राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजनीति लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

26 जनवरी 2013

गण गौण, तंत्र हावी!

दुनिया के सबसे बड़े गणतंत्र को बने 63 साल हो गए। इन तिरसठ सालों में काफी कुछ बदला है। एक बड़ा बदलाव यह हुआ है कि 'गण' गौण होता जा रहा है और 'तंत्र' हावी हो गया है।  गणतंत्र के असली मायने गुम हो गए हैं और 'गणतंत्र' को 'गण' का 'तंत्र' बनाने वाला 'तंत्र' इतना हावी हो गया है कि 'गण' को इसमें घुटन होने लगी है।
आजादी के दीवानों ने जिन उम्मीदों के साथ लड़ाई शुरू की थी और उसे अंजाम तक पहुंचाया था, अब के दौर में सब कुछ भुला दिया गया है। सत्ता का स्वाद बाद के नेताओं को ऐसा भाया कि बाकी सब कुछ गौण होता गया और अब आजादी के 65 साल बाद और गणतंत्र के 63 साल बाद यदि मुड़कर देखा जाए तो काफी कुछ बदल गया है। अब जनता यानि गण की याद पांच साल में एक बार आती है और सत्ता यानि तंत्र के मौज हो गए हैं। आजादी मिलने के बाद जब देश को सुचारू रूप से चलाने की बात सामने आई और इसके लिए संविधान बनाने का काम किया गया तो उस वक्त जो भावनाएं थीं, वे गुम हो गई हैं। देश को आजादी मिलने से कुछ पहले से संविधान बनाने की कवायद शुरू कर दी गई थी और इसके लिए पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई थी। इस बैठक में 210 सदस्य उपस्थित थे। इसके दो दिन बाद यानि 11 दिसंबर 1946 को हुई संविधान सभा की दूसरी बैठक में डॉ. राजेंद्रप्रसाद को इसका स्थायी अध्यक्ष चुना गया जो अंत तक इस पद पर बने रहे। फिर दो दिन बाद यानि 13 दिसंबर 1946 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान का उद्देश्य प्रस्ताव सभा में प्रस्तुत किया जो 22 जनवरी 1947 को पारित किया गया। काफी सारी बातों के साथ ही इसके उद्देश्य के मूल में था, भारत के नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय बराबर मिलेगा। पद, अवसर और कानूनों की समानता होगी। विचार, भाषण, विश्वास, व्यवसाय, संघ निर्माण और कार्य की स्वतंत्रता होगी। कानून तथा सार्वजनिक नैतिकता के अधीन प्राप्त होगी।
पर क्या यह है? सवाल एक है और इसके जवाब में काफी सारे तर्क दिए जा सकते हैं। काफी सारी बातें की जा सकती हैं। पर कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है, वो सपने अब भी अधूरे हैं। या ये कहें कि समय बीतने के साथ साथ सपने पूरे तो नहीं हुए, अलबत्ता और दूर होते चले गए।
हमें गणतंत्र हुए 63 साल हो गए और हम 64 वें साल में प्रवेश कर गए। यह वक्त सोचने का है कि इतने वर्षों में हम क्या हासिल कर पाए? जिन ख्वाबों को लेकर, जिन उम्मीदों को लेकर आजादी के दीवानों ने रण में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, जिन उम्मीदों के साथ देश का गणतंत्र लागू हुआ, क्या उन उम्मीदों पर हम खरा उतरे हैं? वास्तविकता तो यह है कि हम और भी पीछे जा रहे हैं। 1947 को देश की जमीन का बंटवारा हुआ था और अब इस दौर में इंसानों में, भावनाओं में और हर उस चीज में बंटवारा निरंतर जारी है, जिसका मानवीय सरोकार है। 1950 में हम गणतंत्र हुए थे और इस दौर में गण पीछे छूट गया है, तंत्र मजबूत हो गया है। मौजूदा दौर में सत्ता की लड़ाई इस कदर हावी हो  गई है कि इसके सामने सब कुछ बौना नजर आने लगा है। आम आदमी की क्या जरूरतें हैं, इस पर किसी का ध्यान नहीं है, बस सब के सब अपना वोट बैंक मजबूत करने के काम में लगे हुए हैं। इस आपाधापी में आम भारतवासी की उम्मीदें, आम भारतवासी की भावनाएं कितनी आहत हो रही हैं, इस दिशा में सोचने की किसी को फुर्सत नहीं।
बीते साल देश ने दो बड़ा आंदोलन देखा। दोनों आंदोलन को देश की दशा और दिशा बदलने वाला बताया गया। एक आंदोलन की शुरूआत एक योगी ने की। लोगों को योग सिखाने वाले बाबा रामदेव ने देश के बाहर जमा काला धन को वापस देश में लाने की मांग को लेकर आंदोलन का आगाज किया और उन्होंने सपना दिखाया कि इससे भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, देश में महंगाई खत्म हो जाएगी और देश के हर आम आदमी को आसानी से दो वक्त की रोटी नसीब होगी। उनके आंदोलन में लोग जुटे। फिर अचानक उनके आंदोलन को कुचल दिया गया। बाबा दोबारा रामलीला मैदान में पूरी ताकत के साथ आए और पांच दिनों तक उनकी लीला चलती रही। अपनी रणनीति को गोपनीय रखने की बात कहकर खूब भीड़ जमा की और आखिर में कांग्रेस को 'निपटाने' के संकल्प के साथ उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया।
इन सबके बीच उभरे अन्ना हजारे। भारतीय सेना के पूर्व जवान और मौजूदा समय में बूढ़े हो चले अन्ना हजारे ने देश के लिए लडऩे का एक जज्बा  पैदा किया। जन लोकपाल की मांग को लेकर लड़ाई शुरू की। उनका भी उद्देश्य था, भ्रष्टाचार का खात्मा, पर धीरे धीरे उनका जादू खत्म होता गया। इसके पीछे उनकी ही टीम के लोग शामिल थे। उनकी टीम के लोगों ने एक ऐसा मायाजाल बिछाया कि जनता पहले तो उसमें फंसती चली गई और जब जनता को होश आया तो इस टीम से उसका मोह भंग हो गया। आखिर में राजनीतिक दल के गठन की बात कर अन्ना का आंदोलन समाप्त हो गया और जनता एक बार फिर ठगी रह गर्ई। अब टीम अन्ना भंग हो गई है और सब अलग अलग राग गा रहे हैं। टीम अन्ना से टूटकर अलग हुए अरविंद केजरीवाल ने 'आम आदमी पार्टी' बना ली और उनके रास्ते अलग हो गए।
कितने दुर्भाग्य की बात है कि एक का आंदोलन राजनीतिज्ञों के सहयोग के साथ खत्म हो गया और दूसरे का आंदोलन राजनीतिक दल बनाने की बात को लेकर समाप्त हो गया। यदि सब कुछ राजनीति से ही संभव है तो फिर राजनीति को लेकर इतनी कड़वाहट क्यों दिखाई इन लोगों ने? क्यों देश की संसद को, क्यों देश के संविधान को कोसने का काम किया गया? इसका जवाब आने वाले वक्त में अन्ना हजारे की टीम और बाबा रामदेव को देना होगा।
अन्ना, रामदेव और केजरीवाल... इनको छोड़ भी दिया जाए तो गणतंत्र को बनाए रखने की जिम्मदारी निभाने वाली सरकारें क्या कर रही हैं? सिर्फ जनता को ठगने के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा है। देश में जनता के लिए वो सारी चीजें सपने की तरह हैं, जो आजादी के समय देखी और दिखाई गई थीं, जो उम्मीदें गणतंत्र के गठन के दौरान की गई थीं। आज भी देश की पूरी आबादी को दो वक्त का खाना मयस्सर नहीं हो रहा है और भ्रष्टाचार जो पहले सैकड़ों और हजारों में था, उसने करोड़ों और अरबों, खरबों तक का सफर तय कर लिया है। महंगाई चरम पर है। दंगोंं में कोई कमी नहीं आई है। देश के तकरीबन हर हिस्से में जात पात, ऊंच नीच के नाम पर अत्याचार हो रहे हैं। मुंबई जल रहा है। दिल्ली अछूती नहीं। गुजरात के दंगे पूरे देश का अमन छीन लेते हैं। असम में बोडो उग्रवाद का आतंक है तो छत्तीसगढ़ सहित देश के आधे से ज्यादा राज्य नक्सलवाद की खूनी क्रांति में जल रहे हैं। लिंग भेद हावी है। बेटियों को जलाया जा रहा है। आज के दौर में सब कुछ महंगा है, सस्ती है तो इंसानी जान!
आज गणतंत्र की वर्षगांठ है। यह अवसर आत्ममंथन का है। यह विचारने का है कि देश में व्याप्त तमाम तरह की विसंगतियों से किस तरह छुटकारा पाया जा सके? किस तरह उन सपनों को साकार किया जा सके, जिसकी कभी उम्मीद जगाई गई थी। आखिर में सब अच्छा हो, इसी उम्मीद के साथ, इसी कामना के साथ गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं...

30 नवंबर 2012

जानवर कौन?

 नेताओं की जुबान। बेशर्मी की सारी हदें पार करतीं और मर्यादा को ताक पर रखकर कुछ भी बयान देने का शायद लायसेंस मिल जाता है नेताओं को। ऐसे ही एक नेता है, मणिशंकर अय्यर। ब्यूरोक्रेट्स से नेता बने अय्यर अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने ताजा बयान दिया है, कि एफडीआई का विरोध करने वाले सांसद 'जानवर' हैं। अय्यर ने एक निजी न्यूज चैनल के एक कार्यक्रम में जिस अंदाज में अपनी बात की और बाद में अपनी बात पर टिके रहने का दावा किया, उससे साबित होता है कि वे एक अडिय़ल शख्स हैं और उनकी खुद की सोच-समझ किसी 'जानवर' से कम नहीं हैं, जो अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता!
कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद मणिशंकर अय्यर  चैनल के कार्यक्रम में विपक्षी सांसदों को जानवर कहने की बात पर न सिर्फ अड़े रहे बल्कि कार्यक्रम में मौजूद एक बीजेपी नेता के ऐतराज के बाद उन्होंने कहा कि मैं अपने शब्द वापस नहीं लूंगा बल्कि उन्हें एक बार फिर दोहराऊंगा। चैनल के प्रस्तोता ने भी जब सभ्य व्यवहार का सवाल उठाते हुए अय्यर से अपने शब्द वापस लेने और उस पर खेद जताने की उम्मीद की तो अय्यर और भड़क गए। उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि मैं क्या कह रहा हूं। मुझे उसपर कोई अफसोस नहीं है। माफी मांगने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।
यह पहला मौका नहीं है, जब अय्यर ने इस तरह की बयानबाजी की है। अय्यर अपने कामों से ज्यादा विवादास्पद बयानों के लिए ज्यादा जाने जाते हैं। वह सरकार में रहें या ना रहें, उनके बयानों ने हमेशा गर्मी पैदा करने का काम  किया है। ना सिर्फ विपक्ष बल्कि उनके निशाने पर अक्सर उनकी अपनी ही पार्टी और अपने ही नेता आ जाते हैं। किसी समय अय्यर पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी के खासम-खास थे और राजीव की मृत्यु के बाद पार्टी में खुद की उपेक्षा का दर्द  अक्सर मणिशंकर के व्यवहार में झलक जाता है और वे कुछ ऊटपुटांग कर बैठते हैं। कैम्ब्रिज से पढऩे के बाद भारतीय विदेश सेवा में रह चुके अय्यर ने 80 के दशक में राजीव गांधी से प्रभावित होकर कांग्रेस का दामन थामा था। धीरे-धीरे वो हाशिए पर चले गए। पर बड़बोलापन नहीं गया।
अय्यर ने दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान आयोजन समिति के प्रमुख सुरेश कलमाडी को ब्लडी लायर यानी झूठा कह दिया था। अय्यर ने ये भी कहा कि मैंने कोशिश की थी की हमें गेम्स की मेजबानी ना मिले। अय्यर इस कदर नाराज थे कि उन्होंने गेम्स के दौरान देश से बाहर रहने का फैसला किया। अय्यर ने ये आरोप भी लगाया कि कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी हासिल करने के लिए भारत ने राष्ट्रमंडल देशों की ओलंपिक समिति को एक-एक लाख डॉलर रिश्वत दी थी। एक बार अय्यर ने ये भी कहा कि कांग्रेस एक सर्कस है और इसमें 90 फीसदी जोकर हैं। अय्यर ने पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव पर ही विवादास्पद बयान दे दिया था। उन्होंने कहा कि बाबरी विध्वंस के लिए नरसिंह राव जिम्मेदार हैं। उनके इस बयान पर कांग्रेस के भीतर काफी हंगामा मचा था। इसी साल नवंबर में मणिशंकर ने गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार करते हुए नरेंद्र मोदी को लहूपुरुष कह डाला। उन्होंने मोदी की तुलना दाऊद से करते हुए कहा कि मोदी की बुद्धि माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम जैसी है। 2008 में ही अय्यर ने मोदी की तुलना हिटलर से भी की थी। कोल ब्लाक मामले में अय्यर ने एक और बयान ने हंगामा मचाया था, वह था बीजेपी सांसदों को संसद से बाहर फेंक देना चाहिए।  अय्यर को अपनी जुबान पर लगाम लगाना चाहिए और हर समय इस तरह की बयानबाजी कर वे खुद को यदि सुपरहीरो समझ रहे हैं, तो यह उनकी नासमझी है और इस तरह की नासमझी एक सुलझा हुआ नेता नहीं कर सकता, ऐसी बयानबाजी वही कर सकता है जिसकी समझ  'जानवरों' जैसी हो।

16 अक्टूबर 2012

रमन साठ के, सठियाए कांग्रेसी!!!

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने धूम धड़ाके के साथ अपने जन्मदिन का जश्न मनाया। इस मौके पर आयोजित समारोह का कांग्रेस के एक धड़े ने विरोध जताया और दूसरे धड़े ने जन्मदिन और अभिनंदन समारोह में अपनी मौजूदगी से अपने ही साथियों के किए पर 'रायता'  फैलाने का काम किया। ऐसे लोगों ने एक बार फिर बता दिया कि यहां कांग्रेसी किस तरह गुटबाजी और एक दूसरे की टांग खिंचाई में लगे हुए हैं। पिछले चुनाव में मुख्यमंत्री के हाथों शिकस्त खा चुके लेकिन शिकस्त के बाद भी जीत के दौर में मिलने वाले वोटों से ज्यादा वोट पाने की खुशी में ही खुद को भ्रम में रखे हुए उदय मुदलियार ने मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर आयोजित समारोह के औचित्य पर बड़ा सवाल खड़ा किया और उनके अभिनंदन को औचित्यहीन करार दिया। उनका तर्क था कि मुख्यमंत्री ने नांदगांव में एक भी ऐसा काम नहीं किया कि उनका अभिनंदन किया जाए, लेकिन यदि उनसे यह पूछा जाए कि वे अपना एक भी काम गिना दें जिससे उनकी बात सुनी जाए तो वे भी कुछ जवाब नहीं दे पाएंगे!
यहां हम मुख्यमंत्री के अभिनंदन पर उठाए मुदलियार के सवाल पर बहस नहीं करना चाहते और न ही मुख्यमंत्री के अभिनंदन की ही पैरवी कर रहे हैं लेकिन किसी के भी आयोजन पर सवाल खड़ा करने के पहले खुद को आईने में देखना चाहिए। चुनाव नजदीक है। सबको अपना राजनीतिक कैरियर दुरूस्त करने का हक है। सो मुख्यमंत्री ने अपने समर्थकों के माध्यम से ये काम किया और उनके समर्थकों ने आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर मुख्यमंत्री की नजर में अपना कद बढ़ाने की कोशिश की। उधर मुदलियार के किए कराए पर तो सुबह से लेकर रात तक पानी फिरता रहा। राजधानी में सुबह उनके बड़े नेताओं ने मुख्यमंत्री निवास जाकर डॉ. रमन को बधाईयां दीं और फिर यहां अभिनंदन समारोह में भी नगर के प्रथम नागरिक से लेकर राजनांदगांव जिले में कांग्रेस की 'इज्जत' बचाने वाले दोनों विधायक पूरे जोशो-खरोश के साथ मौजूद रहे। और फिर सवाल उठता है कि क्या मुदलियार ने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया? हमें याद है, जब वे विधायक हुआ करते थे, उनका जन्मदिन भी उनके समर्थक पूरे जोशो-खरोश से मनाते थे और वे भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और फूले नहीं समाते थे! तो फिर इस तरह के विरोध का क्या औचित्य? क्या वे जनता को इस विरोध के माध्यम से कोई संदेश देना चाहते हैं? यदि ऐसा था तो उनको पहले यह संदेश अपनी पार्टी के लोगों तक पहुंचाना था, इसके बाद जनता तक पहुंचने की कोशिश की जाती, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया।
खैर! आयोजनों की आलोचना करने का यहां मकसद नहीं है। सब अपने अपने सामथ्र्य से आयेाजन कर रहे हैं लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि यदि कांग्रेस ने किसी तरह का कार्यक्रम बनाया तो उसका समर्थन कांग्रेसी ही करें, उसके बाद जनता से समर्थन की उम्मीद करें, तो बेहतर। यहां एक ओर मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर विरोध में मौन जुलूस निकाला गया और दूसरी ओर उसी मौन जुलूस में आयोजन में शामिल होने की खिचड़ी भी पकती रही। आश्चर्य कि जो विरोध में था, उसने भी अभिनंदन किया मुख्यमंत्री का। हम बात कर रहे हैं महापौर नरेश डाकलिया का। उन्होंने एक ओर तो जन्मदिन के विरोध को समर्थन दिया तो दूसरी ओर अभिनंदन समारोह में पूरे समय मौजूद रहकर अपनी ही पार्टी के लोगों को धता बता दिया। उनके अलावा राजनांदगांव जिले में कांग्रेस की 'नाक' बचाने वाले दो विधायकों खुज्जी के भोलाराम साहू और मोहला मानपुर के शिवराज उसारे ने भी मुख्यमंत्री के जनाधार बताने की कोशिश (कांग्रेसियों के ही शब्दों में) में भरपूर सहयोग देकर अपनी ही पार्टी के विरोध प्रदर्शन को झूठा साबित कर दिया।
मुख्यमंत्री ने अपना 60 वां जन्मदिन पूरे जोशोखरोश के साथ राजनांदगांव में 'लीप बर्थ-डे' के रूप में मनाया। लीप (चार सालों में एक बार आने वाला) इसलिए कहा जा रहा है कि इससे पहले उन्होंने राजनांदगांव में 2008 में इसी उत्साह के साथ जन्मदिन उसी मंडी प्रांगण में मनाया था, जिस जगह इस बार मनाया गया। उसके बाद अब चार साल बाद उनका जन्मदिन मना। साल भर बाद चुनाव का दौर शुरू हो जाएगा। भगवा झंडे से पटा शहर... आदमकट कट आऊट...हर तरफ डॉ. रमन...डॉ. रमन... कुल मिलाकर मुख्यमंत्री ने जन्मदिन के बहाने चुनावी रिहर्सल कर ली और उनके इस रिहर्सल में कांग्रेसियों ने भी उनका खूब साथ दिया। कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि मुख्यमंत्री साठ साल के हो गए, पर सठिया गई कांग्रेस लगती है!!!

20 सितंबर 2012

चेहरा और दिमाग हुए जुदा, कैसे जुड़ेगा देश?

आखिरकार अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए। लंबे समय से यह लग रहा था कि दोनों की सोच जुदा है और दोनों के भाव अलग। यह अलग बात है कि दोनों एक ही मंजिल के मुसाफिर (जैसा कि वे दोनों कहते हैं) थे। अब जब दोनों अलग हो गए हैं। एक बड़ा सवाल पूरे देश के जेहन में कौंध रहा है कि कैसे ये दोनों अपने अपने रास्तों से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे? कैसे जन लोकपाल के लिए ये जेहाद को अंजाम तक पहुंचाएंगे?
जन लोकपाल और भ्रष्टाचार को लेकर एक आंदोलन की शुरूआत 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के बैनर तले शुरू हुई थी और पहली बार जब यह संस्था मैदान में उतरी थी तो एक जनसैलाब सा उमड़ पड़ा था। न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के तकरीबन हर शहर, हर गांव, हर मोहल्ले में 'तू भी अन्ना, मैं भी अन्ना' के नारों के साथ युवा सिर पर 'अन्ना टोपी' लगाकर घूमने लगे थे। उस समय यह लगने लगा था कि ये कुछ कर सकते हैं। देश का युवा बदलाव चाहता था और उसे उम्मीद हो गई थी उनकी इस चाह को पूरा करने का काम ये लोग कर सकते हैं, पर धीरे धीरे यह भ्रम टूटता गया और 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के लोग भ्रष्टाचार से लडऩे के बजाय, भ्रष्ट लोगों से लडऩे के बजाय एक दूसरे में ही उलझ कर रह गए। पिछले दिनों देश की राजधानी में हुए इस बैनर के प्रदर्शन में भी यही नजारा दिखा। आमरण अनशन शुरू हुआ और जमकर हुई नौटंकी के बाद देश की मांग के नाम पर अचानक अनशन को खत्म कर दिया गया। साथ ही एक ऐसे राजनीतिक दल के गठन का सपना भी दिखाया गया जो अपने आप में अलहदा होता। एक ऐसा राजनीतिक दल जिसमें कोई हाईकमान नहीं होगा, जिसके पदाधिकारी जनता तय करेगी, जिसके उम्मीदवार जनता के बीच से आएंगे... ऐसी कई बातें की गईं, लेकिन दो-तीन दिन में ही इस घोषणा की हवा निकलनी शुरू हो गई और अन्ना हजारे ने किसी भी प्रकार के राजनीतिक दल के गठन से खुद को अलग करने की घोषणा कर दी। उन्होंने साफ कर दिया कि वे इस फैसले में साथ नहीं हैं।
अब अन्ना ने अपने तब के घोषणा से कुछ आगे जाते हुए एक तरह से अरविंद केजरीवाल को अपनी 'मिल्कियत' से बेदखल कर दिया है। अन्ना हजारे ने साफ कर दिया है कि वे  किसी भी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं होंगे। उन्होंने अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को कह दिया है कि वे न ही उनके (अन्ना हजारे) के नाम का और न ही तस्वीर का इस्तेमाल कर सकते हैं। अन्ना ने साफ कर दिया है कि अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक पार्टी बनाना है तो  बनाएं पर वे उनके दल के प्रचार के लिए नहीं जाएंगे। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि दोनों (केजरीवाल और अन्ना) की मांग समान है पर रास्ते जुदा हैं। अपने आंदोलन को निरंतर चलाते रहने का भरोसा दिलाते हुए अन्ना हजारे ने स्वीकार किया कि ये उनकी कमजोरी है कि टीम टूट गई।
इस टीम के टूट जाने से अन्ना और अरविंद केजरीवाल के अलग हो जाने के बाद अब इन दोनों के आंदोलन के स्वरूप और सफलता को लेकर सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तरफ जहां अन्ना हजारे 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का 'चेहरा' थे तो दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल इसके 'दिमाग'। और जब चेहरा और दिमाग दोनों एक साथ रहने में सफल नहीं हो पाए तो कैसे ये देश को जोड़ पाएंगे?