वक्त मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सही थे या अब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सही हैं। उस वक्त सांसद अभिषेक सिंह सही थे या अब सांसद संतोष पांडे सही हैं। मौजूदा तथ्यों या उपलब्ध साक्ष्यों को देखें तो सबसे सही 2018 के घटनाक्रम के दौरान मौजूद लोग सही थे और 2026 के घटनाक्रम के दौरान मौजूद लोगों ने करीब 8 साल बाद 2018 का रिपीटेशन किया है, कोई नया काम नहीं किया है। ऐसे में नई स्वीकृति का हल्ला मचाकर वाहवाही लूटना सही नहीं है।


अब एक बडा़ सवाल उठता है कि 2018 में हुए शिलान्यास के बाद इस परियोजना में अब तक कितना काम हुआ। तो जवाब है कि कागजों में काफी काम हुआ लेकिन धरातल पर सिर्फ इस परियोजना के रास्तों में पड़ने वाले शहरों, गाँवों की जमीनों की खरीदी बिक्री पर रोक लगा दी गई। हाँ, उस दौरान अखबारों में कई कई पन्नों के आल एडिशन विज्ञापन भी दिए गए और अखबारों की लंबी चौडी़ कमाई भी हुई।

बस, इसके बाद राज्य में सत्ता बदलने के बाद सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया। राज्य में नई आई सरकार ने इस परियोजना के रास्ते में आने वाले खैरागढ़ छुईखदान गंडई को नया जिला जरूर बना दिया, लेकिन फिर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि रेलवे की इतनी बडी़ परियोजना पर भी काम करना चाहिए। उस सरकार के कार्यकाल के दौरान देश ने कोरोना जैसी महामारी का दौर देखा और इससे देश के साथ प्रदेश ने भी काफी कुछ झेला पर रेलवे का मसला ठंडे बस्ते में रहा।

एक बार फिर राज्य में सरकार बदली। फिर से आई सरकार का ध्यान भी इस परियोजना की ओर नहीं गया। अब जब इस सरकार का ढाई साल का कार्यकाल पूरा हो गया है, इस सरकार के मुखिया, सांसद अपनी ही पार्टी की सरकार द्वारा किए गए काम को नई परियोजना बताकर नए रेलमंत्री से स्वीकृत कराकर ले आए हैं।

अब बडी़ बात यह है कि डोंगरगढ़ से कटघोरा के रेलवे लाईन को कितनी बार स्वीकृति मिलेगी और कितनी बार हर मुख्यमंत्री और हर सांसद नया बताकर इसकी वाहवाही लूटेंगे। क्या ऐसा ही चलता रहेगा या कभी इस क्षेत्र को रेल लाईन के दर्शन भी होंगे।

20 सितंबर 2017

कौन लोग हैं ये?

file photo
सरकार ने किसानों के लिए एक बडा़ ऐलान हाल के दिनों में किया था। 2100 करोड़ रुपए की राशि की घोषणा। प्रति क्विंटल 3 सौ रुपए का  बोनस। इस ऐलान से किसान-जगत इतना उत्साहित हुआ कि मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का उनके विधानसभा मुख्यालय में नागरिक अभिनंदन तक हो गया। हजारों की संख्या में जुटे लोगों ने राजनांदगांव में मुख्यमंत्री को फूल-मालाओं से लाद दिया। ये अलग बात है कि स्कूली बसों, दिगर संसाधनों से भर-भर कर भीड़ आई। कहा गया ये किसान थे।

जब अभिनंदन के पहले हजारों की संख्या में मोटर-साइकलों की रैली निकल गई... जब किसानों ने ऐतिहासिक रूप से अपने मुख्यमंत्री का अभिनंदन किया... जब किसान सरकार की घोषणाओं से इतना उत्साहित थे... जब सब कुछ अच्छा-अच्छा हो रहा है तो फिर बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आखिर ये लोग कौन हैं जिनने पूरे सरकारी तंत्र को हलाकान कर दिया? ये कौन लोग हैं जो किसानों के लिए फायदे (?) के लिए इतनी बड़ी घोषणा करने वाले सरकार को परेशान किए हुए हैं? ये कौन हैं, जिनको रोकने के लिए सरकार को धारा 144 लगाना पड़ गया? ये कौन लोग हैं, जिनको एक जगह जमा होने से पहले उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया... रास्ते से उठा लिया गया... जेल भेज दिया गया...? आखिर कौन लोग हैं ये?

कहा जा रहा है कि ये किसान हैं जो सरकार की वादाखिलाफी के विरोध में राजधानी कूच करने वाले थे। कहा जा रहा है कि ये किसान हैं जो सरकार से बीते तीन साल के बोनस की मांग कर रहे हैं, जिसकी सरकार ने खुद घोषणा की थी। ये किसान हैं, जो लगातार आत्महत्याएं कर रहे किसानों को उनकी फसल का वाजिब हक दिलाने संघर्ष कर रहे हैं। ये किसान हैं, जिनका संघर्ष एक दिन का नहीं, महीनों या ये कहें, साल भर से ज्यादा समय से चल रहा है।

फिर सवाल खड़ा होता है कि आखिर वे कौन लोग थे जिन लोगों ने मुख्यमंत्री का अभिनंदन किया? क्या वे किसान नहीं थे? किसान ही थे तो क्या वे किसान किसी दल विशेष के थे? किसानों की समस्याएं भी क्या दल के आधार पर तय होती हैं? किसानों की मांगें भी क्या दल विशेष के आधार पर बदलती रहती हैं?

यदि वे भी किसान थे, जिन लोगों ने अभिनंदन किया... यदि वे लोग भी किसान थे जो राजधानी कूच करना चाहते थे... तो फिर सवाल खड़ा होता है कि ये रोकना, नजरबंद करना किसलिए? बहुत सारे सवाल हैं... सारे सवालों का जवाब सरकार को देना होगा...

#हिन्दी_ब्लॉगिंग