08 मई 2012

...वरना नहीं मिलेगी माफी!


बारह साल। ढाई बार पीएससी परीक्षा! वह भी अधर में! छत्तीसगढ़ में सरकार की नाकामी का यह बड़ा उदाहरण है। साथ ही यह बताने के लिए भी काफी है कि यहां के युवाओं के लिए, बेरोजगारों के लिए सरकार कितनी सजग है। बड़ी-बड़ी बातें करने, रोजगार का अवसर सृजित करने का दावा अपनी जगह है लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार की कार्यप्रणाली इसी बात से साबित हो जाती है कि पीएससी जैसी संवैधानिक संस्था को सुचारू रूप से चलाया नहीं जा सक रहा है। ...और विपक्ष, वह भी इस गंभीर मामले को सामने में कमजोर साबित हो रहा है। 
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315 कहता है कि अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती के लिए संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सेवाओं में भर्ती के लिए राज्य लोक सेवा आयोग काम करता है। वर्ग एक के पद संघ लोक सेवा आयोग और वर्ग दो-तीन के पद राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से भरे जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका पालन ही नहीं हो रहा है और राज्य सरकार की इस नाकामी का खामियाजा राज्य के लाखों युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। राज्य लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है और इस निकाय का सही ढंग से काम न करना राज्य सरकार के होने पर ही सवालिया निशान है! दुख की बात तो यह है कि इस मामले में विपक्ष भी नकारा साबित हो रहा है।  विपक्ष अपनी रोटी सेंकने में लगा है और सत्ता में बैठे लोग न जाने किस गलतफहमी में जी रहे हैं!
छत्तीसगढ़ राज्य को बने 12 साल हो गए। वर्ष 2000 में यह राज्य अस्तित्व में आया और इसके बाद पहली बार पीएससी की परीक्षा हुई 2003 में। बड़ी मुश्किल से इस परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों की भर्ती हो पाई। उन पर भी तलवार लटकी हुई है। भर्ती में गड़बड़ी की शिकायतें हुईं और मामला हाईकोर्ट में है। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले की जांच की है और जांच रिपोर्ट राज्यपाल के समक्ष पेश की जा चुकी है। इस ब्यूरो के सूत्रों की मानें तो जांच रिपोर्ट के आधार पर पचास से ज्यादा लोगों के पद बदल जाएंगे और कई को तो नौकरी से भी हाथ धोना पड़ जाएगा। दोष उन उम्मीदवारों का नहीं, आयोग का है, सरकार का है, जिसने परीक्षा लेने में, इसका परिणाम निकालने में गड़बड़ी की, लेकिन भविष्य अधर में उनका है जो इस परीक्षा के माध्यम से भविष्य संवारने का सपना देख रहे थे!
दूसरी बार परीक्षा हुई 2005 में। इसकी प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा भी जैसे-तैसे निपटी और भर्ती प्रक्रिया भी पूरी हो गई लेकिन इस पर भी विवाद बना हुआ है। हां, इतनी राहत की बात जरूर है कि इस बार के चयनित उम्मीदवारों पर न्यायालय या जांच की तलवार नहीं लटकी है।
तीसरी बार परीक्षा 2008 में हुई। भर्ती में आरक्षण नियमों में का पालन नहीं होने को लेकर बवाल मचा और मामला न्यायालय में जा पहुंचा। बड़ी मुश्किल से चार साल बाद 2012 में इसकी मुख्य परीक्षा आयोजित हुई। रिजल्ट नहीं आया है और मामला सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंचा है। राज्य की पीएससी ने इस परीक्षा में प्रारंभिक परीक्षा में ही आरक्षण के आधार पर परिणाम  जारी कर दिया, जबकि नियम कहता है कि है  एक से अधिक चरणों में होने वाली परीक्षाओं में आरक्षण नियमों का पालन अंतिम चरण की परीक्षा में किया जाना चाहिए।  इस तरह पीएससी में आरक्षण का नियम मुख्य परीक्षा में ही लागू होना चाहिए था। इस आधार पर मुख्य परीक्षा के परिणाम पर रोक का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर क्या फैसला आएगा यह फिलहाल तय नहीं है। हालांकि बात यहां यह भी हो रही है कि मुख्य परीक्षा निरस्त होगी और नई चयन सूची के आधार पर फिर से मुख्य परीक्षा होगी। यानि यहां भी उम्मीदवारों से छल!
चौथी बार  परीक्षा 2012 में यानि इसी महीने की छह तारीख को हुई है। इस परीक्षा को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। आरोप लग रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों को वंचित करने का षडय़ंत्र रचा जा रहा है। उत्तरप्रदेश की भाषाशैली का प्रश्र पूछा गया है और वहां के ऐसे प्रश्र पूछे गए हैं जिनका जवाब वहां के उम्मीदवारों के लिए सरल और  छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों के लिए काफी कठिन हैं। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के ऐसे सवाल जिनका जवाब हर कोई दे सकता है।
छत्तीसगढ़ में जब पहली बार पीएससी की परीक्षा आयोजित हुई थी तो उस दौरान एक नियम पुस्तिका राज्य लोक सेवा आयोग ने जारी की थी, जिसमें स्पष्ट तौर पर उल्लेख था कि पीएससी की परीक्षा हर साल आयोजित होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। पड़ौसी राज्य मध्यप्रदेश जिससे अलग होकर छत्तीसगढ़ बना है, वहां हर साल यह परीक्षा  आयोजित हो रही है। छत्तीसगढ़ के साथ ही बने झारखंड और उत्त्तराखंड में भी यह परीक्षा सुचारू है। एक छत्तीसगढ़ ही है जहां पीएससी परीक्षा को लेकर पसीने छूट रहे हैं।
सैकड़ों, हजारों पद खाली हैं। राज्य में जिलों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन सरकार और पीएससी भर्ती ही नहीं कर पा रहा है। यह कमजोरी पीएससी की है। सरकार की है। इसका खामियाजा बेरोजगार भुगत रहे हैं। राज्य सेवा में आने की उम्मीद  लगाए युवा भुगत रहे हैं। रिटायर्ड लोगों को संविदा में लेकर सरकार तो अपना काम कर रही है लेकिन नई पीढ़ी के साथ जो अन्याय हो रहा है, उसका क्या। एक बात गौर करने वाली है कि व्यसायिक परीक्षा  मंडल जैसी संस्था जो संवैधानिक संस्था नहीं है, वह हर साल 50 हजार से एक लाख परीक्षार्थियों को लेकर परीक्षाएं आयोजित कर रहा है और उसका परिणाम भी समय पर जारी कर रहा है। इसे लेकर कोई विवाद भी नहीं हो रहा है, लेकिन एक संवैधानिक संस्था का छत्तीसगढ़ में इस तरह का हाल..... राज्य की युवा पीढ़ी के भविष्य से खिलवाड़ है। .... और फिर राज्य सरकार विकास के, तरक्की के, बेहतरी के कितने ही दावे कर ले, मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी उसे कभी माफ नहीं करेगी।

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात है!! आपने बहुत उम्दा लिखा है...बधाई
    इसे भी देखने की जेहमत करें शायद पसन्द आये-
    फिर सर तलाशते हैं वो

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  2. बेहद अफसोसजनक है ...पढ़े लिखे युवा बेरोजगार घूम रहे हैं और सरकारी पद यूँ खाली पड़े हैं.....

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  3. राज्य सरकार को विकास और राज्य की बेहतरी के लिए इस ओर सकारात्मक कदम उठाना जरुरी है... सार्थक आलेख... आभार

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  4. अतुल जी, आपने इस विषय को उठाकर बहुत अच्छा कार्य किया,...आभार

    RECENT POST....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  5. बहुत अच्छा लिखा है आपने >

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  6. हर जगह के यही हाल हैं.
    यहाँ मप्र में भी तथाकथित कुछ भर्तियों में पीएससी में लोग-बाग खुले आम ढाई लाख देकर पोस्टें हासिल किए हैं - मात्र इंटरव्यू से चयन हुआ, वो भी राजपत्रित पोस्ट के लिए!

    गनीमत ये है कि अब सरकारी नौकरियों का उतना आकर्षण नहीं रहा.

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  7. भाई साहब इन्हें कौन समझाये .आपसे अनुरोध एक ऐसी
    शानदार पोस्ट लिखें जिसमें यह बतलाएं की किसी पोस्ट पद की वर्तमान अहर्ता क्या है ,कट ऑफ़ लाइन क्या है ,किसे आवेदन नहीं भरना चाहिए .शायद इससे कोई नई दिशा मिले
    सुन्दर पोस्ट के लिए अभिवादन स्वीकारें .

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  8. आपने इस विषय पर लिखकर बहुत अच्छा कार्य किया है हो सकता है ऐसे ही आलेखों सरकार जाग जाये और सकारात्मक कदम उठाये बहुत आभार .......अतुल जी

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