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19 मार्च 2013

होली, आसाराम और गाली !!!

एक हैं आसाराम बापू। वैसे तो ये संत हैं, पर ज्यादातर चर्चा अपने विवादास्पद कार्यों और बयानों को लेकर रहते हैं। उनके आश्रमों की अव्यवस्था को लेकर खबरें आएं या फिर देश में और भी कोई घटना हो, ये अपना एक अलग ही तर्क रखते हैं और जब उनके तर्कों को लेकर सवाल खड़ा होता है तो वे गालियां बकने लगते हैं। उनका सबसे पहला टारगेट होता है मीडिया। मीडिया को कोसने, गाली बकने का वो कोई अवसर नहीं छोड़ते और खुद को बड़ा संत बताने वाले ये सज्जन अपनी जुबान से खुद को काफी छोटा कर देने से भी परहेज नहीं करते।
ताजा मामला है महाराष्ट्र में उनकी होली का। आसाराम बड़े रंगीन शख्सियत हैं। उनका प्रिय त्यौहार होली है। वे होली का त्यौहार ऐसा खेलते हैं, मानों वे कृष्ण हो और उनके सामने मौजूद सारी जनता गोपियां। वे इन दिनों महाराष्ट्र के शहरों में घूम-घूमकर होली खेल रहे हैं। खुद मंच पर मौजूद रहते हैं और बड़े बड़े फव्हारों से अपने भक्तोंं को भिगोने का मजा लेते हैं। महाराष्ट्र के नागपुर में उन्होंने ऐसी ही होली खेली। वहां करोड़ो लीटर पानी उन्होंने अपने भक्तों को भिगोने में बहा दिया। महाराष्ट्र्र इन दिनों भीषण सूखे की चपेट में है। लोग पानी की बूंद बूंद केे लिए तरस रहे हैं। हालत यह है कि लोगों को पीने का पानी, मवेशियों के लिए पानी नहीं मिल रहा है। एक ओर पानी की किल्लत और दूसरी ओर पानी की इस तरह की बरबादी को लेकर जब मामला महाराष्ट्र के विधानसभा में गूंजा तो महाराष्ट्र सरकार ने नवी मुंबई में होने वाले आसाराम बापू के होली समारोह में पानी के फव्हारे पर पाबंदी के आदेश दे दिए।
अब आसाराम बापू को पानी की किल्लत से क्या लेना देना, उनको तो होली का मजा लेना था, सो वे भड़क गए। उनका तर्क था कि उनके समागम में लाखों लोग मौजूद रहते हैं और उन लोगों पर वो जो पानी की बौछार करते हैं, उसका औसत निकाला जाए तो प्रति व्यक्ति दस ग्राम पानी का इस्तेमाल वे करते हैं। वे कहते हैं कि वे अपने आयोजन में पलाश के फूलों का इस्तेमाल करते हैं और इससे पानी की बरबादी नहीं होती। बचाव ही होता है।
आसाराम यहीं नहीं रूके। वे यह भी कहते हैं कि ऐसे लोग उनकेे कार्यक्रम में विध्र फैलाने का काम कर रहे हैं जो धर्मांतरण के काम में लिप्त रहते हैं। उन्होंने मीडिया को गाली देते हुए कहा कि मीडिया के माध्यम से यह बात फैलाई जा रही है कि वे पानी की बरबादी कर रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है। वे पलाश से होली खेलते हैं। इससे पानी की बरबादी नहीं होती, बचाव ही होता है।
हम आसाराम की होली का विरोध नहीं करते, पर इस तरह की होली का विरोध करते हैं। ऐसे वक्त में जब महाराष्ट्र का एक हिस्सा भीषण सूखे के दौर से गुजर रहा है। लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं, ऐसे वक्त में पानी को इस तरह बहाया जाना कहीं से उचित नहीं। पानी की इस तरह बरबादी पर सवाल खड़ा करने वालों को गालियां बकने वाले और खुद को आध्यात्मिक संत कहने वाले आसाराम में शायद ही इतनी समझ बची हो कि उनकी होली खेलने और भक्तों को भिगोने से ज्यादा जरूरी पानी का दूसरा उपयोग है।

01 नवंबर 2012

राज्‍य का उत्‍सव या हलकट जवानी का उत्‍सव!!!!!



 फिल्‍मी सितारों को परदे में देखकर लोग उनके निभाए किरदारों में आदर्श ढूंढते हैं और उनके जैसा बनने की कोशिश करते हैं.....

फिल्‍मों में ज्‍यादातर मौकों पर अश्‍लीलता और अंग प्रदर्शन के जरिए अपनी अलग ही छवि पेश करने वाली करीना कपूर को सामने देखकर लोग क्‍या सीखेंगे??????

लगता है सरकार करीना को फेस टू फेस दिखाकर छत्‍तीसगढ को यह समझाना चाहती है कि अपने बाप की उमर के शादीशुदा व्‍यक्ति से शादी करने के बाद ''टीआरपी'' कैसे बढती है!!!!!

हद है छत्‍तीसगढ सरकार!!!!!!!!!!!!!

मौजूदा दौर में छत्‍तीसगढ तमाम तरह की दिक्‍कतों से जूझ रहा है, तकरीबन हर दिन नक्‍सली राज्‍य की धरती को खून से लथपथ कर रहे हैं.... बहुत काम हुए हैं पर अभी भी दिक्‍कतें बहुत हैं... उम्‍मीदें बहुत हैं, उन पर सरकार खरी नहीं उतर पाई है।

सरकार कई योजनाओं का ढोल पीटती है, पर मेरा मानना है कि ज्‍यादातर योजनाएं ''चोरी'' की हैं। ज्‍यादातर का क्रियान्‍वयन इस तरह से हो रहा है कि योजनाओं का सदुपयोग कम और दुरूपयोग ज्‍यादा हो रहा है। 
मसलन, गरीबों को चावल योजना की बात करें तो यह आंध्र से उठाया गया है।
संजीवनी एक्‍सप्रेस के माध्‍यम से अच्‍छा काम हो रहा है, यह गुजरात से आयातित योजना है।
मुख्‍यमंत्री सडक योजना, प्रधानमंत्री सडक योजना की नकल है।
चावल के लिए फर्जी गरीबी रेखा कार्ड बन गए हैं और हालत यह है कि हर घर में कई कार्ड लोगों ने बना लिए हैं। नेताओं के पास सैकडों कार्ड हैं। राशन दूकानों से सरकारी चावल की कालाबाजारी हो रही है। 
  ....और भी कई योजनाएं हैं
 
कुल मिलाकर मेरा कहना है कि राज्‍योत्‍सव का जश्‍न मनाया जाना चाहिए लेकिन दिखावा नहीं होना चाहिए...... पर अफसोस हो यही रहा है। एक तारीख से लेकर सात तारीख तक मनने वाले राज्‍योत्‍सव में हर दिन मुंबई के कलाकारों को करोडो रूपए खर्च कर लाया जा रहा है। ज्‍यादा अफसोस यह भी कि इन कलाकारों को छत्‍तीसगढ की संस्‍कृति की ही समझ है और न ही छत्‍तीसगढ से इनको कोई मतलब है। ये यहां आएंगे। करोडो रूपए लेंगे और मंच में ठुमके लगाकर लौट जाएंगे।

(करीना कपूर छत्‍तीसगढ के राज्‍योत्‍सव में सरकारी मेहमान है और खबर है कि करीना को यहां आने के लिए सरकारी खजाने से एक करोड दस लाख रूपए दिया जा रहा है और आने जाने के लिए चाटर्ड विमान का खर्चा भी उठाया जा रहा है। करीना के अलावा राज्‍योत्‍सव के कार्यक्रमों में अलग अलग दिन ये भी आएंगे, एक नवम्बर करीना कपूर (बॉलीवुड अभिनेत्री) एवं सोनू निगम (बॉलीवुड सिंगर), दो नवम्बर नेहा धूपिया (बॉलीवुड अभिनेत्री), सुदेश भोसले (बॉलीवुड सिंगर), तीन नवम्बर रागिनी खन्ना (ससुराल गेंदाफूल फेम), प्रत्युषा बेनर्जी (बालिका वधु फेम), चार नवम्बर विशाल शेखर (संगीतकार), पांच नवम्बर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं छत्तीसगढ़ फिल्म स्टार नाईट, छह नवम्बर हिमेश रेशमिया (बॉलीवुड सिंगर), दीया मिर्जा (बॉलीवुड अभिनेत्री), आयुष्मान खुराना (बॉलीवुड अभिनेता), सात नवम्बर सुनिधी चौहान (बॉलीवुड सिंगर) और श्वेता तिवारी (बॉलीवुड अभिनेत्री)।)



29 सितंबर 2012

आपको सीखना होगा मनमोहन जी पैसे पेड़ पर नहीं उगते...

एक तरफ देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए जनता पर बोझ पर बोझ डाला जा रहा है और दूसरी तरफ जनता की गाढ़ी कमाई (टैक्स) से नेता ऐश कर रहे हैं। घोटाले पर घोटाले कर रहे हैं। नेताओं के अविश्वसनीय आंकड़ों वाले घोटाले लगातार सामने आ रहे हैं और जनता पर डीजल के दामों में बढ़ोत्तरी कर बोझ डाला जा रहा है। रसोई गैस सिलेंडरों की संख्या सीमित कर घर का बजट बिगाडऩे का काम किया जा रहा है और सरकारी पैसे से नेता विदेशों में घूम-घूमकर करोड़ों रूपए बरबाद कर रहे हैं। किसी भी विदेश यात्राओं से यदि कुछ बेहतर निकलकर आता तो फिर भी इन खर्चों को कुछ हद तक जायज ठहराया जा सकता था लेकिन हो कुछ नहीं रहा है और ये यात्राएं महज धन की बरबादी के अलावा कुछ नहीं है।
एक आरटीआई कार्यकर्ता के सवालों के जवाब में यह खुलासा हुआ है कि देश को अर्थशास्त्र की परिभाषा समझाने और देश को आर्थिक संकट से उबारने के लिए कड़े कदमों की जरूरत बताने वाले अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के 'कुनबों' ने करीब पौने सात सौ करोड़ रूपए विदेश यात्राओं पर फूंक डाले हैं। जानकारी के मुताबिक पैसे पेड़ों पर नहीं उगते कहने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी पिछले दो साल में जमकर विदेश दौरे किये। प्रधानमंत्री मॉस्को, मालदीव, न्यूयॉर्क बाली के दौरों पर गए। विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने 28 विदेश दौरे किए। कृष्णा ने न्यूयॉर्क, इस्लामाबाद, बीजिंग, बाली, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, इजरायल और फिलस्तीन का दौरा किया। बताया जाता है कि विदेश दौरों पर खर्चे में बढ़ोतरी इसलिए हुई क्योंकि कई बार मंत्रियों ने चार्टर्ड प्लेन से यात्राएं की। मसलम विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के पाकिस्तान दौरे के लिए एयर इंडिया के एयरबस और वायुसेना के एम्ब्रेयर को किराये पर लिया गया। वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने आठ बार स्वीट्जरलैण्ड,दक्षिण अफ्रीका,पाकिस्तान और फ्रांस की यात्रा की। रक्षा मंत्री एके एंटनी ने पिछले दो साल में 6 विदेश दौरे किए.सुबोध कांत सहाय ने पांच देशों की यात्राएं की। यह सब आधिकारिक दौरे थे।  कुल मिलाकर 2011-12 में मंत्रियों के विदेश दौरों पर यूपीए सरकार ने 678 करोड़ रूपए फूंके। 2010-11 से यह 12 गुना ज्यादा है। 2010-11 में मंत्रियों के विदेश दौरों पर सिर्फ 56.1 करोड़ रूपए खर्च हुए थे।
सवाल उठता है कि विदेशों में जाकर इन लोगों ने क्या किया? क्या देश के लिए कोई नई नीति लेकर आए, कोई सुधार लेकर आए या फिर सिर्फ जुबानी लफ्फाजी करने के अलावा कुछ नहीं किया। इनसे यदि पूछा जाएगा तो ये बड़ी बड़ी बातें कहेंगे और बताएंगे कि विदेशों से इन लोगों ने देश की तरक्की के रास्ते लाए हैं लेकिन हकीकत इससे अलग है। वास्तव में हुआ कुछ  नहीं। हर विदेश यात्राओं के बाद के परिदृश्य पर नजर डालें तो कुछ भी हासिल हुआ हो, नहीं दिखेगा। मसलन, विदेश मंत्री एसएम कृष्णा पाकिस्तान गए और इस यात्रा के लिए उन्होंने चाटर्ड प्लेन किराए पर लेकर करोड़ों फूंके। पाकिस्तान आज भी भारत पर चोरी छिपे आतंक फैलाने का काम कर रहा है। सीमा पर युद्ध विराम का उल्लंघन कर रहा है। फिर कृष्णा ने वहां क्या किया? और क्या पाकिस्तान जाने के लिए चार्टर्ड प्लेन की जरूरत थी, पड़ौस के देश में क्या कम खर्चे में यात्रा नहीं की जा सकती थी? ऐसे कई सवाल हैं, जिसके जवाब घोटालों और धन की बरबादी करने वाले इन नेताओं के पास नहीं हैं। मनमोहन सिंह जी, पैसे पेड़ पर नहीं लगते यह लोगों को बताने की नहीं, आपको और आपके मंत्रियों को समझने की जरूरत है।

26 अगस्त 2012

उम्मीद का सोमवार...

संसद का मानसून सत्र चल रहा है। वैसे तो यह वाक्य अपने आप में सही है, पर मौजूदा हालात को देखकर ऐसा लगने लगा है कि यह वाक्य कहीं गलत तो नहीं हो रहा। मानसूत्र सत्र में 20 दिनों की कार्रवाई हो चुकी है और आधे से ज्यादा वक्त बरबाद ही हुआ है। यानि कि कहा जाना चाहिए कि मानसूत्र सत्र घिसट-घिसट कर चल रहा है। इस बार का सत्र शुरू से ही हंगामे के नाम रहा। सत्र शुरू होते ही इस पर बाबा रामदेव का रामलीला मैदान में चलने वाले कालाधन के आंदोलन की छाया पड़ती रही तो कुछ दिन बाद कैग के रिपोर्ट ने बचा-खुचा काम कर दिया। कोयला ब्लाक आबंटन में धांधली की इस रिपोर्ट ने संसद को सुलगा दिया और इसका कीमती वक्त हर दिन राख होता जा रहा है।
यह बड़ी चिंता की बात है कि संसद में काम का वक्त कम होता जा रहा है। संसद एक ऐसी जगह है, जहां से देशवासियों के लिये योजनाएं बनती हैं और उसे सही तरीके से क्रियान्वित किया जा रहा है, या नहीं, इस बात का मूल्यांकन किया जाता है। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है और उसे संसद में भेजती है। इस उम्मीद के साथ कि वह वहां उनकी समस्याओं को उठाने काम करेंगे, उनकी समस्याओं का निराकरण करेंगे और उनके लिए सुविधाएं जुटाने का काम करेंगे, पर हो विपरीत रहा है।
हमारे पास पिछले साल संसद की कार्रवाई के जो आंकड़े हैं, उसके मुताबिक बीते साल 73 दिन संसद की कार्रवाई चली। ये दिन संसद के काम के हिसाब से करीब आठ सौ घंटे होते हैं। संसद में होने वाले काम काज को लेकर रिसर्च करने वाली एक स्वतंत्र संस्था के आंकड़े कहते हैं कि इन घंटों में से करीब 30 प्रतिशत समय हंगामे की भेंट चढ़ गया था। पिछले साल कुल 54 विधेयकों को कानून बनाने की योजना थी, लेकिन मूर्तरूप ले पाए सिर्फ 28। संसद की कार्रवाई जब खत्म हुई उस वक्त 97 विधेयक लंबित पड़े थे। इस साल की शुरूआत बीते साल से बेहतर रही। इस साल जब बजट सत्र शुरू हुआ, तो एक भय था बीते साल का लेकिन फिर अच्छा नजर आने लगा। मार्च से लेकर मई के बीच हुए बजट सत्र का करीब 90 फीसदी समय उपयोगी  रहा और 12 विधेयक पारित किए गए। 17 नए विधेयक आए। इस तरह करीब सौ विधेयक लंबित रहे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि बीते साल का भूत फिर निकलकर आ गया और संसद का समय बरबाद होता जा रहा है।
इस बार मानसून सत्र की शुरूआत से ही कुछ न कुछ अड़चनें पैदा होते रहीं और आखिर में कोयले की आंच में सब कुछ सुलगने लगा। कैग के रिपोर्ट में टू जी से बड़े गड़बड़झाले का मामला सामने आने के बाद से संसद में कोई काम नहीं हो रहा है। विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफे से कुछ कम में मानने को तैयार नहीं है और सत्ता पक्ष  इस्तीफे की मांग को सिरे से नकार कर कैग रिपोर्ट पर चर्चा करने की बात कह रहा है। शुक्रवार को इस उम्मीद के साथ कार्रवाई थमी थी कि सोमवार से सदन ठीक ठाक काम करने लगेगा। सत्ता पक्ष इस बात को लेकर विपक्ष के नेताओं से भी बात कर चुका है, अब देखना यह है कि सोमवार की सुबह उजाला लेकर आता है या फिर सदन में कालिख पुती नजर आएगी।