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11 जुलाई 2026

कोरकोट्टी

कोरकोट्टी 

सब कुछ भूल सकता हूँ पर ये नाम नहीं भूल सकता कभी।

अविभाजित राजनांदगाँव में घटित ऐसी कोई नक्सल घटना नहीं, जिसके होने के बाद वहाँ न पहुंचा होऊं। संसदीय क्षेत्र की हर नक्सल घटना का कव्हरेज मैंने किया है। कई वीर जवानों की शहादत देखी है। पर कोरकोट्टी??? इस गाँव में 12 जुलाई 2009 को हुए खूनी मंजर का मैं प्रत्यक्ष गवाह हूँ। उस दिन नक्सलियों ने कोरकोट्टी में जो कुछ किया, उसे करीब से देखा है मैंने। प्रत्यक्षदर्शी इसलिए क्योंकि यह घटना होगी, इसका घटना होने के कुछ घंटो पहले तक किसी को अनुमान भी नहीं था। 

12 जुलाई 2009 की तड़के नक्सलियों ने मदनवाडा़ कैम्प के दो जवानों को तब गोली मारी, जब वो शौच के लिए गए थे। इस घटना की खबर मिलने के बाद मैं, मेरे साथी पत्रकार कमलेश सिमनकर और दूरदर्शन के रिपोर्टर भाई परमानंद रजक के पुत्र युवा पत्रकार लोकेश रजक के साथ मानपुर और मदनवाडा़ के लिए रवाना हुआ। तब तक हममें से किसी को नहीं पता था कि मदनवाडा़ में नक्सलियों ने जो किया, वो सिर्फ एक ट्रेलर था, नक्सलियों ने कुछ बडा़ करने की तैयारी कर रखी थी। 12 जुलाई 2009 की उस रविवार की सुबह अपने दो जवानों की शहादत की खबर मिलने के बाद राजनांदगाँव के पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे खुद घटनास्थल के लिए निकले और नक्सलियों ने मानपुर से कुछ ही दूर कोरकोट्टी में राजनांदगाँव जिले के इतिहास का सबसे बडा़ खूनी खेल खेल दिया।

नक्सलियों ने राजनांदगाँव के एसपी विनोद कुमार चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू, उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वट्टी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधान आरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी को अपना निशाना बना लिया और सभी की शहादत हो गई। पुलिस अधीक्षक विनोद कुमार चौबे सहित अधिकांश जवान मानपुर के नजदीक कोरकोट्टी में शहीद हुए थे और उनके शव उसी दिन जिला मुख्यालय ला लिए गए थे। उनके साथ मदनवाडा़ में शहीद हुए सीएएफ भिलाई के दो प्रधान आरक्षकों दुष्यन्त राठौर और सुंदरलाल चौधरी के शव भी उसी दिन ले आया गया जबकि सीतागांव में रोड ओपनिंग में जुटे सीतागांव कैम्प में पदस्थ उप निरीक्षक धनेश साहू और प्रधान आरक्षक गीताराम भंडारी के शव दूसरे दिन लाए जा सके! 

आम तौर पर जून के अंत और जुलाई की शुरूआत से शुरू हो जाने वाला बारिश का दौर उस वर्ष 12 जुलाई तक शांत रहा और एक बूंद पानी नहीं बरसा। और फिर 13 जुलाई को सुबह से बारिश का दौर जो शुरू हुआ तो उसने रूकने का नाम नहीं लिया। उस दिन ऐसा लग रहा था मानों आसमान से बारिश भी बरस कर शहादत को सलाम कर रही हो।
 
शहीद एसपी चौबे और जवानों की शहादत को सलाम करने राजनांदगांव के ठाकुर प्यारेलाल चौक में शहीद एसपी विनोद कुमार चौबे की मूर्ति की स्‍थापना की गई है और शहीद जवानों की नाम पट्टिका लगाई गई है। 


उस घटना को 17 साल हो गए हैं, पर अभी भी लगता है मानों कल की ही बात हो। अब राजनांदगाँव से अलग होकर नए बन चुके जिले मोहला मानपुर अंबागढ़ चौकी के जिस कोरकोट्टी गाँव में जवानों की शहादत हुई थी, उसी कोरकोट्टी गाँव के नाम से मैं अपनी तीसरी किताब "कोरकोट्टी" लेकर आ रहा हूँ और 12 जुलाई 2026 की सुबह शहीद जवानों के परिजनों के हाथों इस किताब का विमोचन होना है।

शहीद जवानों को सलाम।

09 मई 2026

वतन पर जो फिदा होगा अमर वो नौजवां होगा.........


शहीद श्री वीके चौबे और जवान(पूरे जवानों की तस्‍वीरें नहीं मिल पाईं)
नक्‍सलवाद का नासूर। न जाने कितने घरों को तबाह करेगा। कभी किसी मां की गोद सूनी होती है।  कभी किसी की मांग का सिंदूर मिट जाता है। कभी किसी बच्‍चे के सिर से उसके पिता का साया उठ जाता है तो कभी कोई बहन रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी लिए अपने भाई का इंतजार करती रह जाती है। यूं तो नक्‍सल शब्द आया पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्‍सलबाडी से। भाकपा नेता चारू मजूमदार और कानू सान्‍याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। सत्‍ता में परिवर्तन के लिए सशस्‍त्र क्रांति जरूरी है, ऐसे नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी मौजूदा समय में  देश के 9 राज्यों के सामने सीधी चुनौती बनकर सामने है । अब नक्‍सलवाद का चेहरा बदल गया है। सत्‍ता परिवर्तन की इच्‍छा या व्‍यवस्‍था में बदलाव की ख्‍वाहिशें दफ्न हो गई हैं और नक्‍सली लूटेरों और हत्‍यारों के गिरोह में तब्‍दील हो गए हैं।
वैसे तो छत्‍तीसगढ, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, उडीसा, पश्चिम बंगाल,  झारखंड, उत्‍तरप्रदेश और उत्‍तराखंड में नक्‍सलियों  ने कई वारदातों को  अंजाम देकर अपनी दरिंदगी का सबूत दिया है लेकिन एक घटना  है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, उसका जिक्र यहां करूंगा। छत्‍तीसगढ में सबसे बडी वारदात कर नक्‍सलियों ने पुलिस को सीधे चुनौती दी।
12 जुलाई 2009। रविवार का दिन। रविवार होने के कारण देर तक सोने की चाह थी पर सुबह छह बजे फोन की घंटी ने उठा दिया। पहली खबर मिली मानपुर (राजनांदगांव जिले का नक्‍सल प्रभावित इलाका) के मदनवाडा में नक्‍सलियों ने सुरक्षा बल के दो जवानों को गोली मार दी है। सबसे पहले यह खबर अपने चैनल में ब्रेक की। इसके बाद बिस्‍तर से उठा और तैयारी करने लगा मानपुर जाने की। शायद तब तक राजनांदगांव जिले के एसपी श्री वी के चौबे जो एक ऐसे अफसर थे जो किसी भी नक्‍सली वारदात होने पर मौके पर पहुंचकर जवानों की हौसला आफजाई करते थे, मानपुर के लिए कूच कर गए थे। बारिश का मौसम था सो टैक्‍सी काल की। टैक्‍सी आती तब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ। अपने लैपटाप को तैयार किया। कैमरा और बैटरी चेक की।  मोबाईल की बैटरी को देखा।  उस दिन शायद मेरा देर से निकलना लिखा था इसलिए जो टैक्‍सी वाला बुलाने के आधे घंटे में ही हाजिर हो जाता था डेढ घंटे  में पहुंचा। साथ में मैंने अपने सहयोगी को लिया और निकल पडा।  
घर से निकलकर टैक्‍सी में सवार हुआ ही था कि दूसरा फोन आया,  शहीदों का आंकडा  बढ सकता है। मन विचलित हुआ। फिर खबर को  अपडेट किया, चैनल में। सुबह आठ बजे पहला फोनो दिया। फोनो के लिए शहर में  ही रूका, कहीं रास्‍ते में नेटवर्क मिले न मिले। फोनो से निपटकर  जैसे ही गाडी आगे बढी एक और खबर मिली। एसपी श्री वीके चौबे की गाडी पर नक्‍सलियों ने फायरिंग कर दी है लेकिन एसपी नक्‍सलियों की गोलीबारी को पार कर सुरक्षित निकल गए हैं। चिंता और बढी। हम आगे बढते ही रहे। बीच बीच में खबर मिलती रही। इसके बाद सारी खबर अपुष्‍ट ही मिलती रही। सौ किलोमीटर का सफर तय कर मानपुर पहुंचे। मानपुर में पहुंचते ही खबर  मिली कि कुछ जवानों के शव अस्‍पताल में लाए जा चुके हैं। अस्‍पताल पहुंचने पर देखा अफरातफरी का माहौल था। अंदर जाकर देखा तो एक दो नहीं दस बारह जवानों के शव। बिस्‍तर कम था सो जमीन पर ही रख दिये गए थे। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। खबर बडी होती जा रही थी।
करीब 12 बज  गए होंगे। फिर से चैनल में खबर अपडेट की। लैपटाप औ  इवीडीओ की मदद से अब प्रारंभिक विजुअल्‍स भेजने के बाद घटनास्‍थल पर जाने की कोशिश की। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मैं इकलौता पत्रकार था जो वहां पहुंचा था। घटनास्‍थल से कुछ पहले पुलिस के जवानों ने रोक दिया। यह कहकर कि आगे गोली चल रही है न जाएं। पर अपने रिस्‍क में हम आगे बढे। कुछ  दूर जाने के बाद गाडी छोडकर पैदल ही जाना पडा। आगे मिल गए, आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता। उनसे बात करता उससे पहले एक पुलिस वाले ने मुझे गले लगा लिया, यह कहकर कि हर तरफ खून से सराबोर वर्दी..... तुम पहले व्‍यक्ति हो जिसे  देख रहा हूं यहां....  वरना ऐसी ही तस्‍वीरें.... उसने ही मुझे एक संकेत दिया कि शायद एसपी श्री वी के चौबे..........
डेढ बजे होंगे। मैं आगे बढा। जवानों के शव मौके से उठाकर ट्रेक्‍टर में डाले जा रहे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब जो खुद कीचड से लथपथ थे, उन्‍हें देखकर लग रहा था कि जमकर  मुकाबला किया है उन्‍होंने भी नक्‍सलियों का..... लगातार निर्देश दिए जा रहे थे और आर आई  गुरजीत सिंह जवानों के शवों को मौके से उठाकर अस्‍पताल भिजवाने की व्‍यवस्‍था में लगे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब से बात की। उन्‍होंने मौके पर ही बाईट देने में सहमति बताई। करीब 20 मिनट तक वो लगातार बोलते रहे। कहीं कहीं वो रूकते, जिससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था कि कुछ समय पहले ही जिस जगह पर जिस व्‍यक्ति ने नक्‍सलियों से खूनी लडाई लडी हो, इस वक्‍त उसकी मन: स्थिति कैसी रही होगी। खैर वो बोलते रहे।  हमने भी उन्‍हें नहीं टोका।  वो सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम को बयां करते रहे और आखिरी में उन्‍होंने जो कहा, उसने झकझोर कर रख दिया, मुझे याद है उनके वो शब्‍द, ‘नक्‍सलियों ने दोनो ओर से फायरिंग की, हमने भी जमकर मुकाबला किया, नक्‍सलियों को कडा टक्‍कर देते देते  एसपी साहब शहीद हो गए हैं। करीब दो बजे ये लाईनें हमने सुनी। ढाई बजे के आसपास हम वहां से निकले और पांच छह मिनट में ही मानपुर पहुंच गए। जैसे ही नेटवर्क मिला तुरंत चैनल में यह खबर दी। ‘एसपी श्री वी के चौबे शहीद। उनके साथ 29 पुलिस जवान शहीद।’
वो पूरा वाक्‍या अब तक नहीं भूला है मुझे। अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी लाशें एक साथ नहीं देखी मैंने। और जब देखने मिलीं तो जवानों की। करीब दो साल से राजनांदगांव में एसपी रहे श्री वीके चौबे साहब एक ऐसे पुलिस अफसर थे जो आम इंसान की तरह ही रहते थे और उनका दरबार हर वक्‍त आम लोगों के लिए खुला रहता था। अपने मातहतों के लिए उनके मन में जो प्रेम था, उसी प्रेम ने उन्‍हें हर दिल अजीज बनाया था और उसी प्रेम के चलते वो शहीद हो गए।
दरअसल,  मानपुर क्षेत्र का मदनवाडा पहले नक्‍सलियों का गढ हुआ करता था। यहां नक्‍सली अपनी ट्रेनिंग कैम्‍प चलाते थे। इस क्षेत्र में नक्‍सलियों के वजूद को खत्‍म करने के लिए आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता और एसपी श्री वी के चौबे ने मदनवाडा में ही पुलिस कैम्‍प स्‍थापित किया। इससे नक्‍सली बौखला गये। उन्‍होंने एक बडी साजिश तैयार की। 12 जुलाई को सुबह उन्‍होंने सातवीं वाहिनी सीएएफ के दो जवानों को तब गोली मारी जब वो जवान शौच के लिए गए थे। ये नक्‍सलियों की साजिश का हिस्‍सा मात्र था, उनका निशाना कुछ और था। नक्‍सलियों को मालूम था कि यह खबर जिला मुख्‍यालय तक जाएगी और एसपी मौके पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। नक्‍सलियों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी और मानपुर से महज छह किलोमीटर दूर पक्‍की सडक पर बारूदी सुरंग लगा रखा था। एसपी  थे ही ऐसे,  वो अपने मातहतों के पास पहुंचते थे। इस खबर को सुनकर वो निकले..... पर नक्‍सलियों ने रास्‍ते में ही उन्‍हें रोक लिया। एसपी साहब एक बार नक्‍सलियों के चक्रव्‍यूह को भेदते हुए आगे निकल गए थे लेकिन फिर बीच में फंसे अपने जवानों के लिए वो फिर से मौके  पर पहुंचे और फिर दोबारा  वहां से नहीं निकल सके।
इस घटना में एसपी श्री वी के चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू,  उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वटटी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधानआरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी भी शहीद हो गए।
शहीद एसपी श्री चौबे की शहादत को सलाम करने आज राजनांदगांव में उनकी मूर्ति की स्‍थापना की जा रही है। चौबे साहब और शहीद जवानों को सलाम.................

11 मार्च 2013

शहीद डीएसपी की पत्नी की मांगे...शहादत या फिर लाटरी...!!!!

उत्तर प्रदेश में एक डीएसपी शहीद हुए हैं। ये कहें कि राजनीति का शिकार हुए हैं। उनकी हत्या के मामले में उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता रघुराज सिंह उर्फ राजा भैया के खिलाफ सीबीआई का शिकंजा कसता जा रहा है। दूसरी ओर एक शिंकजा कसता जा रहा है, उत्तरप्रदेश सरकार पर। यह शिकंजा कस रही हैं, शहीद डीएसपी जियाउल हक की पत्नी परवीन आजाद। परवीन आजाद के पति शहीद हुए हैं। उनके पति की शहादत का पूरा सम्मान करते हुए परवीन आजाद के प्रति संवेदना व्यक्त की जा सकती है लेकिन वे जिस तरह से बर्ताव कर रही हैं, जिस तरह से एक एक कर सरकार से अपनी मांगे मनवाने की  जिद कर रही हैं, उससे लगने लगा है कि उनके पति की शहादत के बाद उनकी कोई बंपर लाटरी निकल आई हो! यह स्थिति ठीक नहीं है।
उत्तर प्रदेश के कुंडा के डीएसपी जियाउल हक की पिछले हफ्ते हत्या कर दी गई थी। इस कांड में वहां के ताकतवर मंत्री रघुराज प्रताप सिंह यानि राजा भैया का नाम सामने आया। हंगामा मचने के बाद राजा भैया को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। दूसरी ओर डीएसपी मर्डर कांड की जांच सीबीआई से कराई जा रही है। उधर अपने पति की शहादत के बाद डीएसपी की पत्नी परवीन आजाद ने जिस तरह से उत्तरप्रदेश सरकार के सामने अपनी मांगों की फेहरिश्त जारी करनी शुरू कर दी है, उसने न सिर्फ विवाद खड़ा कर दिया है, बल्कि कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। कुंडा के डीएसपी जियाउल हक एक इमानदारी पुलिस अधिकारी माने जाते थे और उनकी हत्या की मुख्य वजह भी यही बताई जा रही है लेकिन उनकी पत्नी ने जिस तरह से शहादत के बाद की प्रक्रिया को अपनी मांगोंं से विवादास्पद बनाने का काम किया है, वह न सिर्फ गैरवाजिब लगता है बल्कि यह शहादत के अपमान की तरह भी है।
अव्वल तो डीएसपी की शहादत के बाद उत्तरप्रदेश सरकार की ओर से पीडि़त परिवार के पांच सदस्यों को नौकरी देने की घोषणा के परिप्रेक्ष्य में परवीन आजाद ने नौकरी के लिए जो नाम दिए, विवाद वहीं से शुरू हुआ। परवीन ने अपने मायके पक्ष के लोगों के नाम नौकरी के लिए दे दिए जबकि डीएसपी के पिता ने इसका विरोध किया और यह कहा कि बेटा उनका खोया है तो यह अधिकार उनका बनता है। इस पर विवाद थमा नहीं था कि परवीन आजाद ने उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उनको योग्यता के आधार पर दी गई नौकरी को यह कहकर ठुकराने का काम किया कि उनको डीएसपी से नीचे का पद मंजूर नहीं है।
अब परवीन आजाद ने पांच मांगे और सामने रख दी हैं।  यूपी सरकार को अपनी 5 मांगों का खत सौंप परवीन ने कहा है कि हत्याकांड की सीबीआई जांच करने वाले अधिकारी दिल्ली के हों न कि लखनऊ में, क्योंकि इससे जांच प्रभावित हो सकती है। दूसरी मांग ये की गई है कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाकर रोजाना की जाए। तीसरी मांग ये है कि फास्ट ट्रैक कोर्ट यूपी के बाहर हो। चौथी मांग ये है कि जो भी सबूत मिलें या मौजूद हैं वो सीधे कोर्ट तक पहुंचें। आखिरी मांग में डीएसपी जियाउल हक की पत्नी ने कहा है कि जांच की जानकारी उन्हें भी दी जाए। इन मांगों को लेकर सीबीआई पशोपेश में है।
डीएसपी की शहादत वास्तव में उनके परिवार के लिए बड़ी क्षति है। खासकर उनकी पत्नी के लिए, लेकिन उनकी पत्नी को अपने पति की शहादत का सम्मान करना चाहिए, न कि अपनी मांगों और बातों से ऐसा कुछ करना चाहिए कि जिससे शहादत का अपमान हो।

13 जनवरी 2013

राष्ट्रीय शर्म है यह!!!

इसे इस देश का दुर्भाग्य कहें या फिर देश में राज करने वाले सत्ताधीशों की नपुंसकता कि किसी समय हमारी दी हुई रोटी पर अपना वर्तमान और भविष्य गढऩे वाला एक पिद्दी सा देश हम पर लगातार हमले करता रहा है और हमारे हुक्मरान सिर्फ बातें ही कर रहे हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह कमीना देश हमारी सीमा पर घुसकर हमारे एक जवान का सिर काटकर अपने साथ ले जाता है, जश्र मनाता रहता है और हमारे मंत्री कोई जवाबी कार्रवाई न करने की बात करते रहते हैं। शर्म से डूब मरने का वक्त है नेताओं केे लिए कि जिस जवान का सिर पाकिस्तानी ले गए हैं, उसके परिजन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं।
पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय सीमा में गोलीबारी करता रहा है। करगिल युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम का समझौता हुआ है, लेकिन पाकिस्तान इसका उल्लंघन किए जा रहा है। दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ रिश्ते निभाने की कवायद हर स्तर पर हो रही है। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी देश में बुलाए जा रहे हैं। तर्क दिया जा रहा है कि खेल के माध्यम से दोनों देशों के बीच रिश्तों में नरमी आएगी। पाकिस्तानी हॉॅकी खिलाडिय़ों को आमंत्रित किया जा रहा है। पाकिस्तानी कलाकारों को भारतीय टीवी चैनलों में आमंत्रित किया जा रहा है। फिल्मों में काम दिया जा रहा है। पाकिस्तान के नेताओं से गले मिलने का काम किया जा रहा है, लेकिन जो गद्दार है, वह गद्दार रहेगा की तर्ज पर पाकिस्तान हर बार पीठ में छुरा भोंकने का काम कर रहा है। ऐसे में ऐसे देश के साथ किसी भी तरह के रिश्ते की बात करना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि देशहित में नहीं है।
पाकिस्तान लगातार भारतीय सैनिकों को उकसाने का काम कर रहा है। हमारे सैनिकों ने यदि उसका जवाब दिया तो वही होगा, जो पहले हो चुका है। 1962, 1971 और 1991 का युद्ध पाकिस्तान को नहीं भूलना चाहिए। उसके घर में घुसकर मारा गया था उसे। सत्ता में काबिज लोगों की कमजोरी सैनिकों को भारी पड़ रही है। सीमा पर गोलीबारी करने वाले दुस्साहसी पाकिस्तान ने पिछले दिनों भारत के क्षेत्र में घुसकर हमारे दो जवानों को मार डाला और दोनों के सिर काट डाले। अमानवीयता की हदें पार करते हुए उसने एक सैनिक का सिर्फ धड़ यहां छोड़ा और सिर अपने साथ ले गया। दो सैनिकों की इस तरह धोखे से की गई हत्या के मामले में पूरा देश उबल रहा है लेकिन राजनीतिक स्तर पर अभी तक पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह के कठोर कदम की बात सत्ता में बैठे लोगों ने नहीं की है। उल्टे देश के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद यह एलान करते हैं कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की इंतकामी कार्रवाई नहीं करेगा। दूसरी ओर अपने दुश्मनों को उसी के देश  में घुसकर मारने वाले अमेरिका ने भारत को सब्र से काम लेने की सलाह दी है। अमेरिका लगातार पाकिस्तान पर ड्रोन हमले कर रहा है और दूसरी ओर भारत को शांति की नसीहत दे रहा है।
हमारे हुक्मरानों को अमेरिका के मुफ्त की सलाह और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का ख्याल रखने के पहले अपने देश की भावनाओं को समझना चाहिए। पूरा देश चाह रहा है कि पाकिस्तान को उसके किए की सजा मिलनी चाहिए और उसे कड़ा जवाब मिलना चाहिए।
इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि हमारे देश की सरहद में शहीद हुए एक जवान के परिजन अपने बेटे की शहादत को सम्मान दिए जाने, उसके आधे शरीर (सिर) को मांगने के लिए भूख हड़ताल पर बैठ जाएं और इस पर सरकारी स्तर पर कोई बात न की जाए। हम कहते हैं कि पाकिस्तान पर फिलहाल जवाबी कार्रवाई न करने का बयान देने वाले नेताओं ने क्या पाकिस्तान से यह बात की है कि उसके सैनिक का कटा हुआ सिर वापस किया जाए। सैनिकों के परिजनों का भूख हड़ताल पर बैठना सिर्फ एक घटना नहीं, राष्ट्रीय शर्म का विषय है।

12 जुलाई 2012

नहीं भूलता वो दिन...

12 जुलाई 2009। रविवार का दिन। रविवार होने के कारण देर तक सोने की चाह थी पर सुबह छह बजे फोन की घंटी ने उठा दिया। पहली खबर मिली मानपुर (राजनांदगांव जिले का नक्‍सल प्रभावित इलाका) के मदनवाडा में नक्‍सलियों ने सुरक्षा बल के दो जवानों को गोली मार दी है। सबसे पहले यह खबर अपने चैनल में ब्रेक की। इसके बाद बिस्‍तर से उठा और तैयारी करने लगा मानपुर जाने की। शायद तब तक राजनांदगांव जिले के एसपी श्री वी के चौबे जो एक ऐसे अफसर थे जो किसी भी नक्‍सली वारदात होने पर मौके पर पहुंचकर जवानों की हौसला आफजाई करते थे, मानपुर के लिए कूच कर गए थे। बारिश का मौसम था सो टैक्‍सी काल की। टैक्‍सी आती तब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ। अपने लैपटाप को तैयार किया। कैमरा और बैटरी चेक की।  मोबाईल की बैटरी को देखा।  उस दिन शायद मेरा देर से निकलना लिखा था इसलिए जो टैक्‍सी वाला बुलाने के आधे घंटे में ही हाजिर हो जाता था डेढ घंटे  में पहुंचा। साथ में मैंने अपने सहयोगी को लिया और निकल पडा।  
घर से निकलकर टैक्‍सी में सवार हुआ ही था कि दूसरा फोन आया,  शहीदों का आंकडा  बढ सकता है। मन विचलित हुआ। फिर खबर को  अपडेट किया, चैनल में। सुबह आठ बजे पहला फोनो दिया। फोनो के लिए शहर में  ही रूका, कहीं रास्‍ते में नेटवर्क मिले न मिले। फोनो से निपटकर  जैसे ही गाडी आगे बढी एक और खबर मिली। एसपी श्री वीके चौबे की गाडी पर नक्‍सलियों ने फायरिंग कर दी है लेकिन एसपी नक्‍सलियों की गोलीबारी को पार कर सुरक्षित निकल गए हैं। चिंता और बढी। हम आगे बढते ही रहे। बीच बीच में खबर मिलती रही। इसके बाद सारी खबर अपुष्‍ट ही मिलती रही। सौ किलोमीटर का सफर तय कर मानपुर पहुंचे। मानपुर में पहुंचते ही खबर  मिली कि कुछ जवानों के शव अस्‍पताल में लाए जा चुके हैं। अस्‍पताल पहुंचने पर देखा अफरातफरी का माहौल था। अंदर जाकर देखा तो एक दो नहीं दस बारह जवानों के शव। बिस्‍तर कम था सो जमीन पर ही रख दिये गए थे। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। खबर बडी होती जा रही थी।
करीब 12 बज  गए होंगे। फिर से चैनल में खबर अपडेट की। लैपटाप औ  इवीडीओ की मदद से अब प्रारंभिक विजुअल्‍स भेजने के बाद घटनास्‍थल पर जाने की कोशिश की। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मैं इकलौता पत्रकार था जो वहां पहुंचा था। घटनास्‍थल से कुछ पहले पुलिस के जवानों ने रोक दिया। यह कहकर कि आगे गोली चल रही है न जाएं। पर अपने रिस्‍क में हम आगे बढे। कुछ  दूर जाने के बाद गाडी छोडकर पैदल ही जाना पडा। आगे मिल गए, आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता। उनसे बात करता उससे पहले एक पुलिस वाले ने मुझे गले लगा लिया, यह कहकर कि हर तरफ खून से सराबोर वर्दी..... तुम पहले व्‍यक्ति हो जिसे  देख रहा हूं यहां....  वरना ऐसी ही तस्‍वीरें.... उसने ही मुझे एक संकेत दिया कि शायद एसपी श्री वी के चौबे..........
डेढ बजे होंगे। मैं आगे बढा। जवानों के शव मौके से उठाकर ट्रेक्‍टर में डाले जा रहे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब जो खुद कीचड से लथपथ थे, उन्‍हें देखकर लग रहा था कि जमकर  मुकाबला किया है उन्‍होंने भी नक्‍सलियों का..... लगातार निर्देश दिए जा रहे थे और आर आई  गुरजीत सिंह जवानों के शवों को मौके से उठाकर अस्‍पताल भिजवाने की व्‍यवस्‍था में लगे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब से बात की। उन्‍होंने मौके पर ही बाईट देने में सहमति बताई। करीब 20 मिनट तक वो लगातार बोलते रहे। कहीं कहीं वो रूकते, जिससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था कि कुछ समय पहले ही जिस जगह पर जिस व्‍यक्ति ने नक्‍सलियों से खूनी लडाई लडी हो, इस वक्‍त उसकी मन: स्थिति कैसी रही होगी। खैर वो बोलते रहे।  हमने भी उन्‍हें नहीं टोका।  वो सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम को बयां करते रहे और आखिरी में उन्‍होंने जो कहा, उसने झकझोर कर रख दिया, मुझे याद है उनके वो शब्‍द, ‘नक्‍सलियों ने दोनो ओर से फायरिंग की, हमने भी जमकर मुकाबला किया, नक्‍सलियों को कडा टक्‍कर देते देते  एसपी साहब शहीद हो गए हैं। करीब दो बजे ये लाईनें हमने सुनी। ढाई बजे के आसपास हम वहां से निकले और पांच छह मिनट में ही मानपुर पहुंच गए। जैसे ही नेटवर्क मिला तुरंत चैनल में यह खबर दी। ‘एसपी श्री वी के चौबे शहीद। उनके साथ 29 पुलिस जवान शहीद।’
वो पूरा वाक्‍या अब तक नहीं भूला है मुझे। अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी लाशें एक साथ नहीं देखी मैंने। और जब देखने मिलीं तो जवानों की। करीब दो साल से राजनांदगांव में एसपी रहे श्री वीके चौबे साहब एक ऐसे पुलिस अफसर थे जो आम इंसान की तरह ही रहते थे और उनका दरबार हर वक्‍त आम लोगों के लिए खुला रहता था। अपने मातहतों के लिए उनके मन में जो प्रेम था, उसी प्रेम ने उन्‍हें हर दिल अजीज बनाया था और उसी प्रेम के चलते वो शहीद हो गए।
दरअसल,  मानपुर क्षेत्र का मदनवाडा पहले नक्‍सलियों का गढ हुआ करता था। यहां नक्‍सली अपनी ट्रेनिंग कैम्‍प चलाते थे। इस क्षेत्र में नक्‍सलियों के वजूद को खत्‍म करने के लिए आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता और एसपी श्री वी के चौबे ने मदनवाडा में ही पुलिस कैम्‍प स्‍थापित किया। इससे नक्‍सली बौखला गये। उन्‍होंने एक बडी साजिश तैयार की। 12 जुलाई को सुबह उन्‍होंने सातवीं वाहिनी सीएएफ के दो जवानों को तब गोली मारी जब वो जवान शौच के लिए गए थे। ये नक्‍सलियों की साजिश का हिस्‍सा मात्र था, उनका निशाना कुछ और था। नक्‍सलियों को मालूम था कि यह खबर जिला मुख्‍यालय तक जाएगी और एसपी मौके पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। नक्‍सलियों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी और मानपुर से महज छह किलोमीटर दूर पक्‍की सडक पर बारूदी सुरंग लगा रखा था। एसपी  थे ही ऐसे,  वो अपने मातहतों के पास पहुंचते थे। इस खबर को सुनकर वो निकले..... पर नक्‍सलियों ने रास्‍ते में ही उन्‍हें रोक लिया। एसपी साहब एक बार नक्‍सलियों के चक्रव्‍यूह को भेदते हुए आगे निकल गए थे लेकिन फिर बीच में फंसे अपने जवानों के लिए वो फिर से मौके  पर पहुंचे और फिर दोबारा  वहां से नहीं निकल सके।
इस घटना में एसपी श्री वी के चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू,  उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वटटी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधानआरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी भी शहीद हो गए। 
नक्‍सलवाद का नासूर। न जाने कितने घरों को तबाह करेगा। कभी किसी मां की गोद सूनी होती है।  कभी किसी की मांग का सिंदूर मिट जाता है। कभी किसी बच्‍चे के सिर से उसके पिता का साया उठ जाता है तो कभी कोई बहन रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी लिए अपने भाई का इंतजार करती रह जाती है। यूं तो नक्‍सल शब्द आया पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्‍सलबाडी से। भाकपा नेता चारू मजूमदार और कानू सान्‍याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। सत्‍ता में परिवर्तन के लिए सशस्‍त्र क्रांति जरूरी है, ऐसे नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी मौजूदा समय में  देश के 9 राज्यों के सामने सीधी चुनौती बनकर सामने है । अब नक्‍सलवाद का चेहरा बदल गया है। सत्‍ता परिवर्तन की इच्‍छा या व्‍यवस्‍था में बदलाव की ख्‍वाहिशें दफ्न हो गई हैं और नक्‍सली लूटेरों और हत्‍यारों के गिरोह में तब्‍दील हो गए हैं।
वैसे तो छत्‍तीसगढ, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, उडीसा, पश्चिम बंगाल,  झारखंड, उत्‍तरप्रदेश और उत्‍तराखंड में नक्‍सलियों  ने कई वारदातों को  अंजाम देकर अपनी दरिंदगी का सबूत दिया है लेकिन एक घटना  है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, उसका जिक्र यहां करूंगा। छत्‍तीसगढ में सबसे बडी वारदात कर नक्‍सलियों ने पुलिस को सीधे चुनौती दी।  

शहीद एसपी श्री चौबे की शहादत को सलाम करने आज राजनांदगांव में उनकी मूर्ति की स्‍थापना की जा रही है। चौबे साहब और शहीद जवानों को सलाम.............

15 मई 2012

सवाल ही सवाल???



...और नक्सली घटनाएं हो रहीं हैं। एक तरफ सरकार नक्सलियों से बात करने का दावा कर रही है। सरकार की बनाई हाईपावर कमेटी नक्सलियों की रिहाई के रास्ते तलाश करने में जुटी है तो दूसरी ओर नक्सली बुलेट का साथ छोड़ ही नहीं रहे हैं। रविवार को मदर्स डे था। मदर्स डे के दिन कई मांओं की गोदें सूनी हो गईं। ये कैसी बातचीत है? ये कैसी शांति है?
छत्तीसगढ़ किस दिशा में जा रहा है। नक्सली एक कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं। पूरा प्रदेश, पूरा देश हिल जाता है। सरकार नक्सलियों के सामने गिड़गिड़ाती नजर आती है।  करीब पखवाड़े भर हाईप्रोफाइल ड्रामा चलता है।  दिगर जगहों से आयातित कर वार्ताकार बुलाए जाते हैं। ये वार्ताकार नक्सलियों की मांद तक पहुंच जाते हैं। सरकार नहीं पहुंच पाती। सरकार के सुरक्षा बल नहीं पहुंच पाते। आम आदमी जानना चाहता है आखिर छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार है?
क्या आम छत्तीसगढिय़ा ये मान ले कि उसे दो सरकारें मिली हैं। एक सरकार जो बैलेट के माध्यम से आई है और दूसरी सरकार जो बुलेट से चल रही है। बस्तर के कुछ इलाकों में बैलेट के जरिए आने वाली सरकार मेमने की तरह होती है। जंगल में शेर की तरह यहां का राजा बुलेट के जरिए सरकार चलाता है। संघ के समय से भगवा पार्टी में रहे और अब भाजपा से किनारा कर चुके एक नेता व्यंग्य करते हैं कि बस्तर में नक्सली हमले के बाद मुख्यमंत्री आवास की दीवारें कुछ इंच ऊंची कर दी जाती हैं! मुख्यमंत्री और उनके सिपहसलार इस व्यंग्य पर खामोश क्यों हैं?
बड़ी खामोशी से नक्सली एक सलवा जुड़ूम कार्यकर्ता की हत्या कर देते हैं। पहले उसका अपहरण करते हैं। फिर जन अदालत लगाते हैं।  उसी सुकमा में जहां हाईप्रोफाइल ड्रामा खेला गया था। न कहीं कोई मोमबत्ती जलती है। न कहीं कोई रैली निकलती है। जी हरगोपाल, ब्रम्हदेव शर्मा, निर्मला बुच और सुयोग्य मिश्र भी नजर नहीं आते। सब अपने घरों में इस गरमी के मौसम में एयरकंडीशंड कमरों में आराम कर रहे होते हैं। पुनेम पोदिया एक आम इंसान था। कोई आईएएस थोड़ी था  जिसके लिए ये लोग धूप में जंगल की खाक छानते। मीडिया को भी पूनेम पोदिया कोई टीआरपी नहीं देता! इसलिए मीडिया भी आराम के मूड में थी। जाहिर है, एक आईएएस के अपहरण और रिहाई के बीच मीडिया को एक सुपर टीआरपीमामला मिल गया था, जब तक यह चला भुनाते रहे सब! खत्म हुआ तो सब लौट गए अपने ठिएं में, मानो कुछ दिन की पिकनिक मन गई! मीडिया के लिए यह रोमांचक कव्हरेज था लेकिन शायद ही कोई समझ सकता है कि बस्तर के लोगों के लिए उनका रोमांच हर दिन के जीने मरने जैसा है। बात हो रही थी, पुनेम पोदिया की। बेचारा फरवरी महीने से नक्सलियों के चंगुल में था। इस बीच के ड्रामे में  इसका कहीं नाम नहीं आया। इसका यही हाल होना था। हो गया। मारा गया। उधर एक के बाद एक नक्सलियों की रिहाई की कोशिशें हो रही हैं। नक्सली वारदात पर वारदात कर रहे हैं। सरकार शहीदों के शवों के लिए तिरंगे का आर्डर देने में ही लगी है! क्या उसका जमीर नहीं जगता?
बैलाडीला में जो सात जवान मारे गए, वो कौन थे? आम सिपाही। एक एएसआई गोलियों से भून दिया गया। उनकी मौत का किस पर असर पड़ा है। उन जवानों की मां, बहन, बच्चे, पिता पर। नक्सलियों से बातचीत चल रही है। रिहाई के प्रयास हो रहे हैं। ऐसे में इनका जाना क्या सरकार की कमजोरी और नक्सलियों की दादागिरी नहीं है? हर हादसे के बाद हादसे की निंदा का रटा-रटाया बयान जारी कर प्रदेश के मुखिया क्या अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं? क्या उनकी घटना की निंदा कर देने से जवान जिंदा लौट आ सकते हैं?
कब तक? आखिर कब तक? इस तरह की नक्सल वारदातें कब तक छत्तीसगढ़ को रूलाती रहेंगी? कब तक मांओं की गोदें सूनी होते रहेंगी? कब तक बहनें अपने भाईयों की कलाई के लिए तरसेंगी? कब तक एक पिता अपने बेटे की लाश को कांधे पर ढोने मजबूर होता रहेगा? कब तक कोई अबोध बच्चा अपने पिता के शव के आसपास लोगों को रोते देखते हुए सहमा सा रहेगा? कब तक हम इस तरह के हादसे के बाद अफसोस जाहिर  कर अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो जाएंगे? क्या खून नहीं खौलता हमारा? या फिर इंतजार उस दिन का है जब हर घर में एक शहीद हो? क्या सरकार को शर्म नहीं आती? क्या सारे सवालों का जवाब किसी के पास है?????????