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27 सितंबर 2013

हर एक ''वोट'' जरूरी होता है.....




साभार : फेसबुक पेज 'प्रतिज्ञा'
मत का दान भले ही हमने 18 वर्ष (पहले यह 21 वर्ष था) की उम्र से किया हो, पर प्रायमरी स्‍कूल में ही यह पढने मिल गया था, कि मताधिकार हर नागरिक का अधिकार है... कर्तव्‍य  है। वैसे तो मतदाताओं के लिए एक सुविधा यह भी थी कि वह यदि चुनाव मैदान में उतरे उम्‍मीदवारों में से किसी को पसंद नहीं करता तो वह उनमें से किसी को भी नहीं चुनने के अपने अधिकार का इस्‍तेमाल कर सकता है। ऐसा करने के लिए वह मतदान केन्‍द्र में जाकर मतदान की सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद पीठासीन अधिकारी से अपनी बात कह उससे एक फार्म की मांग कर सकता है, जिसे फार्म 49 ‘ओ’ के नाम से जाना जाता है। हालांकि ज्‍यादा जागरूकता नहीं होने के कारण और इस तरह के मतदान होने पर उसकी गिनती नहीं होने पर यह ज्‍यादा प्रचलन में नहीं आ पाया लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने मतदाताओं के इस ‘अधिकार’ को लेकर एक अच्‍छी और बडी पहल की है।
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को ‘राईट टू रिजेक्‍ट’ यानि सभी उम्‍मीदवारों को खारिज करने का अधिकार दे दिया है और चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में एक बटन ‘इनमें से कोई नहीं’ का भी दर्ज करे। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर एक ऐसा बटन लगाए जिसके जरिए मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज कर सके, यानी मशीन में 'इनमें से कोई नहीं' का विकल्प होना चाहिए। अदालत ने इस तरह की व्यवस्था इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ही शुरू करने कहा है और यदि सब कुछ ठीक रहा तो इस फ़ैसले का लाभ इस साल दिसंबर में दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को मिलेगा। अदालत ने यह फ़ैसला पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) की 2004 में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। पीयूसीएल ने मतदाताओं के लिए निगेटिव वोटिंग की मांग की थी।
सभी उम्मीदवारों को नकारने की मौजूदा व्यवस्था में मतदाता मतदान केंद्र पर जाकर पीठासीन अधिकारी से 49 ओ नाम के एक फार्म की मांग करता है और उसे भर कर वापस कर देता है, लेकिन इस तरह के फार्म की गिनती नहीं होती है। यही वजह है कि यह प्रक्रिया न ही ज्‍यादा कारगर थी औ न ही इसका ज्‍यादा प्रचार ही हो पाया। साफ है कि मतदाता जागरूक नहीं हो पाए और जो जानते थे, उन्‍होंने भी इसलिए खामोश रहना ही बेहतर समझा कि इससे चुनाव परिणाम पर कोई खास असर तो होगा नहीं और उसका यह प्रयास भी गोपनीय नहीं रह पाएगा, लिहाजा इस तरह की सोच रखने वाले मतदाता, मतदान केन्‍द्र से दूर ही रहे और यही वजह थी कि मतदान का प्रतिशत कभी सौ फीसदी नहीं रह पाया। कई बार  तो मतदान पचास फीसदी से कम ही रहा।  
संयोग की बात है कि अभी छत्‍तीसगढ के राजनांदगांव जिले में एक अभियान शुरू किया गया है।  शत प्रतिशत मतदान बने राजनादगांव का अभिमान’ के नाम से एक अभियान गति पर है। इसका नाम रखा गया है, ‘प्रतिज्ञा’। एक अच्‍छा प्रयास हो रहा है और इसके जरिए कोशिश की जा रही है कि मतदाताओं को जागरू‍क किया जाए मतदान केन्‍द्रों में जाने के लिए ताकि वह अपनी पसंद की सरकार चुनने में अपना योगदान दे सके। जब यह अभियान मेरी जानकारी में आया तो मन में सवाल आया कि आखिर क्‍यों हम उस सीख को भूल जा रहे हैं जो हमने बचपन में ही पढ लिया था, क्‍यों हम चुनाव को लेकर बेरूखी अपनाए रखते हैं और क्‍यों मतदान के अपने अधिकार का इस्‍तेमाल नहीं करते.... जवाब में यही कहा जा सकता है कि कई बार हम चुनाव मैदान में मौजूद उम्‍मीदवारों में से किसी को भी पसंद नहीं करने के कारण मतदान केन्‍द्र तक जाने की जहमत नहीं उठाते तो कई बार हम जान बूझकर इस महत्‍वपूर्ण काम से खुद को दूर कर देते हैं लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए..... यदि किसी की तकलीफ उम्‍मीदवारों को लेकर है तो उनकी यह चिंता तो लगभग दूर होने वाली है, वे सभी उम्‍मीदवारों को दरकिनार करते हुए अपनी बात सामने रख सकते हैं.....
दुनिया के  करीब 25 देशों  ने अपने यहां मतदान अनिवार्य कर रखा है। इन देशों  में आस्ट्रेलिया, अर्जन्टीना, इटली, ब्राजील, मैक्सिको, तुर्की, थाइलैण्ड और सिंगापुर शामिल हैं। इनमें से कुछ देशों ने तो यह व्‍यवस्‍था कर रखी है कि जिस नागरिक के पास मतदान करने का सबूत है, उसे ही सरकारी सुविधाओं, सब्सिडी का लाभ मिल सकता है.....
मतदान को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने का काम वैसे तो चुनाव आयोग की ओर से लगातार होता है और इस कडी में  राजनांदगांव की ‘’प्रतिज्ञा’’ का प्रयास भी सराहनीय है लेकिन जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने ‘राईट टू रिजेक्‍ट’ की बात की है, उसने भी एक बेहतर कल का संकेत दिया है......

16 अक्टूबर 2012

रमन साठ के, सठियाए कांग्रेसी!!!

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने धूम धड़ाके के साथ अपने जन्मदिन का जश्न मनाया। इस मौके पर आयोजित समारोह का कांग्रेस के एक धड़े ने विरोध जताया और दूसरे धड़े ने जन्मदिन और अभिनंदन समारोह में अपनी मौजूदगी से अपने ही साथियों के किए पर 'रायता'  फैलाने का काम किया। ऐसे लोगों ने एक बार फिर बता दिया कि यहां कांग्रेसी किस तरह गुटबाजी और एक दूसरे की टांग खिंचाई में लगे हुए हैं। पिछले चुनाव में मुख्यमंत्री के हाथों शिकस्त खा चुके लेकिन शिकस्त के बाद भी जीत के दौर में मिलने वाले वोटों से ज्यादा वोट पाने की खुशी में ही खुद को भ्रम में रखे हुए उदय मुदलियार ने मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर आयोजित समारोह के औचित्य पर बड़ा सवाल खड़ा किया और उनके अभिनंदन को औचित्यहीन करार दिया। उनका तर्क था कि मुख्यमंत्री ने नांदगांव में एक भी ऐसा काम नहीं किया कि उनका अभिनंदन किया जाए, लेकिन यदि उनसे यह पूछा जाए कि वे अपना एक भी काम गिना दें जिससे उनकी बात सुनी जाए तो वे भी कुछ जवाब नहीं दे पाएंगे!
यहां हम मुख्यमंत्री के अभिनंदन पर उठाए मुदलियार के सवाल पर बहस नहीं करना चाहते और न ही मुख्यमंत्री के अभिनंदन की ही पैरवी कर रहे हैं लेकिन किसी के भी आयोजन पर सवाल खड़ा करने के पहले खुद को आईने में देखना चाहिए। चुनाव नजदीक है। सबको अपना राजनीतिक कैरियर दुरूस्त करने का हक है। सो मुख्यमंत्री ने अपने समर्थकों के माध्यम से ये काम किया और उनके समर्थकों ने आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेकर मुख्यमंत्री की नजर में अपना कद बढ़ाने की कोशिश की। उधर मुदलियार के किए कराए पर तो सुबह से लेकर रात तक पानी फिरता रहा। राजधानी में सुबह उनके बड़े नेताओं ने मुख्यमंत्री निवास जाकर डॉ. रमन को बधाईयां दीं और फिर यहां अभिनंदन समारोह में भी नगर के प्रथम नागरिक से लेकर राजनांदगांव जिले में कांग्रेस की 'इज्जत' बचाने वाले दोनों विधायक पूरे जोशो-खरोश के साथ मौजूद रहे। और फिर सवाल उठता है कि क्या मुदलियार ने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया? हमें याद है, जब वे विधायक हुआ करते थे, उनका जन्मदिन भी उनके समर्थक पूरे जोशो-खरोश से मनाते थे और वे भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे और फूले नहीं समाते थे! तो फिर इस तरह के विरोध का क्या औचित्य? क्या वे जनता को इस विरोध के माध्यम से कोई संदेश देना चाहते हैं? यदि ऐसा था तो उनको पहले यह संदेश अपनी पार्टी के लोगों तक पहुंचाना था, इसके बाद जनता तक पहुंचने की कोशिश की जाती, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया।
खैर! आयोजनों की आलोचना करने का यहां मकसद नहीं है। सब अपने अपने सामथ्र्य से आयेाजन कर रहे हैं लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि यदि कांग्रेस ने किसी तरह का कार्यक्रम बनाया तो उसका समर्थन कांग्रेसी ही करें, उसके बाद जनता से समर्थन की उम्मीद करें, तो बेहतर। यहां एक ओर मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर विरोध में मौन जुलूस निकाला गया और दूसरी ओर उसी मौन जुलूस में आयोजन में शामिल होने की खिचड़ी भी पकती रही। आश्चर्य कि जो विरोध में था, उसने भी अभिनंदन किया मुख्यमंत्री का। हम बात कर रहे हैं महापौर नरेश डाकलिया का। उन्होंने एक ओर तो जन्मदिन के विरोध को समर्थन दिया तो दूसरी ओर अभिनंदन समारोह में पूरे समय मौजूद रहकर अपनी ही पार्टी के लोगों को धता बता दिया। उनके अलावा राजनांदगांव जिले में कांग्रेस की 'नाक' बचाने वाले दो विधायकों खुज्जी के भोलाराम साहू और मोहला मानपुर के शिवराज उसारे ने भी मुख्यमंत्री के जनाधार बताने की कोशिश (कांग्रेसियों के ही शब्दों में) में भरपूर सहयोग देकर अपनी ही पार्टी के विरोध प्रदर्शन को झूठा साबित कर दिया।
मुख्यमंत्री ने अपना 60 वां जन्मदिन पूरे जोशोखरोश के साथ राजनांदगांव में 'लीप बर्थ-डे' के रूप में मनाया। लीप (चार सालों में एक बार आने वाला) इसलिए कहा जा रहा है कि इससे पहले उन्होंने राजनांदगांव में 2008 में इसी उत्साह के साथ जन्मदिन उसी मंडी प्रांगण में मनाया था, जिस जगह इस बार मनाया गया। उसके बाद अब चार साल बाद उनका जन्मदिन मना। साल भर बाद चुनाव का दौर शुरू हो जाएगा। भगवा झंडे से पटा शहर... आदमकट कट आऊट...हर तरफ डॉ. रमन...डॉ. रमन... कुल मिलाकर मुख्यमंत्री ने जन्मदिन के बहाने चुनावी रिहर्सल कर ली और उनके इस रिहर्सल में कांग्रेसियों ने भी उनका खूब साथ दिया। कहने में गुरेज नहीं होना चाहिए कि मुख्यमंत्री साठ साल के हो गए, पर सठिया गई कांग्रेस लगती है!!!

29 सितंबर 2012

आपको सीखना होगा मनमोहन जी पैसे पेड़ पर नहीं उगते...

एक तरफ देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए जनता पर बोझ पर बोझ डाला जा रहा है और दूसरी तरफ जनता की गाढ़ी कमाई (टैक्स) से नेता ऐश कर रहे हैं। घोटाले पर घोटाले कर रहे हैं। नेताओं के अविश्वसनीय आंकड़ों वाले घोटाले लगातार सामने आ रहे हैं और जनता पर डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी कर बोझ डाला जा रहा है। रसोई गैस सिलेंडरों की संख्या सीमित कर घर का बजट बिगाडऩे का काम किया जा रहा है और सरकारी पैसे से नेता विदेशों में घूम-घूमकर करोड़ों रूपए बरबाद कर रहे हैं। किसी भी विदेश यात्राओं से यदि कुछ बेहतर निकलकर आता तो फिर भी इन खर्चों को कुछ हद तक जायज ठहराया जा सकता था लेकिन हो कुछ नहीं रहा है और ये यात्राएं महज धन की बरबादी के अलावा कुछ नहीं है।
एक आरटीआई कार्यकर्ता के सवालों के जवाब में यह खुलासा हुआ है कि देश को अर्थशास्त्र की परिभाषा समझाने और देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए कड़े कदमों की जरूरत बताने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के 'कुनबों' ने करीब पौने सात सौ करोड़ रूपए विदेश यात्राओं पर फूंक डाले हैं। जानकारी के मुताबिक पैसे पेड़ों पर नहीं उगते कहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी पिछले दो साल में जमकर विदेश दौरे किये। प्रधानमंत्री मॉस्को, मालदीव, न्यूयॉर्क बाली के दौरों पर गए। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने 28 विदेश दौरे किए। कृष्णा ने न्यूयॉर्क, इस्लामाबाद, बीजिंग, बाली, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल और फिलस्तीन का दौरा किया। बताया जाता है कि विदेश दौरों पर खर्चे में बढ़ोतरी इसलिए हुई क्योंकि कई बार मंत्रियों ने चार्टर्ड प्लेन से यात्राएं की। मसलम विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के पाकिस्तान दौरे के लिए एयर इंडिया के एयरबस और वायुसेना के एम्ब्रेयर को किराये पर लिया गया। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने आठ बार स्वीट्जरलैण्ड,दक्षिण अफ्रीका,पाकिस्तान और फ्रांस की यात्रा की। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने पिछले दो साल में 6 विदेश दौरे किए.सुबोध कांत सहाय ने पांच देशों की यात्राएं की। यह सब आधिकारिक दौरे थे।  कुल मिलाकर 2011-12 में मंत्रियों के विदेश दौरों पर यूपीए सरकार ने 678 करोड़ रूपए फूंके। 2010-11 से यह 12 गुना ज्यादा है। 2010-11 में मंत्रियों के विदेश दौरों पर सिर्फ 56.1 करोड़ रूपए खर्च हुए थे।
सवाल उठता है कि विदेशों में जाकर इन लोगों ने क्या किया? क्या देश के लिए कोई नई नीति लेकर आए, कोई सुधार लेकर आए या फिर सिर्फ जुबानी लफ्फाजी करने के अलावा कुछ नहीं किया। इनसे यदि पूछा जाएगा तो ये बड़ी बड़ी बातें कहेंगे और बताएंगे कि विदेशों से इन लोगों ने देश की तरक्की के रास्ते लाए हैं लेकिन हकीकत इससे अलग है। वास्तव में हुआ कुछ  नहीं। हर विदेश यात्राओं के बाद के परिदृश्य पर नजर डालें तो कुछ भी हासिल हुआ हो, नहीं दिखेगा। मसलन, विदेश मंत्री एसएम कृष्णा पाकिस्तान गए और इस यात्रा के लिए उन्होंने चाटर्ड प्लेन किराए पर लेकर करोड़ों फूंके। पाकिस्तान आज भी भारत पर चोरी छिपे आतंक फैलाने का काम कर रहा है। सीमा पर युद्ध विराम का उल्लंघन कर रहा है। फिर कृष्णा ने वहां क्या किया? और क्या पाकिस्तान जाने के लिए चार्टर्ड प्लेन की जरूरत थी, पड़ौस के देश में क्या कम खर्चे में यात्रा नहीं की जा सकती थी? ऐसे कई सवाल हैं, जिसके जवाब घोटालों और धन की बरबादी करने वाले इन नेताओं के पास नहीं हैं। मनमोहन सिंह जी, पैसे पेड़ पर नहीं लगते यह लोगों को बताने की नहीं, आपको और आपके मंत्रियों को समझने की जरूरत है।

20 सितंबर 2012

चेहरा और दिमाग हुए जुदा, कैसे जुड़ेगा देश?

आखिरकार अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल के रास्ते अलग हो गए। लंबे समय से यह लग रहा था कि दोनों की सोच जुदा है और दोनों के भाव अलग। यह अलग बात है कि दोनों एक ही मंजिल के मुसाफिर (जैसा कि वे दोनों कहते हैं) थे। अब जब दोनों अलग हो गए हैं। एक बड़ा सवाल पूरे देश के जेहन में कौंध रहा है कि कैसे ये दोनों अपने अपने रास्तों से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे? कैसे जन लोकपाल के लिए ये जेहाद को अंजाम तक पहुंचाएंगे?
जन लोकपाल और भ्रष्टाचार को लेकर एक आंदोलन की शुरूआत 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के बैनर तले शुरू हुई थी और पहली बार जब यह संस्था मैदान में उतरी थी तो एक जनसैलाब सा उमड़ पड़ा था। न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के तकरीबन हर शहर, हर गांव, हर मोहल्ले में 'तू भी अन्ना, मैं भी अन्ना' के नारों के साथ युवा सिर पर 'अन्ना टोपी' लगाकर घूमने लगे थे। उस समय यह लगने लगा था कि ये कुछ कर सकते हैं। देश का युवा बदलाव चाहता था और उसे उम्मीद हो गई थी उनकी इस चाह को पूरा करने का काम ये लोग कर सकते हैं, पर धीरे धीरे यह भ्रम टूटता गया और 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' के लोग भ्रष्टाचार से लडऩे के बजाय, भ्रष्ट लोगों से लडऩे के बजाय एक दूसरे में ही उलझ कर रह गए। पिछले दिनों देश की राजधानी में हुए इस बैनर के प्रदर्शन में भी यही नजारा दिखा। आमरण अनशन शुरू हुआ और जमकर हुई नौटंकी के बाद देश की मांग के नाम पर अचानक अनशन को खत्म कर दिया गया। साथ ही एक ऐसे राजनीतिक दल के गठन का सपना भी दिखाया गया जो अपने आप में अलहदा होता। एक ऐसा राजनीतिक दल जिसमें कोई हाईकमान नहीं होगा, जिसके पदाधिकारी जनता तय करेगी, जिसके उम्मीदवार जनता के बीच से आएंगे... ऐसी कई बातें की गईं, लेकिन दो-तीन दिन में ही इस घोषणा की हवा निकलनी शुरू हो गई और अन्ना हजारे ने किसी भी प्रकार के राजनीतिक दल के गठन से खुद को अलग करने की घोषणा कर दी। उन्होंने साफ कर दिया कि वे इस फैसले में साथ नहीं हैं।
अब अन्ना ने अपने तब के घोषणा से कुछ आगे जाते हुए एक तरह से अरविंद केजरीवाल को अपनी 'मिल्कियत' से बेदखल कर दिया है। अन्ना हजारे ने साफ कर दिया है कि वे  किसी भी राजनीतिक दल का हिस्सा नहीं होंगे। उन्होंने अरविंद केजरीवाल और उनकी टीम को कह दिया है कि वे न ही उनके (अन्ना हजारे) के नाम का और न ही तस्वीर का इस्तेमाल कर सकते हैं। अन्ना ने साफ कर दिया है कि अरविंद केजरीवाल को राजनीतिक पार्टी बनाना है तो  बनाएं पर वे उनके दल के प्रचार के लिए नहीं जाएंगे। हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि दोनों (केजरीवाल और अन्ना) की मांग समान है पर रास्ते जुदा हैं। अपने आंदोलन को निरंतर चलाते रहने का भरोसा दिलाते हुए अन्ना हजारे ने स्वीकार किया कि ये उनकी कमजोरी है कि टीम टूट गई।
इस टीम के टूट जाने से अन्ना और अरविंद केजरीवाल के अलग हो जाने के बाद अब इन दोनों के आंदोलन के स्वरूप और सफलता को लेकर सवाल खड़े होने शुरू हो गए हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक तरफ जहां अन्ना हजारे 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' का 'चेहरा' थे तो दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल इसके 'दिमाग'। और जब चेहरा और दिमाग दोनों एक साथ रहने में सफल नहीं हो पाए तो कैसे ये देश को जोड़ पाएंगे?

11 सितंबर 2012

इस नुकसान की भरपाई कहां से होगी?

कोल ब्लाक आबंटन में देश का करोड़ों का नुकसान हुआ यह विपक्ष का आरोप है और इस पर सरकार का जवाब है कि अभी सिर्फ आबंटन ही हुए हैं, कहीं  से किसी प्रकार की खुदाई नहीं हुई है तो अभी से नुकसान की बात सही नहीं। सरकार और विपक्ष की बातों को छोड़ भी दिया जाए तो एक तथ्य पूरी तरह सही है कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई का 117 करोड़ रूपए बरबाद हो गया है। ये रूपया बरबाद हुआ है, सदन न चलने देने के कारण। लोकसभा और राज्यसभा की कार्रवाई 13 दिनों तक बाधित रही। हंगामा होता रहा और इसकी वजह से देश के 117 करोड़ रूपए पर पानी फिर गया।
विपक्षी नेता तर्क देते हैं कि उन्होंने सदन की कार्रवाई को बाधित कर कुछ करोड़ रूपयों का तो नुकसान किया है लेकिन इस नुकसान की कीमत पर वे देश का करोड़ों, अरबों रूपये बचाने का काम कर रहे हैं। ये रूपये कोल ब्लाक आबंटन में धांधली को रोककर बचा रहे हैं। मेरा मानना है  कि उनका यह तर्क अपने किए पर पर्दा डालने जैसा है। देश के सर्वोच्‍च सदन की कीमत को बरबाद कर वो क्या कुछ बचा लेंगे। सदन की मर्यादा को तार तार करने के बाद यदि कुछ बचा भी तो क्या बचा? लोकसभा में प्रश्रों के बदले रूपए लेने, नोट लहराने, मारपीट और धक्का-मुक्की की घटनाएं, इस तरह सदन की कार्रवाई को हंगामे की भेंट चढ़ा देना कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता।
पिछले दिनों  यहां आए भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्ता शहनवाज हुसैन का कहना था कि सदन को बाधित कर विपक्ष ने 30 करोड़ रूपए का नुकसान किया तो उसके पीछे वजह यह थी कि  देश का 3 हजार करोड़ रूपए बचा लिया जाए। अब जब आंकड़ा सामने आ गया है कि सदन की कार्रवाई बाधित होने से 117 करोड़ रूपए खर्च हुए हैं तो इससे हुसैन के 30 करोड़ के ख्याली पुलाव के आंकड़े खुद ब खुद झूठे साबित हो गए और इसके साथ ही उन पर यह भरोसा करने की वजह कहीं से नहीं रही कि इस नुकसान के कारण कैसे 3 हजार करोड़ रूपए बच जाएंगे। यहां यह तथ्य भी गौर करने वाली है कि सरकार ने कोल ब्लाक आबंटन को रद्द न करने की जिद ठान ली है और वो विपक्ष से इस पर सदन में बहस करने की ही बात करती रही।
हमारा यह मानना है कि लोकसभा और राज्यसभाओं में किसी भी मुद्दे को लेेकर बहस होनी ही चाहिए। इन सदनों के माध्यम से देश की जनता के लिए कानून बनाए जाते हैं। देश की जनता के फायदे और नुकसान को लेकर चर्चा की जाती है।  योजनाओं को मूर्तरूप देने का काम इन सदनों के माध्यम से होता है, लेकिन यदि इन सदनों को ठप कर दिया जाए तो फिर कहां चर्चा की उम्मीद की जाए?
विपक्ष को अपनी बात करने का हक है। वह सड़क पर उतर कर आंदोलन कर सकती है। जनता के बीच जाकर सरकार की कमजोरियों और कारगुजारियों को रख सकती है। पर जो काम सदन में हो सकता है, वह सड़क में नहीं हो सकता। लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले और चुनकर लोकसभा और राज्यसभा में जाने वाले लोग यदि सदन को इस तरह बाधित करने का काम करेंगे तो यह न ही सदन की मर्यादा के लिए उचित है और न देश के लिए। कोल ब्लाक को लेकर यदि कुछ गलत हुआ है तो इसे सदन में चर्चा कर भी सुधारा जा सकता था लेकिन सदन की कार्रवाई ठप होने से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा?

05 सितंबर 2012

फिर आएगी रमन की फिल्म जनदर्शन-2

मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने एक बार फिर जनता को साधने की शुरूआत करने की तैयारी कर ली है। वे फिर से जनदर्शन नाम की पुरानी 'फिल्म' लेकर जनता के पास आ रहे हैं। वैसे तो वे राजधानी में अपने निवास में बरसों से जनदर्शन करते आ रहे हैं लेकिन जनता के पास जाकर जनदर्शन की शुरूआत करने का प्रचार सरकारी अमला इन दिनों पूरी ताकत से कर रहा है लेकिन वास्तविकता यह है कि यह कोई नया काम नहीं है और अपने विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री काफी पहले ऐसा कर चुके हैं और जनता की समस्याएं सुनने का यह तरीका फ्लाप भी हो चुका है। चुनाव नजदीक है, सो फिर से ऐसी कवायद करने की तैयारी की जा रही है।
मुख्यमंत्री ने यहां जनदर्शन की शुरूआत की थी और करीब दर्जन भर बार यह किया भी। कई  समस्याएं आईं। कई का निराकरण हुआ और फिर अचानक यह सब बंद कर दिया गया। अब चुनाव में ज्यादा वक्त नहीं बचा, सो एक बार फिर वे जनता के बीच आ रहे हैं। पूर्व में आई उनकी यह 'फिल्म' कुछ खास नहीं कर पाई थी। अब फिर से इसे  'रिलीज' किया जा रहा है।  मुख्यमंत्री सचिवालय ने उनका जिला मुख्यालयों में जाकर जनता की समस्याएं सुनने (जनदर्शन) का कार्यक्रम तैयार किया है। तारीख तय नहीं हुई है लेकिन जनता को साधने की कोशिश फिर से हो रही है। फिर से जनदरबार लगेगा। जनता याचक के रूप में मौजूद होकर अपनी समस्याएं रखेंगे, इस उम्मीद में कि उनकी समस्याओं का निराकरण हो जाएगा। सरकारी विभाग फिर से एक दो आवेदनों पर होने वाले काम पर विज्ञप्तियां जारी करेंगे। मुख्यमंत्री यहां भी आएंगे और लोगों की समस्याएं सुनेंगे। पर बीते जनदर्शन की बात करें तो अनुभव बेहतर नहीं रहा। न ही जनता का और न ही सरकार का। हालांकि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि जनदर्शनों में आने वाली समस्याओं में से ज्यादातर का निराकरण हो गया है और कुछ ही समस्याएं लंबित हैं लेकिन वास्तविकता शायद कुछ और ही हो। मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में यदि जनदर्शन अच्छा खासा चल रहा था और इसमें जनता की समस्याएं सुनी और उसे सुलझाई जा रही थीं तो फिर अचानक इसे बंद करने का कारण समझ नहीं आया? एक प्रशासनिक अफसर ने कुछ समय पहले संकेत दिया था कि जनदर्शन में ज्यादातर आवेदन शिकायतों के या फिर आर्थिक मदद के आते थे और ऐसे आवेदनों के लिए ही जनदर्शन का औचित्य नहीं था, सो इसे अचानक बंद कर दिया गया।
प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने अपने विधानसभा क्षेत्र में जनदर्शन करने की घोषणा 30 मई 2009 को की थी। इस समय तय किया गया था कि महीने के दूसरे शनिवार को यहां जनदर्शन लगाकर जनता की समस्याएं सुनी जाएंगी। पहला जनदर्शन उनकेे कैम्प कार्यालय में 13 जून 2009 को लगा था। इसमें 832 आवेदन आए। उनके यहां स्थापित कैंप कार्यालय इसे मिलाकर कुल पांच जनदर्शन लगे। दूसरा जनदर्शन 11  जुलाई 2009 को लगा। इसमें महज 104 आवेदन आए। तीसरा 8 अगस्त 2009 को लगा, 874 आवेदन आए। चौथा 12 सितम्बर को लगा जिसमें 1056 आवेदन आए। पांचवा 14 नवम्बर 2009 को लगा जिसमें 996 आवेदन आए।
इसके बाद अचानक जनदर्शन को बंद कर दिया गया। न कोई कारण बताया गया और न किसी प्रकार की जानकारी दी गई। फिर अचानक खबर आई कि मुख्यमंत्री घूम घूमकर जनदर्शन करेंगे। कार्यक्रम भी आ गया। इसी कड़ी में वे 8 मई 2010 को मोखला गांव पहुंचे। यहां 612 आवेदन आए। फिर 10 जुलाई 2010  को शहर के प्यारेलाल स्कूल में मुख्यमंत्री का दरबार सजा, आवेदन आए छह सौ। सुकुलदैहान में 9 अक्टूबर 2010 को लगे दरबार में भी छह सौ आवेदन आए। फिर 13 नवम्बर 2010 को सिंघोला में 750 आवेदन आए। इसके बाद मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में कुछ फेरबदल किया और जनदर्शन को जनसम्पर्क का रूप दिया।  अंजोरा में वे जनसम्पर्क में पहुंचे और उनको मिले 205 आवेदन।
यानि अब तक मुख्यमंत्री की जनता को साधने की कवायद में कुल 9622 आवेदन आए हैं और सरकारी आंकड़े इनमें से 8949 को निराकृत बता रहे हैं। यानि सिर्फ 673 आवेदन लंबित हैं। हालांकि यह आंकड़ा सही नहीं होना चाहिए क्योंकि सरकारी रिकार्ड में उन आवेदनों को भी निराकृत की श्रेणी में डाल दिया जाता है जिनमें विभागों की टीम लिखकर आ जाती है, किसी नियमावली को लेकर। समस्या भले ही यथावत रहे, सरकारी आंकड़ों में इसे निराकृत मान लिया जाता है।
बहरहाल, लोकतंत्र में जनता का वक्त पांच साल में एक बार आता है और इस दौरान वह सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। हमारे लोकतंत्र की बड़ी खासियत यह है कि यहां जनता खुद अपना भाग्यविधाता चुनती है पर कमजोरी यह है कि इस चुनाव में जनता के पास कुछ ज्यादा विकल्प नहीं होता। जनता को उन्हीं में से अपना प्रतिनिधि चुनना होता है, जो राजनीतिक दल उनके सामने पेश करते हैं और वे कैसे भी हों, जनता मजबूर रहती है उनको चुनने। खैर अब देखना होगा कि जनता को साधने की फिर से शुरू हो रही कवायद कितना रंग लाती है? और यह पुरानी फिल्म जनता को कितना पसंद आती है?

26 अगस्त 2012

उम्मीद का सोमवार...

संसद का मानसून सत्र चल रहा है। वैसे तो यह वाक्य अपने आप में सही है, पर मौजूदा हालात को देखकर ऐसा लगने लगा है कि यह वाक्य कहीं गलत तो नहीं हो रहा। मानसूत्र सत्र में 20 दिनों की कार्रवाई हो चुकी है और आधे से ज्यादा वक्त बरबाद ही हुआ है। यानि कि कहा जाना चाहिए कि मानसूत्र सत्र घिसट-घिसट कर चल रहा है। इस बार का सत्र शुरू से ही हंगामे के नाम रहा। सत्र शुरू होते ही इस पर बाबा रामदेव का रामलीला मैदान में चलने वाले कालाधन के आंदोलन की छाया पड़ती रही तो कुछ दिन बाद कैग के रिपोर्ट ने बचा-खुचा काम कर दिया। कोयला ब्लाक आबंटन में धांधली की इस रिपोर्ट ने संसद को सुलगा दिया और इसका कीमती वक्त हर दिन राख होता जा रहा है।
यह बड़ी चिंता की बात है कि संसद में काम का वक्त कम होता जा रहा है। संसद एक ऐसी जगह है, जहां से देशवासियों के लिये योजनाएं बनती हैं और उसे सही तरीके से क्रियान्वित किया जा रहा है, या नहीं, इस बात का मूल्यांकन किया जाता है। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है और उसे संसद में भेजती है। इस उम्मीद के साथ कि वह वहां उनकी समस्याओं को उठाने काम करेंगे, उनकी समस्याओं का निराकरण करेंगे और उनके लिए सुविधाएं जुटाने का काम करेंगे, पर हो विपरीत रहा है।
हमारे पास पिछले साल संसद की कार्रवाई के जो आंकड़े हैं, उसके मुताबिक बीते साल 73 दिन संसद की कार्रवाई चली। ये दिन संसद के काम के हिसाब से करीब आठ सौ घंटे होते हैं। संसद में होने वाले काम काज को लेकर रिसर्च करने वाली एक स्वतंत्र संस्था के आंकड़े कहते हैं कि इन घंटों में से करीब 30 प्रतिशत समय हंगामे की भेंट चढ़ गया था। पिछले साल कुल 54 विधेयकों को कानून बनाने की योजना थी, लेकिन मूर्तरूप ले पाए सिर्फ 28। संसद की कार्रवाई जब खत्म हुई उस वक्त 97 विधेयक लंबित पड़े थे। इस साल की शुरूआत बीते साल से बेहतर रही। इस साल जब बजट सत्र शुरू हुआ, तो एक भय था बीते साल का लेकिन फिर अच्छा नजर आने लगा। मार्च से लेकर मई के बीच हुए बजट सत्र का करीब 90 फीसदी समय उपयोगी  रहा और 12 विधेयक पारित किए गए। 17 नए विधेयक आए। इस तरह करीब सौ विधेयक लंबित रहे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि बीते साल का भूत फिर निकलकर आ गया और संसद का समय बरबाद होता जा रहा है।
इस बार मानसून सत्र की शुरूआत से ही कुछ न कुछ अड़चनें पैदा होते रहीं और आखिर में कोयले की आंच में सब कुछ सुलगने लगा। कैग के रिपोर्ट में टू जी से बड़े गड़बड़झाले का मामला सामने आने के बाद से संसद में कोई काम नहीं हो रहा है। विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफे से कुछ कम में मानने को तैयार नहीं है और सत्ता पक्ष  इस्तीफे की मांग को सिरे से नकार कर कैग रिपोर्ट पर चर्चा करने की बात कह रहा है। शुक्रवार को इस उम्मीद के साथ कार्रवाई थमी थी कि सोमवार से सदन ठीक ठाक काम करने लगेगा। सत्ता पक्ष इस बात को लेकर विपक्ष के नेताओं से भी बात कर चुका है, अब देखना यह है कि सोमवार की सुबह उजाला लेकर आता है या फिर सदन में कालिख पुती नजर आएगी।

11 जून 2012

लोकतंत्र का मजाक!

 यह लोकतंत्र का कौन सा चेहरा है? लोकतंत्र में बहुदलीय प्रणाली की व्यवस्था है। अलग-अलग दलों के लोग चुनाव मैदान में होते हैं और उनमें से जनता को एक को चुनना होता है। बहस होती है, कि सब के सब भ्र्रष्ट हैं। सब के सब बेकार हैं। जनता के पास विकल्प के नाम पर कुछ खास नहीं होता। जो सबसे कम बुरा हो, उसे चुनने का प्रयास जनता करती है। बहस इस बात पर भी हो रही है कि जनता को 'राईट टू रिकालऔर 'राईट टू रिजेक्टका अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन यहां तो सब के सब धरे रह गए। राजनीति में संघर्ष की समाप्ति का यह उदाहरण कहां ले जाएगा?
बात हो रही है उत्तरप्रदेश की। उत्तरप्रदेश के कन्नौज की। यहां से खांटी समाजवादी मुलायम सिंह की बहू और मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव (मुलायम पुत्र) की पत्नी डिंपल यादव सांसद बन गई हैं। 2009 में फिरोजाबाद में कांग्रेस के राजबब्बर के हाथों शिकस्त खाकर लोकसभा जाने से वंचित हो गई डिंपल ने आखिरकार संसद का रास्ता तय कर लिया और वह भी इस तरीके से जो उसके लिए, उसकी पार्टी के लिए तो दमदार है, पर लोकतंत्र के लिए...? लोकतंत्र के लिए तो यह चिंता का सबब है।
डिंपल के सामने सबसे पहले कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी खड़ा नहीं करने का एलान कर दिया। कई दलों की बैसाखी पर चल रही केन्द्र सरकार के सामने इस समय मजबूरी है, अपनी सरकार को चुनाव के समय तक खींचने की और इसमें उसे मुलायम सिंह यादव का सहारा दिख रहा है। अपनी इसी मजबूरी में उसने 2009 में भी कन्नौज से उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था और इस बार भी उसने कन्नौज को छोड़ दिया।
बसपा का तर्क अजीब है। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी से शिकस्त खाकर सत्ता से बाहर हो चुकी मायावती की पार्टी के पास यदि नैतिक साहस होता तो वह कन्नौज में अखिलेश यादव की हारी हुई पत्नी को मैदान में देखकर उसके खिलाफ सीना तानकर खड़ी होती लेकिन उसने घुटने टेक दिए। तर्क दिया कि जिस तरह रायबरेली और अमेठी में  गांधी-नेहरू परिवार काबिज है और उस क्षेत्र में विकास नहीं दिख रहा है, उसी तरह यह क्षेत्र भी विकासविहीन होगा, इसे साबित करने के लिए उसने उम्मीदवार खड़ा नहीं किया। सवाल यह उठता है कि पांच साल तक प्रदेश की सत्ता में वह बैठी रही, उसने इस क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया? कन्नौज में  मुख्यमंत्री की पत्नी चुनाव लड़ रही थी, सत्ताधारी पार्टी के सामने खड़े होने में पसीने छूटने लगे बसपा के और उसने डर कर मैदान छोड़ दिया।
भाजपा की स्थिति तो हास्यास्पद हो गई। पहले तो उसने अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करने का फैसला किया और जब पार्टी के भीतर इस फैसले का विरोध हुआ तो आनन फानन में उम्मीदवार तय किया गया। जिसका नाम तय किया गया, उसके पास इतना वक्त  ही  नहीं बचा था कि वह नामांकन दाखिल कर पाता, लिहाजा भाजपा भी मैदान में  नहीं रही।
डिंपल के अलावा दो और उम्मीदवार मैदान में थे जिन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। डिंपल निर्विरोध चुन ली गई। समाजवादी पार्टी के लिए यह उपलब्धि का विषय हो सकता है कि उसकी पार्टी के उम्मीदवार, उनकी बहू निर्विरोध चुन ली गई पर यह जनता के लिए तो धोखे की तरह है।
हमारा मानना है कि यह धोखा कांग्रेस ने दिया है, बसपा ने दिया है, भाजपा ने दिया है। चुनाव में उम्मीदवार चुनना जनता का हक है और यह लोकतंत्र का हिस्सा है। लोकतंत्र में जनता से उसका हक छीनने का  अधिकार किसी का नहीं है, लेकिन ऐसा किया गया है।  पार्टियों को इसका जवाब देना होगा।