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22 मार्च 2013

मुन्ना भाई देखा... एक बार खलनायक और अग्निपथ भी देखिए काटजू साहब!!!

 करीब बीस साल पहले हुए मुंबई में हुए सिलसिलेवार बम विस्फोट के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टाडा अदालत में सजा पाए वांछित आरोपी याकूब मेनन की सजा को बरकरार रखी है और दस अन्य मुजरिमों की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है। 1993 में मुंबई में हुए धमाकों में ढाई सौ से ज्यादा लोगों की जानें गई थीं और सात सौ से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस मामले में टाडा अदालत द्वारा फिल्म अभिनेता संजय दत्त को दी गई छह साल की सजा को पांच साल कर दिया गया है। संजय दत्त को दी गई सजा को लेकर गुरूवार को फैसला आने के बाद से लेकर अब तक लगातार बहस छिड़ी हुई है और संजय दत्त को माफी दिए जाने की मांग भी उठ रही है। आम तौर पर कड़वी बात कहने और तर्कसंगत तर्कों के आधार पर जनहित से जुड़े मुद्दों पर टिप्पणी करने के लिए जाने जाने वाले प्रेस काउंसिल के प्रमुख जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने भी संजय दत्त को इस मामले से बरी किए जाने की मांग की है। यह मामला भले ही काटजू को उनकी चर्चा में रहने वाले 'शगलÓ में योगदान दे, पर उन्होंने बात गैरवाजिब की है।
उम्मीद तो यह की जा रही थी कि काटजू इस मामले में इलेक्ट्रानिक मीडिया में लगातार चल रही खबरों पर कुछ कहेंगे। वे कहेंगे कि गुरूवार दोपहर से लेकर लगातार इस तरह की खबरें दिखाई जा रही हैं, मानों संजय दत्त के साथ किसी तरह का अन्याय हो गया हो, या फिर संजय दत्त को सजा दिए जाने से देश का, समाज का कोई बड़ा अहित हो गया हो, यह गलत है, लेकिन काटजू साहब ने इस मसले पर मुंह खोला तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ही सवाल खड़े कर गए। वे खुद सुप्रीम कोर्ट के जज रह चुके हैं, यानि यह माना जाए कि उन्होंने जो भी फैसले दिए हैं, वे भावनाओं में बहकर दिए हैं, गवाह, सबूत उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था।
बात न्यूज चैनलों की करें तो तकरीबन हर चैनल में इस आशय की खबरें आ रही हैं कि संजय दत्त पर बालीवुड का करोड़ो-अरबों रूपए दांव पर लग गया है और संजय दत्त के जेल चले जाने से कई निर्माताओं को बड़ा नुकसान होगा, कई फिल्में अधर में लटक जाएंगी। न्यूज चैनल संजय दत्त, जो पहले से 'हीरो' हैं, को हीरो बनाने की कोशिश में लगे रहे और उसका क्या, जो मुंबई पिछले बीस बरस से भुगत रही है। संजय दत्त ने यह जरूर कहा है कि वे न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं,  लेकिन उन्होंने कहा है कि पिछले बीस बरसों में वे काफी कुछ भुगत चुके हैं, करीब डेढ़ साल जेल में रह चुके हैं और अब उनको सजा हो जाने से सिर्फ वो नहीं, उनकी पत्नी और उनके बच्चे भी इस सजा को भुगतेंगे।
हम इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मामले में सुनाई गई सजा के साथ की गई टिप्पणी का जिक्र करना चाहते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि इस मामले में याकूब मेमन धनुष चलाने वाले की भूमिका में था और उसने बाकी लोगों को तीर की तरह इस्तेमाल किया। यानि कि किसी न किसी तरह संजय दत्त भी तीर की भूमिका में रहा। यह अलग बात है कि संजय दत्त की भूमिका बुंबई के धमाकों में सीधे तौर पर नजर नहीं आई है लेकिन उनके पास से उस दौरान घातक हथियार मिले थे और यही वजह है कि वे इस षडय़ंत्र के दायरे में आ गए। 
मुंबई में 1993 में हुए धमाकों में कई घरों के चिराग छिन गए थे, कई लोगों को ऐसा जख्म लगा था, जो ताउम्र नहीं मिट सकता। उस पीड़ा के सामने संजय दत्त को दी गई सजा कोई मायने नहीं रखती, लेकिन बात की जा रही है, सिर्फ संजय दत्त को लेकर, उनकी फिल्मों को लेकर, निर्माताओं के नुकसान को लेकर। हम सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को जायज ठहराते हैं और उम्मीद करते हैं कि इस तरह के फैसले से न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास मजबूत होगा। साथ ही हम इस मामले में काटजू साहब की बातों का विरोध करते हैं। किसी वक्त काटजू साहब ने देश की नब्बे फीसदी आबादी को बेवकूफ कहा था, अब संजय दत्त के मुद्दे पर अपने तर्कों के साथ उन्होंने खुद को इस नब्बे फीसदी की जमात में खड़ा कर लिया है। एक बानगी यह है कि काटजू मुन्नाभाई सीरिज की फिल्म देखकर संजय दत्त को गांधीजी की विचारधारा को आगे बढ़ाने वाला बताकर उनके लिए माफी मांग रहे हैं तो क्या काटजू अग्रिपथ और खलनायक जैसी फिल्में देखकर अपने विचार बदल सकते हैं?

12 फ़रवरी 2013

अफजल ने जो बोया, वो उसे मिला

भारतीय संसद पर हमले के मुख्य मास्टरमाइंड अफजल गुरू को 12 साल बाद फांसी दी गई। एक ओर आठ साल पहले इस सजा पर अदालत की मुहर लगा दिए जाने के बाद भी इस काम के लिए इतना विलंब किए जाने को लेकर सरकार की आलोचना हो रही है तो दूसरी ओर अलग ही तरह का विधवा-विलाप किया जा रहा है। कहीं फांसी की सजा का विरोध हो रहा है तो कहीं अफजल को फांसी पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा है। भारत से परे, पाकिस्तान में और कश्मीर के कुछ हिस्सों में अफजल के इस अंजाम का विरोध हो तो फिर भी समझा जा सकता  है, लेकिन आश्चर्य तो तब होता है जब देश के भीतर ही कई बुद्धिजीवी खुद को बहुत बड़ा मानवाधिकारवादी(?) साबित करने पर तुले हुए हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि अफजल को प्राकृतिक न्याय नहीं मिल पाया, उसे बचाव का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया। इसी कड़ी में अफजल गुरू के वकील रहे एनडी पंचोली ने एक नया विवाद पैदा करने की कोशिश की है। उन्होंने इस दुर्दांत आतंकी के मामले की तुलना आजादी के ठीक बाद हुए महात्मा गांधी हत्याकांड के आरोपियों से करते हुए राय व्यक्त की है कि गांधी जी की हत्या का अपराध, संसद पर हुए हमले से बड़ा अपराध था और जब उस मामले में अपराध में सहयोग देने वालों को फांसी नहीं, उम्रकैद हुई थी तो अफजल को फांसी देना गलत हैै।
फांसी के बाद उठ रहे तमाम तरह के सवालों में से सिर्फ एक सवाल वाजिब लगता है, वह है फांसी में हुई देरी। अफजल पर भारत के कानून के मुताबिक बकायदा मुकदमा चला था और उसे अपने बचाव का पूरा मौका मिला था। इसके बाद उसे फांसी की सजा मिली थी। हर स्तर के अदालत से फांसी पर मुहर लगने के बाद उसे बचाव का एक मौका मिला था, राष्ट्रपति के पास। वहां से भी सजा माफी की अपील खारिज हो जाने के बाद से फांसी दी गई थी। अफजल की फांसी में देरी हुई, यह जल्द हो जाना चाहिए था, सिर्फ इस बात को करने के बजाय अब इस तरह का विवाद खड़ा किया जा रहा है, मानो एक अपराधी को सजा देकर अन्याय कर दिया गया हो। अफजल की फांसी देर से पर दुरूस्त  कदम है और हम इस विषय पर आ रही तमाम आपत्ति को खारिज करते हैं।
अफजल के वकील रहे पंचोली ने बेवजह का विवाद खड़ा करने की कोशिश की है। महात्मा गांधी की हत्या के मामले से संसद हमले की उनकी तुलना भी गलत है। आजादी के बाद महात्मा गांधी की हत्या का अपराध जघन्य जरूर था, लेकिन ये दोनों मामले अलग हैं। जहां तक हमारा मानना है कि महात्मा गांधी एक व्यक्ति थे जबकि संसद पूरे देश की अस्मिता का प्रतीक एक संस्था। ऐसे में यदि दोनों मामलों की तुलना भी की जाए तो संसद पर हमला बड़ा अपराध माना जाना चाहिए, लेकिन दोनों अपराधों की तुलना कर किसी अपराध को छोटा या बड़ा करने का प्रयास सिर्फ विवाद पैदा करने की मानसिकता को दर्शाता है, इसलिए ऐसे किसी विषय की जरूरत इस वक्त नहीं है। अफजल की फांसी का विरोध करने वालों को हमारा जवाब है कि उसने जो बोया, उसे वही मिला है।

31 अगस्त 2012

फांसी को नहीं, फांसी पर लटकाना चाहिए

फांसी की सजा पाने वालों की फेहरिश्त में एक और दुश्मन आ गया। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर यानि संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरू को फांसी की सजा दिए जाने के बाद से उसे अब तक लटकाया नहीं गया है, अलबत्ता उसकी फांसी के मसले को लटकाकर रखा गया है और अब सुप्रीम कोर्ट ने भारत के खिलाफ जंग छेडऩे का घोर अपराधी मानकर अजमल कसाब को दी गई फांसी की सजा को बरकरार रख दिया है। इन दोनों मोस्ट वांटेड आतंकियों की फांसी का इंतजार पूरे देश को है।
मौत की सजा को लेकर देश में लंबे समय से बहस होती रही है और कुछ तबके का मानना है कि सभ्य समाज में इस तरह की सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए जबकि एक बड़ा तबका यह कहता है कि सजा की प्रकृति को देखते हुए सजा  का प्रकार तय होना चाहिए और इस तरह की सजा के हकदार ये अपराधी हैं। दुनिया भर में अपराधियों को मौत सजा देने के कई तरीके हैं, इनमें से भारत में मौत की सजा का तरीका फांसी ही है। दुनिया के कुछ देश ऐसे भी हैं जहां मौत की सजा अपराधी को तड़पा-तड़पा कर दी जाती है लेकिन हमारे देश में फिर भी बेहतर तरीका है। इस पर भी सवाल खड़ा किया जा रहा है और कई उपायों से कई बार सजा को टालने की कोशिश होती है।
भारत में आखिरी बार फांसी की सजा करीब आठ साल पहले पश्चिम बंगाल में दी गई थी। उस समय एक अपराधी धनंजय चटर्जी को एक युवती का बलात्कार कर उसकी हत्या का दोषी पाए जाने के बाद सजा दी गई थी। उस समय भी इस मामले को लंबा खींचा गया था लेकिन आखिरकार अपराध की प्रकृति को देखते हुए मुकर्रर की गई सजा को अमल में लाया गया।
ताजा मामलों की बात करें तो देश इस समय दो फांसी की सजा पाए लोगों को सजा  मिलने का इंतजार कर रहा है। दोनों अपराधी देश की अखंडता को चोट पहुंचाने का काम कर चुके हैं, पर दुर्भाग्य है कि इतना गंभीर अपराध होने के बाद भी दोनों की सजा का मामला लंबे समय से लंबित है। संसद में हमले के दोषी अफजल गुरू को तो काफी पहले फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है और कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद उसका मामला राष्ट्र्रपति के पास दया याचिका के रूप में लंबित है। राष्ट्रपति ने इस पर अब तक कोई फैसला नहीं दिया है लेकिन मामले ने इससे पहले राजनीतिक रूप ले लिया और एक वर्ग विशेष की भावनाओं का ख्याल रखते हुए इस मामले को लंबा खींचा जा रहा  है।
दूसरा मामला मुंबई में हमले का है। इस मामले में पकड़े गए एकमात्र  जिंदा आतंकी अजमल कसाब का मामला लंबे समय तक चला और इसके बाद उसे फांसी की  सजा सुनाई गई। सुप्रीम कोर्ट में कसाब ने सजा के खिलाफ अपील की और अब सुप्रीम कोर्ट का भी फैसला आ गया है। सजा बरकरार रखी गई है। तर्क भी दिए गए हैं कि यह अपराध देश के खिलाफ युद्ध छेडऩे का अपराध  है और इसमें सजा कम नहीं की जा सकती। इसके बाद अब कसाब के सामने राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दायर करने का ही रास्ता बचता है।
पर देश इस मामले में कुछ और ही चाह रहा है। देश चाहता है कि इस मामले में जल्द से जल्द फैसला हो और जो अफजल गुरू के मामले में हो रहा है, वह यहां न हो। संसद में हमले के दौरान मारे गए लोगों और मुंबई हमले के दौरान मारे गए लोगों के परिवारों की संंतुष्टि के लिए और मृतकों को श्रद्धांजलि तभी मिल सकती है जब फांसी के मसले को लटकाने के बजाय आरोपियों को फांसी पर लटकाया जाए।