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22 मार्च 2015

चुनाव पत्रकारों का और कत्ल की रात!



आपने अखबारों में अक्सर पढ़ा होगा, फलां चुनाव में बंटने के लिए आई दारू पकड़ाई... मतदाताओं को रिझाने के लिए उम्मीदवारों ने दारू बांटा... कंबल बांटा...साड़ी, बिछिया और न जाने क्या क्या बांटे जाने की खबरें आपने अखबारों में पढ़ी होंगी। हर खबरों के बाद चिंतन करने का मन भी किया होगा कि क्या हो गया है, लोकतंत्र का? मतदान के एक दिन पहले यह सारा खेल होता है.... इस एक रात को ‘’कत्ल की रात’’ कहा जाता है!
अब यह ‘’कत्ल की रात’’ क्या होती है, यह  मुझे बीते दिनों महसूस हुआ।
दरअसल, मैं भी चुनाव लड़ रहा था। जी नहीं! मैं किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं। मैं तो एक सीधा और सज्जन इंसान हूं। राजनीतिक दल से मेरा दूर दूर से कोई नाता नहीं। मैं पत्रकारों का चुनाव लड़ रहा था। मुझे लगा था कि मैं इस चुनाव में अपनी पत्रकारिता के दम पर बेहतर प्रदर्शन कर सकता हूं, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि मेरा सारा बेहतर प्रबंधन उस एक ‘’कत्ल की रात’’ को तार-तार हो जाएगा और चुनाव में मुझे चारों खाने मात खानी पड़ जाएगी। जनाब मैं चुनाव हार गया!! पर मैं आपकी बधाईयां चाहता हूं कि मैं ‘’कत्ल की रात’’ का भागीदार होने से बच गया!!!
चुनाव। पिछले साल अप्रैल-मई में देश की सरकार चुनने के लिए चुनाव। इसकी खुमारी उतरी नहीं कि नवंबर में विधानसभा के चुनाव। यह खुमारी जाए इससे पहले इस साल की शुरूआत में नगरीय निकाय और फिर पंचायत चुनाव। कसम से अवसर पर अवसर... अब आप पूछेंगे कैसा अवसर, अरे जनाब अपना जनप्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं, अवसर तो कुछ और होता है। कहने को अपना देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन यहां चुनाव होते ही दूसरे गणित होने शुरू हो जाते हैं। गुणा भाग शुरू हो जाता है! सबके सब लग जाते हैं, इस कोशिश में कि कौन उनको ज्यादा से ज्यादा उपकृत कर सकता है...! .... और जब एक के बाद एक चार चुनावों की खुमारी हावी हो तो मीडिया के चुनाव में भी इसका असर दिखना लाजिमी था। सो कुछ जनाब लग गए ‘’कत्ल की रात’’ के इंतजार में...!
मेरे अपने शहर में पत्रकारों का चुनाव था। मैं भी एक दावेदार था। एक पत्रकार सज्जन(?) मेरे पास आए और कहने लगे कि मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मतदाता यूनियन बनाया है और हमारी कुछ मांगे हैं, आपको इन मांगों को पूरी करनी है, फिर आपकी जीत पक्की!!!! जीत पक्की सुनकर मैं खुश हो गया लेकिन उनकी मांगों ने मुझे डरा दिया... वही ‘’कत्ल की रात’’। अब कोई आम चुनाव तो था नहीं कि ‘’कत्ल की रात’’ एक होती, जनाब की मांग थी कि चुनाव तो एक दिन का है, पर आपको ‘’कत्ल की रात’’ के ‘अवसर’ उनको ‘अक्सर’ उपलब्ध कराने होंगे!
कसम से मैं तो डर ही गया और उसी दिन मेरी हार हो गई... चुनाव हुए, परिणाम भी आए, मैं हार गया, क्योंकि मेरे पास ‘’कत्ल की रात’’ का इंतजाम नहीं था, पर मुझे उम्मीद नहीं थी कि बुद्धिजीवियों के चुनाव में भी ‘’कत्ल की रात’’ होती है, मुझे लगता था कि यह तो राजनीतिक दलों के चोचले हैं, पर मैं गलत था क्योंकि जब भी चुनाव होगा, ‘’कत्ल की रात’’ भी होगी....!


27 अगस्त 2011

ईमानदारी और कर्मठता की नई परिभाषा............!!!!


टेलीविजन में इन दिनों एक ही खबर दिख रही है। ये कह सकते हैं, एक ही खबर बिक रही है। बिक रही है, इसलिए कह रहा हूं कि हमारे देश के न्‍यूज चैनलों को खबरों से उतना ज्‍यादा सरोकार नहीं है, जितना इस बात से कि कौन सी खबर रेटिंग में उसे नम्‍बर एक कर सकती है। हां इस बार यह अच्‍छे के लिए हो रहा है। सारे के सारे न्‍यूज चैनल अन्‍ना अन्‍ना कर रहे  हैं। अच्‍छा है। अन्‍ना के बहाने कम से कम देश की सोई हुई जनता को जगाने का काम किया जा रहा है। और यह काम कर रहे हैं, हमारे देश के न्‍यूज चैनल। अरे भाई न्‍यूज चैनलों को  हमेशा बुरा मत समझो! कभी कभी ये अच्‍छा भी करते हैं। ईमान जगाने का काम  कर रहे हैं। एक करीब 75 साल के ‘युवा’ ने कम से कम वो  काम  कर दिया,  जो बरसों में कोई नहीं कर पाया। सोच सबकी है, ईमानदारी, भ्रष्‍ट्राचार से मुक्ति, स्‍वस्‍थ शासन, स्‍वस्‍थ प्रशासन। पर पहल किसी ने नहीं की। खैर पहल तो हो रही है। अच्‍छी बात है.....
अब आता हूं उस बात पर जिसने मुझे आज यह पोस्‍ट लिखने को प्रेरित किया।  बीती रात मैं टीवी देख देख रहा था। ब्रेक में न्‍यूज चैनल बदला तो  देखा सबमें अन्‍ना की खबरें। कुछ देर खबरों पर ध्‍यान देने के बाद फिर मनोरंजन चैनल में आया तो एक विज्ञापन चल रहा था। विज्ञापन में कुछ  पुलिस वाले एक तेज रफ्तार कार चलाने वाले युवाओं को रोकते हैं। कार का शीशा खुलवाने पर सिपाही उन युवाओं से बात करने की कोशिश करता है और फिर उनके मुंह से शराब की दुर्गंध आने की बात अपने अफसर से कहता है। अफसर उन लडकों को डांटता  इससे पहले वो युवा पांच सौ रूपए का नोट अफसर को थमा देता है। अफसर उस नोट को परखता है कि कहीं नकली तो नहीं और फिर उस युवा को उसका नोट वापस करता है और साथ में चालान की परची थमा देता है। विज्ञापन का पंच लाईन इसके बाद आता है, ‘जियो शान से... क्‍योंकि आप हो असली आफिसर’। और फिर टीवी स्‍क्रीन में आता है आफिसर च्‍वाईस.......... !
अरे ये क्‍या? सरकार ने तो शराब के विज्ञापनों के प्रदर्शन पर तो बैन लगा दिया है ना।  फिर ये शराब का विज्ञापन! ‘नहीं ये शराब का विज्ञापन नहीं है’,  कंपनियों के पास अपने तर्क हैं। वो कह सकते हैं कि ये तो सोडा का विज्ञापन है। यानि....... ! बैगपाईपर का विज्ञापन देख लीजिए, ‘जमेगा रंग जब मिल बैठेंगे तीन यार मैं आप और बैगपाईपर’ .....! एक बियर बनाने वाली कंपनी का पंच लाईन है, ‘जोश है तो हैवर्ड है’ । ये सब क्‍या है...... ! क्‍या सरकार को  ये सब नहीं दिख रहा।
एक तरफ अन्‍ना। भूखे प्‍यासे,  इस देश के भविष्‍य के लिए भोजन त्‍याग कर बैठे हैं और दूसरी ओर कंपनियां इमानदारी और कर्मठता के लिए सोडा के रास्‍ते शराब का विज्ञापन कर रही हैं। और इस पर तुर्रा यह‍ कि शराब पियेंगे तो आपके भीतर कर्मठता, इमानदारी और जोश आएगा..... वाह रे इंडिया................ !!!!!!