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12 नवंबर 2014

यहां जिंदगी सस्‍ती है....



वो गए तो इस उम्‍मीद में थे कि परिवार और न बढे... ! पर डाक्‍टरों ने ऐसा कारनामा कर डाला कि परिवार कम हो गया.... ! ! अनाथ हो गया..... ! ! ! उसका कोई भी नाम हो सकता है, नाम मायने नहीं रखता... ! ! ! ! मायने यह रखता है कि वह गरीब थी और उसकी गरीबी की तरह ही उसकी जान भी सस्‍ती थी.... ! ! ! ! ! जान सस्‍ती थी इसीलिए तो करीब ढाई-तीन घंटों में उस जैसी 83 लोगों का आपरेशन कर दिया गया... ! ! ! ! ! ! एक ही सुई से कई लोगों को टांके लगा दिए गए... ! ! ! ! ! ! ! बिना यह देखे-परखे कि ऑपरेशन थियेटर बै‍क्‍टेरिया मुक्‍त है, या नहीं, जान ले ली गई 13 ऐसी मांओं की जो अपने कुनबे को और न बढाने की मंशा लेकर आई थीं... ! ! ! ! ! ! ! सरकार के राष्‍ट्रीय मिशन में सहभागिता निभाने आई थीं... ! ! ! ! ! ! ! !
छत्‍तीसगढ के बिलासपुर से महज दस किलोमीटर दूर कानन पेंडारी से लगे गांव सकरी में एक निजी अस्‍पताल नेमीचंद अस्‍पताल में सरकारी नसबंदी शिशिर में ऑपरेशन में की गई लापरवाही से 13 महिलाओं की मौत हो गई और 25 से ज्‍यादा महिलाएं गंभीर हैं। इस अस्‍पताल में कुछ ही घंटों में 83 महिलाओं का नसबंदी का ऑपरेशन कर दिया गया और ऑपरेशन से लेकर तमाम प्रक्रिया में इतनी लापरवाही बरती गई कि मौत का यह आंकडा सामने आ गया। मुख्‍यमंत्री ने खुद मौके का मुआयना किया और प्रधानमंत्री ने विदेश दौरे में रहते हुए मुख्‍यमंत्री से फोन पर बात की और मामले में कडी कार्रवाई करने कहा। केन्‍द्र का एक दल छत्‍तीसगढ में जांच के लिए भी आ रहा है। इस घटना से जुडे तमाम पहलुओं को लेकर आज के अखबार रंगे हुए हैं और आगे भी खबरें मीडिया में आएंगी लेकिन सबसे बडा मुद्दा यह है कि क्‍या यह पहली घटना है और क्‍या कोई गारंटी देगा कि यह आखिरी घटना होगी।
छत्‍तीसगढ का इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पडा है। अकेले स्‍वास्‍थ्‍य के क्षेत्र की बात करें तो मोतियाबिंद का आपरेशन कराकर फिर से बेहतर तरीके से देख पाने की उम्‍मीद पाले लोग ‘’अंधे’’ हो जाते हैं.... ! गर्भाशय निकाले जाने की घटना हो जाती है...! ! अस्‍पतालों में पीलिया से मौतें होती हैं... ! ! ! मलेरिया से मौत का आंकडा रूक नहीं रहा और इन सबके बीच प्रदेश के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री इसी बात पर ठहाके लगाते हैं कि उन्‍होंने रिकार्ड समय में प्रदेश में मेडिकल कॉलेज खुलवाने का ‘’कारनामा’’ कर दिया! मुख्‍यमंत्री उस वक्‍त तो स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का पीठ थपथपाते हैं जब प्रदेश में मेडिकल कॉलेज खुल जाते हैं, यह जानते हुए भी कि इसके पीछे अफसरों की मेहनत हो सकती है.... लेकिन जब सरकारी नसबंदी शिविर में महिलाओं की मौतें होती हैं तब मुख्‍यमंत्री तर्क देते हैं कि स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री का दोष नहीं... वे डाक्‍टर नहीं, उनने ऑपरेशन नहीं किया..... ! ! ! ! मुख्‍यमंत्री को जवाब देना होगा कि जब सब कुछ अफसर करते हैं तो किसी मसले पर अव्‍वल होने पर दिल्‍ली में इनाम लेते दांत निपोरते वो और उनके मंत्री क्‍यों नजर आते हैं?????
निलंबन.... जांच के लिए कमेटी.... ये दो हथियार सरकार ऐसे मौकों पर खूब इस्तेमाल करती है, जब कहीं मामला गरमा जाए और लोगों का आक्रोश सामने आए.... पर इन हथियारों का क्‍या होता है, ये किसी से छिपा नहीं.... ऐसे एक नहीं दर्जनों और हो सकता है कि कई दर्जनों मामले हैं, जिनमें जांच का कहीं पता नहीं और निलंबित अफसर कब बहाल होकर फिर से अपने ‘’काले कारनामे’’ को अंजाम देना शुरू कर देता है... ! ! इसी कडी में एक नया हथियार जुड गया है एफआईआर करने का.... यह भी सिर्फ दिखावे की तरह है। एफआईआर हो भी जाए और जेल भी भेज दिया जाए तो दिक्‍कत नहीं.... ये छत्‍तीसगढ है... मामला ठंडा होते ही सब कुछ सामान्‍य होने में यहां वक्‍त नहीं लगता.... जेल जा चुके अफसर वहां से वापस आकर अपनी नौकरी में फिर से पहुंच जाते हैं, एक नई कई उदाहरण हैं।
बिलासपुर की घटना के बाद सीएम ने अस्‍पताल का दौरा किया, पीडितों से मुलाकात की.... इसकी एक तस्‍वीर सार्वजनिक हुई है, स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री ठहाके लगाते दिख रहे हैं.... शर्म आनी चाहिए उनको, पर नहीं आएगी..... क्‍योंकि उनको मालूम है, मरने वाले गरीब हैं और गरीबों की जिंदगी बडी सस्‍ती है, हां, गरीब की मौत की कीमत जरूर वो लगा सकते हैं और वो लगा दिया है उनके मुखिया ने! !  मरने वालों के परिजनों को चार लाख रूपए और बाकी पीडितों को 50-50 हजार रूपए.... ! ! ! ! ! ! ! बेशर्म सरकार..... ! ! ! ! !