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07 सितंबर 2025

कांस्टीट्यूशन क्लब और संसद

संसद में सवाल पूछने के बदले रूपए लेने के आरोप में साल 2005 में संसद से बर्खास्त हुए राजनांदगाँव के तत्कालीन सांसद प्रदीप गाँधी इन दिनों फिर चर्चा में हैं। प्रदीप गाँधी हाल ही में दिल्ली में सांसदों और पूर्व सांसदों के लिए बने क्लब कांस्टीट्यूशन क्लब आफ इंडिया में निर्वाचित हुए हैं। 

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव आमतौर पर सचिव (प्रशासन), खेल सचिव, संस्कृति सचिव, कोषाध्यक्ष और 11 कार्यकारी सदस्यों के लिए कराया जाता है। 

कांस्टीट्यूशन क्लब के पदेन अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष  होते हैं। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला इसके अध्यक्ष हैं। केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर उपाध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश महासचिव के पद पर हैं। राजीव प्रताप रूड़ी सचिव (प्रशासन), राजीव शुक्ल सचिव(खेल), तिरुची शिवा सचिव (संस्कृति), एपी जीतेंद्र रेड्डी कोषाध्यक्ष हैं। कार्यकारिणी सदस्यों में सुरेंद्र नागर,  केसी त्यागी, संदीप दीक्षित, केआर मोहन राव, डी राजा, एपी जीतेंद्र रेड्डी, केएन सिंह देव, अजय संचेती, सुप्रिया सुले, तारीक अनवर और सतीश चंद्र मिश्रा. अरविंद कुमार इसके निदेशक हैं।

इस बार खेल सचिव के पद पर कांग्रेस सांसद राजीव शुक्ला और बीजेपी के राज्यसभा सांसद प्रदीप कुमार वर्मा की दावेदारी थी लेकिन अंतिम समय में बीजेपी के उम्मीदवार पीछे हट गए। इससे शुक्ल निर्विरोध खेल सचिव का चुनाव जीत गए। इसी तरह डीएमके सांसद तिरुचि सिवा बीजेपी के पूर्व सांसद प्रदीप गांधी की उम्मीदवारी वापस लेने के बाद संस्कृति सचिव चुने गए। डीएमके सांसद पी विल्सन कोषाध्यक्ष चुने गए हैं। टीआरएस के पूर्व सांसद एपी जितेंद्र रेड्डी ने कोषाध्यक्ष पद पर अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी इससे विल्सन कोषाध्यक्ष बने।

कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव जीतने के बाद राजनांदगाँव लौटने पर प्रदीप गाँधी का सम्मान किया गया। सम्मान समारोह को संबोधित करते हुए विधानसभा अध्यक्ष और राजनांदगाँव के विधायक डा रमन सिंह ने कहा कि प्रदीप गाँधी ने विधायक रहते हुए डोंगरगाँव विधानसभा की सीट उनके लिए छोडी़ थी और फिर सांसद रहते हुए संघर्षशीलता बनाए रखी। डा रमन ने कहा कि अब कांस्टीट्यूशन क्लब के   चुनाव में जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि सतत गतिशील रहकर कार्य करने वाला व्यक्ति नए मुकाम हासिल करता है। गाँधी की सम्मान सभा में राजनांदगाँव के मौजूदा सांसद संतोष पांडे, पद्मश्री डा पुखराज बाफना सहित कई गणमान्यजन मौजूद रहे।

गाँधी से जुडा़ एक बडा़ मामला साल 2005 में हुआ था। 2005 में 11 सांसदों को पैसे लेकर सवाल पूछने का दोषी पाए जाने के बाद उनकी संसद सदस्यता रद्द कर दी गई थी। इनमें एक राज्यसभा सांसद भी शामिल थीं। 12 दिसंबर 2005 को एक निजी चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था जिसमें खुफिया कैमरों में कुछ सांसद संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेते हुए कैद हुए थे। देश के संसदीय इतिहास में ये पहली घटना थी। ये 11 सांसद किसी एक पार्टी के नहीं थे। इनमें से छह बीजेपी से, तीन बसपा से और एक-एक राजद और कांग्रेस से थे। बीजेपी से सांसद सुरेश चंदेल, अन्ना साहेब पाटिल, चंद्र प्रताप सिंह, छत्रपाल सिंह लोध, वाई जी महाजन और  प्रदीप गांधी, बीएसपी से नरेंद्र कुमार कुशवाहा और राजा राम पाल और लालचंद्र, आरजेडी से मनोज कुमार और कांग्रेस से राम सेवक सिंह शामिल थे।

उस समय स्टिंग ऑपरेशन के दौरान कुछ पत्रकारों ने एक काल्पनिक संस्था के प्रतिनिधि बनकर सांसदों से मुलाकात की थी। पत्रकारों ने सांसदों को उनकी संस्था की ओर से सवाल पूछने की बात कही और रिश्वत लेते हुए सांसदों का वीडियो बना लिया था।

इस पूरे कांड के सामने आने के 12 दिन बाद ही 24 दिसंबर 2005 को इन सांसदों की सदस्यता रद्द करने को लेकर संसद में वोटिंग कराई गई थी। बाकी सभी पार्टियां आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के पक्ष में थीं पर बीजेपी ने वॉक-आउट कर दिया था। उस समय विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि सांसदों ने जो किया, वो बेशक भ्रष्टाचार का मामला है, लेकिन निष्कासन की सजा ज्यादा है।

पिछली लोकसभा यानि 2019 से 2024 के दौरान भी 'कैश फॉर क्वेरी' का एक मामला हुआ था। साल 2023 की दिसम्बर में त्रिणमूल सांसद महुआ मोइत्रा को पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था। महुआ के निष्कासन के संसद के एथिक्स कमेटी की सिफारिश पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सहमति जताते हुए महुआ की उस मांग को ठुकरा दिया था जिसमें उन्होंने लोकसभा में अपनी बात रखने समय मांगा था। इसके बाद उन्हें निष्कासित कर दिया गया था।

13 जनवरी 2013

राष्ट्रीय शर्म है यह!!!

इसे इस देश का दुर्भाग्य कहें या फिर देश में राज करने वाले सत्ताधीशों की नपुंसकता कि किसी समय हमारी दी हुई रोटी पर अपना वर्तमान और भविष्य गढऩे वाला एक पिद्दी सा देश हम पर लगातार हमले करता रहा है और हमारे हुक्मरान सिर्फ बातें ही कर रहे हैं। इससे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि वह कमीना देश हमारी सीमा पर घुसकर हमारे एक जवान का सिर काटकर अपने साथ ले जाता है, जश्र मनाता रहता है और हमारे मंत्री कोई जवाबी कार्रवाई न करने की बात करते रहते हैं। शर्म से डूब मरने का वक्त है नेताओं केे लिए कि जिस जवान का सिर पाकिस्तानी ले गए हैं, उसके परिजन भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं।
पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय सीमा में गोलीबारी करता रहा है। करगिल युद्ध के बाद से दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम का समझौता हुआ है, लेकिन पाकिस्तान इसका उल्लंघन किए जा रहा है। दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ रिश्ते निभाने की कवायद हर स्तर पर हो रही है। पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी देश में बुलाए जा रहे हैं। तर्क दिया जा रहा है कि खेल के माध्यम से दोनों देशों के बीच रिश्तों में नरमी आएगी। पाकिस्तानी हॉॅकी खिलाडिय़ों को आमंत्रित किया जा रहा है। पाकिस्तानी कलाकारों को भारतीय टीवी चैनलों में आमंत्रित किया जा रहा है। फिल्मों में काम दिया जा रहा है। पाकिस्तान के नेताओं से गले मिलने का काम किया जा रहा है, लेकिन जो गद्दार है, वह गद्दार रहेगा की तर्ज पर पाकिस्तान हर बार पीठ में छुरा भोंकने का काम कर रहा है। ऐसे में ऐसे देश के साथ किसी भी तरह के रिश्ते की बात करना न सिर्फ बेवकूफी है, बल्कि देशहित में नहीं है।
पाकिस्तान लगातार भारतीय सैनिकों को उकसाने का काम कर रहा है। हमारे सैनिकों ने यदि उसका जवाब दिया तो वही होगा, जो पहले हो चुका है। 1962, 1971 और 1991 का युद्ध पाकिस्तान को नहीं भूलना चाहिए। उसके घर में घुसकर मारा गया था उसे। सत्ता में काबिज लोगों की कमजोरी सैनिकों को भारी पड़ रही है। सीमा पर गोलीबारी करने वाले दुस्साहसी पाकिस्तान ने पिछले दिनों भारत के क्षेत्र में घुसकर हमारे दो जवानों को मार डाला और दोनों के सिर काट डाले। अमानवीयता की हदें पार करते हुए उसने एक सैनिक का सिर्फ धड़ यहां छोड़ा और सिर अपने साथ ले गया। दो सैनिकों की इस तरह धोखे से की गई हत्या के मामले में पूरा देश उबल रहा है लेकिन राजनीतिक स्तर पर अभी तक पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह के कठोर कदम की बात सत्ता में बैठे लोगों ने नहीं की है। उल्टे देश के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद यह एलान करते हैं कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ किसी तरह की इंतकामी कार्रवाई नहीं करेगा। दूसरी ओर अपने दुश्मनों को उसी के देश  में घुसकर मारने वाले अमेरिका ने भारत को सब्र से काम लेने की सलाह दी है। अमेरिका लगातार पाकिस्तान पर ड्रोन हमले कर रहा है और दूसरी ओर भारत को शांति की नसीहत दे रहा है।
हमारे हुक्मरानों को अमेरिका के मुफ्त की सलाह और अंतरराष्ट्रीय संबंधों का ख्याल रखने के पहले अपने देश की भावनाओं को समझना चाहिए। पूरा देश चाह रहा है कि पाकिस्तान को उसके किए की सजा मिलनी चाहिए और उसे कड़ा जवाब मिलना चाहिए।
इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा कि हमारे देश की सरहद में शहीद हुए एक जवान के परिजन अपने बेटे की शहादत को सम्मान दिए जाने, उसके आधे शरीर (सिर) को मांगने के लिए भूख हड़ताल पर बैठ जाएं और इस पर सरकारी स्तर पर कोई बात न की जाए। हम कहते हैं कि पाकिस्तान पर फिलहाल जवाबी कार्रवाई न करने का बयान देने वाले नेताओं ने क्या पाकिस्तान से यह बात की है कि उसके सैनिक का कटा हुआ सिर वापस किया जाए। सैनिकों के परिजनों का भूख हड़ताल पर बैठना सिर्फ एक घटना नहीं, राष्ट्रीय शर्म का विषय है।

01 अक्टूबर 2012

तब होगा भगत सिंह का सच्‍चा सम्‍मान

पाकिस्तान ने बड़े समय बाद एक अच्छा काम किया है। शहीदे आजम भगत सिंह को हमारे देश में आदर्श की तरह पूजा जाता है और पाकिस्तान का आवाम भी उनको उतनी ही इज्जत देता है। वहां भी उनको अंग्रेजों के शासन के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंकने वाला नायक माना जाता है। शहीद भगत सिंह की ज्यादातर यादें पाकिस्तान से जुड़ी हुई हैं। उनको फांसी भी लाहौर जेल में दी गई थी। जिस जगह पर उनको फांसी दी गई थी, वह उनके चाहने वालों के लिए काफी महत्वपूर्ण जगह है और उनकी इस जयंती पर उनके भारत के चाहने वालों को हालांकि वहां जाकर अपने नायक को श्रद्धासुमन अर्पित करने का सपना वीजा न मिलने के कारण पूरा नहीं हो पाया लेकिन इसके बाद पाकिस्तान के अफसरों ने उस लाहौर चौक का नामकरण भगत सिंह चौक करने की घोषणा कर एक अच्छा कदम उठाया है।
पाकिस्तान ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगत सिंह की क्रांतिकारी भावना और इस उप महाद्वीप में अंग्रेजों (ब्रिटेन) के शासन के खिलाफ उनकी भूमिका का मान रखते हुए लाहौर के पुराने लाहौर चौक (अब शदमान चौक) का नामकरण भगत सिंह चौक रखने की घोषणा की है। इसी जगह पर लाहौर जेल था,  जहां मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दी गई थी। बाद में इस जगह पर लाहौर चौक बना दिया गया जो अब से भगत सिंह के नाम से जाना जाएगा। हालांकि इस चौक का नाम किसी अन्य के नाम पर रखने का आवेदन भी प्रशासन के पास पहुंचा था लेकिन वहां के प्रशासनिक प्रमुख ने एक कड़ा पत्र लिखकर कहा है कि भगत सिंह जैसी शख्सियत के नाम पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
यह एक अच्छा कदम है। हम इस कदम की प्रशंसा करते हैं और इसका स्वागत करते हैं। साथ ही यह उम्मीद जाहिर करते हैं कि भगत सिंह जैसे सर्वमान्य शहीद को पाकिस्तान में वही सम्मान मिलना और आदर से उनके नाम का इस्तेमाल करना एक बेहतर संदेश देगा। इस कदम को सिर्फ एक चौक के किसी शहीद के नाम पर करने के प्रशासनिक निर्णय के तौर पर नहीं देखना चाहिए। वैसे भी जिस वक्त भगत सिंह शहीद हुए थे, न पाकिस्तान का वजूद था और न ही भारत विभाजित था। वे इस पूरे उपमहाद्वीप की आजादी के लिए लड़े थे और उनका सपना पूरे उप महाद्वीप को अंग्रेजों के चंगुल से आजाद कराना था। इस लिहाज से वे भारत, पाकिस्तान सहित उस समय उपमहाद्वीप के हिस्से रहे सभी जगहों पर समान रूप से आदरणीय थे और रहेंगे।
हम यह भी उम्मीद करते हैं कि भगत सिंह को सम्मान देकर पाकिस्तान ने जो कदम उठाया है, उसके बाद वह भगत सिंह के आदर्शों पर भी चलने का काम करेगा। देशों की सरहद बंट चुकी है और अब भारत-पाकिस्तान में अलग अलग हुकुमतें आ गई हैं लेकिन उनके बीच तनाव का माहौन हमेशा बना रहता है। दोनों पड़ौसी देश  सुकून से नहीं रह पाते हैं और कभी घोषित तो निरंतर अघोषित युद्ध की स्थिति बनी रहती है। भगत सिंह यह कभी नहीं चाहते तो दोनों देशों में अमन और चैन कायम हो, यह प्रयास अब होने चाहिए। पाकिस्तान को अपने देश में रहने वाले हिंदू नागरिकों के साथ भी सद्भावनापूर्वक व्यवहार करने की पहल करनी चाहिए, तभी भगत सिंह जैसे शहीदों को दिए जाने वाले सम्मान का सही सम्मान हो पाएगा।

आमीन....