11 मार्च 2013

शहीद डीएसपी की पत्नी की मांगे...शहादत या फिर लाटरी...!!!!

उत्तर प्रदेश में एक डीएसपी शहीद हुए हैं। ये कहें कि राजनीति का शिकार हुए हैं। उनकी हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता रघुराज सिंह उर्फ राजा भैया के खिलाफ सीबीआई का शिकंजा कसता जा रहा है। दूसरी ओर एक शिंकजा कसता जा रहा है, उत्तरप्रदेश सरकार पर। यह शिकंजा कस रही हैं, शहीद डीएसपी जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद। परवीन आजाद के पति शहीद हुए हैं। उनके पति की शहादत का पूरा सम्मान करते हुए परवीन आजाद के प्रति संवेदना व्यक्त की जा सकती है लेकिन वे जिस तरह से बर्ताव कर रही हैं, जिस तरह से एक एक कर सरकार से अपनी मांगे मनवाने की  जिद कर रही हैं, उससे लगने लगा है कि उनके पति की शहादत के बाद उनकी कोई बंपर लाटरी निकल आई हो! यह स्थिति ठीक नहीं है।
उत्तर प्रदेश के कुंडा के डीएसपी जियाउल हक की पिछले हफ्ते हत्या कर दी गई थी। इस कांड में वहां के ताकतवर मंत्री रघुराज प्रताप सिंह यानि राजा भैया का नाम सामने आया। हंगामा मचने के बाद राजा भैया को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी ओर डीएसपी मर्डर कांड की जांच सीबीआई से कराई जा रही है। उधर अपने पति की शहादत के बाद डीएसपी की पत्नी परवीन आजाद ने जिस तरह से उत्तरप्रदेश सरकार के सामने अपनी मांगों की फेहरिश्त जारी करनी शुरू कर दी है, उसने न सिर्फ विवाद खड़ा कर दिया है, बल्कि कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। कुंडा के डीएसपी जियाउल हक एक इमानदारी पुलिस अधिकारी माने जाते थे और उनकी हत्या की मुख्य वजह भी यही बताई जा रही है लेकिन उनकी पत्नी ने जिस तरह से शहादत के बाद की प्रक्रिया को अपनी मांगोंं से विवादास्पद बनाने का काम किया है, वह न सिर्फ गैरवाजिब लगता है बल्कि यह शहादत के अपमान की तरह भी है।
अव्वल तो डीएसपी की शहादत के बाद उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से पीडि़त परिवार के पांच सदस्यों को नौकरी देने की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में परवीन आजाद ने नौकरी के लिए जो नाम दिए, विवाद वहीं से शुरू हुआ। परवीन ने अपने मायके पक्ष के लोगों के नाम नौकरी के लिए दे दिए जबकि डीएसपी के पिता ने इसका विरोध किया और यह कहा कि बेटा उनका खोया है तो यह अधिकार उनका बनता है। इस पर विवाद थमा नहीं था कि परवीन आजाद ने उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उनको योग्यता के आधार पर दी गई नौकरी को यह कहकर ठुकराने का काम किया कि उनको डीएसपी से नीचे का पद मंजूर नहीं है।
अब परवीन आजाद ने पांच मांगे और सामने रख दी हैं।  यूपी सरकार को अपनी 5 मांगों का खत सौंप परवीन ने कहा है कि हत्याकांड की सीबीआई जांच करने वाले अधिकारी दिल्ली के हों न कि लखनऊ में, क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है। दूसरी मांग ये की गई है कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर रोजाना की जाए। तीसरी मांग ये है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट यूपी के बाहर हो। चौथी मांग ये है कि जो भी सबूत मिलें या मौजूद हैं वो सीधे कोर्ट तक पहुंचें। आखिरी मांग में डीएसपी जियाउल हक की पत्नी ने कहा है कि जांच की जानकारी उन्हें भी दी जाए। इन मांगों को लेकर सीबीआई पशोपेश में है।
डीएसपी की शहादत वास्तव में उनके परिवार के लिए बड़ी क्षति है। खासकर उनकी पत्नी के लिए, लेकिन उनकी पत्नी को अपने पति की शहादत का सम्मान करना चाहिए, न कि अपनी मांगों और बातों से ऐसा कुछ करना चाहिए कि जिससे शहादत का अपमान हो।

15 टिप्‍पणियां:

  1. ATUL JI -PARVEEN KI MANSIK STHITI KO SAMAJHNE KA PRAYAS KAREN .BAHUT DARI HUI HAIN VE .ISI KARAN YE SAB MANGEN KAR RAHI HAIN .

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  2. मरने वाला तो मर गया
    लाश पर राजनीति हो रही है
    निर्लज्जता की हद हो गयी है
    हर बड़े नेता की गाडी
    मरने वाले गाँव की और दौड़ रही है
    मौत से फायदा उठाने के लिए
    मर्यादाएं दफ़न करी जा रही हैं
    एक ओर
    शहीद सैनिकों की विधवाएं
    दाने दाने को तरस रही हैं
    दूसरी ओर
    पूरे कुनबे के लिए मुंह मांगी
    नौकरी की मांग हो रही हैं
    वोट के खातिर हर मांग की
    भरपाई सरकार कर रही है
    इंसानियत करहा रही है
    स्वार्थ की
    सीमाएं पार हो गयी हैं
    डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

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  3. बड़े बूढों से पूछो
    गुरूओं ज्ञानियों से पूछो
    क्या पहले भी कभी
    ऐसा हुआ है
    किसी पत्नी ने पति की
    मौत पर सौदा किया हो
    नौकरी से लेकर धन माँगा हो
    पता नहीं मीडिया से
    फुर्सत पा कर
    पति को याद करने का
    समय भी मिला ना मिला हो
    बड़े बूढों से पूछो
    गुरूओं ज्ञानियों से पूछो
    दुःख के समय का
    ऐसा सदुपयोग
    क्या पहले भी हुआ है
    कर्तव्य की बलिवेदी पर
    शहीद हुआ इंसान
    हमारी हार्दिक संवेदना
    उसके परिवार के साथ
    इश्वर शहीद की आत्मा को
    शांति प्रदान करे
    पता नहीं हमारा सन्देश
    पढने का समय भी मिला
    ना मिला हो
    बड़े बूढों से पूछो
    गुरूओं ज्ञानियों से पूछो
    क्या पहले भी कभी ऐसा हुआ है

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  4. खेल सा लगता है सब .... विचारणीय बात कही आपने....

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  5. Atulji,Samajh nahee aayaa ,kavitaaon ke roop mein meree tippniyaan kyon hataa dee?

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    1. राजेन्‍द्र जी, मैंने नहीं हटाई थी, आपकी टिप्‍पणियां स्‍वत: स्‍पैम में चली गई थी, वापस आ गई हैं अब....

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    2. सही कहा आपने।यह शहादत का अपमानहै। शहादत के बदले डिमांड उचित नही।

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  6. jahan tak naukariyon ka prashn hai, naam unse maanga gaya tha, tabhi unhone diya hai. Haan Naukari ke liye sirf apne maayke waalon ka naam dena beshaq sahi nahi hai.

    Baaki ki maang mujhe to sahi lag rahin hain. khaas karke jab DSP ka qatl hi rajnaitik hai to fir aisi jaanch par nazar rakhne ki aavshyakta to hai hi.

    meri nazar mein Parveen Azaad ki maang bilkul jaayaz hai. shahadat se jaanch ki shuchita ka kya lena dena hai bhala. Yah ek shahadat thi isliye aur bhi zaroori hai ki jaanch ki shuchita bani rahe.

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    1. @स्‍व्‍पन मंजूषा जी, सबसे बडा सवाल है शहादत में भेद करने का....

      देश की सीमा पर विपरीत परिस्थितियों में चौकसी करने वाला जवान जब शहीद हो जाता है तो उसके परिवार को एक दो लाख रूपए दे दिए जाते हैं, परिवार के एक सदस्‍य को नौकरी का प्रावधान किया जाता है और एक हाई प्रोफाइल मर्डर मामले में शहीद की विधवा को पचास लाख रूपए दिए जाते हैं, पांच पांच लोगों को नौकरी का आफर किया जाता है.......
      यह भेदभाव क्‍यों????
      .... और तकलीफ तब होती है जब ऐसे मामले में मांगों की फेहरिश्‍त जारी होने लगती है.....
      जांच की शुचिता पर तो सवाल खडे करने का सवाल ही पैदा नहीं होता, यह निश्चित तौर पर इमानदारी से होना चाहिए, पर दिगर मांगों का क्‍या....????

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    2. मुझे आपकी बात का जवाब देना अच्छा नहीं लग रहा है , लेकिन जवाब देना भी आवश्यक है। मानवता की नज़र से देखें तो यह भेद-भाव ज़रूर गलत लगता है, लेकिन यह भेद-भाव हमारे सिस्टम में है ही और इसे आप अस्वीकार नहीं कर सकते। सीमा पर चौकसी करते हुए सिपाही और डी एस पी में, ओहदे, जिम्मेदारी, और चयन प्रक्रिया में बहुत फर्क है। आई पी एस बनने की योग्यता हमारे समाज के बहुत कम लोगों में होती है। लेकिन सिपाही, डी एस पी बनने से आसान है। आई ए एस , आई पी एस, आई ऍफ़ एस विशेष लोग होते हैं, क्रीम ऑफ़ दी सोसायटी। शायद इसी लिए ये हाई प्रोफाईल केस है। वर्ना सिपाही का मरना कब भला हाई प्रोफाईल केस बना है। सिपाही सीमा पर मरता है, तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि सिपाही बनने के साथ ही, वह व्यक्ति अपने डेथ सर्टिफिकेट पर साईन कर देता है।

      एक सिपाही की पगार और एक डी एस पी की तनख्वाह में भी फर्क है। डी एस पी को जो सुविधा मिलती है उसमें भी फर्क है, इसलिए उसके मरने के बाद भी जो भी मिलना है, उसकी तुलना आप एक सिपाही के मरणोपरांत मिलने से नहीं कर सकते। यही क्यों उसी सेना में एक ब्रिगेडियर, कर्नल, मेजर और एक सिपाही के मरणोपरांत मिलने वाली राशि में आप तुलना नहीं कर पायेंगे।

      इसके अलावा लाइन ऑफ़ डयूटी पर मरना और राजनीतिक हत्या होना, ये भी बिलकुल अलग बात है, इसलिए भी मुझे लगता है परवीन आज़ाद सही हैं।

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    3. मंजूषा जी , जवाब देना मुझे भी अच्‍छा नहीं लग रहा, पर देना पड रहा है।
      मैं उसी मानवता की बात कर रहा हूं।
      और हां, जहां तक मेरी जानकारी है, दिवंगत डीएसपी आईपीएस नहीं थे....,
      मैं यह मानता हूं कि शहादत, शहादत होती है, चाहे सिपाही की हो या किसी अफसर की, इसमें भेदभाव नहीं होना चाहिए....

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  7. यहां तो सौदा हो रहा है जी।

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  8. भावपूर्ण प्रस्तुतिकरण एक गहरे अर्थ के साथ, विषयपरक-----बधाई

    मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों----आग्रह है
    jyoti-khare.blogspot.in







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  9. यदि पति चीफ मेडिकल ऑफिसर होता तो क्या चीफ मेडिकल ऑफिसर के पद की माँग करतीं? जो हो रहा है गलत हो रहा है और एक बार ऐसा हुआ तो बारबार होगा. नियम सबके लिए एक से होने चाहिए.
    घुघूतीबासूती

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