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20 सितंबर 2012

चेहरा और दिमाग हुए जुदा, कैसे जुड़ेगा देश?

आखिरकार अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए। लंबे समय से यह लग रहा था कि दोनों की सोच जुदा है और दोनों के भाव अलग। यह अलग बात है कि दोनों एक ही मंजिल के मुसाफिर (जैसा कि वे दोनों कहते हैं) थे। अब जब दोनों अलग हो गए हैं। एक बड़ा सवाल पूरे देश के जेहन में कौंध रहा है कि कैसे ये दोनों अपने अपने रास्तों से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे? कैसे जन लोकपाल के लिए ये जेहाद को अंजाम तक पहुंचाएंगे?
जन लोकपाल और भ्रष्टाचार को लेकर एक आंदोलन की शुरूआत 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के बैनर तले शुरू हुई थी और पहली बार जब यह संस्था मैदान में उतरी थी तो एक जनसैलाब सा उमड़ पड़ा था। न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के तकरीबन हर शहर, हर गांव, हर मोहल्ले में 'तू भी अन्ना, मैं भी अन्ना' के नारों के साथ युवा सिर पर 'अन्ना टोपी' लगाकर घूमने लगे थे। उस समय यह लगने लगा था कि ये कुछ कर सकते हैं। देश का युवा बदलाव चाहता था और उसे उम्मीद हो गई थी उनकी इस चाह को पूरा करने का काम ये लोग कर सकते हैं, पर धीरे धीरे यह भ्रम टूटता गया और 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के लोग भ्रष्टाचार से लडऩे के बजाय, भ्रष्ट लोगों से लडऩे के बजाय एक दूसरे में ही उलझ कर रह गए। पिछले दिनों देश की राजधानी में हुए इस बैनर के प्रदर्शन में भी यही नजारा दिखा। आमरण अनशन शुरू हुआ और जमकर हुई नौटंकी के बाद देश की मांग के नाम पर अचानक अनशन को खत्म कर दिया गया। साथ ही एक ऐसे राजनीतिक दल के गठन का सपना भी दिखाया गया जो अपने आप में अलहदा होता। एक ऐसा राजनीतिक दल जिसमें कोई हाईकमान नहीं होगा, जिसके पदाधिकारी जनता तय करेगी, जिसके उम्मीदवार जनता के बीच से आएंगे... ऐसी कई बातें की गईं, लेकिन दो-तीन दिन में ही इस घोषणा की हवा निकलनी शुरू हो गई और अन्ना हजारे ने किसी भी प्रकार के राजनीतिक दल के गठन से खुद को अलग करने की घोषणा कर दी। उन्होंने साफ कर दिया कि वे इस फैसले में साथ नहीं हैं।
अब अन्ना ने अपने तब के घोषणा से कुछ आगे जाते हुए एक तरह से अरविंद केजरीवाल को अपनी 'मिल्कियत' से बेदखल कर दिया है। अन्ना हजारे ने साफ कर दिया है कि वे  किसी भी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं होंगे। उन्होंने अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को कह दिया है कि वे न ही उनके (अन्ना हजारे) के नाम का और न ही तस्वीर का इस्तेमाल कर सकते हैं। अन्ना ने साफ कर दिया है कि अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक पार्टी बनाना है तो  बनाएं पर वे उनके दल के प्रचार के लिए नहीं जाएंगे। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि दोनों (केजरीवाल और अन्ना) की मांग समान है पर रास्ते जुदा हैं। अपने आंदोलन को निरंतर चलाते रहने का भरोसा दिलाते हुए अन्ना हजारे ने स्वीकार किया कि ये उनकी कमजोरी है कि टीम टूट गई।
इस टीम के टूट जाने से अन्ना और अरविंद केजरीवाल के अलग हो जाने के बाद अब इन दोनों के आंदोलन के स्वरूप और सफलता को लेकर सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तरफ जहां अन्ना हजारे 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का 'चेहरा' थे तो दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल इसके 'दिमाग'। और जब चेहरा और दिमाग दोनों एक साथ रहने में सफल नहीं हो पाए तो कैसे ये देश को जोड़ पाएंगे?

09 जुलाई 2011

अन्‍ना और बाबा.... बोलने से पहले सोचो तो.....


अन्‍ना हजारे
 शोहरत इंसान को किस कदर बडबोला बना देती है, इसका उदाहरण हैं अभी हाल ही में मीडिया के माध्‍यम से हीरो बना दिए गए दो सज्‍जन। एक हैं गरीब अन्‍ना हजारे तो दूसरे हैं अमीर बाबा रामदेव। साधनहीन अन्‍ना हजारे के भ्रष्‍टाचार के मुददे पर किए आंदोलन ने देश को रातों रात एक ‘मसीहा’ दे दिया। मीडिया ने बरसों से खामोशी से इसी मुददे को लेकर काम कर रहे समाजसेवी अन्‍ना हजारे को अचानक बुलंदियों पर पहुंचा दिया। दूसरी ओर काले धन के मुददे को लेकर आंदोलन करने और फिर आंदोलन स्‍थल से महिला भेष में  भागने की कोशिश करते धरे जाने वाले बाबा रामदेव।
माफ  कीजिए, मैं  अन्‍ना  हजारे और बाबा रामदेव का समर्थक नहीं हूं। मैं इन दोनों का विरोधी भी नहीं हूं। इन दोनों ने देश के ज्‍वलंत मुददों पर बात की है और अन्‍ना हजारे के आंदोलन ने तो एक बार फिर से सरकार को सोचने पर मजबूर कर दिया है। लोकपाल बिल अन्‍ना हजारे के दबाव के कारण शायद जल्‍द ही पेश भी हो जाए। बाबा रामदेव की बात करें तो विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने के मुददे को लेकर बाबा  ने लंबे समय से अनशन की रूपरेखा तय की लेकिन अफसोस जितने दिनों तक उनकी रूपरेखा बनी उतने घंटे भी वे अनशन पर नहीं रह पाए।
मैंने बात की बडपोलेपन की। तो मैं  यह कह‍ना चाहता हूं कि अन्‍ना ने दो दिन पहले जो बात की है वो अपने आप में गैर जिम्‍मेदाराना बात है और यह देश की आजादी का अपमान ही है। माना कि अन्‍ना की बात इस समय पूरा देश सुन रहा है, लोग भ्रष्‍टाचार के खात्‍मे को लेकर अन्‍ना से उम्‍मीदें लगाए हुए हैं  लेकिन इसका यह‍ मतलब नहीं कि अन्‍ना जो भी बोलें वो सही हो और सब उसे मानें।  अन्‍ना ने इस बार गलत बात कर दी। अन्‍ना का कहना है कि यदि मानसून सत्र में लोकपाल बिल पेश नहीं हुआ तो वो 16 अगस्‍त से एक बार फिर अनशन पर बैठ जाएंगे। चलो यहां तक ठीक है लेकिन यह क्‍या। वे  कहते हैं कि 15 अगस्‍त को रात को आठ बजे से नौ बजे तक लोग घरों की बिजली बंद करें। उनका तर्क है कि ऐसा कर लोग भ्रष्‍टाचार के खिलाफ के मुहिम को समर्थन दें। ये क्‍या बात हुई। 
महोदय, 15 अगस्‍त को देश आजाद हुआ था। कई लोगों की शहादत के बाद अंग्रेजों को देश को छोडने मजबूर होना पडा था। राष्‍ट्रीय पर्व है यह। दीवाली किसी एक धर्म का त्‍यौहार है। ईद  किसी एक धर्म का। क्रिसमस  किसी एक धर्म का और बैसाखी किसी एक धर्म  का, लेकिन पूरे देश का कोई त्‍यौहार है तो वो है 15 अगस्‍त।  स्‍वतंत्रता दिवस। इस दिन देश आजाद हुआ था। यह शोक मनाने का  दिन नहीं, खुशियां मनाने का दिन है। मैं नक्‍सल इलाके में रहता हूं।  इस दिन को नक्‍सली काला दिन मनाते हैं। हमारी शान के प्रतीक तिरंगे के बजाय नक्‍सली काले झंडे को फहराते हैं। वो ऐसा इसलिए करते हैं क्‍योंकि वो देश के संविधान को नहीं मानते। वो  मानते हैं कि देश में सच्‍ची आजादी नहीं आई..... मौजूदा आजादी बेकार है..... वे संविधान विरोधी हैं, देश विरोधी हैं  यह बात तय है..... पर अन्‍ना। उनसे ऐसी उम्‍मीद नहीं थी। 
 
अब बात बाबा रामदेव की। बाबा ने अनशन किया। पुलिस ने उनके अनशन को दमन कर तुडवा‍ दिया। बाबा आंदोलन स्‍थल से महिला भेष में भागने की कोशिश में धरे गए। खैर, कोई बात नहीं। बाबा की कोई मजबूरी रही होगी। पर यह क्‍या जब बाबा ने चुप्‍पी तोडी तो अपने भागने पर ही पहली बात की।  उनके मुताबिक वे इसलिए भागे कि वो गीदड की मौत नहीं मरना चाहते थे। इस देश  में अंग्रेजों के खिलाफ भी कई लडाईयां लडी गई थीं और उसमें हमारे से‍नानियों ने डटकर मुकाबला किया। कोई भागा नहीं, तो क्‍या बाबा  की नजर में वो सब गीदड थे। बाबा ने एक और बात की, मेरे लिए भ्रष्‍टाचार से बडा मुददा कांग्रेस पार्टी को हटाना है। ये क्‍या बात हुई बाबा।
बाबा और अन्‍ना के समर्थक माफ करें पर जहां तक मुझे लगता है कि इन दोनों को मिले शोहरत ने उन्‍हें बडबोला बना दिया है और ये दोनों यह सोच रहे हैं कि वे जो कहेंगे सब सही है। माफ  करना बाबा रामदेव पर आपने भागकर अपने किस ‘’शौय’’ का परिचय दिया यह मैं नहीं जानता पर देश की आजादी के लिए प्राण न्‍यौछावर करने वाले भारत मां के सच्‍चे सपूत गीदड नहीं ‘’शेर’’ थे और माफ करना अन्‍ना हजारे 15 अगस्‍त को आजादी का जश्‍न आतिशबाजियों के साथ रौशनी कर मनाया जाना चाहिए, यह कोई शोक का दिन नहीं कि अंधेरा  किया जाए।