05 मई 2012

‘यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...!’


सुकमा कलेक्‍टर एलेक्‍स पाल मेनन
 ‘फक्र है हमें कि हमने अपने कर्तव्यों की पूर्ति के लिए अपनी जान दे दी। हम एक पल भी नहीं डिगे और हमने वो काम अपनी आखिरी सांस तक करने की कोशिश की, जो हमें मिला था। जब तक हम जिंदा थे, जब तक हमारे शरीर में ताकत थी, हम डटे रहे और अपने साहब के लिए ढाल बने रहे। नक्सलियों ने उस समय तक हमारे साहब को छूने की भी हिम्मत नहीं दिखाई जब तक हम उनके साथ थे। हमारी जान गई और नक्सलियों ने हमारे साहब का अपहरण कर लिया। .....पर ये क्या? नक्सलियों के चंगुल से छूटने के बाद हमारे साहब ने हमारे बारे में बात ही नहीं की। जानने की कोशिश ही नहीं की कि हमारे बाद हमारे परिवार का क्या हाल है? यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला....!

किशन कुजूर और अमजद खान। ये दो सैनिक थे जो 21 अप्रैल की दोपहर तीन बजे तक की स्थिति में जीवित थे। इस समय तक ये अपने कलेक्टर, जिनकी सुरक्षा में तैनात थे, को लेकर पूरी तरह सजग थे। समर्पित थे। यही भाव लिए वो तीन बजे के बाद निर्जीव हो गए। शहीद हो गए। नाम ऊंचा कर गए अपने परिवार का। अपनी जमात का। इस दुनिया के बाद कहीं स्वर्ग का अस्तित्व है, जन्नत का अस्तित्व है तो वहां से भी ये दोनों 21 अप्रैल की शाम से लेकर तीन मई की शाम तक यही दुआ करते रहे होंगे कि उन लोगों की जान भले ही चली गई पर उनके साहब को कुछ नहीं होना चाहिए। उन लोगों ने जो कुर्बानी दीवह व्यर्थ नहीं जानी चाहिए। उनके साहब सकुशल घर लौट आएंगे।
किशन और अमजद की इस दुनिया से परे की गई दुआएं काम कर गईं और उनके साहब घर लौट आए। नक्सलियों ने किसी अघोषित सौदे(?) की प्रत्याशा में सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन को रिहा कर दिया। गुरूवार को एलेक्स पाल मेनन पहले ताड़मेटला से चिंतलनार पहुंचे। चिंतलनार में उन्होंने मीडिया से संक्षिप्त बात की। इस बात में उन्होंने सरकार, अपने बड़े अफसरों, अपने परिवार और मीडिया को धन्यवाद ज्ञापित किया। वे दूसरे दिन सुकमा में पत्रकारों से बात करने की बात कहकर निकल गए। दूसरा दिन भी आ गया। कलेक्टर अब बंगले में पहुंच गए थे। जंगल में तो नहीं थे। नक्सलियों के कब्जे में तो नहीं थे, जो सामान्य रहते। कलेक्टरी का रूतबा हावी हो गया। बंगले के भीतर गए तो बाहर ही नहीं निकले। उनके बंगले के बाहर उनसे बात करने, उनके नक्सली चंगुल में रहने के दौरान के अनुभव जानने, उनकी रक्षा करते जान गवां चुके दो सुरक्षा गार्डों पर सवाल करने की उम्मीद से मौजूद मीडिया को एसडीएम ने कलेक्टर का संदेश सुनाया कि कलेक्टर साहब की तबियत ठीक नहीं, वो बात नहीं कर सकेंगे! सुकमा में कलेक्टर बंगले के बाहर अपने न्यूज चैनल के लिए ड्यूटीमें तैनात एक पत्रकार का कहना था कि वो कलेक्टर से पूछना चाहते हैं कि उन गार्डों का क्या कसूर जो अब इस दुनिया में नहीं रहे। पर पूछें किससे....? और क्या पूछने की जरूरत होनी चाहिए? कलेक्टर को खुद होकर पूछताछ करनी चाहिए थी और अपने गार्डों के परिवारों का हाल जानना चाहिए था।
कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन रिहा हो गए। सच में यह वक्त काफी राहत पहुंचाने वाला था। मेनन के परिवार वालों के लिए, मेनन के लिए, सरकार के लिए और सरकार के लिए काम करने वाले मध्यस्थों, नक्सलियों के वार्ताकारों के लिए, लेकिन यह वक्त इस कदर जश्र मनाने का कतई नहीं था कि किसी की शहादत को भूला दिया जाए। पटाखे फोड़े जाने वाली बात तो नहीं थी। मिठाईयां बांटे जाने का वक्त तो नहीं था। एलेक्स के पिता हैं, उनका परिवार है, क्या उनको यह सामान्य समझ नहीं कि किशन कुजूर का भी परिवार होगा? अहमद खान का भी परिवार होगा? उनका बेटा तो लौट आया, पर क्या किशन और अमजद कभी लौट पाएंगे!
किशन और अहमद खुद कहीं होंगे, इस दुनिया से परे तो कल रिहा होने के बाद अपने साहब की बेरूखी और साहब के चाहने वालों के जश्न को देखकर जरूर आपस में यह बात कर रहे होंगे कि, यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...!

31 टिप्‍पणियां:

  1. "जाओ जो लौट के तुम ... घर हो खुशी से भरा ;
    बस इतना याद रहे ... एक साथी और भी था"

    - जावेद अख्तर

    दोनों अमर शहीदो को शत शत नमन !

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  2. एक साथी जो टूट गया अपने एक साथी के लिए, आज उसने ही तोड़ दिया साथ अपने स्वार्थ को पा के....:(
    विडम्बना...!!

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  3. bat sahi bhi hai par itni bhi nahi...agar sahab ne hal-chal media k samne nahi poochha to kya hua??? last 12 dino me shayad naxalites se ya fir riha hone par apne mediaters se poochha hoga...

    abhi wo khud in halat me nahi..jo khud maut se bach kar aya ho wo auro ki maut k baare me kaise poochhega???

    fir bhi apki lekhni se nikle shabd sochne par mazboor karte hai..

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  5. एलेक्स को चाहिए कि अपने दिवगंत सुरक्षा कर्मी के घर जाकर सांत्वना दे,और सहयोग करे,अन्यथा लोग कहेगें ही ‘यार, ये एलेक्स तो बड़ा मतलबी निकला...

    बहुत सुंदर सार्थक अभिव्यक्ति //


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  6. हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और ..
    ऐसे ही हैं सब..
    शहीदों को हमारा नमन ..
    kalamdaan

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  7. जान बची तो लाख उपाया, लौट कलेक्टर घर को आये |
    अहमद किशन बड़े अहमक थे, बिन मतलब के जान गँवाए |
    इलेक्स रिलेक्सिंग बंगले में अब, नक्सल बैठे घात लगाए -
    किसको फुरसत है साहब जी, मौत पे उनके अश्रु बहाए ||

    बेमतलब है नीति नियम सब, नीयत में ही खोट दिखाए |
    एक तरफ है ढोल नगाड़े, दूजी तरफ मर्सिया गाये |
    अहमद किशन शहीद हुए पर, सरकार पुन: छलनी कर जाए |
    उनके दो परिवार दुखी हैं, इन गदहों को कौन बताये ||

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  8. अतुल जी मैं आपसे कतई सहमत नहीं, यह सच है कि शहीद जवानो के परिजनो ंकी संवेदना को समझना चाहिए पर इसके लिए एलेक्स मेनन का दोष कहां है। आप भी जानते है और मैं भी कि यह सब पटाखे बाजी मीडिया के लिए न्यूज बनाने वाले हम और आप ही होते है और मेनन को बात नहीं करना उनका सदमे में होना भी हो सकता है, इतनी जल्दी कोई कौसे मौत की आगोश से लौटने के बाद उबर सकता है..

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  9. वीर शहीदों को नमन... आपकी बात से सहमत लेकिन अरुण जी की बात भी गौर करने लायक है...

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  10. कडुवे सच को लिखा है ... हमारी पूरी संस्कृति ऐसी ही होती जा रही है ... मरने वाले छोटे लोगों का नामों निशान भी नहीं रहता बस बड़े लोगों की बाते होती हैं ... क्या होता जा रहा है ...

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  11. Gareeb aadmi ko kaun puchhta hai? Jiske paas power hai, paisa hai usee kee puchh hai .. Yeh media waale bhee Alex ke ghar ke baahar khare wait lar rahe the lekin maine to donon Guards ka naam bhee nahin suna tha (Shaayad ek-aadh baar bola ho jo maine dekha nahin) ..Lekin kisi media waale ne unke family ko dikhaya nahin .. Aur Pathake phorna to ekdum samvedanheenta thee .. Ye collector hain to inke liye itni haye tauba aur do insaan mar gaye koi sugbugahat tak nahin .. No one to blame .. It us who have done this to ourselves ..

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  12. aapne sahi baat uthai magar arun ji ki baat bhi kabi-e-gour hai. dono shahido ko naman !

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  13. पढ़कर , सोचकर मन द्रवित है ...इसे इंसानियत पर दाग कहते हैं ....अब अगर मेनन जिन्दा भी हैं तो क्या हुआ .....निकले तो मुर्दा दिल ही न ..!

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  14. दोनों को शत शत नमन, ऐसा भी होता हैं ......

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  15. इस देश की बड़ी पोस्टों पर बैठे लोग इसी तरह के होते हैं , अपने अलावा सोच ही नहीं पते!!

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  16. सूचनार्थ: ब्लॉग4वार्ता के पाठकों के लिए खुशखबरी है कि वार्ता का प्रकाशन नित्य प्रिंट मीडिया में भी किया जा रहा है, जिससे चिट्ठाकारों को अधिक पाठक उपलब्ध हो सकें। 

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  17. अतुल मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूं। ये बात सिर्फ सामान्य शिष्टाचार की नहीं है, इससे सुरक्षाकर्मियों का हौसला बढता है। ऐसा ही व्यवहार अफसरों का रहा तो फिर कोई सुरक्षाकर्मी अपने साहब के लिए जान दांव पर नहीं लगाएगा।
    ये बात तो बिल्कुल सही है कि कलेक्टर के छूटने पर आतिशबाजी बेवजह थी.. कलक्टर साहब कोई जंग जीत कर नहीं आए थे, बल्कि उनकी वजह से सरकार की ऐसी तैसी हो गई थी...

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  18. हर ओर वर्गीकरण सच निर्मम हैं लोग
    एक यही बात देश के लिये घातक है
    आपकी अभिव्यक्ति को सर्वथा समर्थन
    देते हुए शहीदों को नमन

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  19. दुखद है यह व्यवहार निर्मम लोग |???????????????????????

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  21. sahido ko shat-shat naman....
    aleks ko unaki khoj khabar leni chahiye thi...
    unke ghar jakar...unake parivarjano ko santavna deni chahiye..
    atul sir apki lekhani samajik hoti hai....
    samaj ki bhalayi....aur unpar ho rahe atyachar ke khilaf hoti hai...
    bahut accha hai.....shubhkamnaye....

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  22. अतुल जी,
    मैं आपके विचारो से बिलकुल भी सहमत नहीं हूँ, जहाँ तक पटाखे फोड़ने की बात है, तो कलेक्टर ने नहीं बल्कि आप जनता और उनके नजदीकी लोगो ने फोड़े होंगे । हालाकि यह बात सही के उन शहीद सिपाहियों के परिवारों को अब तक सरकार की तरफ से पूरी तव्वजो नहीं दी गयी है । जो की सर्वथा निंदनीय है । जहाँ तक एलेक्स का सवाल है, वो एक संवेंदनशील इंसान जान पड़ते है । जानने के लिये यह खबर पढ़े ।

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  23. please read this news.

    http://www.bhaskar.com/article/CHH-RAI-can-not-sleep-at-night-alex-menon-3221689.html?OF3=

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  24. oonche pad par baithe logon se kyaa ab yah bhee apekshaa nahee rakhein?maathat unke liye jaan dein aur wo unhein bhool jaaye ?

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