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09 मई 2026

वतन पर जो फिदा होगा अमर वो नौजवां होगा.........


शहीद श्री वीके चौबे और जवान(पूरे जवानों की तस्‍वीरें नहीं मिल पाईं)
नक्‍सलवाद का नासूर। न जाने कितने घरों को तबाह करेगा। कभी किसी मां की गोद सूनी होती है।  कभी किसी की मांग का सिंदूर मिट जाता है। कभी किसी बच्‍चे के सिर से उसके पिता का साया उठ जाता है तो कभी कोई बहन रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी लिए अपने भाई का इंतजार करती रह जाती है। यूं तो नक्‍सल शब्द आया पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्‍सलबाडी से। भाकपा नेता चारू मजूमदार और कानू सान्‍याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। सत्‍ता में परिवर्तन के लिए सशस्‍त्र क्रांति जरूरी है, ऐसे नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी मौजूदा समय में  देश के 9 राज्यों के सामने सीधी चुनौती बनकर सामने है । अब नक्‍सलवाद का चेहरा बदल गया है। सत्‍ता परिवर्तन की इच्‍छा या व्‍यवस्‍था में बदलाव की ख्‍वाहिशें दफ्न हो गई हैं और नक्‍सली लूटेरों और हत्‍यारों के गिरोह में तब्‍दील हो गए हैं।
वैसे तो छत्‍तीसगढ, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, उडीसा, पश्चिम बंगाल,  झारखंड, उत्‍तरप्रदेश और उत्‍तराखंड में नक्‍सलियों  ने कई वारदातों को  अंजाम देकर अपनी दरिंदगी का सबूत दिया है लेकिन एक घटना  है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, उसका जिक्र यहां करूंगा। छत्‍तीसगढ में सबसे बडी वारदात कर नक्‍सलियों ने पुलिस को सीधे चुनौती दी।
12 जुलाई 2009। रविवार का दिन। रविवार होने के कारण देर तक सोने की चाह थी पर सुबह छह बजे फोन की घंटी ने उठा दिया। पहली खबर मिली मानपुर (राजनांदगांव जिले का नक्‍सल प्रभावित इलाका) के मदनवाडा में नक्‍सलियों ने सुरक्षा बल के दो जवानों को गोली मार दी है। सबसे पहले यह खबर अपने चैनल में ब्रेक की। इसके बाद बिस्‍तर से उठा और तैयारी करने लगा मानपुर जाने की। शायद तब तक राजनांदगांव जिले के एसपी श्री वी के चौबे जो एक ऐसे अफसर थे जो किसी भी नक्‍सली वारदात होने पर मौके पर पहुंचकर जवानों की हौसला आफजाई करते थे, मानपुर के लिए कूच कर गए थे। बारिश का मौसम था सो टैक्‍सी काल की। टैक्‍सी आती तब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ। अपने लैपटाप को तैयार किया। कैमरा और बैटरी चेक की।  मोबाईल की बैटरी को देखा।  उस दिन शायद मेरा देर से निकलना लिखा था इसलिए जो टैक्‍सी वाला बुलाने के आधे घंटे में ही हाजिर हो जाता था डेढ घंटे  में पहुंचा। साथ में मैंने अपने सहयोगी को लिया और निकल पडा।  
घर से निकलकर टैक्‍सी में सवार हुआ ही था कि दूसरा फोन आया,  शहीदों का आंकडा  बढ सकता है। मन विचलित हुआ। फिर खबर को  अपडेट किया, चैनल में। सुबह आठ बजे पहला फोनो दिया। फोनो के लिए शहर में  ही रूका, कहीं रास्‍ते में नेटवर्क मिले न मिले। फोनो से निपटकर  जैसे ही गाडी आगे बढी एक और खबर मिली। एसपी श्री वीके चौबे की गाडी पर नक्‍सलियों ने फायरिंग कर दी है लेकिन एसपी नक्‍सलियों की गोलीबारी को पार कर सुरक्षित निकल गए हैं। चिंता और बढी। हम आगे बढते ही रहे। बीच बीच में खबर मिलती रही। इसके बाद सारी खबर अपुष्‍ट ही मिलती रही। सौ किलोमीटर का सफर तय कर मानपुर पहुंचे। मानपुर में पहुंचते ही खबर  मिली कि कुछ जवानों के शव अस्‍पताल में लाए जा चुके हैं। अस्‍पताल पहुंचने पर देखा अफरातफरी का माहौल था। अंदर जाकर देखा तो एक दो नहीं दस बारह जवानों के शव। बिस्‍तर कम था सो जमीन पर ही रख दिये गए थे। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। खबर बडी होती जा रही थी।
करीब 12 बज  गए होंगे। फिर से चैनल में खबर अपडेट की। लैपटाप औ  इवीडीओ की मदद से अब प्रारंभिक विजुअल्‍स भेजने के बाद घटनास्‍थल पर जाने की कोशिश की। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मैं इकलौता पत्रकार था जो वहां पहुंचा था। घटनास्‍थल से कुछ पहले पुलिस के जवानों ने रोक दिया। यह कहकर कि आगे गोली चल रही है न जाएं। पर अपने रिस्‍क में हम आगे बढे। कुछ  दूर जाने के बाद गाडी छोडकर पैदल ही जाना पडा। आगे मिल गए, आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता। उनसे बात करता उससे पहले एक पुलिस वाले ने मुझे गले लगा लिया, यह कहकर कि हर तरफ खून से सराबोर वर्दी..... तुम पहले व्‍यक्ति हो जिसे  देख रहा हूं यहां....  वरना ऐसी ही तस्‍वीरें.... उसने ही मुझे एक संकेत दिया कि शायद एसपी श्री वी के चौबे..........
डेढ बजे होंगे। मैं आगे बढा। जवानों के शव मौके से उठाकर ट्रेक्‍टर में डाले जा रहे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब जो खुद कीचड से लथपथ थे, उन्‍हें देखकर लग रहा था कि जमकर  मुकाबला किया है उन्‍होंने भी नक्‍सलियों का..... लगातार निर्देश दिए जा रहे थे और आर आई  गुरजीत सिंह जवानों के शवों को मौके से उठाकर अस्‍पताल भिजवाने की व्‍यवस्‍था में लगे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब से बात की। उन्‍होंने मौके पर ही बाईट देने में सहमति बताई। करीब 20 मिनट तक वो लगातार बोलते रहे। कहीं कहीं वो रूकते, जिससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था कि कुछ समय पहले ही जिस जगह पर जिस व्‍यक्ति ने नक्‍सलियों से खूनी लडाई लडी हो, इस वक्‍त उसकी मन: स्थिति कैसी रही होगी। खैर वो बोलते रहे।  हमने भी उन्‍हें नहीं टोका।  वो सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम को बयां करते रहे और आखिरी में उन्‍होंने जो कहा, उसने झकझोर कर रख दिया, मुझे याद है उनके वो शब्‍द, ‘नक्‍सलियों ने दोनो ओर से फायरिंग की, हमने भी जमकर मुकाबला किया, नक्‍सलियों को कडा टक्‍कर देते देते  एसपी साहब शहीद हो गए हैं। करीब दो बजे ये लाईनें हमने सुनी। ढाई बजे के आसपास हम वहां से निकले और पांच छह मिनट में ही मानपुर पहुंच गए। जैसे ही नेटवर्क मिला तुरंत चैनल में यह खबर दी। ‘एसपी श्री वी के चौबे शहीद। उनके साथ 29 पुलिस जवान शहीद।’
वो पूरा वाक्‍या अब तक नहीं भूला है मुझे। अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी लाशें एक साथ नहीं देखी मैंने। और जब देखने मिलीं तो जवानों की। करीब दो साल से राजनांदगांव में एसपी रहे श्री वीके चौबे साहब एक ऐसे पुलिस अफसर थे जो आम इंसान की तरह ही रहते थे और उनका दरबार हर वक्‍त आम लोगों के लिए खुला रहता था। अपने मातहतों के लिए उनके मन में जो प्रेम था, उसी प्रेम ने उन्‍हें हर दिल अजीज बनाया था और उसी प्रेम के चलते वो शहीद हो गए।
दरअसल,  मानपुर क्षेत्र का मदनवाडा पहले नक्‍सलियों का गढ हुआ करता था। यहां नक्‍सली अपनी ट्रेनिंग कैम्‍प चलाते थे। इस क्षेत्र में नक्‍सलियों के वजूद को खत्‍म करने के लिए आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता और एसपी श्री वी के चौबे ने मदनवाडा में ही पुलिस कैम्‍प स्‍थापित किया। इससे नक्‍सली बौखला गये। उन्‍होंने एक बडी साजिश तैयार की। 12 जुलाई को सुबह उन्‍होंने सातवीं वाहिनी सीएएफ के दो जवानों को तब गोली मारी जब वो जवान शौच के लिए गए थे। ये नक्‍सलियों की साजिश का हिस्‍सा मात्र था, उनका निशाना कुछ और था। नक्‍सलियों को मालूम था कि यह खबर जिला मुख्‍यालय तक जाएगी और एसपी मौके पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। नक्‍सलियों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी और मानपुर से महज छह किलोमीटर दूर पक्‍की सडक पर बारूदी सुरंग लगा रखा था। एसपी  थे ही ऐसे,  वो अपने मातहतों के पास पहुंचते थे। इस खबर को सुनकर वो निकले..... पर नक्‍सलियों ने रास्‍ते में ही उन्‍हें रोक लिया। एसपी साहब एक बार नक्‍सलियों के चक्रव्‍यूह को भेदते हुए आगे निकल गए थे लेकिन फिर बीच में फंसे अपने जवानों के लिए वो फिर से मौके  पर पहुंचे और फिर दोबारा  वहां से नहीं निकल सके।
इस घटना में एसपी श्री वी के चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू,  उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वटटी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधानआरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी भी शहीद हो गए।
शहीद एसपी श्री चौबे की शहादत को सलाम करने आज राजनांदगांव में उनकी मूर्ति की स्‍थापना की जा रही है। चौबे साहब और शहीद जवानों को सलाम.................

12 नवंबर 2012

नाम के महानायक !!!

बिहार पुलिस का वह पोस्‍टर जिसे लेकर बच्‍चन नाराज हुए
सदी के महानायक अमिताभ बच्चन को उनकी तस्वीर का एक नेक काम के लिए इस्तेमाल करने पर दिक्कत हो गई। बिना इजाजत उनकी तस्वीर के इस्तेमाल करने पर नाराजगी तो जायज है, पर इस्तेमाल करने की वजह जानने के बाद भी यदि वो इस मसले पर अपने वकील से बात करने की बात करें और नोटिस देने की धमकी दें तो इसे उचित नहीं कहा जा सकता। रूपयों के लिए किसी भी उत्पाद को बेचने उसकी तारीफों के पुल बांध देने वाले के साथ ही स्वभाव से नम्र और बेहद भावुक एक कलाकार से किसी मसले पर इस तरह के उतावलेपन की उम्मीद तो नहीं की जा सकती थी, पर अफसोस उन्होंने ऐसा ही किया।
दरसअल, बिहार के एक जिले में वहां की पुलिस ने नई भर्ती के लिए अमिताभ बच्चन की तस्वीर को प्रेरणा के तौर पर इस्तेमाल करने का तरीका अपना लिया गया। बिहार के कैमूर जिले के एसपी उमाशंकर सुधांशु ने नक्सल हिंसा से जूझ रहे इलाके में पुलिस विभाग में भर्ती होने के लिए युवाओं का आकर्षित करने के लिए एक पोस्टर छपवाया, जिसमें अमिताभ बच्चन की तस्वीर के साथ एक कविता प्रकाशित किया। हां, इतना जरूर है कि एसपी ने या फिर उनके विभाग ने इसके लिए अमिताभ बच्चन की इजाजत नहीं ली, बगैर उनसे पूछे उनकी तस्वीर लगा दी लेकिन उनका मकसद स्वाभाविक रूप से नेक था। न ही अमिताभ बच्चन की तस्वीर का इस्तेमाल कर निजी रूप से लाभ कमाने का उद्देश्य था और न ही ऐसा कर अमिताभ बच्चन की छवि को नुकसान पहुंचाने का ही प्रयास किया गया। सामान्य तौर पर जो समझ आ रहा है, उसके मुताबिक ऐसा कर बिहार के ये अफसर सिर्फ अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता का उपयोग जागरूकता के लिए करना चाहते थे। अमिताभ का नाम सामने आया और इसके बाद यह अनूठा प्रयोग सुर्खियां बन गया और बात अमिताभ तक पहुंची और वे इससे इस कदर नाराज हो गए कि नोटिस देने के लिए वकील तक से सलाह लेने लगे। ऐसा नहीं होना चाहिए। अमिताभ बच्चन एक सुलझे हुए कलाकार हैं। वे रूपए लेकर कई उत्पादों की सिफारिश करते टीवी विज्ञापनों में नजर आते हैं। वे एक प्रदेश गुजरात के पर्यटन स्थलों की गाथा गाते भी दिखते हैं। वे गुजरात सरकार के ब्रांड एम्बेसेडर हैं। इसके लिए उनको आर्थिक लाभ भी मिलता है लेकिन वे एक ऐसे कलाकार हैं, जिनकी प्रशंसा पूरा देश करता है, ऐसे में उनको कुछ काम ऐसा भी करना चाहिए जो आर्थिक फायदे से परे हो।
हमारा मानना है कि बिहार पुलिस  ने एक गलती भर की है और वह है, बगैर इजाजत अमिताभ बच्चन की तस्वीर का उपयोग कर लिया। इस मसले पर नाराज होकर अमिताभ उनकी खिंचाई जरूर कर सकते हैं, पर नोटिस देने की धमकी की यहां  जरूरत नहीं थी। अमिताभ की नाराजगी के बाद बिहार की पुलिस ने हालांकि उनसे माफी मांग ली है और उनकी तस्वीरों वाले पोस्टरों को हटा लिया है लेकिन इस घटनाक्रम ने इतना तो साफ कर दिया है कि फिल्मों के परदे पर नायक की छवि रखने वाले कलाकारों का मन वास्तव में कितना छोटा होता है, जो एक जनहित के मुद्दे पर भी खुद के नाम के इस्तेमाल पर बौखला जाएं।

12 जुलाई 2012

नहीं भूलता वो दिन...

12 जुलाई 2009। रविवार का दिन। रविवार होने के कारण देर तक सोने की चाह थी पर सुबह छह बजे फोन की घंटी ने उठा दिया। पहली खबर मिली मानपुर (राजनांदगांव जिले का नक्‍सल प्रभावित इलाका) के मदनवाडा में नक्‍सलियों ने सुरक्षा बल के दो जवानों को गोली मार दी है। सबसे पहले यह खबर अपने चैनल में ब्रेक की। इसके बाद बिस्‍तर से उठा और तैयारी करने लगा मानपुर जाने की। शायद तब तक राजनांदगांव जिले के एसपी श्री वी के चौबे जो एक ऐसे अफसर थे जो किसी भी नक्‍सली वारदात होने पर मौके पर पहुंचकर जवानों की हौसला आफजाई करते थे, मानपुर के लिए कूच कर गए थे। बारिश का मौसम था सो टैक्‍सी काल की। टैक्‍सी आती तब तक मैं नहा धोकर तैयार हुआ। अपने लैपटाप को तैयार किया। कैमरा और बैटरी चेक की।  मोबाईल की बैटरी को देखा।  उस दिन शायद मेरा देर से निकलना लिखा था इसलिए जो टैक्‍सी वाला बुलाने के आधे घंटे में ही हाजिर हो जाता था डेढ घंटे  में पहुंचा। साथ में मैंने अपने सहयोगी को लिया और निकल पडा।  
घर से निकलकर टैक्‍सी में सवार हुआ ही था कि दूसरा फोन आया,  शहीदों का आंकडा  बढ सकता है। मन विचलित हुआ। फिर खबर को  अपडेट किया, चैनल में। सुबह आठ बजे पहला फोनो दिया। फोनो के लिए शहर में  ही रूका, कहीं रास्‍ते में नेटवर्क मिले न मिले। फोनो से निपटकर  जैसे ही गाडी आगे बढी एक और खबर मिली। एसपी श्री वीके चौबे की गाडी पर नक्‍सलियों ने फायरिंग कर दी है लेकिन एसपी नक्‍सलियों की गोलीबारी को पार कर सुरक्षित निकल गए हैं। चिंता और बढी। हम आगे बढते ही रहे। बीच बीच में खबर मिलती रही। इसके बाद सारी खबर अपुष्‍ट ही मिलती रही। सौ किलोमीटर का सफर तय कर मानपुर पहुंचे। मानपुर में पहुंचते ही खबर  मिली कि कुछ जवानों के शव अस्‍पताल में लाए जा चुके हैं। अस्‍पताल पहुंचने पर देखा अफरातफरी का माहौल था। अंदर जाकर देखा तो एक दो नहीं दस बारह जवानों के शव। बिस्‍तर कम था सो जमीन पर ही रख दिये गए थे। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं था। खबर बडी होती जा रही थी।
करीब 12 बज  गए होंगे। फिर से चैनल में खबर अपडेट की। लैपटाप औ  इवीडीओ की मदद से अब प्रारंभिक विजुअल्‍स भेजने के बाद घटनास्‍थल पर जाने की कोशिश की। इलेक्‍ट्रानिक मीडिया से मैं इकलौता पत्रकार था जो वहां पहुंचा था। घटनास्‍थल से कुछ पहले पुलिस के जवानों ने रोक दिया। यह कहकर कि आगे गोली चल रही है न जाएं। पर अपने रिस्‍क में हम आगे बढे। कुछ  दूर जाने के बाद गाडी छोडकर पैदल ही जाना पडा। आगे मिल गए, आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता। उनसे बात करता उससे पहले एक पुलिस वाले ने मुझे गले लगा लिया, यह कहकर कि हर तरफ खून से सराबोर वर्दी..... तुम पहले व्‍यक्ति हो जिसे  देख रहा हूं यहां....  वरना ऐसी ही तस्‍वीरें.... उसने ही मुझे एक संकेत दिया कि शायद एसपी श्री वी के चौबे..........
डेढ बजे होंगे। मैं आगे बढा। जवानों के शव मौके से उठाकर ट्रेक्‍टर में डाले जा रहे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब जो खुद कीचड से लथपथ थे, उन्‍हें देखकर लग रहा था कि जमकर  मुकाबला किया है उन्‍होंने भी नक्‍सलियों का..... लगातार निर्देश दिए जा रहे थे और आर आई  गुरजीत सिंह जवानों के शवों को मौके से उठाकर अस्‍पताल भिजवाने की व्‍यवस्‍था में लगे थे। मुकेश गुप्‍ता साहब से बात की। उन्‍होंने मौके पर ही बाईट देने में सहमति बताई। करीब 20 मिनट तक वो लगातार बोलते रहे। कहीं कहीं वो रूकते, जिससे यह अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता था कि कुछ समय पहले ही जिस जगह पर जिस व्‍यक्ति ने नक्‍सलियों से खूनी लडाई लडी हो, इस वक्‍त उसकी मन: स्थिति कैसी रही होगी। खैर वो बोलते रहे।  हमने भी उन्‍हें नहीं टोका।  वो सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम को बयां करते रहे और आखिरी में उन्‍होंने जो कहा, उसने झकझोर कर रख दिया, मुझे याद है उनके वो शब्‍द, ‘नक्‍सलियों ने दोनो ओर से फायरिंग की, हमने भी जमकर मुकाबला किया, नक्‍सलियों को कडा टक्‍कर देते देते  एसपी साहब शहीद हो गए हैं। करीब दो बजे ये लाईनें हमने सुनी। ढाई बजे के आसपास हम वहां से निकले और पांच छह मिनट में ही मानपुर पहुंच गए। जैसे ही नेटवर्क मिला तुरंत चैनल में यह खबर दी। ‘एसपी श्री वी के चौबे शहीद। उनके साथ 29 पुलिस जवान शहीद।’
वो पूरा वाक्‍या अब तक नहीं भूला है मुझे। अपनी जिंदगी में कभी भी इतनी लाशें एक साथ नहीं देखी मैंने। और जब देखने मिलीं तो जवानों की। करीब दो साल से राजनांदगांव में एसपी रहे श्री वीके चौबे साहब एक ऐसे पुलिस अफसर थे जो आम इंसान की तरह ही रहते थे और उनका दरबार हर वक्‍त आम लोगों के लिए खुला रहता था। अपने मातहतों के लिए उनके मन में जो प्रेम था, उसी प्रेम ने उन्‍हें हर दिल अजीज बनाया था और उसी प्रेम के चलते वो शहीद हो गए।
दरअसल,  मानपुर क्षेत्र का मदनवाडा पहले नक्‍सलियों का गढ हुआ करता था। यहां नक्‍सली अपनी ट्रेनिंग कैम्‍प चलाते थे। इस क्षेत्र में नक्‍सलियों के वजूद को खत्‍म करने के लिए आईजी श्री मुकेश गुप्‍ता और एसपी श्री वी के चौबे ने मदनवाडा में ही पुलिस कैम्‍प स्‍थापित किया। इससे नक्‍सली बौखला गये। उन्‍होंने एक बडी साजिश तैयार की। 12 जुलाई को सुबह उन्‍होंने सातवीं वाहिनी सीएएफ के दो जवानों को तब गोली मारी जब वो जवान शौच के लिए गए थे। ये नक्‍सलियों की साजिश का हिस्‍सा मात्र था, उनका निशाना कुछ और था। नक्‍सलियों को मालूम था कि यह खबर जिला मुख्‍यालय तक जाएगी और एसपी मौके पर पहुंचने की कोशिश करेंगे। नक्‍सलियों ने इसकी तैयारी पहले से कर रखी थी और मानपुर से महज छह किलोमीटर दूर पक्‍की सडक पर बारूदी सुरंग लगा रखा था। एसपी  थे ही ऐसे,  वो अपने मातहतों के पास पहुंचते थे। इस खबर को सुनकर वो निकले..... पर नक्‍सलियों ने रास्‍ते में ही उन्‍हें रोक लिया। एसपी साहब एक बार नक्‍सलियों के चक्रव्‍यूह को भेदते हुए आगे निकल गए थे लेकिन फिर बीच में फंसे अपने जवानों के लिए वो फिर से मौके  पर पहुंचे और फिर दोबारा  वहां से नहीं निकल सके।
इस घटना में एसपी श्री वी के चौबे के साथ निरीक्षक विनोद ध्रुव, उप निरीक्षक धनेश साहू,  उप निरीक्षक कोमल साहू, प्रधान आरक्षक गीता भंडारी, प्रधान आरक्षक संजय यादव, प्रधान आरक्षक जखरियस खलखो, आरक्षक रजनीकांत, आरक्षक लालबहादुर नाग, आरक्षक निकेश यादव, आरक्षक वेदप्रकाश यादव, आरक्षक श्‍यामलाल भोई, आरक्षक बेदूराम सूर्यवंशी, आरक्षक लोकेश छेदैया, आरक्षक अजय भारव्‍दाज, आरक्षक सुभाष बेहरा, आरक्षक रितेश देशमुख, आरक्षक मनोज वर्मा, आरक्षक अमित नायक, आरक्षक टिकेश्‍वर देखमुख, आरक्षक मिथलेश साहू, आरक्षक प्रकाश वर्मा, आरक्षक सूर्यपाल वटटी, आरक्षक झाडूराम वर्मा, आरक्षक संतराम साहू और सातवीं वाहिनी सीएएफ भिलाई के दो प्रधानआरक्षक दुष्‍यंत राठौर और सुंदरलाल चौधरी भी शहीद हो गए। 
नक्‍सलवाद का नासूर। न जाने कितने घरों को तबाह करेगा। कभी किसी मां की गोद सूनी होती है।  कभी किसी की मांग का सिंदूर मिट जाता है। कभी किसी बच्‍चे के सिर से उसके पिता का साया उठ जाता है तो कभी कोई बहन रक्षाबंधन के दिन हाथ में राखी लिए अपने भाई का इंतजार करती रह जाती है। यूं तो नक्‍सल शब्द आया पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्‍सलबाडी से। भाकपा नेता चारू मजूमदार और कानू सान्‍याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। सत्‍ता में परिवर्तन के लिए सशस्‍त्र क्रांति जरूरी है, ऐसे नारे के साथ 1967 में नक्सलबाड़ी में फूटी चिंगारी मौजूदा समय में  देश के 9 राज्यों के सामने सीधी चुनौती बनकर सामने है । अब नक्‍सलवाद का चेहरा बदल गया है। सत्‍ता परिवर्तन की इच्‍छा या व्‍यवस्‍था में बदलाव की ख्‍वाहिशें दफ्न हो गई हैं और नक्‍सली लूटेरों और हत्‍यारों के गिरोह में तब्‍दील हो गए हैं।
वैसे तो छत्‍तीसगढ, बिहार, आंध्रप्रदेश, महाराष्‍ट्र, उडीसा, पश्चिम बंगाल,  झारखंड, उत्‍तरप्रदेश और उत्‍तराखंड में नक्‍सलियों  ने कई वारदातों को  अंजाम देकर अपनी दरिंदगी का सबूत दिया है लेकिन एक घटना  है जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, उसका जिक्र यहां करूंगा। छत्‍तीसगढ में सबसे बडी वारदात कर नक्‍सलियों ने पुलिस को सीधे चुनौती दी।  

शहीद एसपी श्री चौबे की शहादत को सलाम करने आज राजनांदगांव में उनकी मूर्ति की स्‍थापना की जा रही है। चौबे साहब और शहीद जवानों को सलाम.............