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04 सितंबर 2015

सब पर भारी एक डाक्टर

राजनांदगांव के जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज का दर्जा मिल गया है। पिछले साल बड़ी तेजी से काम कर ऐसा किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने इसके लिए तब के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल और स्वास्थ्य विभाग के राजधानी में बैठे अफसरों की खूब पीठ थपथपाई थी। काम भी अच्छा था। पर मुख्यमंत्री के माननीय मंत्री और उनके अफसरों की कार्यक्षमता पर उस समय सवाल खड़े हो जाता है, जब यह खबर सामने आती है कि मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में ही एक डॉक्टर का प्रकरण छह साल से बिना जांच के पड़ा हुआ है। वह डाक्टर निलंबित हो जाता है। सरकार से 75 प्रतिशत गुजारा भत्ता लेना शुरू कर देता है और फिर जिला अस्पताल के सामने ही नर्सिंग होम खोलकर सरकारी अस्पताल की खामियों का फायदा उठाते हुए वहां के मरीजों को अपने यहां खींचना शुरू कर देता है। 
राजनांदगांव के जिला अस्पताल में भेषज्ञ विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर रंगारी को सितम्बर 2009 में मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने के बदले रिश्वत लेने के आरोप में अक्टूबर 2009 में निलंबित किया गया था। इसके बाद राज्य सरकार ने जांच बिठा दी। जांच न जाने किस मुहुर्त में बिठाई गई, वह अब  तक शुरू ही नहीं हो पाई है। व्यवस्था की खामी ऐसी है कि अब डॉ. रंगारी का 'अपराध' सामान्य लगने लगा है। छह सालों में जांच क्यों शुरू नहीं हो पाई, इस पर यदि जांच हो जाए तो संभवत: राजनांदगांव से लेकर राजधानी तक के स्वास्थ्य अमले के कई अफसरों पर गाज गिर सकती है। सबने इस प्रकरण को लटकाकर सरकारी धन की बर्बादी में अपना अपना पर्याप्त योगदान दिया है।
डॉ. दिवाकर रंगारी का प्रकरण अपने आप में अजूबे की तरह है। पूरा शहर चर्चा करता है कि डॉ. रंगारी अपने निलंबन को बनाए रखने हर जतन करते हैं। कलक्टर शासन को पत्र लिखकर कहते हैं कि प्रकरण में कोई जांच करना नहीं चाहता। वो यह भी कहते हैं कि डॉ. रंगारी खुद सबसे फायदे की स्थिति में हैं। तीन साल पहले जीवनदीप समिति की बैठक में स्वास्थ्य मंत्री के सामने मामला लाया जाता है। मंत्री जल्द से जल्द निपटारे का निर्देश देते हैं, पर होता कुछ नहीं। डॉ. रंगारी कहते हैं कि वो खुद याचक की भूमिका में हैं। वो तर्क देते हैं कि यदि जांच को वो रोक सकते हैं तो समझ लीजिए कि सरकार में डॉ. रंगारी की कितनी चलती है। 
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक डॉक्टर मेडिकल सर्टिफिकेट लेने के आरोप में निलंबित होता है और उसके प्रकरण में छह साल तक जांच ही शुरू नहीं हो पाती। सवाल यह भी नहीं है कि वह डॉक्टर बिना काम किए आधे से ज्यादा पगार पा रहा है। सवाल यह भी नहीं है कि वह सरकारी अस्पताल के सामने ही निजी नर्सिंग होम खोलकर सरकारी अस्पताल के मरीजों को अपने यहां खींचने का काम कर रहा है। सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री के क्षेत्र में स्वास्थ्य जैसे मसले पर अफसर इस तरह से लापरवाही से काम करते हैं, तो प्रदेश के दूसरे इलाकों में क्या होता होगा? विभागों में क्या होगा? लगता है, अफसरों पर सीएम का डर खत्म हो गया है। यह हाल तब है, जब सीएम के पुत्र अभिषेक  सिंह  स्वयं राजनांदगांव के सांसद हैं। 

12 नवंबर 2014

यहां जिंदगी सस्‍ती है....



वो गए तो इस उम्‍मीद में थे कि परिवार और न बढे... ! पर डाक्‍टरों ने ऐसा कारनामा कर डाला कि परिवार कम हो गया.... ! ! अनाथ हो गया..... ! ! ! उसका कोई भी नाम हो सकता है, नाम मायने नहीं रखता... ! ! ! ! मायने यह रखता है कि वह गरीब थी और उसकी गरीबी की तरह ही उसकी जान भी सस्‍ती थी.... ! ! ! ! ! जान सस्‍ती थी इसीलिए तो करीब ढाई-तीन घंटों में उस जैसी 83 लोगों का आपरेशन कर दिया गया... ! ! ! ! ! ! एक ही सुई से कई लोगों को टांके लगा दिए गए... ! ! ! ! ! ! ! बिना यह देखे-परखे कि ऑपरेशन थियेटर बै‍क्‍टेरिया मुक्‍त है, या नहीं, जान ले ली गई 13 ऐसी मांओं की जो अपने कुनबे को और न बढाने की मंशा लेकर आई थीं... ! ! ! ! ! ! ! सरकार के राष्‍ट्रीय मिशन में सहभागिता निभाने आई थीं... ! ! ! ! ! ! ! !
छत्‍तीसगढ के बिलासपुर से महज दस किलोमीटर दूर कानन पेंडारी से लगे गांव सकरी में एक निजी अस्‍पताल नेमीचंद अस्‍पताल में सरकारी नसबंदी शिशिर में ऑपरेशन में की गई लापरवाही से 13 महिलाओं की मौत हो गई और 25 से ज्‍यादा महिलाएं गंभीर हैं। इस अस्‍पताल में कुछ ही घंटों में 83 महिलाओं का नसबंदी का ऑपरेशन कर दिया गया और ऑपरेशन से लेकर तमाम प्रक्रिया में इतनी लापरवाही बरती गई कि मौत का यह आंकडा सामने आ गया। मुख्‍यमंत्री ने खुद मौके का मुआयना किया और प्रधानमंत्री ने विदेश दौरे में रहते हुए मुख्‍यमंत्री से फोन पर बात की और मामले में कडी कार्रवाई करने कहा। केन्‍द्र का एक दल छत्‍तीसगढ में जांच के लिए भी आ रहा है। इस घटना से जुडे तमाम पहलुओं को लेकर आज के अखबार रंगे हुए हैं और आगे भी खबरें मीडिया में आएंगी लेकिन सबसे बडा मुद्दा यह है कि क्‍या यह पहली घटना है और क्‍या कोई गारंटी देगा कि यह आखिरी घटना होगी।
छत्‍तीसगढ का इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पडा है। अकेले स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र की बात करें तो मोतियाबिंद का आपरेशन कराकर फिर से बेहतर तरीके से देख पाने की उम्‍मीद पाले लोग ‘’अंधे’’ हो जाते हैं.... ! गर्भाशय निकाले जाने की घटना हो जाती है...! ! अस्‍पतालों में पीलिया से मौतें होती हैं... ! ! ! मलेरिया से मौत का आंकडा रूक नहीं रहा और इन सबके बीच प्रदेश के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री इसी बात पर ठहाके लगाते हैं कि उन्‍होंने रिकार्ड समय में प्रदेश में मेडिकल कॉलेज खुलवाने का ‘’कारनामा’’ कर दिया! मुख्‍यमंत्री उस वक्‍त तो स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का पीठ थपथपाते हैं जब प्रदेश में मेडिकल कॉलेज खुल जाते हैं, यह जानते हुए भी कि इसके पीछे अफसरों की मेहनत हो सकती है.... लेकिन जब सरकारी नसबंदी शिविर में महिलाओं की मौतें होती हैं तब मुख्‍यमंत्री तर्क देते हैं कि स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का दोष नहीं... वे डाक्‍टर नहीं, उनने ऑपरेशन नहीं किया..... ! ! ! ! मुख्‍यमंत्री को जवाब देना होगा कि जब सब कुछ अफसर करते हैं तो किसी मसले पर अव्‍वल होने पर दिल्‍ली में इनाम लेते दांत निपोरते वो और उनके मंत्री क्‍यों नजर आते हैं?????
निलंबन.... जांच के लिए कमेटी.... ये दो हथियार सरकार ऐसे मौकों पर खूब इस्तेमाल करती है, जब कहीं मामला गरमा जाए और लोगों का आक्रोश सामने आए.... पर इन हथियारों का क्‍या होता है, ये किसी से छिपा नहीं.... ऐसे एक नहीं दर्जनों और हो सकता है कि कई दर्जनों मामले हैं, जिनमें जांच का कहीं पता नहीं और निलंबित अफसर कब बहाल होकर फिर से अपने ‘’काले कारनामे’’ को अंजाम देना शुरू कर देता है... ! ! इसी कडी में एक नया हथियार जुड गया है एफआईआर करने का.... यह भी सिर्फ दिखावे की तरह है। एफआईआर हो भी जाए और जेल भी भेज दिया जाए तो दिक्‍कत नहीं.... ये छत्‍तीसगढ है... मामला ठंडा होते ही सब कुछ सामान्‍य होने में यहां वक्‍त नहीं लगता.... जेल जा चुके अफसर वहां से वापस आकर अपनी नौकरी में फिर से पहुंच जाते हैं, एक नई कई उदाहरण हैं।
बिलासपुर की घटना के बाद सीएम ने अस्‍पताल का दौरा किया, पीडितों से मुलाकात की.... इसकी एक तस्‍वीर सार्वजनिक हुई है, स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ठहाके लगाते दिख रहे हैं.... शर्म आनी चाहिए उनको, पर नहीं आएगी..... क्‍योंकि उनको मालूम है, मरने वाले गरीब हैं और गरीबों की जिंदगी बडी सस्‍ती है, हां, गरीब की मौत की कीमत जरूर वो लगा सकते हैं और वो लगा दिया है उनके मुखिया ने! !  मरने वालों के परिजनों को चार लाख रूपए और बाकी पीडितों को 50-50 हजार रूपए.... ! ! ! ! ! ! ! बेशर्म सरकार..... ! ! ! ! !

24 अगस्त 2013

गुणवत्‍ता वर्ष का काम पानी में बहा....



बडे दिनों बाद ब्‍लाग लिख रहा हूं..... पहले कुछ व्‍यक्तिगत और फिर तकनीकी कारणों से अचानक ब्‍लाग लेखन से दूर हो गया था और फिर ऐसा व्‍यस्‍त हुआ कि कई विषय चूक गए, लिख ही नहीं पाया.... आज से फिर वापसी हो रही है.... इस उम्‍मीद के साथ कि अब यह काम नियमित चलता रहेगा...... 

फोटो : अमित चटर्जी 

मुख्‍यमंत्री ने अपने विधानसभा क्षेत्र में पिछले साल जुलाई में करीब 13 करोड रूपए की लागत से शिवनाथ नदी पर बने एक पुल का लोकार्पण किया था और इस अगस्‍त में यानि कल इस पुल के एप्रोच रोड को शिवनाथ नदी ने उसकी औकात बता दी..... बह गया एप्रोच रोड!!!!! मुझे नहीं लगता ठेकेदार ने इतनी लापरवाही सिर्फ अपनी कमाई के लिए की होगी.... उपर से नीचे तक के अफसरों और फिर नेताओं को कमीशन बांटने वाले ठेकेदारों से इमानदारी से काम की उम्‍मीद हम कैसे कर सकते हैं?
मुख्‍यमंत्री के लोकार्पण के दस दिन के भीतर ही इस सडक पर गडढे हो गए थे, जिसके बाद कांग्रेस ने इन गडढों पर धान का रोपा लगाकर विरोध जताया था.... इस विरोध के बाद जांच की बात की गई लेकिन जांच में क्‍या हुआ यह पता नहीं चल पाया और अब जब सडक बारिश में बह गई है, एक बार फिर जांच शुरू हो गई है। महाराष्‍ट्र के कोटगुल से लगे गोंडरी पहाडी से निकलने वाली शिवनाथ नदी राजनांदगांव के वनांचल से होते हुए राजनांदगांव शहर और फिर दुर्ग की ओर जाती है। यह इस जिले की जीवनदायिनी नदी है लेकिन इन दिनों इसके गुस्‍से से सब सहमे हुए हैं।
एक बात और... चुनाव नजदीक है, इसलिए मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र में प्रदेश के पहले एस्‍ट्रोटर्फ स्‍टेडियम के निर्माण का काम भरे बरसात में चल रहा है.... बरसते पानी में सीमेंटीकरण हो रहा है, डामरीकरण जारी है..... आचार संहिता के पहले मुख्‍यमंत्री इसका भी लोकार्पण जैसे तैसे कर देंगे..... हां उनके लिए सुकून की बात यह हो सकती है कि अगले साल यदि यह भी बारिश की भेंट चढा तो भी, इससे चुनावी फायदा तो तब तक मिल ही जाया रहेगा उनको.......!!!
राजनांदगांव छत्‍तीसगढ का सबसे वीआईपी जिला है। वीवीआईपी कहें तो भी गलत नहीं होगा। 13 साल की उमर वाले छत्‍तीसगढ का पिछले दस सालों से मुख्‍यमंत्री इसी जिले से जो है। पहले पांच साल जिले के डोंगरगांव का विधायक मुखिया रहा और फिर अब राजनांदगांव विधानसभा का विधायक प्रदेश का मुखिया है। डा रमन सिंह के रूप में। लोगों को लगता होगा, प्रदेश का मुखिया जिस जिले का है, वहां की तो बल्‍ले-बल्‍ले होगी, लेकिन क्‍या वास्‍तव में ऐसा है। न्‍यूज चैनलों में सरकार की तारीफों के पुल बांधते हुए कई विज्ञापन रोज चल रहे हैं, एक विज्ञापन देखा, राजनांदगांव जिले और राजनांदगांव शहर की तरक्‍की को लेकर तो सोचने लगा कि क्‍या वास्‍तव में दृश्‍य ऐसा ही है.... जो मैं देख रहा हूं, महसूस कर रहा हूं, क्‍या वह मेरा वहम है....मेरी नजर में जो दिख रहा है... जो मैं महसूस कर रहा हूं.... काश वह वहम ही होता... पर जनाब हकीकत ऐसा नहीं है....... जहां नजर दौडाऊं.... कमियां ही दिखती हैं, कहीं से नहीं लगता कि मुखिया का जिला है!  बुरा लगे तो मुझे माफ करना डाक्‍टर साहब, पर हकीकत वही है.... जो शायद आपको नहीं दिखती या आप देखना नहीं चाहते.... शायद इसीलिए आपने पिछली बार अपना विधानसभा क्षेत्र बदल लिया था और शायद अब भी.....

13 सितंबर 2012

ठाठ पर सवाल

वीआईपी कौन होता है? वीआईपी होने का पैमाना क्या है? क्या वीआईपी वही होता है, जो राजनीति में ऊंचे ओहदे पर होता है? अब तक तो यही होता आया है और इस वीआईपी वर्ग के लिए आम आदमी यानि 'मैंगो मैन' को तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। किसी भी शहर में किसी वीआईपी का आना हो तो यह वहां के और वीआईपी लोगों के लिए तो सुखद अहसास लेकर आता है लेकिन आम आदमी को इससे सिर्फ परेशानी ही मिलती है, दिक्कतें ही नसीब होती हैं।
वैसे तो सुप्रीम कोर्ट तक ने पहले ऐसे निर्देश कई बार जारी किए हैं कि किसी भी वीआईपी के लिए कहीं भी आम आदमी का रास्ता न रोका जाए, किसी आम आदमी के कामकाज को बाधित न किया जाए यानि ऐसा कोई काम न किया जाए जिससे आम आदमी को परेशानी हो लेकिन कानून का पालन सुनिश्चित करने वाले  लोग ही इन निर्देशों की हर बार धज्जियां उड़ाते हैं और जहां भी किसी वीआईपी का आगमन हो, बैरिकेट्स लगाकर,  पुलिस जवान खड़ा कर आम आदमी का रास्ता रोक दिया जाता है। किसी को भी किसी भी जरूरी काम से जाना हो, किसी की सुनवाई नहीं होती। कई बार इस तरह के मामले भी सामने आए हैं कि किसी वीआईपी आगमन के दौरान लगे जाम में एंबुलेंस जैसी वाहनें भी फंसी हो और किसी का जीवन संकट में फंस गया हो
लेकिन पुलिस और प्रशासन सब कुछ जानकर भी वीआईपी की सेवा सत्कार में लगा रहता है। यह स्थिति काफी चिंताजनक है।
अब एक खबर आई है उत्तरप्रदेश से। यहां हाईकोर्ट ने वीआईपी को दी जाने वाली सुविधा पर कड़ा एतराज जताया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वीआईपी शहरों को 24 घंटे बिजली देेने के एक मामले की सुनवाई करते हुए अफसरों को लताड़ लगाई है और कहा है कि वे इस संबंध में कोर्ट में 20 सितम्बर तक हलफनामा प्रस्तुत करे। इस संबंध में एक मामला दायर किया गया था जिस पर सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश किए गए रोस्टर में कहा गया कि प्रदेश के छह जिले ऐसे हैं जहां आए दिन अतिविशिष्ट लोगों का आना होता रहता है इसलिए वहां चौबीसों घंटे बिजली का इंतजाम किया जाता है। बता दें कि उत्तरप्रदेश में बिजली संकट हावी है और कई इलाकों में घंटो बिजली बंद रहती है जबकि प्रदेश के रायबरेली, अमेठी, इटावा, मैनपुरी रामपुर और कन्नौज में चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति की जाती है। इन इलाकों में निर्बाध बिजली आपूर्ति का कारण यह है कि इटावा, मैनपुरी और कन्नौज मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उनके पिता मुलायम सिंह यादव और सांसद पत्नी डिंपल यादव का क्षेत्र है जबकि रामपुर को प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री आजम खान के कारण वीआईपी दर्जा मिला हुआ है। अमेठी और रायबरेली सोनिया गांधी और राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण वीआईपी सुविधा भोग रहे हैं। इस असमानता को लेकर हाईकोर्ट में मामला दायर किया गया था।
वीआईपी के नाम पर अलग तरह की सुविधा, वीआईपी के लिए आम आदमी को परेशान करने का काम निरंतर जारी है और कोर्ट की सख्ती के बाद भी इस पर कहीं कोई रोक, बंदिश नहीं लगाई जा रही है जो एक तरह से न्यायालय की अवमानना है और इस तरह की अवमानना तकरीबन हर दिन हो रहा है। पर अफसोस कि कानून का पालन करने और कराने वाले लोग सब कुछ देखकर भी आंखों पर पट्टी बांधे बैठे हैं।