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11 मार्च 2013

शहीद डीएसपी की पत्नी की मांगे...शहादत या फिर लाटरी...!!!!

उत्तर प्रदेश में एक डीएसपी शहीद हुए हैं। ये कहें कि राजनीति का शिकार हुए हैं। उनकी हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता रघुराज सिंह उर्फ राजा भैया के खिलाफ सीबीआई का शिकंजा कसता जा रहा है। दूसरी ओर एक शिंकजा कसता जा रहा है, उत्तरप्रदेश सरकार पर। यह शिकंजा कस रही हैं, शहीद डीएसपी जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद। परवीन आजाद के पति शहीद हुए हैं। उनके पति की शहादत का पूरा सम्मान करते हुए परवीन आजाद के प्रति संवेदना व्यक्त की जा सकती है लेकिन वे जिस तरह से बर्ताव कर रही हैं, जिस तरह से एक एक कर सरकार से अपनी मांगे मनवाने की  जिद कर रही हैं, उससे लगने लगा है कि उनके पति की शहादत के बाद उनकी कोई बंपर लाटरी निकल आई हो! यह स्थिति ठीक नहीं है।
उत्तर प्रदेश के कुंडा के डीएसपी जियाउल हक की पिछले हफ्ते हत्या कर दी गई थी। इस कांड में वहां के ताकतवर मंत्री रघुराज प्रताप सिंह यानि राजा भैया का नाम सामने आया। हंगामा मचने के बाद राजा भैया को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी ओर डीएसपी मर्डर कांड की जांच सीबीआई से कराई जा रही है। उधर अपने पति की शहादत के बाद डीएसपी की पत्नी परवीन आजाद ने जिस तरह से उत्तरप्रदेश सरकार के सामने अपनी मांगों की फेहरिश्त जारी करनी शुरू कर दी है, उसने न सिर्फ विवाद खड़ा कर दिया है, बल्कि कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। कुंडा के डीएसपी जियाउल हक एक इमानदारी पुलिस अधिकारी माने जाते थे और उनकी हत्या की मुख्य वजह भी यही बताई जा रही है लेकिन उनकी पत्नी ने जिस तरह से शहादत के बाद की प्रक्रिया को अपनी मांगोंं से विवादास्पद बनाने का काम किया है, वह न सिर्फ गैरवाजिब लगता है बल्कि यह शहादत के अपमान की तरह भी है।
अव्वल तो डीएसपी की शहादत के बाद उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से पीडि़त परिवार के पांच सदस्यों को नौकरी देने की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में परवीन आजाद ने नौकरी के लिए जो नाम दिए, विवाद वहीं से शुरू हुआ। परवीन ने अपने मायके पक्ष के लोगों के नाम नौकरी के लिए दे दिए जबकि डीएसपी के पिता ने इसका विरोध किया और यह कहा कि बेटा उनका खोया है तो यह अधिकार उनका बनता है। इस पर विवाद थमा नहीं था कि परवीन आजाद ने उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उनको योग्यता के आधार पर दी गई नौकरी को यह कहकर ठुकराने का काम किया कि उनको डीएसपी से नीचे का पद मंजूर नहीं है।
अब परवीन आजाद ने पांच मांगे और सामने रख दी हैं।  यूपी सरकार को अपनी 5 मांगों का खत सौंप परवीन ने कहा है कि हत्याकांड की सीबीआई जांच करने वाले अधिकारी दिल्ली के हों न कि लखनऊ में, क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है। दूसरी मांग ये की गई है कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर रोजाना की जाए। तीसरी मांग ये है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट यूपी के बाहर हो। चौथी मांग ये है कि जो भी सबूत मिलें या मौजूद हैं वो सीधे कोर्ट तक पहुंचें। आखिरी मांग में डीएसपी जियाउल हक की पत्नी ने कहा है कि जांच की जानकारी उन्हें भी दी जाए। इन मांगों को लेकर सीबीआई पशोपेश में है।
डीएसपी की शहादत वास्तव में उनके परिवार के लिए बड़ी क्षति है। खासकर उनकी पत्नी के लिए, लेकिन उनकी पत्नी को अपने पति की शहादत का सम्मान करना चाहिए, न कि अपनी मांगों और बातों से ऐसा कुछ करना चाहिए कि जिससे शहादत का अपमान हो।

10 जनवरी 2013

बंद... जनता की उम्मीदों का बलात्कार!!!


बंद। बेहद आसान तरीका है विरोध जताने का। दिल्ली में गैंगरेप हुआ तो भारत बंद का आव्हान कर दिया गया और जब छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चियों से दुष्कर्म की घटना सामने आई, छत्तीसगढ़ बंद का आव्हान कर दिया गया। अंतर सिर्फ इतना था कि पहले वाला बंद कांग्रेस पार्टी के विरोधियों ने किया था और इस बार के बंद का आव्हान कांग्रेस ने किया। बताने की जरूरत नहीं कि पहली घटना कांग्रेस शासित राज्य में हुई इसलिए विरोधियों ने ऐसा किया और छत्तीसगढ़ में अपनी विरोधी पार्टी के खिलाफ मुद्दों की तलाश में पिछले नौ सालों से भटकती कांग्रेस की झोली में एक मुद्दा आकर गिर गया और उसने मत चूको चौहान की तर्ज पर झट से बंद का आव्हान कर दिया। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस बंद का क्या औचित्य? क्या बंद कर देने से बलात्कार जैसी घटनाएं रूक जाएंगी? क्या बंद  कर देने से कुत्सिक मानसिकता वालों में लाज शर्म लौट आएगी? नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद देश भर में प्रदर्शन के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में दो दर्जन से ज्यादा बलात्कार की घटनाएं हुई थीं। ये आंकड़ा पुलिस रिकार्ड से है, वरना कई मामले तो थाने पहुंचने से पहले ही दम तोड़ चुके होंगे।
बंद। राजनीतिक रोटी सेंकने का एक बेहतरीन तरीका। राजनीतिक दलों को आजकल किसी मुद्दे पर दिल से जुडऩे के बजाय इस तरह के प्रदर्शनों में मजा आता है। जनता से जुड़े मुद्दों पर सार्थक पहल करने के बजाय इस तरह बंद का आयोजन कर राजनीतिक दल भले ही अपनी सक्रियता (?) दिखाने की कोशिश कर लें,  लेकिन हकीकत यह है कि वे ऐसा कर जनता को खुद के साथ जोडऩे का काम नहीं कर सकते। बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र कांकेर जिले के नरहरपुर ब्लाक के एक आदिसासी हॉस्टल में करीब दर्जन भर नाबालिग बच्चियों से वहीं का चौकीदार महीनों दुष्कर्म करता रहता है और इस दुष्कृत्य में उसका बराबर का हिस्सेदार एक शिक्षाकर्मी रहता है। बच्चियां भी प्रायमरी स्कूल में पढऩे वाली। ... और जब मामले का खुलासा होता है, तीसरे ही दिन चौकीदार और शिक्षाकर्मी को गिरफ्तार कर लिया जाता है, फिर बंद का औचित्य क्या? दिल्ली के मामले में भी ऐसा ही कुछ था। आरोपी तत्काल गिरफ्तार कर लिए गए थे। उनके खिलाफ धाराएं तय की जा चुकी थीं। फिर उस मुद्दे को लेकर भी इस तरह प्रदर्शन का औचित्य नहीं था। बंद का औचित्य नहीं था। छत्तीसगढ़ के इस मसले पर कांग्रेस ने बंद का आव्हान राज्य सरकार पर इस आरोप के साथ किया था कि प्रदेश में कानून व्यवस्था चौपट हो गई है। जहां तक हमारा मानना है, इस मामले में आदिवासी क्षेत्रों में आश्रम शालाओं में आदिवासी बच्चियों की सुरक्षा में लापरवाही की बात की जा सकती है, लेकिन कानून व्यवस्था चौपट होने की बात करना ठीक नहीं।
बंद। ... और फिर क्या इस तरह बंद कर जनता को अपने साथ जोड़ा जा सकता है? कांग्रेस ने तो ऐसा ही कुछ सोचा होगा लेकिन वह अपने इस मकसद में कामयाब नहीं हो पाई। लोग और दूकानदार उससे ज्यादा समझदार निकले और उसकी लाख कोशिशों के बाद भी बंद का कोई खास असर नहीं देखा गया। लोग यह बात समझ गए कि बंद कर देने से इस तरह की घटनाएं नहीं रोकी जा सकतीं। हाँ, एक राजनीतिक दल की रोटियां जरूर इससे सेंकी जा सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हमें एक भी ऐसा मामला नजर नहीं आया लोगों ने स्वस्फूर्त  होकर बंद किया हो। कांग्रेस के लोग घूमते रहे, खुली दूकानों का शटर खुद बंद कर करते रहे। कांग्रेसियों के हुजूम के जाने के बाद फिर कारोबार शुरू।
बंद। आखिर क्यों? बंद से क्या होने वाला है? ऐसे बंद किसी समस्या का हल नहीं होते। अलबत्ता ये मुसीबत का सबब जरूर  बनते हैं। उनके लिए, जो हर दिन कमाते हैं, हर दिन खाते हैं। उनके लिए जिनकी दो वक्त की रोटी बंद की भेंट चढ़ जाती है और उनके घरों में चूल्हे तक नहीं जल पाते। पर इतना दूर तक सोचने की जरूरत किसे है? सब के सब सेंक रहे हैं अपनी राजनीतिक रोटियां... और कर रहे हैं हर वक्त जनता की उम्मीदों का बलात्कार....!!!!

14 सितंबर 2012

सिर्फ महंगाई का बढना नहीं है यह.....

 सरकार ने आखिरकार डीजल के दाम बढ़ा दिए। संभवत: मई 2011 के बाद पहली बार डीजल के दाम बढे हैं। एक मुश्त पांच रूपए। इससे पहले पेट्रोल के दाम लगातार बढ़ते रहे हैं। इस सरकार के काबिज होने के बाद से करीब 13 दफा। रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में भी परिवर्तन हुआ है लेकिन उपभोक्ता पर तब ज्यादा भार पड़ेगा जब वह साल भर में छह से ज्यादा सिलेंडर उपयोग करे। छह सिलेंडर तक वही पुरानी कीमत यानि 420 रूपए चुकानी पड़ेगी और इसके बाद के सिलेंडर के लिए 747 रूपए देने होंगे। ये दोनों है तो वैसे महंगाई बढऩे की खबरें। सामान्य तौर पर यही चर्चा की जा रही है और इसी बात को लेकर सरकार को कोसने का काम हो रहा है, पर पिछले दिनों आई एक खबर को इस खबर के साथ जोड़कर हम देख रहे हैं और यह एक तरह से भारतीय संस्कृति, भारतीयता की ताकत पर हमले की तरह है।
कुछ दिनों पहले खबर आई थी कि भारत सरकार का महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय इस बात पर विचार कर रहा है कि महिलाओं को अपने पति की कमाई में से एक हिस्सा हर माह मिले। यानि कि पति अपनी कमाई से दस या बीस फीसदी पत्नी को दे। अब तक होता यह आया है कि (जैसा कि हर भारतीय परिवार में परंपरा है) पति अपनी पूरी पगार सीधे अपनी पत्नी के हाथों में दे देता है और पत्नी घर का खर्चा चलाती है लेकिन सरकार पत्नियों को घर की मालकिन से सीधे कर्मचारी बनाने पर विचार कर रही है। इस मंत्रालय के प्रस्ताव में भी ऐसा ही जिक्र है कि पति अपनी पत्नियों को परिवार के लिए किए कामों की कीमत दे। सरकार का तर्क है कि यह प्रस्ताव महिलाओं को, गृहणियों को आर्थिक रूप से मजबूत करेगा लेकिन हमारा सोचना है कि ऐसा कर सरकार एक पत्नी, जिसे भारतीय परंपरा में अर्धांगिनी कहा जाता है, को महज वेतन के लिए परिवार के लोगों का ख्याल रखने वाला बनाना चाहती है।
अब रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में फेरबदल पर बात की जाए तो यह भी संयुक्त परिवार पर हमले की तरह है। एक साल में छह सिलेंडर से उन घरों में आसानी से काम निकल सकता है जो संयुक्त परिवार से अलग रहते हैं। पति, पत्नी और एक या दो बच्चों वाले परिवार में एक सिलेंडर डेढ़ से दो महीने आसानी से चल जाता है यानि इस परिवार के लिए साल में छह सब्सिडी वाले सिलेंडर पर्याप्त हैं। पर संयुक्त परिवार जहां माता पिता, एक से ज्यादा भाईयों का परिवार एक साथ रहता है, वहां एक सिलेंडर महीने भर या पखवाड़ा भर चल जाए तो बड़ी बात है। यानि कि यहां चौथे महीने के बाद ही सिलेंडर 747 रूपए में लेने पड़ेंगे। इससे बचने ये परिवार कागजों में खुद को अलग दिखाएंगे और अलग अगल भाई अलग अलग रसोई दर्शाकर सिलेंडर लेंगे। कुछ रूपए बचाने कागजों में अलग हुआ संयुक्त परिवार आने वाले वक्त में दिल से भी जुदा हो जाए तो आश्चर्य नहीं।
मेरा मानना है कि सरकार ने पेट्रोल, डीजल, रसाई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी कर आम आदमी को तो महंगाई की आग में झुलसाने का काम किया ही है, इस बहाने भारतीय परंपरा, भारतीय संस्कृति को भी चोट करने का काम किया गया है, जिसका असर आने वाले समय में दिखेगा। सरकार को यदि घाटे की ही चिंता है तो उसे सब्सिडी का खेल बंद कर देना चाहिए और पहला सिलेंडर ही सीधे 747 रूपए में मिले, यह आदेश जारी करना चाहिए, इससे उसकी नीयत में खोट भी नहीं नजर आएगी और भेदभाव का भाव भी लोगों में नहीं रहेगा। वरना संयुक्त परिवार और आदर्श व्यवस्था की जो मिसाल भारत में मौजूदा समय में है, वह सिर्फ किताबों में दर्ज हो जाएगी और इसके लिए इतिहास इस सरकार को कभी माफ नहीं करेगा। 

07 सितंबर 2012

अंडरएचीवर... रोबोट... भ्रष्टों का सरदार

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लगातार मुसीबत में  नजर आ रहे हैं। एक तरफ संसद में लगातार उनके इस्तीफे की मांग को लेकर कामकाज ठप किया जा रहा है तो दूसरी ओर उनको मीडिया में कोसने का सिलसिला जारी है। इसकी शुरूआत सोशल मीडिया से हुई है। फेसबुक हो या ट्विटर या किसी और प्रकार का सोशल मीडिया हो, हर  जगह प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह छाए हुए हैं, पर अच्छी वजह से नहीं, हर कोई उनको अपने स्तर पर 'निपटाने' में लगा हुआ है। सोशल मीडिया में प्रधानमंत्री की बन रही 'खलनायकी' और 'रोबोट' वाली छवि को रोकने की सरकारी कोशिशें बेकार ही साबित हो रही हैं और सोशल मीडिया पर तमाम तरह की बंदिशों के बाद भी इस पर सबसे ज्यादा कोई छाया है तो वो मनमोहन सिंह ही हैं।
और अब तो विदेशी मीडिया ने भी प्रधानमंत्री की मौजूदगी को लेकर सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया है।  कुछ समय पहले टाईम मैग्जिन ने प्रधानमंत्री को 'अंडर एचीवर' करार दिया था। उस पत्रिका के मुताबिक प्रधानमंत्री का प्रदर्शन उम्मीद से कम है। अब न्यूयार्क से प्रकाशित होने वाले वांशिगटन पोस्ट ने लिखा है कि मनमोहन सिंह भ्रष्ट सरकार के मुखिया हैं और भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में वे पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। इस अखबार ने साफ तौर पर लिखा है कि मनमोहन सिंह की साख जिस तरह गिर रही है, वह उन्हें इतिहास में एक असफल प्रधानमंत्री के तौर पर दर्ज कर रही है। अखबार के मुताबिक मनमोहन सिंह की छवि उनके दूसरे कार्यकाल में सबसे ज्यादा गिरी है। इस दौरान देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई और एक अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होते हुए भी देश आर्थिक मामलों में काफी नीचे गिरता चला गया। भ्रष्टाचार के लगातार खुलासों ने इमानदार  कहे जाने वाले प्रधानमंत्री के नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया और इस धारणा को बल दिया कि मनमोहन सिंह एक भ्रष्ट सरकार के मुखिया हैं।
वाशिंगटन पोस्ट की इस रिपोर्ट पर कांग्रेस के कुछ मंत्रियों ने नाराजगी जाहिर की है और कुछ ने इस पर आपत्ति भी उठाई है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इस पर सवाल खड़ा किया है लेकिन इसमें ऐसा कुछ नया नहीं है, जिस पर आश्चर्य जताया जाए। या ऐसा कुछ भी नहीं है जो नया खुलासा कर रहा हो। वाशिंगटन पोस्ट एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र है और उसने काफी अध्ययन के बाद इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया होगा, लेकिन भारत का हर आम आदमी इस बात को अच्छी तरह समझता है और इसे सोशल मीडिया में समय समय पर अभिव्यक्त भी करता रहा है।
प्रधानमंत्री यदि इमानदार भी हैं तो ऐसी इमानदारी का कोई औचित्य नहीं कि उनके नाक के नीचे सब के सब भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार करते रहे और वह अपनी इमानदार छवि के साथ उनका बचाव  करता रहे। कांग्रेस के लिए यह मजबूरी हो सकती है कि उसे एक साफ सुथरी छवि के व्यक्ति की जरूरत हो पर मनमोहन सिंह के लिए यह  कतई जरूरी नहीं कि वह तमाम तरह के घोटालों के मामलों के खुलासे के बाद भी पद पर बने रहें और अपने आसपास के काले कारनामों पर परदा डालते रहें। प्रधानमंत्री को तुरंत अपना पद छोड़ देना चाहिए और जनता को बताना चाहिए कि वे उन कृत्यों का हिस्सा नहीं हैं, जो उनकी सरकार ने किया है, वरना मनमोहन सिंह का नाम जब भी लिया या लिखा जाएगा उसके साथ रोबोट, अंडर एचीवर और भ्रष्टों के सरदार के तौर पर ही लिखा जाएगा।

15 मई 2012

सवाल ही सवाल???



...और नक्सली घटनाएं हो रहीं हैं। एक तरफ सरकार नक्सलियों से बात करने का दावा कर रही है। सरकार की बनाई हाईपावर कमेटी नक्सलियों की रिहाई के रास्ते तलाश करने में जुटी है तो दूसरी ओर नक्सली बुलेट का साथ छोड़ ही नहीं रहे हैं। रविवार को मदर्स डे था। मदर्स डे के दिन कई मांओं की गोदें सूनी हो गईं। ये कैसी बातचीत है? ये कैसी शांति है?
छत्तीसगढ़ किस दिशा में जा रहा है। नक्सली एक कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं। पूरा प्रदेश, पूरा देश हिल जाता है। सरकार नक्सलियों के सामने गिड़गिड़ाती नजर आती है।  करीब पखवाड़े भर हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता है।  दिगर जगहों से आयातित कर वार्ताकार बुलाए जाते हैं। ये वार्ताकार नक्सलियों की मांद तक पहुंच जाते हैं। सरकार नहीं पहुंच पाती। सरकार के सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते। आम आदमी जानना चाहता है आखिर छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार है?
क्या आम छत्तीसगढिय़ा ये मान ले कि उसे दो सरकारें मिली हैं। एक सरकार जो बैलेट के माध्यम से आई है और दूसरी सरकार जो बुलेट से चल रही है। बस्तर के कुछ इलाकों में बैलेट के जरिए आने वाली सरकार मेमने की तरह होती है। जंगल में शेर की तरह यहां का राजा बुलेट के जरिए सरकार चलाता है। संघ के समय से भगवा पार्टी में रहे और अब भाजपा से किनारा कर चुके एक नेता व्यंग्य करते हैं कि बस्तर में नक्सली हमले के बाद मुख्यमंत्री आवास की दीवारें कुछ इंच ऊंची कर दी जाती हैं! मुख्यमंत्री और उनके सिपहसलार इस व्यंग्य पर खामोश क्यों हैं?
बड़ी खामोशी से नक्सली एक सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता की हत्या कर देते हैं। पहले उसका अपहरण करते हैं। फिर जन अदालत लगाते हैं।  उसी सुकमा में जहां हाईप्रोफाइल ड्रामा खेला गया था। न कहीं कोई मोमबत्ती जलती है। न कहीं कोई रैली निकलती है। जी हरगोपाल, ब्रम्हदेव शर्मा, निर्मला बुच और सुयोग्य मिश्र भी नजर नहीं आते। सब अपने घरों में इस गरमी के मौसम में एयरकंडीशंड कमरों में आराम कर रहे होते हैं। पुनेम पोदिया एक आम इंसान था। कोई आईएएस थोड़ी था  जिसके लिए ये लोग धूप में जंगल की खाक छानते। मीडिया को भी पूनेम पोदिया कोई टीआरपी नहीं देता! इसलिए मीडिया भी आराम के मूड में थी। जाहिर है, एक आईएएस के अपहरण और रिहाई के बीच मीडिया को एक सुपर टीआरपीमामला मिल गया था, जब तक यह चला भुनाते रहे सब! खत्म हुआ तो सब लौट गए अपने ठिएं में, मानो कुछ दिन की पिकनिक मन गई! मीडिया के लिए यह रोमांचक कव्हरेज था लेकिन शायद ही कोई समझ सकता है कि बस्तर के लोगों के लिए उनका रोमांच हर दिन के जीने मरने जैसा है। बात हो रही थी, पुनेम पोदिया की। बेचारा फरवरी महीने से नक्सलियों के चंगुल में था। इस बीच के ड्रामे में  इसका कहीं नाम नहीं आया। इसका यही हाल होना था। हो गया। मारा गया। उधर एक के बाद एक नक्सलियों की रिहाई की कोशिशें हो रही हैं। नक्सली वारदात पर वारदात कर रहे हैं। सरकार शहीदों के शवों के लिए तिरंगे का आर्डर देने में ही लगी है! क्या उसका जमीर नहीं जगता?
बैलाडीला में जो सात जवान मारे गए, वो कौन थे? आम सिपाही। एक एएसआई गोलियों से भून दिया गया। उनकी मौत का किस पर असर पड़ा है। उन जवानों की मां, बहन, बच्चे, पिता पर। नक्सलियों से बातचीत चल रही है। रिहाई के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में इनका जाना क्या सरकार की कमजोरी और नक्सलियों की दादागिरी नहीं है? हर हादसे के बाद हादसे की निंदा का रटा-रटाया बयान जारी कर प्रदेश के मुखिया क्या अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? क्या उनकी घटना की निंदा कर देने से जवान जिंदा लौट आ सकते हैं?
कब तक? आखिर कब तक? इस तरह की नक्सल वारदातें कब तक छत्तीसगढ़ को रूलाती रहेंगी? कब तक मांओं की गोदें सूनी होते रहेंगी? कब तक बहनें अपने भाईयों की कलाई के लिए तरसेंगी? कब तक एक पिता अपने बेटे की लाश को कांधे पर ढोने मजबूर होता रहेगा? कब तक कोई अबोध बच्चा अपने पिता के शव के आसपास लोगों को रोते देखते हुए सहमा सा रहेगा? कब तक हम इस तरह के हादसे के बाद अफसोस जाहिर  कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएंगे? क्या खून नहीं खौलता हमारा? या फिर इंतजार उस दिन का है जब हर घर में एक शहीद हो? क्या सरकार को शर्म नहीं आती? क्या सारे सवालों का जवाब किसी के पास है?????????

08 मई 2012

...वरना नहीं मिलेगी माफी!


बारह साल। ढाई बार पीएससी परीक्षा! वह भी अधर में! छत्तीसगढ़ में सरकार की नाकामी का यह बड़ा उदाहरण है। साथ ही यह बताने के लिए भी काफी है कि यहां के युवाओं के लिए, बेरोजगारों के लिए सरकार कितनी सजग है। बड़ी-बड़ी बातें करने, रोजगार का अवसर सृजित करने का दावा अपनी जगह है लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार की कार्यप्रणाली इसी बात से साबित हो जाती है कि पीएससी जैसी संवैधानिक संस्था को सुचारू रूप से चलाया नहीं जा सक रहा है। ...और विपक्ष, वह भी इस गंभीर मामले को सामने में कमजोर साबित हो रहा है। 
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 315 कहता है कि अखिल भारतीय सेवाओं में भर्ती के लिए संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सेवाओं में भर्ती के लिए राज्य लोक सेवा आयोग काम करता है। वर्ग एक के पद संघ लोक सेवा आयोग और वर्ग दो-तीन के पद राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से भरे जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका पालन ही नहीं हो रहा है और राज्य सरकार की इस नाकामी का खामियाजा राज्य के लाखों युवाओं को भुगतना पड़ रहा है। राज्य लोक सेवा आयोग एक संवैधानिक निकाय है और इस निकाय का सही ढंग से काम न करना राज्य सरकार के होने पर ही सवालिया निशान है! दुख की बात तो यह है कि इस मामले में विपक्ष भी नकारा साबित हो रहा है।  विपक्ष अपनी रोटी सेंकने में लगा है और सत्ता में बैठे लोग न जाने किस गलतफहमी में जी रहे हैं!
छत्तीसगढ़ राज्य को बने 12 साल हो गए। वर्ष 2000 में यह राज्य अस्तित्व में आया और इसके बाद पहली बार पीएससी की परीक्षा हुई 2003 में। बड़ी मुश्किल से इस परीक्षा में चयनित उम्मीदवारों की भर्ती हो पाई। उन पर भी तलवार लटकी हुई है। भर्ती में गड़बड़ी की शिकायतें हुईं और मामला हाईकोर्ट में है। राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले की जांच की है और जांच रिपोर्ट राज्यपाल के समक्ष पेश की जा चुकी है। इस ब्यूरो के सूत्रों की मानें तो जांच रिपोर्ट के आधार पर पचास से ज्यादा लोगों के पद बदल जाएंगे और कई को तो नौकरी से भी हाथ धोना पड़ जाएगा। दोष उन उम्मीदवारों का नहीं, आयोग का है, सरकार का है, जिसने परीक्षा लेने में, इसका परिणाम निकालने में गड़बड़ी की, लेकिन भविष्य अधर में उनका है जो इस परीक्षा के माध्यम से भविष्य संवारने का सपना देख रहे थे!
दूसरी बार परीक्षा हुई 2005 में। इसकी प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा भी जैसे-तैसे निपटी और भर्ती प्रक्रिया भी पूरी हो गई लेकिन इस पर भी विवाद बना हुआ है। हां, इतनी राहत की बात जरूर है कि इस बार के चयनित उम्मीदवारों पर न्यायालय या जांच की तलवार नहीं लटकी है।
तीसरी बार परीक्षा 2008 में हुई। भर्ती में आरक्षण नियमों में का पालन नहीं होने को लेकर बवाल मचा और मामला न्यायालय में जा पहुंचा। बड़ी मुश्किल से चार साल बाद 2012 में इसकी मुख्य परीक्षा आयोजित हुई। रिजल्ट नहीं आया है और मामला सुप्रीम कोर्ट में जा पहुंचा है। राज्य की पीएससी ने इस परीक्षा में प्रारंभिक परीक्षा में ही आरक्षण के आधार पर परिणाम  जारी कर दिया, जबकि नियम कहता है कि है  एक से अधिक चरणों में होने वाली परीक्षाओं में आरक्षण नियमों का पालन अंतिम चरण की परीक्षा में किया जाना चाहिए।  इस तरह पीएससी में आरक्षण का नियम मुख्य परीक्षा में ही लागू होना चाहिए था। इस आधार पर मुख्य परीक्षा के परिणाम पर रोक का मामला सुप्रीम कोर्ट में है और इस पर क्या फैसला आएगा यह फिलहाल तय नहीं है। हालांकि बात यहां यह भी हो रही है कि मुख्य परीक्षा निरस्त होगी और नई चयन सूची के आधार पर फिर से मुख्य परीक्षा होगी। यानि यहां भी उम्मीदवारों से छल!
चौथी बार  परीक्षा 2012 में यानि इसी महीने की छह तारीख को हुई है। इस परीक्षा को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। आरोप लग रहे हैं कि छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों को वंचित करने का षडय़ंत्र रचा जा रहा है। उत्तरप्रदेश की भाषाशैली का प्रश्र पूछा गया है और वहां के ऐसे प्रश्र पूछे गए हैं जिनका जवाब वहां के उम्मीदवारों के लिए सरल और  छत्तीसगढ़ के उम्मीदवारों के लिए काफी कठिन हैं। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के ऐसे सवाल जिनका जवाब हर कोई दे सकता है।
छत्तीसगढ़ में जब पहली बार पीएससी की परीक्षा आयोजित हुई थी तो उस दौरान एक नियम पुस्तिका राज्य लोक सेवा आयोग ने जारी की थी, जिसमें स्पष्ट तौर पर उल्लेख था कि पीएससी की परीक्षा हर साल आयोजित होगी, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। पड़ौसी राज्य मध्यप्रदेश जिससे अलग होकर छत्तीसगढ़ बना है, वहां हर साल यह परीक्षा  आयोजित हो रही है। छत्तीसगढ़ के साथ ही बने झारखंड और उत्त्तराखंड में भी यह परीक्षा सुचारू है। एक छत्तीसगढ़ ही है जहां पीएससी परीक्षा को लेकर पसीने छूट रहे हैं।
सैकड़ों, हजारों पद खाली हैं। राज्य में जिलों की संख्या बढ़ती जा रही है लेकिन सरकार और पीएससी भर्ती ही नहीं कर पा रहा है। यह कमजोरी पीएससी की है। सरकार की है। इसका खामियाजा बेरोजगार भुगत रहे हैं। राज्य सेवा में आने की उम्मीद  लगाए युवा भुगत रहे हैं। रिटायर्ड लोगों को संविदा में लेकर सरकार तो अपना काम कर रही है लेकिन नई पीढ़ी के साथ जो अन्याय हो रहा है, उसका क्या। एक बात गौर करने वाली है कि व्यसायिक परीक्षा  मंडल जैसी संस्था जो संवैधानिक संस्था नहीं है, वह हर साल 50 हजार से एक लाख परीक्षार्थियों को लेकर परीक्षाएं आयोजित कर रहा है और उसका परिणाम भी समय पर जारी कर रहा है। इसे लेकर कोई विवाद भी नहीं हो रहा है, लेकिन एक संवैधानिक संस्था का छत्तीसगढ़ में इस तरह का हाल..... राज्य की युवा पीढ़ी के भविष्य से खिलवाड़ है। .... और फिर राज्य सरकार विकास के, तरक्की के, बेहतरी के कितने ही दावे कर ले, मौजूदा पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी उसे कभी माफ नहीं करेगी।

03 मई 2012

क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?


सरकार ढोल पीट रही है कि उसने सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन की रिहाई का रास्ता आखिर तय कर लिया। सब कुछ ठीक रहा तो गुरूवार को मेनन सुरक्षित अपने घर भी आ जाएंगे, पर उनका क्या जो गए तो थे नक्सल मोर्चे पर अमन शांति कायम करने की उम्मीद के साथ और घर उनका निर्जीव शरीर लौटा! इस वक्त भी जब सरकार खुशी से फूले नहीं समा रही है, कि उसने कलेक्टर को सुरक्षित लाने में सफलता हासिल कर ली, नक्सलियों ने लाशें बिछाने में देरी नहीं की। क्या जवानों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे मामूली जवान हैं, आईएएस जैसा ओहदा उनके साथ नहीं है? कहां हैं, वे लोग जिन लोगों ने कलेक्टर की रिहाई के लिए कैंडल मार्च किया? रैलियां निकालीं? प्रार्थनाएं कीं? कहां हैं? अफसोस.......!
क्या कर रहे हैं, वे मध्यस्थ जो नक्सलियों का दूत बनकर आए? क्या उन लोगों ने जो मसौदा तैयार किया उसमें ऐसा कुछ था कि कलेक्टर रिहा होना चाहिए, चाहे कुछ भी कीमत लगे? बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं बीडी शर्मा और जी हरगोपाल, सरकारी मेहमान बनकर बैठे हैं सुयोग्य मिश्र और निर्मला बुच। क्या उन लोगों ने ऐसा कुछ ही तय किया था कि कलेक्टर की रिहाई होनी चाहिए, बस! अफसोस.......!
मंगलवार को जब मुख्यमंत्री ने कहा था कि 48 घंटे में कलेक्टर रिहा हो जाएंगे। किसी नक्सली को नहीं छोड़ा जाएगा।  हां, विचाराधीन नक्सली बंदियों को लेकर हाईपावर रिव्यू कमेटी बनाई जाएगी। ... और इस पर जब नक्सलियों के दोनों दूतों ने सहमति जताई थी तो लगा था कि अब नक्सल आतंक से छत्तीसगढ़ को मुक्ति मिल सकती है। एक बेहतर प्रयास हो रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार के इस कदम की हमने सराहना भी की थी, और ऐसा लगा था कि एक नई शुरूआत हो रही है, लेकिन! अफसोस......!
नक्सलियों ने इस सहमति की स्याही भी नहीं सूखी, अपनी औकात दिखा दी है। बस्तर के बचेली के साप्ताहिक बाजार में नक्सलियों की गोली से दो जवानों की मौत हो गई। क्या यही समझौता हुआ था, सरकार और नक्सलियों के दूतों के बीच! क्या समझौता सिर्फ कलेक्टर तक सीमित था? जवानों और आम लोगों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है? अफसोस.....!
सुकमा के अगवा कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन गुरूवार को नक्सली चंगुल से आजाद हो जाएंगे। एक बड़ा सवाल चर्चा में है, कि ऐसा क्या जादू हुआ कि कलेक्टर का अपहरण कर सरकार को बेकफुट पर लाने वाले नक्सली अचानक खुद क्यों बेकफुट पर आ गए? कल तक जो सरकार नक्सलियों के सामने मिमियाती नजर आ रही थी, वह अचानक दहाडऩे कैसे लगी? नक्सलियों ने कलेक्टर का अपहरण कर पहले अपने आठ साथी मांगे, फिर संख्या बढ़कर 17 हुई और फिर 80 के आसपास पहुंची। एक नक्सली भी रिहा नहीं हो रहा है और नक्सली नेता ने एसएमएस कर कहा है कि गुरूवार को वे कलेक्टर को छोड़ रहे हैं! यह चमत्कार कैसे हुआ?
अब जब मेनन रिहा होने वाले हैं और नक्सल वारदातें नहीं थमी हैं, ऐसा लग रहा है, कहीं यह सब सोझी समझी 'स्क्रिप्ट' का हिस्सा तो नहीं! कहीं ऐसा तो नहीं कि नक्सलियों ने किसी बड़े सौदे की प्रत्याशा में कलेक्टर का पहले अपहरण किया और इसी की अगली कड़ी हो कलेक्टर की रिहाई! नक्सली कल जन अदालत लगाएंगे और जन अदालत में कलेक्टर को छोडऩे का फैसला लेंगे... यदि यह खबर सही है तो अभी से कलेक्टर को रिहा करने की बात कैसे आई? फैसला तो जन अदालत में होना है!
बेहतर हो, ऐसा न हो। वरना छत्तीसगढ़ में नासूर बन चुका नक्सलवाद शायद ही कभी थमें। सरकारें  अपने फायदे के लिए नक्सलियों से समझौता करती रहें और इस आग में आम आदिवासी, आम आदमी, आम पुलिस वाला झुलसता रहे तो किसी दिन पूरा छत्तीसगढ़ श्मशान बनकर रह जाएगा और फिर क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?

22 अप्रैल 2012

अगवा हुआ ‘सरकार का चेहरा’

अपह़त कलेक्‍टर मेनन 
छत्तीसगढ़ में अब यही देखना बाकी था। प्रदेश के मुखिया गांव-गांव घूमकर विकास का ढोल पीट रहे हैं। गांव,  गरीब, किसान की बात कर रहे हैं और बात कर रहे हैं कि उनके ‘राज’ में सुशासन आया है। सुरक्षा मिली है, सबको! .... और ऐसे में खबर आती है कि एक कलेक्टर का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया है! गंभीर चिंतन का विषय है कि जिस प्रदेश में कलेक्टर सुरक्षित नहीं, भरी सभा से नक्सली कलेक्टर को उठाकर ले जाएं, उस प्रदेश में आम नागरिकों की सुरक्षा की क्या उम्मीद की जाए। कलेक्टर अगवा हुए हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है और अब बैठकों, चिंतनों से हटकर सरकार को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है, वरना  नक्सली कलेक्टर को सामने रखकर फिर अपनी गैरकानूनी मांगें पूरी करने दबाव डालेंगे।
आत्मप्रशंसा, आत्ममुग्धता में घिरी सरकार के लिए यह अवसर सोचने का है कि उसने प्रदेश की जनता को क्या दिया है? गांव-गांव में फोर्स बिठाने के  बाद भी नक्सली किसी कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं और सरकार को नुमाइंदे देखते रह जाते हैं। कलेक्टर कोई बुधारू, समारू या इसी तरह के नाम वाला कोई आम आदमी नहीं होता। वह जिलों में सरकार का चेहरा होता है और जब सरकार के चेहरे तक नक्सलियों की पहुंच हो सकती है तो फिर आम लोग कितने सुरक्षित हैं, आम नागरिकों की जिंदगी कितनी सस्ती है, एक बड़ा सवाल है।
नक्सल आतंक प्रदेश में सिर चढ़कर बोल रहा है। छत्तीसगढ़ की धरती अब तक हजारों जवानों के खून से रंग चुकी है। तकरीबन हर दिन छत्तीसगढ़ के किसी न किसी हिस्से से नक्सल आतंक की खबरें आती हैं। सरकारी सम्पत्ति को नक्सली नुकसान पहुंचाते हैं। आम लोगों को मारते हैं। पुलिस को निशाना बनाते हैं, पर सरकार है कि वह इस आत्मप्रशंसा से नहीं उबर पा रही है कि उसने ‘राम राज’ लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
‘जब रोम जल रहा था, नीरो बंसी बजा रहा था।’ बड़ा चर्चित वाक्य है और यह वाक्य आज फिर याद आ रहा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री उस वक्त भी गांव-गांव घूम रहे होंगे, जिस वक्त कलेक्टर सुकमा का अपहरण हुआ होगा! मुख्यमंत्री उस वक्त भी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे होंगे, जिस वक्त कलेक्टर को नक्सली उठाकर ले गए होंगे! बड़ी अचंभे की बात है।  नक्सली एक गांव में पहुंचते हैं। वहां किसान सभा चल रही होती है। वो पूछते हैं, कलेक्टर कौन है? और इसके बाद कलेक्टर के गार्डों को गोली मारकर कलेक्टर को उठा ले जाते हैं। गार्ड गरीब थे, उनकी मौत हो जाती है,  पर कलेक्टर नक्सलियों के चंगुल में पड़ जाते हैं। कलेक्टर का अपहरण सिर्फ नक्सलियों की  दहशत फैलाने की  रणनीति नहीं हो सकता, वो कलेक्टर के गार्ड को मारकर या फिर किसी और को मारकर भी अपनी दहशत का अहसास करा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कलेक्टर का अपहरण किया। अब शुरू होगा, खेल सौदेबाजी का।
शनिवार को दोपहर बाद साढ़े चार बजे के आसपास नक्सलियों ने कलेक्टर का अपहरण किया है, और नक्सली कलेक्टर को  जंगल की ओर ले गए हैं। हाल ही में नक्सली उड़ीसा के एक विधायक को उठाकर ले गए हैं। विधायक झीना हिकाका के अपहरण के बाद नक्सलियों ने अपने साथियों को छुड़ाने की  मांग की। अब ऐसी ही मांग यहां उठेगी। एक-एक नक्सलियों को पकडऩे सुरक्षा बलों को जान से खेलना पड़ता है और पकडऩे के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद किसी नक्सली को सजा मिलती है, ऐसे में किसी का अपहरण कर नक्सली अपने साथियों को छुड़ाने की मांग करते हैं, उसमें कामयाब भी रहते हैं, यह भी चिंता का विषय है। राज्य सरकार के चेहरे को इस बार नक्सलियों ने निशाना बनाया है। सरकार के गिरेबान में झांकने का वक्त है यह, और उसे यह करना चाहिए।

26 फ़रवरी 2012

लाल क्रांति के लिए दो अपने लाल!


‘’हर घर से एक युवक दो या फिर मौत के लिए तैयार हो जाओ......’’ ये फरमान जारी किया है नक्‍सलियों ने और इस फरमान का असर है कि लोग  अपनी  धरती, अपना जन्‍मस्‍थान और अपनी कर्मस्‍थली को छोडकर शरणार्थी बन गए हैं। वैसे तो छत्‍तीसगढ का तकरीबन आधा हिस्‍सा नक्‍सल हिंसा की चपेट में है लेकिन कुछ इलाकों में तो ऐसा लगता है कि नक्‍सलियों की ही सरकार है.....! ऐसा लगता है उन इलाकों में लोकतांत्रित तरीके से काम कर रही सरकार की पहुंच से ज्‍यादा नक्‍सलियों की पहुंच है! ! उन इलाकों में नक्‍सली जो चाहते हैं, कर जाते हैं और इसके बाद सरकार लकीर पीटती नजर आती  है! ! ! लोगों में सरकार पर विश्‍वास से ज्‍यादा नकसलियों का भय है! ! ! ! स्‍िथति देखकर लगता है कि हम जो सुरक्षित हैं, वो इसलिए नहीं कि सुरक्षातंत्र तगडा है, इसलिए कि नक्‍सली कुछ करना नहीं चाहते.... वरना.......!!!!!!! छत्‍तीसगढ में नक्‍सल हिंसा ने उन इलाकों में रहने वाले लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। तकरीबन हर दिन कहीं न कहीं से नक्‍सल आतंक से धरती लाल हो रही है।

ताजा मामला है राजनांदगांव और कवर्धा जिले से जुडा। इस इलाके के नक्‍सल प्रभावित गांव बकरकट्टा का करीब 25 परिवारों वाला गांव कांशीबहरा इस समय वीरान हो गया है। इन 25 परिवारों में करीब 115 सदस्‍य हैं। सबके सब अपना गांव छोड चुके हैं और कवर्धा जिले के वनांचल के गांव  तेंदूटोला में खुले मैदान में शरणार्थी की हैसियत से रह रहे हैं। वजह यह कि नकसलियों ने इस गांव के हर परिवार से एक एक सदस्‍य की मांग अपने संगठन के विस्‍तार के‍ लिए की, वरना अंजाम भुगतने की धमकी दी। नकसलियों के इस फरमान के चलते ग्रामीण अपना बरसो पुराना आशियाना छोड खुले मैदान के नीचे जीवन काटने मजबूर है। तकरीबन दस दिनों से ये ग्रामीण इस हालात में हैं पर प्रशासन की आंख नहीं खुली। प्रशासन जागा आज, जब मीडिया ने इन ग्रामीणों के दर्द को सामने रखा और अब आनन फानन में प्रशासन के नुमाइंदे इन ग्रामीणों के पास पहुंचे और उन्‍हें गांव वापस लौटने कहा, पर ये ग्रामीण किसी कीमत पर वापस गांव नहीं जाना  चा‍हते। 

इस पूरे मामले का सबसे दुर्भाग्‍यजनक पहलू यह है कि राजनांदगांव प्रदेश के मुख्‍यमंत्री का निर्वाचन जिला है और कवर्धा गृह जिला। इसके बाद भी इन ग्रामीणों की सुध लेने के लिए प्रशासन को मीडिया में सुर्खियों बनने तक का  इंतजार करना पडा। एक दुर्भाग्‍यजनक तथ्‍य यह भी कि शुक्रवार को इन पीडित ग्रामीणों का एक दल राजनांदगांव जिला मुख्‍यालय पहुंचा था,  सांसद से मिलने और साथ में मुख्‍यमंत्री से मिलने पर शुक्रवार को सांसद और मुख्‍यमंत्री राजनांदगांव में ही रहते हुए भी इनसे नहीं मिले। दरअसल में ये दोनों एक जलसे में व्‍यस्‍त थे। जलसा था राजनांदगांव में करीब 70 लाख रूपए (विपक्षी पार्टी कांग्रेस के आरोपों की मानें तो करीब तीन करोड रूपए) की लागत से बने एक और सीएम हाऊस में मुख्‍यमंत्री के गृह-प्रवेश का। एक और सौ से ज्‍यादा ग्रामीण अपने आशियाने को छोड भटक रहे थे और दूसरी ओर प्रदेश के मुखिया नए आवास में प्रवेश का जश्‍न मना रहे थे.......!!!!!!! हालांकि सांसद ने यह सफाई जरूर दी कि उन्‍होंने उनके कार्यालय में पहुंचे ग्रामीणों से मिलने के लिए अफसरों को वहां भेजा था, पर वे खुद क्‍यों नहीं मिले ग्रामीणों से ये वो नहीं बता पाए। 

कवर्धा में काम कर रहे पत्रकार साथी सतीश तंबोली से मिली जानकारी के मुता‍बिक खुले मैदान और पेड के नीचे अपना जीवन निर्वाह कर रहे आदिवासी ग्रामीण दरअसल बरसों से नक्‍सलियों के आतंक को सहते आ रहे हैं। अब नक्सलियों ने इन ग्रामीणों के प्रत्येक घर से एक सदस्य  को अपने संगठन में शामिल होने का दबाव बना रहे हैं। इनकी बात नही मानने पर इन्हे प्रताडित कर रहे  हैं और गोली मारकर हत्या करने की बात कह रहे हैं। नक्सलियों के आतंक और धमकी के चलते इन्‍हें अपना आशियाना छोडना पडा। नक्सलियों के डर से ग्रामीणों ने गांव खाली कर दिया है और अपने साथ जरूरी सामान और कुछ आनाज साथ लेकर आये हैं जिनसे उनका गुजारा हो रहा हैसाथ लाया अनाज कुछ दिन ही और चल पाएगा। उसके बाद क्‍या होगा, इस बात की चिंता इन्हे अभी से सता रही है।

नक्सलियों ने स्कूली बच्चों को भी नही बक्शा है। उन्हे अपने साथ चलने को कहा जाता हैमना करने पर इनसे मारपीट की जाती है।  नक्सलियों का खौफ उनके चेहरो पर देखा और जुबान से सुना जा सकता है । बच्चे नक्सली संगठन मे शामिल नहीं होना चाहते, पढाई कर नेक रास्ते में चलना चाहते हैं। नक्सलियों के लगातार परेशान करने के बाद भी यहां के लोगों को वहां के पुलिस से कोई सहायता नही मिल पा रही है। ग्रामीणों की माने तो इन इलाकों में तैनात सुरक्षाकर्मी भी इनका कोई सुध नही लेते। यहां बताना लाजमी होगा कि इस वनांचल क्षेत्र में जंगली जानवर बहुतायत हैं। आये दिन जंगली जानवरों द्वारा यहां के पालतू मवेशियों को अपना आहार बना लिया जाता है।  ऐसे में खुले मैदान में छोटे छोटे बच्चों के साथ इनका जीवन कितना सुरक्षित है इसका अंदाजा लगया जा सकता है। 

दस दिनों बाद जब मीडिया के माध्‍यम से यह खबर सुर्खियों में आया, इसके बाद राजनांदगांव और कवर्धा के प्रशासन की नींद खुली और आनन फानन में कुछ प्रशासनिक नुमाइंदे इन ग्रामीणों के पास पहुंचे पर अब ये ग्रामीण किसी कीमत पर अपने गांव नहीं लौटना चाहते। उनका कहना है कि वे किसी भी तरह किसी और जगह अपनी जिंदगी काट लेंगे पर उस जगह नहीं लौटेंगे जहां उनके सिर में नक्‍सलियों के फरमान की तलवार  लटकी है। क्षेत्र के तहसीलदार स्‍वीकार करते हैं कि ग्रामीण अब कांशीबहरा नहीं जाना चाहते। उन्‍होंने बताया  कि प्रभावित ग्रामीणों में से करीब 40 लोगों को वहां से लाकर साल्‍हेवारा के पंचायत भवन में रखा गया है और उन्‍हें साल्‍हेवारा से लगे कुछ गांवों में बसाने की कोशिश की जाएगी और बाकी लोगों को भी कहीं और बसाने के लिए लाया जाएगा लेकिन ग्रामीण अपने गांव में नहीं लौटना चाहते। तहसीलदार का कहना है कि फिलहाल तो ग्रामीणों की व्‍यवस्‍था कहीं और की जाएगी पर उम्‍मीद है कि समय बीतने के साथ वे अपने गांव लौट जाएंगे।
बहरहाल, नक्‍सलियों के भय के चलते पूरे गांव के गांव के खाली हो जाने का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई इलाकों के ग्रामीण अपना घर छोडकर दूसरी जगह जा चुके हैं। यह अलग बात है कि काफी समय बीतने के बाद वो अपने आशियाने में लौटे भी, पर सरकार, सुरक्षा तंत्र और  लोकतंत्र पर सवालिया निशान छोड जाते हैं इस तरह के वाक्‍ये.....!!!!!!!!!  

11 फ़रवरी 2012

शर्मनाक.....शर्मनाक.... शर्मनाक

कैप्‍टन बाना सिंह‍ जी

गर्व की बात  है... हम उस देश में पैदा हुए, जिस देश की मिट्टी को माथे पर लगाया जाता है। गर्व की बात है..... हम उस देश में पैदा हुएजिस देश के संत महात्‍माओं की सीखों से पूरी दुनिया रौशन है। क्‍या किसी और देश की जमींन को मां का दर्जा मिला हुआ है, इस बात पर भी गर्व है कि हमारी धरती हमारी मां है....। एक मां जिसने हमें जन्‍म दिया और दूसरी मां, हमारी धरती। गर्व करने के और  भी कई कारण है..... पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है, इस देश पर गर्व करने के कारणों पर...... पर!!!!!!
अफसोस भी होता है....! अफसोस होता है, इस देश के कर्णधारों को देखकर! ! उनकी हरकतों को देखकर! ! ! कितनी अजीब बात है....., इस देश के कर्णधारों ने आतंकियों को सरेंडर करने पर आकर्षक ‘पैकेज’  घोषित किए हैं, नक्‍सलियों को आत्‍मसमर्पण करने पर दुनिया भर की सुविधाएं देने की बात की जाती है! न सिर्फ बात की जाती है, ऐसा हो भी रहा है! समर्पण तो दूर जिसने देश के सीने में खंजर मारा उस कसाब को वीवीआईपी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है, अफजल गुरू को अब तक फांसी  पर नहीं लटका पाई सरकार.... और वो, जिन्‍होंने देश की सेवा की वो अपने हक की लडाई लड रहे हैं.... सरकार ने उनकी ओर से मुंह फेर लिया है....... !
आज फेसबुक पर अर्चना चावजी और लिलि कर्मकार जी के माध्‍यम से एक पोस्‍ट पढने में आया...... पोस्‍ट पढने के बाद गर्व कहीं खो गया और एक ही शब्‍द गूंजने लगा... शर्मनाक.... शर्मनाक... शर्मनाक.......
आप भी पढिए ये पोस्‍ट, 

‘’ सियाचिन की अमानवीय परिस्थितियों में अपूर्व पराक्रम दिखाते हुए 1987 में एक पाकिस्तानी चौकी पर कब्जा जमाने वाले "परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बाना सिंह" आज अपने हालात और सरकारी रवैये से बेहद हताश हैं। इस मेडल के लिए मानदेय के रूप में आज भी 166 रुपये की मासिक रकम पाने वाले कैप्टन सिंह बुरी तरह टूट चुके हैं। वह इस बात पर शर्मिंदा हैं कि कभी उन्होंने इस देश की सेवा की।

सालों तक मातृभूमि की नि:स्वार्थ सेवा करने वाले कैप्टन सिंह ने सियाचिन ग्लेशियर में जिस वीरता का परिचय दिया, उसके लिए उन्हें सर्वोच्च वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने पाकिस्तान की सबसे अहम चौकी 'कैद' पर कब्जा जमाया था। बाद में उनके सम्मान में इस चौकी का नाम बदलकर 'बाना पोस्ट' कर दिया गया। परमवीर चक्र के लिए बाना को 166 रुपये मासिक की मानदेय राशि तय की गई, जो आज भी उतनी ही दी जाती है। उन्होंने यह राशि बढ़वाने के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार से कई बार गुजारिश की। इधर-उधर भी हाथ पैर मारे, लेकिन सभी प्रयास बेकार साबित हुए।

उन्होंने कहा, मुझे शर्म आती है कि मैंने अपने देश की सेवा की। सरकार हमारे साथ ऐसा रूखा बर्ताव करती है, मानो हम भिखारी हों। कैप्टन सिंह कहते हैं, जब एक आतंकवादी सरेंडर करता है, तो उसे 2000 रुपये मिलते हैं और मुझे देश की सेवा के बदले 166 रुपये। मैं अपमानित और असहाय महसूस कर रहा हूं। अगर सरकार का रवैया यही रहा, तो मैं परमवीर चक्र लौटा दूंगा।
इससे प्रमाणित होता है कि किस तरह से हमारे देश के रक्षक सरकार की अवहेलना और उपेक्षाओं के शिकार हैँ।
शर्म करो भारत सरकार !!! शर्म करो भारत सरकार !!! शर्म करो भारत सरकार !!!’’

27 अगस्त 2011

ईमानदारी और कर्मठता की नई परिभाषा............!!!!


टेलीविजन में इन दिनों एक ही खबर दिख रही है। ये कह सकते हैं, एक ही खबर बिक रही है। बिक रही है, इसलिए कह रहा हूं कि हमारे देश के न्‍यूज चैनलों को खबरों से उतना ज्‍यादा सरोकार नहीं है, जितना इस बात से कि कौन सी खबर रेटिंग में उसे नम्‍बर एक कर सकती है। हां इस बार यह अच्‍छे के लिए हो रहा है। सारे के सारे न्‍यूज चैनल अन्‍ना अन्‍ना कर रहे  हैं। अच्‍छा है। अन्‍ना के बहाने कम से कम देश की सोई हुई जनता को जगाने का काम किया जा रहा है। और यह काम कर रहे हैं, हमारे देश के न्‍यूज चैनल। अरे भाई न्‍यूज चैनलों को  हमेशा बुरा मत समझो! कभी कभी ये अच्‍छा भी करते हैं। ईमान जगाने का काम  कर रहे हैं। एक करीब 75 साल के ‘युवा’ ने कम से कम वो  काम  कर दिया,  जो बरसों में कोई नहीं कर पाया। सोच सबकी है, ईमानदारी, भ्रष्‍ट्राचार से मुक्ति, स्‍वस्‍थ शासन, स्‍वस्‍थ प्रशासन। पर पहल किसी ने नहीं की। खैर पहल तो हो रही है। अच्‍छी बात है.....
अब आता हूं उस बात पर जिसने मुझे आज यह पोस्‍ट लिखने को प्रेरित किया।  बीती रात मैं टीवी देख देख रहा था। ब्रेक में न्‍यूज चैनल बदला तो  देखा सबमें अन्‍ना की खबरें। कुछ देर खबरों पर ध्‍यान देने के बाद फिर मनोरंजन चैनल में आया तो एक विज्ञापन चल रहा था। विज्ञापन में कुछ  पुलिस वाले एक तेज रफ्तार कार चलाने वाले युवाओं को रोकते हैं। कार का शीशा खुलवाने पर सिपाही उन युवाओं से बात करने की कोशिश करता है और फिर उनके मुंह से शराब की दुर्गंध आने की बात अपने अफसर से कहता है। अफसर उन लडकों को डांटता  इससे पहले वो युवा पांच सौ रूपए का नोट अफसर को थमा देता है। अफसर उस नोट को परखता है कि कहीं नकली तो नहीं और फिर उस युवा को उसका नोट वापस करता है और साथ में चालान की परची थमा देता है। विज्ञापन का पंच लाईन इसके बाद आता है, ‘जियो शान से... क्‍योंकि आप हो असली आफिसर’। और फिर टीवी स्‍क्रीन में आता है आफिसर च्‍वाईस.......... !
अरे ये क्‍या? सरकार ने तो शराब के विज्ञापनों के प्रदर्शन पर तो बैन लगा दिया है ना।  फिर ये शराब का विज्ञापन! ‘नहीं ये शराब का विज्ञापन नहीं है’,  कंपनियों के पास अपने तर्क हैं। वो कह सकते हैं कि ये तो सोडा का विज्ञापन है। यानि....... ! बैगपाईपर का विज्ञापन देख लीजिए, ‘जमेगा रंग जब मिल बैठेंगे तीन यार मैं आप और बैगपाईपर’ .....! एक बियर बनाने वाली कंपनी का पंच लाईन है, ‘जोश है तो हैवर्ड है’ । ये सब क्‍या है...... ! क्‍या सरकार को  ये सब नहीं दिख रहा।
एक तरफ अन्‍ना। भूखे प्‍यासे,  इस देश के भविष्‍य के लिए भोजन त्‍याग कर बैठे हैं और दूसरी ओर कंपनियां इमानदारी और कर्मठता के लिए सोडा के रास्‍ते शराब का विज्ञापन कर रही हैं। और इस पर तुर्रा यह‍ कि शराब पियेंगे तो आपके भीतर कर्मठता, इमानदारी और जोश आएगा..... वाह रे इंडिया................ !!!!!!