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10 दिसंबर 2012

काटजू के कडवे पर सच्‍चे बोल

 अपने तेजतर्रार वक्तव्य और विवादास्पद विषयों पर बेखौफ बोलने के लिए जाने जाने वाले भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू के ताजा बयान पर बवाल सा मच गया है। काटजू ने देश की नब्बे फीसदी जनता को बेवकूफ कह दिया है। उनके इस बयान के बाद उनको कानूनी नोटिस तक भेज दिया गया है। कानूनी कार्रवाई करने का काम लखनऊ के दो बच्चों ने किया है। सोशल मीडिया में भी काटजू के बयान का पोस्टमार्टम हो रहा है और कहीं इस पर चुटकी ली जा रही है तो कहीं आलोचना की जा रही है। देखना यह चाहिए कि काटजू ने किस परिप्रेक्ष्य में यह कहा है, उस पर गौर करना चाहिए और इसके बाद उनकी बात को गलत नहीं कहा जा सकेगा।
काटजू ने नब्बे फीसदी भारतीयों को बेवकूफ इस संदर्भ में दिया है कि यहां लोग धर्म के नाम पर आसानी से बहकावे में आ जाते हैं। लोगों को आसानी से बहकाकर दंगे फैलाए जा सकते हैं। लोग यह नहीं देखते कि उनको आपस में लड़ाने का काम किया जा रहा है और उनकी नासमझी का फायदा कुछ तत्व उठा रहे हैं। काटजू ने यह कड़वी बात इसलिए कही कि हमारे देश में बहुसंख्य वर्ग को कुछ लोग मिलकर भ्रम में डाल देते हैं और इसके बाद लोग बगैर कुछ सोचे समझे उसका अनुसरण करना शुरू कर देते हैं। राजनीति की बात करें या फिर धर्म की। हर जगह ऐसी स्थिति देखने मिल सकती है। किसी नेता के पीछे कारवां चलने लगता है, चाहे वह सही हो या गलत। कोई भी यहां चमत्कार के दावे कर बाबा बन जाता है और लोग भक्त की तरह उनको पूजने लगते हैं।
एक उक्ति हमारे देश में लंबे समय  से चली आ रही है और तकरीबन सबने उसे सुना होगा। उक्ति यह है कि, 'जब तक मुर्ख जिंदा हैं, अकलमंद भूखे नहीं मर सकते।' काटजू ने कोई नई बात नहीं की है।  इसी उक्ति को उन्होंने अपने अंदाज में कही है। उनकी बात का मर्म यही है और इसे समझने की जरूरत है। वे नब्बे फीसदी लोगों को बेवकूफ कहकर दस फीसदी लोगों को होशियार नहीं कहना चाहते, वे कहना चाहते हैं कि देश की नब्बे फीसदी आबादी सीधी साधी है और दस फीसदी चालाक। ये चालाक लोग अपने हितों के लिए नब्बे फीसदी आबादी के सीधेपन का फायदा उठाते हैं।
काटजू के बयान की आलोचना होने के बजाय इसके मर्म को समझना चाहिए और यह देखना चाहिए कि उन्होंने भले ही कड़े और कठोर शब्दों का इस्तेमाल किया है, उनकी भावनाएं क्या कहती हैं। वे क्या कहना चाहते हैं। वे अपने इस बयान के माध्यम से संदेश देना चाहते हैं कि बरसों से भारतीय लोगों के बहकावे में आकर अपना नुकसान कर रहे हैं, उस पर रोक लगनी चाहिए और ये रोक वे ही लगा सकते हैं, जो बहकते हैं। काटजू ने तो अपने अंदाज में पूरी साफगोई से बात कर दी है लेकिन अब  यह हम पर है कि हम वास्तव में समझदारी दिखाते हैं, या फिर बेवकूफ ही बने रहना चाहते हैं।

12 नवंबर 2012

नाम के महानायक !!!

बिहार पुलिस का वह पोस्‍टर जिसे लेकर बच्‍चन नाराज हुए
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को उनकी तस्वीर का एक नेक काम के लिए इस्तेमाल करने पर दिक्कत हो गई। बिना इजाजत उनकी तस्वीर के इस्तेमाल करने पर नाराजगी तो जायज है, पर इस्तेमाल करने की वजह जानने के बाद भी यदि वो इस मसले पर अपने वकील से बात करने की बात करें और नोटिस देने की धमकी दें तो इसे उचित नहीं कहा जा सकता। रूपयों के लिए किसी भी उत्पाद को बेचने उसकी तारीफों के पुल बांध देने वाले के साथ ही स्वभाव से नम्र और बेहद भावुक एक कलाकार से किसी मसले पर इस तरह के उतावलेपन की उम्मीद तो नहीं की जा सकती थी, पर अफसोस उन्होंने ऐसा ही किया।
दरसअल, बिहार के एक जिले में वहां की पुलिस ने नई भर्ती के लिए अमिताभ बच्चन की तस्वीर को प्रेरणा के तौर पर इस्तेमाल करने का तरीका अपना लिया गया। बिहार के कैमूर जिले के एसपी उमाशंकर सुधांशु ने नक्सल हिंसा से जूझ रहे इलाके में पुलिस विभाग में भर्ती होने के लिए युवाओं का आकर्षित करने के लिए एक पोस्टर छपवाया, जिसमें अमिताभ बच्चन की तस्वीर के साथ एक कविता प्रकाशित किया। हां, इतना जरूर है कि एसपी ने या फिर उनके विभाग ने इसके लिए अमिताभ बच्चन की इजाजत नहीं ली, बगैर उनसे पूछे उनकी तस्वीर लगा दी लेकिन उनका मकसद स्वाभाविक रूप से नेक था। न ही अमिताभ बच्चन की तस्वीर का इस्तेमाल कर निजी रूप से लाभ कमाने का उद्देश्य था और न ही ऐसा कर अमिताभ बच्चन की छवि को नुकसान पहुंचाने का ही प्रयास किया गया। सामान्य तौर पर जो समझ आ रहा है, उसके मुताबिक ऐसा कर बिहार के ये अफसर सिर्फ अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता का उपयोग जागरूकता के लिए करना चाहते थे। अमिताभ का नाम सामने आया और इसके बाद यह अनूठा प्रयोग सुर्खियां बन गया और बात अमिताभ तक पहुंची और वे इससे इस कदर नाराज हो गए कि नोटिस देने के लिए वकील तक से सलाह लेने लगे। ऐसा नहीं होना चाहिए। अमिताभ बच्चन एक सुलझे हुए कलाकार हैं। वे रूपए लेकर कई उत्पादों की सिफारिश करते टीवी विज्ञापनों में नजर आते हैं। वे एक प्रदेश गुजरात के पर्यटन स्थलों की गाथा गाते भी दिखते हैं। वे गुजरात सरकार के ब्रांड एम्बेसेडर हैं। इसके लिए उनको आर्थिक लाभ भी मिलता है लेकिन वे एक ऐसे कलाकार हैं, जिनकी प्रशंसा पूरा देश करता है, ऐसे में उनको कुछ काम ऐसा भी करना चाहिए जो आर्थिक फायदे से परे हो।
हमारा मानना है कि बिहार पुलिस  ने एक गलती भर की है और वह है, बगैर इजाजत अमिताभ बच्चन की तस्वीर का उपयोग कर लिया। इस मसले पर नाराज होकर अमिताभ उनकी खिंचाई जरूर कर सकते हैं, पर नोटिस देने की धमकी की यहां  जरूरत नहीं थी। अमिताभ की नाराजगी के बाद बिहार की पुलिस ने हालांकि उनसे माफी मांग ली है और उनकी तस्वीरों वाले पोस्टरों को हटा लिया है लेकिन इस घटनाक्रम ने इतना तो साफ कर दिया है कि फिल्मों के परदे पर नायक की छवि रखने वाले कलाकारों का मन वास्तव में कितना छोटा होता है, जो एक जनहित के मुद्दे पर भी खुद के नाम के इस्तेमाल पर बौखला जाएं।