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07 अगस्त 2017

आखिर कब तक????



दो और जवान शहीद हो गए। राखी के‍ एक दिन पहले दो बहनों ने अपने भाईयों को खो दिया। राखी की सुबह दोनों शहीदों को गार्ड आफ ऑनर दिया गया। पुलिस, प्रशासन और शहीदों के परिजनों की आंखों से आंसू बहता देख हर आंखें नम रहीं। पर एक बात तय हो गई कि राजनीति क्षेत्र में संवेदनाएं मर गई हैं। शहीदों को अंतिम‍ बिदाई देने भी उंगलियों में गिने जाने वाले नेता मौजूद थे। क्‍या हुआ, मुख्‍यमंत्री ने अपने विधानसभा क्षेत्र में पांच पांच लालबत्तियां बांटी है। उपस्थिति एक की ही रही। 

आज रक्षाबंधन का त्‍यौहार है। हम सब इतराएंगे... सब अपनी कलाई पर अपनी बहनों का प्रेम देख इतराएंगे 

बहनें भी इतराएंगी कि हमारी रक्षा करने वाले भाई की कलाई पर मैंने डोर बांधी है और मेरा भाई हमेशा मेरे लिए, मेरी हर मुश्किल हालात में मेरे साथ होगा, लेकिन उस बहन का क्या, जिसके लिए रक्षाबंधन का त्योहार उसके भाई की मौत की खबर लेकर आया। 






नक्सल आतंक से जूझ रहे छत्तीसगढ़ में एक बार फिर शहादत हुई है! राजनांदगाँव जिले में रविवार को नक्सलियों के हमले में दो जवान शहीद हो गए!! एक एसआई और एक आरक्षक नक्सलवाद की बलि चढ़ गए!!! कब तक? आखिर कब तक?? 

फिर वही निंदा! फिर वही चेतावनी!! फिर वही शहादत व्यर्थ नहीं जाने देने के बयान!!! आखिर कब तक???? 

शहीद हुए एसआई युगल किशोर वर्मा के संबंध में पता चला है कि वे दो भाई थे और उनकी एक बहन थी... अब क्या बहन कभी रक्षाबंधन का त्योहार मना पाएगी? शहीद आरक्षक कृष साहू के परिवार में त्योहार की खुशी मनेगी?? सिर्फ कल नहीं, सालों साल इनके घरों में मातम रहेगा!!! 

सोमवार की सुबह हम जुटेंगे, शहादत को नमन करेंगे, पुलिस विभाग गाड आफ आनर देगा और इसके बाद फिर अगली शहादत का इंतजार....

बस, आप और हम इतराएँ कि हम रक्षाबंधन का त्योहार मना रहे हैं!!! हर दिन बहनों से भाई छिन रहा है!!!! सुहागिनों की मांग का सिंदूर मिट रहा है!!!!! माँ की गोद सूनी हो रही है!!!!! बच्चों के सिर से पिता का साया उठ रहा है!!!!!! इससे क्या...!!!!!!!!

जवाब बहुत छोटा हो सकता है (यदि देना चाहें), पर सवाल बहुत बडा़ है कि क्या नक्सल आतंक कभी खत्म होगा?????

#हिन्‍दी_ब्‍लाॅगिंग 

12 नवंबर 2014

यहां जिंदगी सस्‍ती है....



वो गए तो इस उम्‍मीद में थे कि परिवार और न बढे... ! पर डाक्‍टरों ने ऐसा कारनामा कर डाला कि परिवार कम हो गया.... ! ! अनाथ हो गया..... ! ! ! उसका कोई भी नाम हो सकता है, नाम मायने नहीं रखता... ! ! ! ! मायने यह रखता है कि वह गरीब थी और उसकी गरीबी की तरह ही उसकी जान भी सस्‍ती थी.... ! ! ! ! ! जान सस्‍ती थी इसीलिए तो करीब ढाई-तीन घंटों में उस जैसी 83 लोगों का आपरेशन कर दिया गया... ! ! ! ! ! ! एक ही सुई से कई लोगों को टांके लगा दिए गए... ! ! ! ! ! ! ! बिना यह देखे-परखे कि ऑपरेशन थियेटर बै‍क्‍टेरिया मुक्‍त है, या नहीं, जान ले ली गई 13 ऐसी मांओं की जो अपने कुनबे को और न बढाने की मंशा लेकर आई थीं... ! ! ! ! ! ! ! सरकार के राष्‍ट्रीय मिशन में सहभागिता निभाने आई थीं... ! ! ! ! ! ! ! !
छत्‍तीसगढ के बिलासपुर से महज दस किलोमीटर दूर कानन पेंडारी से लगे गांव सकरी में एक निजी अस्‍पताल नेमीचंद अस्‍पताल में सरकारी नसबंदी शिशिर में ऑपरेशन में की गई लापरवाही से 13 महिलाओं की मौत हो गई और 25 से ज्‍यादा महिलाएं गंभीर हैं। इस अस्‍पताल में कुछ ही घंटों में 83 महिलाओं का नसबंदी का ऑपरेशन कर दिया गया और ऑपरेशन से लेकर तमाम प्रक्रिया में इतनी लापरवाही बरती गई कि मौत का यह आंकडा सामने आ गया। मुख्‍यमंत्री ने खुद मौके का मुआयना किया और प्रधानमंत्री ने विदेश दौरे में रहते हुए मुख्‍यमंत्री से फोन पर बात की और मामले में कडी कार्रवाई करने कहा। केन्‍द्र का एक दल छत्‍तीसगढ में जांच के लिए भी आ रहा है। इस घटना से जुडे तमाम पहलुओं को लेकर आज के अखबार रंगे हुए हैं और आगे भी खबरें मीडिया में आएंगी लेकिन सबसे बडा मुद्दा यह है कि क्‍या यह पहली घटना है और क्‍या कोई गारंटी देगा कि यह आखिरी घटना होगी।
छत्‍तीसगढ का इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पडा है। अकेले स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र की बात करें तो मोतियाबिंद का आपरेशन कराकर फिर से बेहतर तरीके से देख पाने की उम्‍मीद पाले लोग ‘’अंधे’’ हो जाते हैं.... ! गर्भाशय निकाले जाने की घटना हो जाती है...! ! अस्‍पतालों में पीलिया से मौतें होती हैं... ! ! ! मलेरिया से मौत का आंकडा रूक नहीं रहा और इन सबके बीच प्रदेश के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री इसी बात पर ठहाके लगाते हैं कि उन्‍होंने रिकार्ड समय में प्रदेश में मेडिकल कॉलेज खुलवाने का ‘’कारनामा’’ कर दिया! मुख्‍यमंत्री उस वक्‍त तो स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का पीठ थपथपाते हैं जब प्रदेश में मेडिकल कॉलेज खुल जाते हैं, यह जानते हुए भी कि इसके पीछे अफसरों की मेहनत हो सकती है.... लेकिन जब सरकारी नसबंदी शिविर में महिलाओं की मौतें होती हैं तब मुख्‍यमंत्री तर्क देते हैं कि स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का दोष नहीं... वे डाक्‍टर नहीं, उनने ऑपरेशन नहीं किया..... ! ! ! ! मुख्‍यमंत्री को जवाब देना होगा कि जब सब कुछ अफसर करते हैं तो किसी मसले पर अव्‍वल होने पर दिल्‍ली में इनाम लेते दांत निपोरते वो और उनके मंत्री क्‍यों नजर आते हैं?????
निलंबन.... जांच के लिए कमेटी.... ये दो हथियार सरकार ऐसे मौकों पर खूब इस्तेमाल करती है, जब कहीं मामला गरमा जाए और लोगों का आक्रोश सामने आए.... पर इन हथियारों का क्‍या होता है, ये किसी से छिपा नहीं.... ऐसे एक नहीं दर्जनों और हो सकता है कि कई दर्जनों मामले हैं, जिनमें जांच का कहीं पता नहीं और निलंबित अफसर कब बहाल होकर फिर से अपने ‘’काले कारनामे’’ को अंजाम देना शुरू कर देता है... ! ! इसी कडी में एक नया हथियार जुड गया है एफआईआर करने का.... यह भी सिर्फ दिखावे की तरह है। एफआईआर हो भी जाए और जेल भी भेज दिया जाए तो दिक्‍कत नहीं.... ये छत्‍तीसगढ है... मामला ठंडा होते ही सब कुछ सामान्‍य होने में यहां वक्‍त नहीं लगता.... जेल जा चुके अफसर वहां से वापस आकर अपनी नौकरी में फिर से पहुंच जाते हैं, एक नई कई उदाहरण हैं।
बिलासपुर की घटना के बाद सीएम ने अस्‍पताल का दौरा किया, पीडितों से मुलाकात की.... इसकी एक तस्‍वीर सार्वजनिक हुई है, स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ठहाके लगाते दिख रहे हैं.... शर्म आनी चाहिए उनको, पर नहीं आएगी..... क्‍योंकि उनको मालूम है, मरने वाले गरीब हैं और गरीबों की जिंदगी बडी सस्‍ती है, हां, गरीब की मौत की कीमत जरूर वो लगा सकते हैं और वो लगा दिया है उनके मुखिया ने! !  मरने वालों के परिजनों को चार लाख रूपए और बाकी पीडितों को 50-50 हजार रूपए.... ! ! ! ! ! ! ! बेशर्म सरकार..... ! ! ! ! !

01 नवंबर 2012

राज्‍य का उत्‍सव या हलकट जवानी का उत्‍सव!!!!!



 फिल्‍मी सितारों को परदे में देखकर लोग उनके निभाए किरदारों में आदर्श ढूंढते हैं और उनके जैसा बनने की कोशिश करते हैं.....

फिल्‍मों में ज्‍यादातर मौकों पर अश्‍लीलता और अंग प्रदर्शन के जरिए अपनी अलग ही छवि पेश करने वाली करीना कपूर को सामने देखकर लोग क्‍या सीखेंगे??????

लगता है सरकार करीना को फेस टू फेस दिखाकर छत्‍तीसगढ को यह समझाना चाहती है कि अपने बाप की उमर के शादीशुदा व्‍यक्ति से शादी करने के बाद ''टीआरपी'' कैसे बढती है!!!!!

हद है छत्‍तीसगढ सरकार!!!!!!!!!!!!!

मौजूदा दौर में छत्‍तीसगढ तमाम तरह की दिक्‍कतों से जूझ रहा है, तकरीबन हर दिन नक्‍सली राज्‍य की धरती को खून से लथपथ कर रहे हैं.... बहुत काम हुए हैं पर अभी भी दिक्‍कतें बहुत हैं... उम्‍मीदें बहुत हैं, उन पर सरकार खरी नहीं उतर पाई है।

सरकार कई योजनाओं का ढोल पीटती है, पर मेरा मानना है कि ज्‍यादातर योजनाएं ''चोरी'' की हैं। ज्‍यादातर का क्रियान्‍वयन इस तरह से हो रहा है कि योजनाओं का सदुपयोग कम और दुरूपयोग ज्‍यादा हो रहा है। 
मसलन, गरीबों को चावल योजना की बात करें तो यह आंध्र से उठाया गया है।
संजीवनी एक्‍सप्रेस के माध्‍यम से अच्‍छा काम हो रहा है, यह गुजरात से आयातित योजना है।
मुख्‍यमंत्री सडक योजना, प्रधानमंत्री सडक योजना की नकल है।
चावल के लिए फर्जी गरीबी रेखा कार्ड बन गए हैं और हालत यह है कि हर घर में कई कार्ड लोगों ने बना लिए हैं। नेताओं के पास सैकडों कार्ड हैं। राशन दूकानों से सरकारी चावल की कालाबाजारी हो रही है। 
  ....और भी कई योजनाएं हैं
 
कुल मिलाकर मेरा कहना है कि राज्‍योत्‍सव का जश्‍न मनाया जाना चाहिए लेकिन दिखावा नहीं होना चाहिए...... पर अफसोस हो यही रहा है। एक तारीख से लेकर सात तारीख तक मनने वाले राज्‍योत्‍सव में हर दिन मुंबई के कलाकारों को करोडो रूपए खर्च कर लाया जा रहा है। ज्‍यादा अफसोस यह भी कि इन कलाकारों को छत्‍तीसगढ की संस्‍कृति की ही समझ है और न ही छत्‍तीसगढ से इनको कोई मतलब है। ये यहां आएंगे। करोडो रूपए लेंगे और मंच में ठुमके लगाकर लौट जाएंगे।

(करीना कपूर छत्‍तीसगढ के राज्‍योत्‍सव में सरकारी मेहमान है और खबर है कि करीना को यहां आने के लिए सरकारी खजाने से एक करोड दस लाख रूपए दिया जा रहा है और आने जाने के लिए चाटर्ड विमान का खर्चा भी उठाया जा रहा है। करीना के अलावा राज्‍योत्‍सव के कार्यक्रमों में अलग अलग दिन ये भी आएंगे, एक नवम्बर करीना कपूर (बॉलीवुड अभिनेत्री) एवं सोनू निगम (बॉलीवुड सिंगर), दो नवम्बर नेहा धूपिया (बॉलीवुड अभिनेत्री), सुदेश भोसले (बॉलीवुड सिंगर), तीन नवम्बर रागिनी खन्ना (ससुराल गेंदाफूल फेम), प्रत्युषा बेनर्जी (बालिका वधु फेम), चार नवम्बर विशाल शेखर (संगीतकार), पांच नवम्बर अखिल भारतीय कवि सम्मेलन एवं छत्तीसगढ़ फिल्म स्टार नाईट, छह नवम्बर हिमेश रेशमिया (बॉलीवुड सिंगर), दीया मिर्जा (बॉलीवुड अभिनेत्री), आयुष्मान खुराना (बॉलीवुड अभिनेता), सात नवम्बर सुनिधी चौहान (बॉलीवुड सिंगर) और श्वेता तिवारी (बॉलीवुड अभिनेत्री)।)



12 जुलाई 2012

नहीं भूलता वो दिन...

12 जुलाई 2009। रविवार का दिन। रविवार होने के कारण देर तक सोने की चाह थी पर सुबह छह बजे फोन की घंटी ने उठा दिया। पहली खबर मिली मानपुर (राजनांदगांव जिले का नक्‍सल प्रभावित इलाका) के मदनवाडा में नक्‍सलियों ने सुरक्षा बल के दो जवानों को गोली मार दी है। सबसे पहले यह खबर अपने चैनल में ब्रेक की। इसके बाद बिस्‍तर से उठा और तैयारी करने लगा मानपुर जाने की। शायद तब तक राजनांदगांव जिले के एसपी श्री वी के चौबे जो एक ऐसे अफसर थे जो किसी भी नक्‍सली वारदात होने पर मौके पर पहुंचकर जवानों की हौसला आफजाई करते थे, मानपुर के लिए कूच कर गए थे। बारिश का मौसम था सो टैक्‍सी काल की। टैक्‍सी आती तब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ। अपने लैपटाप को तैयार किया। कैमरा और बैटरी चेक की।  मोबाईल की बैटरी को देखा।  उस दिन शायद मेरा देर से निकलना लिखा था इसलिए जो टैक्‍सी वाला बुलाने के आधे घंटे में ही हाजिर हो जाता था डेढ घंटे  में पहुंचा। साथ में मैंने अपने सहयोगी को लिया और निकल पडा।  
घर से निकलकर टैक्‍सी में सवार हुआ ही था कि दूसरा फोन आया,  शहीदों का आंकडा  बढ सकता है। मन विचलित हुआ। फिर खबर को  अपडेट किया, चैनल में। सुबह आठ बजे पहला फोनो दिया। फोनो के लिए शहर में  ही रूका, कहीं रास्‍ते में नेटवर्क मिले न मिले। फोनो से निपटकर  जैसे ही गाडी आगे बढी एक और खबर मिली। एसपी श्री वीके चौबे की गाडी पर नक्‍सलियों ने फायरिंग कर दी है लेकिन एसपी नक्‍सलियों की गोलीबारी को पार कर सुरक्षित निकल गए हैं। चिंता और बढी। हम आगे बढते ही रहे। बीच बीच में खबर मिलती रही। इसके बाद सारी खबर अपुष्‍ट ही मिलती रही। सौ किलोमीटर का सफर तय कर मानपुर पहुंचे। मानपुर में पहुंचते ही खबर  मिली कि कुछ जवानों के शव अस्‍पताल में लाए जा चुके हैं। अस्‍पताल पहुंचने पर देखा अफरातफरी का माहौल था। अंदर जाकर देखा तो एक दो नहीं दस बारह जवानों के शव। बिस्‍तर कम था सो जमीन पर ही रख दिये गए थे। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। खबर बडी होती जा रही थी।
करीब 12 बज  गए होंगे। फिर से चैनल में खबर अपडेट की। लैपटाप औ  इवीडीओ की मदद से अब प्रारंभिक विजुअल्‍स भेजने के बाद घटनास्‍थल पर जाने की कोशिश की। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मैं इकलौता पत्रकार था जो वहां पहुंचा था। घटनास्‍थल से कुछ पहले पुलिस के जवानों ने रोक दिया। यह कहकर कि आगे गोली चल रही है न जाएं। पर अपने रिस्‍क में हम आगे बढे। कुछ  दूर जाने के बाद गाडी छोडकर पैदल ही जाना पडा। आगे मिल गए, आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता। उनसे बात करता उससे पहले एक पुलिस वाले ने मुझे गले लगा लिया, यह कहकर कि हर तरफ खून से सराबोर वर्दी..... तुम पहले व्‍यक्ति हो जिसे  देख रहा हूं यहां....  वरना ऐसी ही तस्‍वीरें.... उसने ही मुझे एक संकेत दिया कि शायद एसपी श्री वी के चौबे..........
डेढ बजे होंगे। मैं आगे बढा। जवानों के शव मौके से उठाकर ट्रेक्‍टर में डाले जा रहे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब जो खुद कीचड से लथपथ थे, उन्‍हें देखकर लग रहा था कि जमकर  मुकाबला किया है उन्‍होंने भी नक्‍सलियों का..... लगातार निर्देश दिए जा रहे थे और आर आई  गुरजीत सिंह जवानों के शवों को मौके से उठाकर अस्‍पताल भिजवाने की व्‍यवस्‍था में लगे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब से बात की। उन्‍होंने मौके पर ही बाईट देने में सहमति बताई। करीब 20 मिनट तक वो लगातार बोलते रहे। कहीं कहीं वो रूकते, जिससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था कि कुछ समय पहले ही जिस जगह पर जिस व्‍यक्ति ने नक्‍सलियों से खूनी लडाई लडी हो, इस वक्‍त उसकी मन: स्थिति कैसी रही होगी। खैर वो बोलते रहे।  हमने भी उन्‍हें नहीं टोका।  वो सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम को बयां करते रहे और आखिरी में उन्‍होंने जो कहा, उसने झकझोर कर रख दिया, मुझे याद है उनके वो शब्‍द, ‘नक्‍सलियों ने दोनो ओर से फायरिंग की, हमने भी जमकर मुकाबला किया, नक्‍सलियों को कडा टक्‍कर देते देते  एसपी साहब शहीद हो गए हैं। करीब दो बजे ये लाईनें हमने सुनी। ढाई बजे के आसपास हम वहां से निकले और पांच छह मिनट में ही मानपुर पहुंच गए। जैसे ही नेटवर्क मिला तुरंत चैनल में यह खबर दी। ‘एसपी श्री वी के चौबे शहीद। उनके साथ 29 पुलिस जवान शहीद।’
वो पूरा वाक्‍या अब तक नहीं भूला है मुझे। अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी लाशें एक साथ नहीं देखी मैंने। और जब देखने मिलीं तो जवानों की। करीब दो साल से राजनांदगांव में एसपी रहे श्री वीके चौबे साहब एक ऐसे पुलिस अफसर थे जो आम इंसान की तरह ही रहते थे और उनका दरबार हर वक्‍त आम लोगों के लिए खुला रहता था। अपने मातहतों के लिए उनके मन में जो प्रेम था, उसी प्रेम ने उन्‍हें हर दिल अजीज बनाया था और उसी प्रेम के चलते वो शहीद हो गए।
दरअसल,  मानपुर क्षेत्र का मदनवाडा पहले नक्‍सलियों का गढ हुआ करता था। यहां नक्‍सली अपनी ट्रेनिंग कैम्‍प चलाते थे। इस क्षेत्र में नक्‍सलियों के वजूद को खत्‍म करने के लिए आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता और एसपी श्री वी के चौबे ने मदनवाडा में ही पुलिस कैम्‍प स्‍थापित किया। इससे नक्‍सली बौखला गये। उन्‍होंने एक बडी साजिश तैयार की। 12 जुलाई को सुबह उन्‍होंने सातवीं वाहिनी सीएएफ के दो जवानों को तब गोली मारी जब वो जवान शौच के लिए गए थे। ये नक्‍सलियों की साजिश का हिस्‍सा मात्र था, उनका निशाना कुछ और था। नक्‍सलियों को मालूम था कि यह खबर जिला मुख्‍यालय तक जाएगी और एसपी मौके पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। नक्‍सलियों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी और मानपुर से महज छह किलोमीटर दूर पक्‍की सडक पर बारूदी सुरंग लगा रखा था। एसपी  थे ही ऐसे,  वो अपने मातहतों के पास पहुंचते थे। इस खबर को सुनकर वो निकले..... पर नक्‍सलियों ने रास्‍ते में ही उन्‍हें रोक लिया। एसपी साहब एक बार नक्‍सलियों के चक्रव्‍यूह को भेदते हुए आगे निकल गए थे लेकिन फिर बीच में फंसे अपने जवानों के लिए वो फिर से मौके  पर पहुंचे और फिर दोबारा  वहां से नहीं निकल सके।
इस घटना में एसपी श्री वी के चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू,  उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वटटी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधानआरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी भी शहीद हो गए। 
नक्‍सलवाद का नासूर। न जाने कितने घरों को तबाह करेगा। कभी किसी मां की गोद सूनी होती है।  कभी किसी की मांग का सिंदूर मिट जाता है। कभी किसी बच्‍चे के सिर से उसके पिता का साया उठ जाता है तो कभी कोई बहन रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी लिए अपने भाई का इंतजार करती रह जाती है। यूं तो नक्‍सल शब्द आया पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्‍सलबाडी से। भाकपा नेता चारू मजूमदार और कानू सान्‍याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। सत्‍ता में परिवर्तन के लिए सशस्‍त्र क्रांति जरूरी है, ऐसे नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी मौजूदा समय में  देश के 9 राज्यों के सामने सीधी चुनौती बनकर सामने है । अब नक्‍सलवाद का चेहरा बदल गया है। सत्‍ता परिवर्तन की इच्‍छा या व्‍यवस्‍था में बदलाव की ख्‍वाहिशें दफ्न हो गई हैं और नक्‍सली लूटेरों और हत्‍यारों के गिरोह में तब्‍दील हो गए हैं।
वैसे तो छत्‍तीसगढ, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, उडीसा, पश्चिम बंगाल,  झारखंड, उत्‍तरप्रदेश और उत्‍तराखंड में नक्‍सलियों  ने कई वारदातों को  अंजाम देकर अपनी दरिंदगी का सबूत दिया है लेकिन एक घटना  है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, उसका जिक्र यहां करूंगा। छत्‍तीसगढ में सबसे बडी वारदात कर नक्‍सलियों ने पुलिस को सीधे चुनौती दी।  

शहीद एसपी श्री चौबे की शहादत को सलाम करने आज राजनांदगांव में उनकी मूर्ति की स्‍थापना की जा रही है। चौबे साहब और शहीद जवानों को सलाम.............

08 मई 2012

...वरना नहीं मिलेगी माफी!


बारह साल। ढाई बार पीएससी परीक्षा! वह भी अधर में! छत्तीसगढ़ में सरकार की नाकामी का यह बड़ा उदाहरण है। साथ ही यह बताने के लिए भी काफी है कि यहां के युवाओं के लिए, बेरोजगारों के लिए सरकार कितनी सजग है। बड़ी-बड़ी बातें करने, रोजगार का अवसर सृजित करने का दावा अपनी जगह है लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार की कार्यप्रणाली इसी बात से साबित हो जाती है कि पीएससी जैसी संवैधानिक संस्था को सुचारू रूप से चलाया नहीं जा सक रहा है। ...और विपक्ष, वह भी इस गंभीर मामले को सामने में कमजोर साबित हो रहा है। 
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315 कहता है कि अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती के लिए संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सेवाओं में भर्ती के लिए राज्य लोक सेवा आयोग काम करता है। वर्ग एक के पद संघ लोक सेवा आयोग और वर्ग दो-तीन के पद राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से भरे जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका पालन ही नहीं हो रहा है और राज्य सरकार की इस नाकामी का खामियाजा राज्य के लाखों युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। राज्य लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है और इस निकाय का सही ढंग से काम न करना राज्य सरकार के होने पर ही सवालिया निशान है! दुख की बात तो यह है कि इस मामले में विपक्ष भी नकारा साबित हो रहा है।  विपक्ष अपनी रोटी सेंकने में लगा है और सत्ता में बैठे लोग न जाने किस गलतफहमी में जी रहे हैं!
छत्तीसगढ़ राज्य को बने 12 साल हो गए। वर्ष 2000 में यह राज्य अस्तित्व में आया और इसके बाद पहली बार पीएससी की परीक्षा हुई 2003 में। बड़ी मुश्किल से इस परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों की भर्ती हो पाई। उन पर भी तलवार लटकी हुई है। भर्ती में गड़बड़ी की शिकायतें हुईं और मामला हाईकोर्ट में है। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले की जांच की है और जांच रिपोर्ट राज्यपाल के समक्ष पेश की जा चुकी है। इस ब्यूरो के सूत्रों की मानें तो जांच रिपोर्ट के आधार पर पचास से ज्यादा लोगों के पद बदल जाएंगे और कई को तो नौकरी से भी हाथ धोना पड़ जाएगा। दोष उन उम्मीदवारों का नहीं, आयोग का है, सरकार का है, जिसने परीक्षा लेने में, इसका परिणाम निकालने में गड़बड़ी की, लेकिन भविष्य अधर में उनका है जो इस परीक्षा के माध्यम से भविष्य संवारने का सपना देख रहे थे!
दूसरी बार परीक्षा हुई 2005 में। इसकी प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा भी जैसे-तैसे निपटी और भर्ती प्रक्रिया भी पूरी हो गई लेकिन इस पर भी विवाद बना हुआ है। हां, इतनी राहत की बात जरूर है कि इस बार के चयनित उम्मीदवारों पर न्यायालय या जांच की तलवार नहीं लटकी है।
तीसरी बार परीक्षा 2008 में हुई। भर्ती में आरक्षण नियमों में का पालन नहीं होने को लेकर बवाल मचा और मामला न्यायालय में जा पहुंचा। बड़ी मुश्किल से चार साल बाद 2012 में इसकी मुख्य परीक्षा आयोजित हुई। रिजल्ट नहीं आया है और मामला सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंचा है। राज्य की पीएससी ने इस परीक्षा में प्रारंभिक परीक्षा में ही आरक्षण के आधार पर परिणाम  जारी कर दिया, जबकि नियम कहता है कि है  एक से अधिक चरणों में होने वाली परीक्षाओं में आरक्षण नियमों का पालन अंतिम चरण की परीक्षा में किया जाना चाहिए।  इस तरह पीएससी में आरक्षण का नियम मुख्य परीक्षा में ही लागू होना चाहिए था। इस आधार पर मुख्य परीक्षा के परिणाम पर रोक का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर क्या फैसला आएगा यह फिलहाल तय नहीं है। हालांकि बात यहां यह भी हो रही है कि मुख्य परीक्षा निरस्त होगी और नई चयन सूची के आधार पर फिर से मुख्य परीक्षा होगी। यानि यहां भी उम्मीदवारों से छल!
चौथी बार  परीक्षा 2012 में यानि इसी महीने की छह तारीख को हुई है। इस परीक्षा को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। आरोप लग रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों को वंचित करने का षडय़ंत्र रचा जा रहा है। उत्तरप्रदेश की भाषाशैली का प्रश्र पूछा गया है और वहां के ऐसे प्रश्र पूछे गए हैं जिनका जवाब वहां के उम्मीदवारों के लिए सरल और  छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों के लिए काफी कठिन हैं। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के ऐसे सवाल जिनका जवाब हर कोई दे सकता है।
छत्तीसगढ़ में जब पहली बार पीएससी की परीक्षा आयोजित हुई थी तो उस दौरान एक नियम पुस्तिका राज्य लोक सेवा आयोग ने जारी की थी, जिसमें स्पष्ट तौर पर उल्लेख था कि पीएससी की परीक्षा हर साल आयोजित होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। पड़ौसी राज्य मध्यप्रदेश जिससे अलग होकर छत्तीसगढ़ बना है, वहां हर साल यह परीक्षा  आयोजित हो रही है। छत्तीसगढ़ के साथ ही बने झारखंड और उत्त्तराखंड में भी यह परीक्षा सुचारू है। एक छत्तीसगढ़ ही है जहां पीएससी परीक्षा को लेकर पसीने छूट रहे हैं।
सैकड़ों, हजारों पद खाली हैं। राज्य में जिलों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन सरकार और पीएससी भर्ती ही नहीं कर पा रहा है। यह कमजोरी पीएससी की है। सरकार की है। इसका खामियाजा बेरोजगार भुगत रहे हैं। राज्य सेवा में आने की उम्मीद  लगाए युवा भुगत रहे हैं। रिटायर्ड लोगों को संविदा में लेकर सरकार तो अपना काम कर रही है लेकिन नई पीढ़ी के साथ जो अन्याय हो रहा है, उसका क्या। एक बात गौर करने वाली है कि व्यसायिक परीक्षा  मंडल जैसी संस्था जो संवैधानिक संस्था नहीं है, वह हर साल 50 हजार से एक लाख परीक्षार्थियों को लेकर परीक्षाएं आयोजित कर रहा है और उसका परिणाम भी समय पर जारी कर रहा है। इसे लेकर कोई विवाद भी नहीं हो रहा है, लेकिन एक संवैधानिक संस्था का छत्तीसगढ़ में इस तरह का हाल..... राज्य की युवा पीढ़ी के भविष्य से खिलवाड़ है। .... और फिर राज्य सरकार विकास के, तरक्की के, बेहतरी के कितने ही दावे कर ले, मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी उसे कभी माफ नहीं करेगी।