18 दिसंबर 2011

मुर्गा लडाई का रोमांच


स्‍पेन, पुर्तगाल और अमेरिका का बुल फायटिंग (सांड युध्‍द) का नजारा मैंने टीवी पर देखा है..... रोमांच का आलम वहां होता है इस खेल के दौरान पर पिछले दिनों मैंने उससे ज्‍यादा रोमांच देखा छत्‍तीसगढ के वनांचल में। छत्‍तीसगढ के धुर नक्‍सल प्रभावित इलाके दंतेवाडा में इस तरह का रोमांच देखना अपने आप में अलग अनुभव था। वहां सांड युध्‍द तो नहीं पर मुर्गा लडाई जरूर देखने मिला और दौरान वहां दूर दूर गांव से आए आदिवासियों का उत्‍साह देखने लायक था। विश्‍व के कुछ देशों में सांड युध्‍द पर भले ही सवाल उठते रहे हों, इसे बंद करने की पशु प्रेमियों की मांगें उठती रही हों और संभवत: 2012 में कुछ जगहों पर इस पर प्रतिबंध भी लग जाएगा। .... पर छत्‍तीसगढ में मुर्गों के बीच की लडाई का नजारा अपने आप में गजब का अनुभव दे जाता है और साथ ही यह भी कि नक्‍सल हिंसा से त्रस्‍त लोग, जिनके पास मनोरंजन के सीमित साधन होते हैं, किस तरह एक परंपरा को लेकर उत्‍साहित होते हैं और इसमें खुलकर हिस्‍सा लेते हैं।
छत्‍तीसगढ की अपनी अलग संस्‍कृति है और इसके अलग रूप। राज्‍य का आदिवासी अंचल
संस्‍कृति और परंपरा की दृष्टि से समृद्ध है। इसी का एक हिस्‍सा है मुर्गा लडाई। अपने क्षेत्र के आदिवासी क्षेत्रों में मैंने पहले भी मुर्गा लडाई का नजारा देखा है पर इस ऐसा उत्‍साह नहीं। दंतेवाडा में हजारों की भीड इस रोमांच में शामिल नजर आई। न सिर्फ लडाई देखने बल्कि इस पर दांव लगाने भी। हर हाथ में रूपए थे और सब अपने पसंदीदा मुर्गे पर दांव लगाने उतारू थे। बताते हैं एक दिन में सौ से ज्‍यादा मुर्गे लडाई में शामिल होते हैं और दांव में लगते हैं लाखों रूपए। .... और सब कुछ व्‍यवस्थित होता है यहां। लडने वाले मुर्गों पर दांव लगता है और जिसका मुर्गा लडाई में जीतता है, वह हारने वाले मुर्गे का हकदार हो जाता है...... मामूली घायल होने पर वह उस मुर्गे को अगली लडाई के लिए तैयार करता है और यदि फिर से लडाई के लायक न रह पाए मुर्गा तो पार्टी...........!!!! ज्‍यादा कुछ नहीं लिखते हुए आपको ले चलता हूं मुर्गा लडाई के रोमांच की ओर.... तस्‍वीरों के जरिए.......... 
आपस में लडने के लिए उत्‍तेजित किए जा रहे मुर्गे
 
वो देखो..... उसे है हराना
जंग शुरू.....
जोर आजमाईश.....
कौन जीतेगा.......????
आज दांव पडेगा या नहीं........????
हर हाथ में हैं रूपए........
ये तो गया काम से........
इस औजार को बांधा जाता है मुर्गों के पैर में
धार किया जा रहा है औजार, ताकि वार लगे जोरदार 
मेरा भी नम्‍बर आएगा.......
दो हजार रूपए का मुर्गा.......
मुर्गों का इस तरह खूनी खेल पशुप्रेमियों को नागवार गुजर सकता है..... पर यह सिर्फ आदिवासियों की परंपरा का हिस्‍सा है और नक्‍सलवाद के साए में मूलभूत जरूरतों को तरस रहे वनवासी लोगों के पास मनोरंजन और खुशी के प्रदर्शन का अदभुत तरीका है और यह पोस्‍ट इसी बात को प्रदर्शित करता है। 

41 टिप्‍पणियां:

  1. रोमांचक चित्र,... ऐसा भी होता है,..जानकारी के लिए आभार

    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    सब कुछ जनता जान गई ,इनके कर्म उजागर है
    चुल्लू भर जनता के हिस्से,इनके हिस्से सागर है,
    छल का सूरज डूबेगा , नई रौशनी आयेगी
    अंधियारे बाटें है तुमने, जनता सबक सिखायेगी,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  2. Rahul Singh

    8:44 PM (31 minutes ago)

    कमेंट बाक्‍स पर टिप्‍पणी स्‍वीकार नहीं हो रही है, सो यहां-
    ''जबरदस्‍त रोमांच और उन्‍माद होता है लोगों में इसका''.

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  3. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा आज दिनांक 19-12-2011 को सोमवारीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  4. अरे वाह!
    मुर्गा लड़े या गुर्गा!
    मज़ा तो दोनों में ही आता है!

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  5. बस्तर में रहकर इस लड़ाई को देखा है, बीती यादें ताजा कर दीं.

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  6. मन कुछ खिन्न सा हो जाता है ऐसा कुछ देखकर .....पता नहीं लोग ऐसा खेल क्यों खेलते हैं ?

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  7. बहुत अच्छा ....अतुल जी अच्छा परिदृश्य चित्रित किया आपने ...
    मुझे ब्लॉग विस्तार हेतु आप से कुछ विचार विमर्श करना चाहती हूँ ...
    आशा है आपका सहयोग प्राप्त करुगी ....बहुत -बहुत आभार

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  8. कडकनाथ्‍ा मुर्गा है। पुरानी परम्‍पराओं में मनोरंजन के ये ही साधन थे।

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  9. मैने अपने ब्लाग में इस पर लिखा था.. इस खेल में और आदमी के अपने खेल में बहुत ज्यादा अन्तर नहीं दिखता...हश्र तो दौनों का ही एक है। ...

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  10. bechare murge..
    kabhi inhe ladakar log maja lete hai...
    to kabhi inhe kha kar....
    kabhi to lagata hai inka jivan inka na hokar dusaro ka ho gaya hai..

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  11. संसद में होना चाहिए इसका मुकाबला .संसदीय परम्परा के अनुरूप रहेगा .मुर्गे लड़ाना खेल खेल में .खेल का खेल और संसद की संसद बहस मुबाहिसे का यही तो आज स्वरूप है .

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  12. अफगानिस्तान के तालिबान का प्रिय खेल था , अंजाम तो पता ही है . अमानवीय .

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  13. किसी के लिए मनोरंजन है पर जान से तो बेचारा जानवर ही जाता है न... अमानवीय

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  14. माना की पूरनी परम्पराओं मे मानो राजन के यही साधन थे मगर आब तो नहीं यह मनोरंजन कम अत्याचार ज्यादा लगा मुझे तो ...

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  15. यह मनोरंजन नहीं , मनुष्य की पाशविक वृत्ति है जो उसकी आदिम भावना को संतुष्टि देती है ...
    इन पर रोक लगाई जानी चाहिए !

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  16. मनुष्य को अपनें मनोरंजन के नाम पर क्रूरता का अधिकार नहीं मिल जाता।

    सहमत इन सम्वेदनशील शब्दों से………

    --अफगानिस्तान के तालिबान का प्रिय खेल था , अंजाम तो पता ही है . अमानवीय .

    --किसी के लिए मनोरंजन है पर जान से तो बेचारा जानवर ही जाता है न... अमानवीय

    --माना की पुरानी परम्पराओं मे मानोरंजन के यही साधन थे मगर आब तो नहीं यह मनोरंजन कम अत्याचार ज्यादा लगा मुझे तो ...

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  17. आदिवासियों के लिये यह मनोरंजन का साधन हो सकता है, लेकिन इससे पशुओं के प्रति क्रूरता कम नहीं हो जाती.

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  18. आदिवासियों.के मनोरंजन सुगम साधन है,..

    मेरी नई पोस्ट के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  19. कल 23/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  20. पुरानी परम्‍पराओं में ये मनोरंजन के साधन थे पर इन रोक लगाई जानी चाहिए !

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  21. ऐसे मनोरंजन पर रोक लगाई जानी चाहिए ... बेहतरीन प्रस्‍तु‍ति दी है आपने ...आभार ।

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  22. अतुल जी,....आपके नए पोस्ट के इंतजार में,....

    "काव्यान्जलि"--नई पोस्ट--"बेटी और पेड़"--में click करे

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  23. परम्पराओं का अपना अलग महत्व है..... मगर हर जीव में जीने की लालसा होती है. इस दृष्टी से उचित नहीं. बहरहाल चित्रमय प्रस्तुति बहुत ही खुबसूरत सजी है. सुंदर प्रस्तुति.

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  24. बहुत सुंदर प्रस्तुती, नए पोस्ट के इंतजार है ,.....
    नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाए..

    नई पोस्ट --"काव्यान्जलि"--"नये साल की खुशी मनाएं"--click करे...

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  25. अच्छा लेख |नववर्ष शुभ और मंगलमय हो |
    आशा

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  26. रोचक प्रस्तुति...नववर्ष की वधाई

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  27. आप को सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनायें !

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  28. आप को सपरिवार नव वर्ष 2012 की ढेरों शुभकामनाएं.

    इस रिश्ते को यूँ ही बनाए रखना,
    दिल मे यादो क चिराग जलाए रखना,
    बहुत प्यारा सफ़र रहा 2011 का,
    अपना साथ 2012 मे भी इस तहरे बनाए रखना,
    !! नया साल मुबारक !!

    आप को सुगना फाऊंडेशन मेघलासिया, आज का आगरा और एक्टिवे लाइफ, एक ब्लॉग सबका ब्लॉग परिवार की तरफ से नया साल मुबारक हो ॥


    सादर
    आपका सवाई सिंह राजपुरोहित
    एक ब्लॉग सबका

    आज का आगरा

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  29. हमको तो भैया बहुत अच्छा लगा। यह मुर्गा दौड़ भी और आपकी रिपोर्टिंगा भी। मुर्गा लोग पालते ही क्यों हैं? अंडे के लिये या उसको काटकर/बेचकर पेट भरने के लिए। मुर्गा भी असंख्य मानव का एक व्यवसाय है जैसे मछली बेचना। यह अमानवीय भी नहीं है क्योंकि उस क्षेत्र की जनता के सबसे बढ़िया और सुलभ मनोरंजन का साधन है। हां, हम आप ऐसे अपने घर के कमरे में मुर्गा लड़ायें तो वह अमानवीय होगा। यह तो उस क्षेत्र की आवश्यकता लगती है। इसी बहाने जब तक जिवित रहते हैं मुर्गे का भाव चउचक बढ़ा रहता होगा:)

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  30. आपको एवं आपके परिवार को नए वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

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