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26 अगस्त 2012

उम्मीद का सोमवार...

संसद का मानसून सत्र चल रहा है। वैसे तो यह वाक्य अपने आप में सही है, पर मौजूदा हालात को देखकर ऐसा लगने लगा है कि यह वाक्य कहीं गलत तो नहीं हो रहा। मानसूत्र सत्र में 20 दिनों की कार्रवाई हो चुकी है और आधे से ज्यादा वक्त बरबाद ही हुआ है। यानि कि कहा जाना चाहिए कि मानसूत्र सत्र घिसट-घिसट कर चल रहा है। इस बार का सत्र शुरू से ही हंगामे के नाम रहा। सत्र शुरू होते ही इस पर बाबा रामदेव का रामलीला मैदान में चलने वाले कालाधन के आंदोलन की छाया पड़ती रही तो कुछ दिन बाद कैग के रिपोर्ट ने बचा-खुचा काम कर दिया। कोयला ब्लाक आबंटन में धांधली की इस रिपोर्ट ने संसद को सुलगा दिया और इसका कीमती वक्त हर दिन राख होता जा रहा है।
यह बड़ी चिंता की बात है कि संसद में काम का वक्त कम होता जा रहा है। संसद एक ऐसी जगह है, जहां से देशवासियों के लिये योजनाएं बनती हैं और उसे सही तरीके से क्रियान्वित किया जा रहा है, या नहीं, इस बात का मूल्यांकन किया जाता है। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है और उसे संसद में भेजती है। इस उम्मीद के साथ कि वह वहां उनकी समस्याओं को उठाने काम करेंगे, उनकी समस्याओं का निराकरण करेंगे और उनके लिए सुविधाएं जुटाने का काम करेंगे, पर हो विपरीत रहा है।
हमारे पास पिछले साल संसद की कार्रवाई के जो आंकड़े हैं, उसके मुताबिक बीते साल 73 दिन संसद की कार्रवाई चली। ये दिन संसद के काम के हिसाब से करीब आठ सौ घंटे होते हैं। संसद में होने वाले काम काज को लेकर रिसर्च करने वाली एक स्वतंत्र संस्था के आंकड़े कहते हैं कि इन घंटों में से करीब 30 प्रतिशत समय हंगामे की भेंट चढ़ गया था। पिछले साल कुल 54 विधेयकों को कानून बनाने की योजना थी, लेकिन मूर्तरूप ले पाए सिर्फ 28। संसद की कार्रवाई जब खत्म हुई उस वक्त 97 विधेयक लंबित पड़े थे। इस साल की शुरूआत बीते साल से बेहतर रही। इस साल जब बजट सत्र शुरू हुआ, तो एक भय था बीते साल का लेकिन फिर अच्छा नजर आने लगा। मार्च से लेकर मई के बीच हुए बजट सत्र का करीब 90 फीसदी समय उपयोगी  रहा और 12 विधेयक पारित किए गए। 17 नए विधेयक आए। इस तरह करीब सौ विधेयक लंबित रहे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि बीते साल का भूत फिर निकलकर आ गया और संसद का समय बरबाद होता जा रहा है।
इस बार मानसून सत्र की शुरूआत से ही कुछ न कुछ अड़चनें पैदा होते रहीं और आखिर में कोयले की आंच में सब कुछ सुलगने लगा। कैग के रिपोर्ट में टू जी से बड़े गड़बड़झाले का मामला सामने आने के बाद से संसद में कोई काम नहीं हो रहा है। विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफे से कुछ कम में मानने को तैयार नहीं है और सत्ता पक्ष  इस्तीफे की मांग को सिरे से नकार कर कैग रिपोर्ट पर चर्चा करने की बात कह रहा है। शुक्रवार को इस उम्मीद के साथ कार्रवाई थमी थी कि सोमवार से सदन ठीक ठाक काम करने लगेगा। सत्ता पक्ष इस बात को लेकर विपक्ष के नेताओं से भी बात कर चुका है, अब देखना यह है कि सोमवार की सुबह उजाला लेकर आता है या फिर सदन में कालिख पुती नजर आएगी।

15 अगस्त 2012

सवाल स्वतंत्रता को लेकर...?


हमें आजाद हुए 65 साल हो गए और छैंसठवें वर्ष में हम प्रवेश कर गए। यह वक्त सोचने का है कि इतने वर्षों में हम क्या हासिल कर पाए? जिन ख्वाबों को लेकर, जिन उम्मीदों को लेकर आजादी के दीवानों ने रण में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, क्या उन उम्मीदों पर हम खरा उतरे हैं? वास्तविकता तो यह है कि हम और भी पीछे जा रहे हैं। 1947 को देश की जमीन का बंटवारा हुआ था और अब इस दौर में इंसानों में, भावनाओं में और हर उस चीज में बंटवारा निरंतर जारी है, जिसका मानवीय सरोकार है।
मौजूदा दौर में सत्ता की लड़ाई इस कदर हावी हो  गई है कि इसके सामने सब कुछ बौना नजर आने लगा है। आम आदमी की क्या जरूरतें हैं, इस पर किसी का ध्यान नहीं है, बस सब के सब अपना वोट बैंक मजबूत करने के काम में लगे हुए हैं। इस आपाधापी में आम भारतवासी की उम्मीदें, आम भारतवासी की भावनाएं कितनी आहत हो रही हैं, इस दिशा में सोचने की किसी को फुर्सत नहीं।
हाल के दिनों में देश ने दो बड़ा आंदोलन देखा। दोनों आंदोलन को देश की दशा और दिशा बदलने वाला बताया गया। एक आंदोलन की शुरूआत एक योगी ने की। लोगों को योग सिखाने वाले बाबा रामदेव ने देश के बाहर जमा काला धन को वापस देश में लाने की मांग को लेकर आंदोलन का आगाज किया और उन्होंने सपना दिखाया कि इससे भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, देश में महंगाई खत्म हो जाएगी और देश के हर आम आदमी को आसानी से दो वक्त की रोटी नसीब होगी। उनके आंदोलन में लोग जुटे। फिर अचानक उनके आंदोलन को कुचल दिया गया। बाबा दोबारा रामलीला मैदान में पूरी ताकत के साथ आए और पांच दिनों तक उनकी लीला चलती रही। अपनी रणनीति को गोपनीय रखने की बात कहकर खूब भीड़ जमा की और आखिर में कांग्रेस को 'निपटाने' के संकल्प के साथ उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया।
इन सबके बीच उभरे अन्ना हजारे। भारतीय सेना के पूर्व जवान और मौजूदा समय में बूढ़े हो चले अन्ना हजारे ने देश के लिए लडऩे का एक जज्बा  पैदा किया। जन लोकपाल की मांग को लेकर लड़ाई शुरू की। उनका भी उद्देश्य था, भ्रष्टाचार का खात्मा, पर धीरे धीरे उनका जादू खत्म होता गया। इसके पीछे उनकी ही टीम के लोग शामिल थे। उनकी टीम के लोगों ने एक ऐसा मायाजाल बिछाया कि जनता पहले तो उसमें फंसती चली गई और जब जनता को होश आया तो इस टीम से उसका मोह भंग हो गया। आखिर में राजनीतिक दल के गठन की बात कर अन्ना का आंदोलन समाप्त हो गया और जनता एक बार फिर ठगी रह गई। अब टीम अन्ना भंग हो गई है और सब अलग अलग राग गा रहे हैं।
कितने दुर्भाग्य की बात है कि एक का आंदोलन राजनीतिज्ञों के सहयोग के साथ खत्म हो गया और दूसरे का आंदोलन राजनीतिक दल बनाने की बात को लेकर समाप्त हो गया। यदि सब कुछ राजनीति से ही संभव है तो फिर राजनीति को लेकर इतनी कड़वाहट क्यों दिखाई इन लोगों ने? क्यों देश की संसद को, क्यों देश के संविधान को कोसने का काम किया गया? इसका जवाब आने वाले वक्त में अन्ना हजारे की टीम और बाबा रामदेव को देना होगा।
बात अन्ना और रामदेव से हटकर करें तो सरकार भी क्या कर रही है। सिर्फ जनता को ठगने के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा है। पिछले 65 सालों से देश में जनता के लिए वो सारी चीजें सपने की तरह हैं, जो आजादी के समय देखी और दिखाई गई थीं। आज भी देश की पूरी आबादी को दो वक्त का खाना मयस्सर नहीं हो रहा है और भ्रष्टाचार जो पहले सैकड़ों और हजारों में था, उसने करोड़ों और अरबों, खरबों तक का सफर तय कर लिया है।
महंगाई चरम पर है। पुराने समय में कहा जाता था कि जेब में रूपए ले जाएं और बाजार से थैला भर सामान लाएं पर अब स्थिति यह है कि थैले में रूपए ले जाने पर जेब भर सामान ही आ पाता है। दाल, रोटी, चावल का भाव आसमान को छू रहा है। जो गरीब हैं, उनको सब्सिडी में सब कुछ दिया जा रहा है। अमीरों को महंगाई से खास फर्क नहीं पड़ रहा है और इन सब के बीच पिस रहा है मध्यमवर्ग।
दंगोंं में कोई कमी नहीं आई है। देश के तकरीबन हर हिस्से में जात पात, ऊंच नीच के नाम पर अत्याचार हो रहे हैं। मुंबई जल रहा है। दिल्ली अछूती नहीं। गुजरात के दंगे पूरे देश का अमन छीन लेते हैं। असम में बोडो उग्रवाद का आतंक है तो छत्तीसगढ़ सहित देश के आधे से ज्यादा राज्य नक्सलवाद की खूनी क्रांति में जल रहे हैं। लिंग भेद हावी है। बेटियों को जलाया जा रहा है।
आज के दौर में सब कुछ महंगा है, सस्ती है तो इंसानी जान!
आज स्वतंत्रता की वर्षगांठ है। यह अवसर आत्ममंथन का है। यह विचारने का है कि देश में व्याप्त तमाम तरह की विसंगतियों से किस तरह छुटकारा पाया जा सके? किस तरह उन सपनों को साकार किया जा सके, जिसे आजादी के दीवानों ने देखा था। आखिर में सब अच्छा हो, इसी उम्मीद के साथ, इसी कामना के साथ स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं...