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07 सितंबर 2025

कांस्टीट्यूशन क्लब और संसद

संसद में सवाल पूछने के बदले रूपए लेने के आरोप में साल 2005 में संसद से बर्खास्त हुए राजनांदगाँव के तत्कालीन सांसद प्रदीप गाँधी इन दिनों फिर चर्चा में हैं। प्रदीप गाँधी हाल ही में दिल्ली में सांसदों और पूर्व सांसदों के लिए बने क्लब कांस्टीट्यूशन क्लब आफ इंडिया में निर्वाचित हुए हैं। 

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव आमतौर पर सचिव (प्रशासन), खेल सचिव, संस्कृति सचिव, कोषाध्यक्ष और 11 कार्यकारी सदस्यों के लिए कराया जाता है। 

कांस्टीट्यूशन क्लब के पदेन अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष  होते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इसके अध्यक्ष हैं। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर उपाध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश महासचिव के पद पर हैं। राजीव प्रताप रूड़ी सचिव (प्रशासन), राजीव शुक्ल सचिव(खेल), तिरुची शिवा सचिव (संस्कृति), एपी जीतेंद्र रेड्डी कोषाध्यक्ष हैं। कार्यकारिणी सदस्यों में सुरेंद्र नागर,  केसी त्यागी, संदीप दीक्षित, केआर मोहन राव, डी राजा, एपी जीतेंद्र रेड्डी, केएन सिंह देव, अजय संचेती, सुप्रिया सुले, तारीक अनवर और सतीश चंद्र मिश्रा. अरविंद कुमार इसके निदेशक हैं।

इस बार खेल सचिव के पद पर कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला और बीजेपी के राज्यसभा सांसद प्रदीप कुमार वर्मा की दावेदारी थी लेकिन अंतिम समय में बीजेपी के उम्मीदवार पीछे हट गए। इससे शुक्ल निर्विरोध खेल सचिव का चुनाव जीत गए। इसी तरह डीएमके सांसद तिरुचि सिवा बीजेपी के पूर्व सांसद प्रदीप गांधी की उम्मीदवारी वापस लेने के बाद संस्कृति सचिव चुने गए। डीएमके सांसद पी विल्सन कोषाध्यक्ष चुने गए हैं। टीआरएस के पूर्व सांसद एपी जितेंद्र रेड्डी ने कोषाध्यक्ष पद पर अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी इससे विल्सन कोषाध्यक्ष बने।

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव जीतने के बाद राजनांदगाँव लौटने पर प्रदीप गाँधी का सम्मान किया गया। सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष और राजनांदगाँव के विधायक डा रमन सिंह ने कहा कि प्रदीप गाँधी ने विधायक रहते हुए डोंगरगाँव विधानसभा की सीट उनके लिए छोडी़ थी और फिर सांसद रहते हुए संघर्षशीलता बनाए रखी। डा रमन ने कहा कि अब कांस्टीट्यूशन क्लब के   चुनाव में जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि सतत गतिशील रहकर कार्य करने वाला व्यक्ति नए मुकाम हासिल करता है। गाँधी की सम्मान सभा में राजनांदगाँव के मौजूदा सांसद संतोष पांडे, पद्मश्री डा पुखराज बाफना सहित कई गणमान्यजन मौजूद रहे।

गाँधी से जुडा़ एक बडा़ मामला साल 2005 में हुआ था। 2005 में 11 सांसदों को पैसे लेकर सवाल पूछने का दोषी पाए जाने के बाद उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी। इनमें एक राज्यसभा सांसद भी शामिल थीं। 12 दिसंबर 2005 को एक निजी चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें खुफिया कैमरों में कुछ सांसद संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेते हुए कैद हुए थे। देश के संसदीय इतिहास में ये पहली घटना थी। ये 11 सांसद किसी एक पार्टी के नहीं थे। इनमें से छह बीजेपी से, तीन बसपा से और एक-एक राजद और कांग्रेस से थे। बीजेपी से सांसद सुरेश चंदेल, अन्ना साहेब पाटिल, चंद्र प्रताप सिंह, छत्रपाल सिंह लोध, वाई जी महाजन और  प्रदीप गांधी, बीएसपी से नरेंद्र कुमार कुशवाहा और राजा राम पाल और लालचंद्र, आरजेडी से मनोज कुमार और कांग्रेस से राम सेवक सिंह शामिल थे।

उस समय स्टिंग ऑपरेशन के दौरान कुछ पत्रकारों ने एक काल्पनिक संस्था के प्रतिनिधि बनकर सांसदों से मुलाकात की थी। पत्रकारों ने सांसदों को उनकी संस्था की ओर से सवाल पूछने की बात कही और रिश्वत लेते हुए सांसदों का वीडियो बना लिया था।

इस पूरे कांड के सामने आने के 12 दिन बाद ही 24 दिसंबर 2005 को इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने को लेकर संसद में वोटिंग कराई गई थी। बाकी सभी पार्टियां आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के पक्ष में थीं पर बीजेपी ने वॉक-आउट कर दिया था। उस समय विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सांसदों ने जो किया, वो बेशक भ्रष्टाचार का मामला है, लेकिन निष्कासन की सजा ज्यादा है।

पिछली लोकसभा यानि 2019 से 2024 के दौरान भी 'कैश फॉर क्वेरी' का एक मामला हुआ था। साल 2023 की दिसम्बर में त्रिणमूल सांसद महुआ मोइत्रा को पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था। महुआ के निष्कासन के संसद के एथिक्स कमेटी की सिफारिश पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सहमति जताते हुए महुआ की उस मांग को ठुकरा दिया था जिसमें उन्होंने लोकसभा में अपनी बात रखने समय मांगा था। इसके बाद उन्हें निष्कासित कर दिया गया था।

08 दिसंबर 2015

इस पर बोलिए हुजूर...

लोकसभा में सांसद अभिषेक सिंह
बड़े दिनों बाद टीवी पर लोकसभा की कार्रवाई का सीधा प्रसारण देखा, देखने की वजह थी, सांसद (राजनांदगांव) कार्यालय से आया एसएमएस।

इस एसएमएस में लिखा गया था कि सांसद अभिषेक सिंह संसद में छत्तीसगढी़ भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखने की मांग रखेंगे।

राजनांदगांव के सांसद सोमवार को लोकसभा में प्रश्नकाल पर बोले। करीब दो से तीन मिनट, या शायद साढ़े तीन मिनट। कागज हाथ में था और बोलते समय ज्यादातर समय उनकी आंखें कागज पर थी। शायद लिखकर लाए थे और उसे पढ़ रहे थे।

संसद में सोमवार को एक और युवा को सुना। ज्योतिरादित्य सिंधिया। सूखे पर करीब आधा-पौन घंटा वो बोले। छत्तीसगढ़ के सूखे पर भी सिंधिया ने काफी कुछ कहा। देश के आधे से ज्यादा राज्यों में सूखे, ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से कुल रकबे के २० फीसदी से ज्यादा के प्रभावित हो जाने पर चिंता जताते हुए उन्होंने कई आंकड़े प्रस्तुत किए।

छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर संसद में बोला गया उनका वक्तव्य पर आपत्ति नहीं लेकिन जब पेट भरा न हो तो पेट भरने के विषय पर चर्चा हो तो ज्यादा बेहतर। सूखे की मार के चलते छत्तीसगढ़ के अधिकांश इलाके त्रस्त हैं। राजनांदगांव के सभी ब्लाक सूखाग्रस्त घोषित हो चुके हैं, ऐसे में यदि अपने सांसद को सूखे पर बोलते सुनता तो अच्छा लगता और यदि सासंद इस विषय पर बोलते तो शायद उनको लिखकर लाने की जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि सूखे के कारण अपनी जान दे चुके एक किसान के घर होकर वो खुद आ चुके हैं।

कितनी अजीब बात है ना?
राजनांदगांव जिले में सूखे के कारण करीब आठ किसान आत्महत्या कर चुके हैं और यहाँ के सूखे पर यहाँ से काफी दूर दूसरे प्रदेश गुना के सांसद बोल रहे हैं और हमारे सांसद इस पर नहीं, किसी और विषय पर...!!!

शायद इसलिए कि राज्य में और केन्द्र में सरकार उसी पार्टी की है, जिस पार्टी के सांसद हमारे प्रतिनिधि हैं, पर कुछ विषय पार्टी और विचारधारा से हटकर होना चाहिए, ये सामाजिक सरोकार के विषय हैं, इस पर बोलने से परहेज नहीं करना चाहिए।

12 फ़रवरी 2013

अफजल ने जो बोया, वो उसे मिला

भारतीय संसद पर हमले के मुख्य मास्टरमाइंड अफजल गुरू को 12 साल बाद फांसी दी गई। एक ओर आठ साल पहले इस सजा पर अदालत की मुहर लगा दिए जाने के बाद भी इस काम के लिए इतना विलंब किए जाने को लेकर सरकार की आलोचना हो रही है तो दूसरी ओर अलग ही तरह का विधवा-विलाप किया जा रहा है। कहीं फांसी की सजा का विरोध हो रहा है तो कहीं अफजल को फांसी पर ही सवाल खड़ा किया जा रहा है। भारत से परे, पाकिस्तान में और कश्मीर के कुछ हिस्सों में अफजल के इस अंजाम का विरोध हो तो फिर भी समझा जा सकता  है, लेकिन आश्चर्य तो तब होता है जब देश के भीतर ही कई बुद्धिजीवी खुद को बहुत बड़ा मानवाधिकारवादी(?) साबित करने पर तुले हुए हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि अफजल को प्राकृतिक न्याय नहीं मिल पाया, उसे बचाव का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाया। इसी कड़ी में अफजल गुरू के वकील रहे एनडी पंचोली ने एक नया विवाद पैदा करने की कोशिश की है। उन्होंने इस दुर्दांत आतंकी के मामले की तुलना आजादी के ठीक बाद हुए महात्मा गांधी हत्याकांड के आरोपियों से करते हुए राय व्यक्त की है कि गांधी जी की हत्या का अपराध, संसद पर हुए हमले से बड़ा अपराध था और जब उस मामले में अपराध में सहयोग देने वालों को फांसी नहीं, उम्रकैद हुई थी तो अफजल को फांसी देना गलत हैै।
फांसी के बाद उठ रहे तमाम तरह के सवालों में से सिर्फ एक सवाल वाजिब लगता है, वह है फांसी में हुई देरी। अफजल पर भारत के कानून के मुताबिक बकायदा मुकदमा चला था और उसे अपने बचाव का पूरा मौका मिला था। इसके बाद उसे फांसी की सजा मिली थी। हर स्तर के अदालत से फांसी पर मुहर लगने के बाद उसे बचाव का एक मौका मिला था, राष्ट्रपति के पास। वहां से भी सजा माफी की अपील खारिज हो जाने के बाद से फांसी दी गई थी। अफजल की फांसी में देरी हुई, यह जल्द हो जाना चाहिए था, सिर्फ इस बात को करने के बजाय अब इस तरह का विवाद खड़ा किया जा रहा है, मानो एक अपराधी को सजा देकर अन्याय कर दिया गया हो। अफजल की फांसी देर से पर दुरूस्त  कदम है और हम इस विषय पर आ रही तमाम आपत्ति को खारिज करते हैं।
अफजल के वकील रहे पंचोली ने बेवजह का विवाद खड़ा करने की कोशिश की है। महात्मा गांधी की हत्या के मामले से संसद हमले की उनकी तुलना भी गलत है। आजादी के बाद महात्मा गांधी की हत्या का अपराध जघन्य जरूर था, लेकिन ये दोनों मामले अलग हैं। जहां तक हमारा मानना है कि महात्मा गांधी एक व्यक्ति थे जबकि संसद पूरे देश की अस्मिता का प्रतीक एक संस्था। ऐसे में यदि दोनों मामलों की तुलना भी की जाए तो संसद पर हमला बड़ा अपराध माना जाना चाहिए, लेकिन दोनों अपराधों की तुलना कर किसी अपराध को छोटा या बड़ा करने का प्रयास सिर्फ विवाद पैदा करने की मानसिकता को दर्शाता है, इसलिए ऐसे किसी विषय की जरूरत इस वक्त नहीं है। अफजल की फांसी का विरोध करने वालों को हमारा जवाब है कि उसने जो बोया, उसे वही मिला है।

06 दिसंबर 2012

ये क्या हो रहा है राष्ट्रपति महोदय???

 इस तस्वीर पर क्या लिखा जाए? मौका था, संविधान निर्माता भीमराव बाबा साहेब आम्बेडकर की पुण्यतिथि पर आयोजित समारोह का और जगह था लोकतंत्र का मंदिर, यानि कि संसद भवन। बाबा साहेब को इस दुनिया से रूखसत हुए 57 साल हो गए। अपने पूरे जीवनकाल में बाबा साहब ने असमानता  का विरोध किया और उनका मूल मर्म था, हर इंसान को उसका वाजिब हक दिलाना। उनको सच्ची श्रद्धांजलि भी यही होती कि उनके बताए रास्ते पर चला जाए और इंसानों के बीच हो रहे भेद को समाप्त करने काम किया जाए लेकिन दुर्भाग्य है कि ऐसा हो नहीं रहा है और उनकी पुण्यतिथि के मौके पर  आयोजित समारोह के ठीक बाद ही उनके आदर्शों की धज्जियां उड़ाई गईं और यह तस्वीर सामने आई।
संसद के भीतर आज बाबा साहब की पुण्यतिथि पर बड़ी-बड़ी बातें की गई होंगी। उनके आदर्शों पर चलने की वकालत सबने की होगी। सबने कहा होगा कि बाबा साहब अंतिम पंक्ति पर खड़े व्यक्ति के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे लेकिन समारोह के खत्म होने के तुरंत बाद देश के सबसे बड़े संवैधानिक शख्स ने बाबा साहब के आदर्शों को अपने पैरों तलें रौंद देने का काम किया!
माफ करना राष्ट्रपति महोदय। माफ करना प्रणव मुखर्जी जी। पर यह आपने ही किया। आपने बाबा साहब की पुण्यतिथि  के दिन ही उनके आदर्शों का मखौल उड़ाने का काम किया। मुझे याद आ रहा है, वह दिन जब आपने राष्ट्रपति पद पर अपनी पहुंच बनाई थी और इसके बाद आपने एक बड़ा काम किया था। राष्ट्रपति के नाम के आगे 'महामहिम' लिखने की बरसों से चली आ रही परंपरा को आपने खत्म किया था। अच्छा लगा था। लगा था कि आपकी सोच बेहतर है। भारत जैसे प्रजातांत्रिक देश में अंग्रेजों के समय से चली आ रही 'महामहिमी' परंपरा को खत्म कर आप लोकतंत्र में अपनी आस्था की प्रगाढ़ता का सबूत दे रहे हैं, लेकिन आपने यह क्या किया? अपने पैरों पर जूता पहनने के लिए आपने किसी को अपने पैरों पर गिरा दिया! वह भी उस समारोह में, जो उस शख्स को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित था जिसने हर मानव को एक समझा था। माना कि आप राष्ट्रपति हैं। पर आप भगवान नहीं। आप भी इंसान हैं और आपको किसी और इंसान की इज्जत का उतना ही ख्याल होना चाहिए, जितना कि आपको अपनी इज्जत का है। आपको यह हक कतई नहीं कि आप किसी को अपने पैरों पर गिरा लें।
नहीं मालूम कि आपके पैरों में जूता पहनाने  वाला शख्स कौन है? हो सकता है, वह आपके 344 कमरों वाले आलीशान घर का आपका अपना कारिंदा हो, पर क्या यह सही है! आप देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर हैं और आप अपने हर काम से देश के लिए आदर्श बना सकते हैं, लेकिन आपकी इस तरह की तस्वीर का सामने आना क्या गलत नहीं है? आप राष्ट्रपति हैं। आपकी समझ काफी ज्यादा है। अब आप ही तय करें कि क्या आपकी इस तरह की तस्वीर किसी व्यक्ति के मानवाधिकार का उल्लंघन नहीं है?

11 सितंबर 2012

इस नुकसान की भरपाई कहां से होगी?

कोल ब्लाक आबंटन में देश का करोड़ों का नुकसान हुआ यह विपक्ष का आरोप है और इस पर सरकार का जवाब है कि अभी सिर्फ आबंटन ही हुए हैं, कहीं  से किसी प्रकार की खुदाई नहीं हुई है तो अभी से नुकसान की बात सही नहीं। सरकार और विपक्ष की बातों को छोड़ भी दिया जाए तो एक तथ्य पूरी तरह सही है कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई का 117 करोड़ रूपए बरबाद हो गया है। ये रूपया बरबाद हुआ है, सदन न चलने देने के कारण। लोकसभा और राज्यसभा की कार्रवाई 13 दिनों तक बाधित रही। हंगामा होता रहा और इसकी वजह से देश के 117 करोड़ रूपए पर पानी फिर गया।
विपक्षी नेता तर्क देते हैं कि उन्होंने सदन की कार्रवाई को बाधित कर कुछ करोड़ रूपयों का तो नुकसान किया है लेकिन इस नुकसान की कीमत पर वे देश का करोड़ों, अरबों रूपये बचाने का काम कर रहे हैं। ये रूपये कोल ब्लाक आबंटन में धांधली को रोककर बचा रहे हैं। मेरा मानना है  कि उनका यह तर्क अपने किए पर पर्दा डालने जैसा है। देश के सर्वोच्‍च सदन की कीमत को बरबाद कर वो क्या कुछ बचा लेंगे। सदन की मर्यादा को तार तार करने के बाद यदि कुछ बचा भी तो क्या बचा? लोकसभा में प्रश्रों के बदले रूपए लेने, नोट लहराने, मारपीट और धक्का-मुक्की की घटनाएं, इस तरह सदन की कार्रवाई को हंगामे की भेंट चढ़ा देना कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता।
पिछले दिनों  यहां आए भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्ता शहनवाज हुसैन का कहना था कि सदन को बाधित कर विपक्ष ने 30 करोड़ रूपए का नुकसान किया तो उसके पीछे वजह यह थी कि  देश का 3 हजार करोड़ रूपए बचा लिया जाए। अब जब आंकड़ा सामने आ गया है कि सदन की कार्रवाई बाधित होने से 117 करोड़ रूपए खर्च हुए हैं तो इससे हुसैन के 30 करोड़ के ख्याली पुलाव के आंकड़े खुद ब खुद झूठे साबित हो गए और इसके साथ ही उन पर यह भरोसा करने की वजह कहीं से नहीं रही कि इस नुकसान के कारण कैसे 3 हजार करोड़ रूपए बच जाएंगे। यहां यह तथ्य भी गौर करने वाली है कि सरकार ने कोल ब्लाक आबंटन को रद्द न करने की जिद ठान ली है और वो विपक्ष से इस पर सदन में बहस करने की ही बात करती रही।
हमारा यह मानना है कि लोकसभा और राज्यसभाओं में किसी भी मुद्दे को लेेकर बहस होनी ही चाहिए। इन सदनों के माध्यम से देश की जनता के लिए कानून बनाए जाते हैं। देश की जनता के फायदे और नुकसान को लेकर चर्चा की जाती है।  योजनाओं को मूर्तरूप देने का काम इन सदनों के माध्यम से होता है, लेकिन यदि इन सदनों को ठप कर दिया जाए तो फिर कहां चर्चा की उम्मीद की जाए?
विपक्ष को अपनी बात करने का हक है। वह सड़क पर उतर कर आंदोलन कर सकती है। जनता के बीच जाकर सरकार की कमजोरियों और कारगुजारियों को रख सकती है। पर जो काम सदन में हो सकता है, वह सड़क में नहीं हो सकता। लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले और चुनकर लोकसभा और राज्यसभा में जाने वाले लोग यदि सदन को इस तरह बाधित करने का काम करेंगे तो यह न ही सदन की मर्यादा के लिए उचित है और न देश के लिए। कोल ब्लाक को लेकर यदि कुछ गलत हुआ है तो इसे सदन में चर्चा कर भी सुधारा जा सकता था लेकिन सदन की कार्रवाई ठप होने से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा?

01 सितंबर 2012

ऐसे में कैसे होगा दूध का दूध, पानी का पानी?

दो खबरें एक साथ पढऩे मिलीं। पहले में लगातार ढप हो रही लोकसभा को चलने देने का आग्रह था यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी का तो दूसरे में एक संस्था की रिपोर्ट थी जिसमें जानकारी दी गई थी कि संसद में कौन किस हद तक मुखर होता है, चर्चा करता है। सोनिया ने कोल ब्लाक मामले में विपक्ष के प्रधानमंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद ढप किए जाने और किसी प्रकार की चर्चा न होने पर प्रहार करते हुए कहा कि संसद को चलने दें, मामले में चर्चा हो जाए और इसके बाद दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा, लेकिन दूसरी खबर बता रही है कि सोनिया खुद संसद की गतिविधियों में कितना हिस्सा लेती हैं। एक साल में सोनिया सिर्फ एक बार चर्चा में शामिल हुई है।
बड़ी विकट स्थिति है। संसद का मौजूदा सत्र लगातार कोयले की भेंट चढ़  रहा है और कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों के लोग सत्र को चलाने की दिशा में गंभीर नहीं दिख रहे हैं। एक ओर जहां विपक्षी दल प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांग रहे हैं, वहीं सत्ताधारी दल का कहना है कि इस पर चर्चा करा ली जाए। अब चर्चा यदि हो भी जाए तो जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे क्या बेहतर की उम्मीद की जा सकती है? स्थिति यह है कि कोयले की दलाली में सबके हाथ काले हैं और कोई भी इस पर चर्चा करने तैयार नहीं दिख रहा है। सब सिर्र्फ टालने में लगे हैं। ऐसा लगता है कि सत्ताधारी और विपक्ष दोनों को इस बात का डर है कि कहीं कोयले की दलाली में उनके काले मुंह सामने न आ जाए।
फिलहाल बात हो रही है संसद में कामकाज में हिस्सा लेने और उस पर पेश होने वाले मुद्दों पर चर्चा की तो इस मामले में भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी अव्वल नम्बर पर हैं। आडवाणी की संसद में हाजिरी सौ फीसदी है और उनके अलावा पीएल पुनिया ही ऐसे सासंद हैं, जो संसद में हर वक्त मौजूद रहे हैं। राहुल गांधी, नवजोत सिंह सिद्धू और अखिलेश यादव उन सांसदों में शामिल रहे हैं, जो कभी कभी संसद पहुंचे। हालांकि अब अखिलेश यादव संसद से इस्तीफा दे चुके हैं और वे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके हैं लेकिन एक से ज्यादा बार सांसद की पारी खेल चुके सिद्धू और राहुल गांधी की संसद में कम मौजूदगी चिंता की बात है।
राहुल गांधी ने साल 2011-12 में संसद में एक भी सवाल नहीं पूछा। वे संसद में पूरी तरह मौन रहे। उनके अलावा मौन रहने वाले एक और सांसद हैं, जसवंत सिंह। जसवंत भाजपा के दिग्गज नेता हैं। उनका भी संसद में मौन रहना कई सवाल खड़ा करता है। इन दोनों के अलावा करीब 65 सांसद ऐसे हैं, जिन्होंने संसद में सवाल पूछने की जहमत ही नहीं उठाई।
बेटा तो बेटा मां भी संसद में ज्यादातर समय चुप ही रहती हैं। सोनिया गांधी ने 2011-12 में संसद में सिर्फ एक बार चर्चा में हिस्सा लिया है। यह अपने आप में चिंता की बात है  कि जिस गठबंधन की सरकार केन्द्र में काबिज है उस गठबंधन की मुखिया ही संसद में चुप रहे। यह भी बड़ा सवाल है कि सोनिया कह रही है कि विपक्ष संसद चलने दे, वहां सब दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा, जब वो संसद में खामोश रहेंगी तो वे किस मुंह से इस तरह का बयान दे रही हैं?

26 अगस्त 2012

उम्मीद का सोमवार...

संसद का मानसून सत्र चल रहा है। वैसे तो यह वाक्य अपने आप में सही है, पर मौजूदा हालात को देखकर ऐसा लगने लगा है कि यह वाक्य कहीं गलत तो नहीं हो रहा। मानसूत्र सत्र में 20 दिनों की कार्रवाई हो चुकी है और आधे से ज्यादा वक्त बरबाद ही हुआ है। यानि कि कहा जाना चाहिए कि मानसूत्र सत्र घिसट-घिसट कर चल रहा है। इस बार का सत्र शुरू से ही हंगामे के नाम रहा। सत्र शुरू होते ही इस पर बाबा रामदेव का रामलीला मैदान में चलने वाले कालाधन के आंदोलन की छाया पड़ती रही तो कुछ दिन बाद कैग के रिपोर्ट ने बचा-खुचा काम कर दिया। कोयला ब्लाक आबंटन में धांधली की इस रिपोर्ट ने संसद को सुलगा दिया और इसका कीमती वक्त हर दिन राख होता जा रहा है।
यह बड़ी चिंता की बात है कि संसद में काम का वक्त कम होता जा रहा है। संसद एक ऐसी जगह है, जहां से देशवासियों के लिये योजनाएं बनती हैं और उसे सही तरीके से क्रियान्वित किया जा रहा है, या नहीं, इस बात का मूल्यांकन किया जाता है। लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है और उसे संसद में भेजती है। इस उम्मीद के साथ कि वह वहां उनकी समस्याओं को उठाने काम करेंगे, उनकी समस्याओं का निराकरण करेंगे और उनके लिए सुविधाएं जुटाने का काम करेंगे, पर हो विपरीत रहा है।
हमारे पास पिछले साल संसद की कार्रवाई के जो आंकड़े हैं, उसके मुताबिक बीते साल 73 दिन संसद की कार्रवाई चली। ये दिन संसद के काम के हिसाब से करीब आठ सौ घंटे होते हैं। संसद में होने वाले काम काज को लेकर रिसर्च करने वाली एक स्वतंत्र संस्था के आंकड़े कहते हैं कि इन घंटों में से करीब 30 प्रतिशत समय हंगामे की भेंट चढ़ गया था। पिछले साल कुल 54 विधेयकों को कानून बनाने की योजना थी, लेकिन मूर्तरूप ले पाए सिर्फ 28। संसद की कार्रवाई जब खत्म हुई उस वक्त 97 विधेयक लंबित पड़े थे। इस साल की शुरूआत बीते साल से बेहतर रही। इस साल जब बजट सत्र शुरू हुआ, तो एक भय था बीते साल का लेकिन फिर अच्छा नजर आने लगा। मार्च से लेकर मई के बीच हुए बजट सत्र का करीब 90 फीसदी समय उपयोगी  रहा और 12 विधेयक पारित किए गए। 17 नए विधेयक आए। इस तरह करीब सौ विधेयक लंबित रहे। सब कुछ ठीक चल रहा था कि बीते साल का भूत फिर निकलकर आ गया और संसद का समय बरबाद होता जा रहा है।
इस बार मानसून सत्र की शुरूआत से ही कुछ न कुछ अड़चनें पैदा होते रहीं और आखिर में कोयले की आंच में सब कुछ सुलगने लगा। कैग के रिपोर्ट में टू जी से बड़े गड़बड़झाले का मामला सामने आने के बाद से संसद में कोई काम नहीं हो रहा है। विपक्ष प्रधानमंत्री के इस्तीफे से कुछ कम में मानने को तैयार नहीं है और सत्ता पक्ष  इस्तीफे की मांग को सिरे से नकार कर कैग रिपोर्ट पर चर्चा करने की बात कह रहा है। शुक्रवार को इस उम्मीद के साथ कार्रवाई थमी थी कि सोमवार से सदन ठीक ठाक काम करने लगेगा। सत्ता पक्ष इस बात को लेकर विपक्ष के नेताओं से भी बात कर चुका है, अब देखना यह है कि सोमवार की सुबह उजाला लेकर आता है या फिर सदन में कालिख पुती नजर आएगी।