डोंगरगढ़-कटघोरा रेल लाईन के नाम पर हर बार मजाक ठीक नहीं
अक्टूबर 2018 और जुलाई 2026 के दोनों घटनाक्रम ने बडा़ सवाल खडा़ कर दिया है कि उस वक्त रेलमंत्री पीयूष गोयल सही थे या अब रेलमंत्री अश्विनी वैष्णव सही हैं। उस वक्त मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सही थे या अब मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सही हैं। उस वक्त सांसद अभिषेक सिंह सही थे या अब सांसद संतोष पांडे सही हैं। मौजूदा तथ्यों या उपलब्ध साक्ष्यों को देखें तो सबसे सही 2018 के घटनाक्रम के दौरान मौजूद लोग सही थे और 2026 के घटनाक्रम के दौरान मौजूद लोगों ने करीब 8 साल बाद 2018 का रिपीटेशन किया है, कोई नया काम नहीं किया है। ऐसे में नई स्वीकृति का हल्ला मचाकर वाहवाही लूटना सही नहीं है।
अब एक बडा़ सवाल उठता है कि 2018 में हुए शिलान्यास के बाद इस परियोजना में अब तक कितना काम हुआ। तो जवाब है कि कागजों में काफी काम हुआ लेकिन धरातल पर सिर्फ इस परियोजना के रास्तों में पड़ने वाले शहरों, गाँवों की जमीनों की खरीदी बिक्री पर रोक लगा दी गई। हाँ, उस दौरान अखबारों में कई कई पन्नों के आल एडिशन विज्ञापन भी दिए गए और अखबारों की लंबी चौडी़ कमाई भी हुई।
बस, इसके बाद राज्य में सत्ता बदलने के बाद सब कुछ ठंडे बस्ते में चला गया। राज्य में नई आई सरकार ने इस परियोजना के रास्ते में आने वाले खैरागढ़ छुईखदान गंडई को नया जिला जरूर बना दिया, लेकिन फिर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि रेलवे की इतनी बडी़ परियोजना पर भी काम करना चाहिए। उस सरकार के कार्यकाल के दौरान देश ने कोरोना जैसी महामारी का दौर देखा और इससे देश के साथ प्रदेश ने भी काफी कुछ झेला पर रेलवे का मसला ठंडे बस्ते में रहा।
एक बार फिर राज्य में सरकार बदली। फिर से आई सरकार का ध्यान भी इस परियोजना की ओर नहीं गया। अब जब इस सरकार का ढाई साल का कार्यकाल पूरा हो गया है, इस सरकार के मुखिया, सांसद अपनी ही पार्टी की सरकार द्वारा किए गए काम को नई परियोजना बताकर नए रेलमंत्री से स्वीकृत कराकर ले आए हैं।
अब बडी़ बात यह है कि डोंगरगढ़ से कटघोरा के रेलवे लाईन को कितनी बार स्वीकृति मिलेगी और कितनी बार हर मुख्यमंत्री और हर सांसद नया बताकर इसकी वाहवाही लूटेंगे। क्या ऐसा ही चलता रहेगा या कभी इस क्षेत्र को रेल लाईन के दर्शन भी होंगे।
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