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11 सितंबर 2012

इस नुकसान की भरपाई कहां से होगी?

कोल ब्लाक आबंटन में देश का करोड़ों का नुकसान हुआ यह विपक्ष का आरोप है और इस पर सरकार का जवाब है कि अभी सिर्फ आबंटन ही हुए हैं, कहीं  से किसी प्रकार की खुदाई नहीं हुई है तो अभी से नुकसान की बात सही नहीं। सरकार और विपक्ष की बातों को छोड़ भी दिया जाए तो एक तथ्य पूरी तरह सही है कि देश की जनता की गाढ़ी कमाई का 117 करोड़ रूपए बरबाद हो गया है। ये रूपया बरबाद हुआ है, सदन न चलने देने के कारण। लोकसभा और राज्यसभा की कार्रवाई 13 दिनों तक बाधित रही। हंगामा होता रहा और इसकी वजह से देश के 117 करोड़ रूपए पर पानी फिर गया।
विपक्षी नेता तर्क देते हैं कि उन्होंने सदन की कार्रवाई को बाधित कर कुछ करोड़ रूपयों का तो नुकसान किया है लेकिन इस नुकसान की कीमत पर वे देश का करोड़ों, अरबों रूपये बचाने का काम कर रहे हैं। ये रूपये कोल ब्लाक आबंटन में धांधली को रोककर बचा रहे हैं। मेरा मानना है  कि उनका यह तर्क अपने किए पर पर्दा डालने जैसा है। देश के सर्वोच्‍च सदन की कीमत को बरबाद कर वो क्या कुछ बचा लेंगे। सदन की मर्यादा को तार तार करने के बाद यदि कुछ बचा भी तो क्या बचा? लोकसभा में प्रश्रों के बदले रूपए लेने, नोट लहराने, मारपीट और धक्का-मुक्की की घटनाएं, इस तरह सदन की कार्रवाई को हंगामे की भेंट चढ़ा देना कहीं से उचित नहीं कहा जा सकता।
पिछले दिनों  यहां आए भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्ता शहनवाज हुसैन का कहना था कि सदन को बाधित कर विपक्ष ने 30 करोड़ रूपए का नुकसान किया तो उसके पीछे वजह यह थी कि  देश का 3 हजार करोड़ रूपए बचा लिया जाए। अब जब आंकड़ा सामने आ गया है कि सदन की कार्रवाई बाधित होने से 117 करोड़ रूपए खर्च हुए हैं तो इससे हुसैन के 30 करोड़ के ख्याली पुलाव के आंकड़े खुद ब खुद झूठे साबित हो गए और इसके साथ ही उन पर यह भरोसा करने की वजह कहीं से नहीं रही कि इस नुकसान के कारण कैसे 3 हजार करोड़ रूपए बच जाएंगे। यहां यह तथ्य भी गौर करने वाली है कि सरकार ने कोल ब्लाक आबंटन को रद्द न करने की जिद ठान ली है और वो विपक्ष से इस पर सदन में बहस करने की ही बात करती रही।
हमारा यह मानना है कि लोकसभा और राज्यसभाओं में किसी भी मुद्दे को लेेकर बहस होनी ही चाहिए। इन सदनों के माध्यम से देश की जनता के लिए कानून बनाए जाते हैं। देश की जनता के फायदे और नुकसान को लेकर चर्चा की जाती है।  योजनाओं को मूर्तरूप देने का काम इन सदनों के माध्यम से होता है, लेकिन यदि इन सदनों को ठप कर दिया जाए तो फिर कहां चर्चा की उम्मीद की जाए?
विपक्ष को अपनी बात करने का हक है। वह सड़क पर उतर कर आंदोलन कर सकती है। जनता के बीच जाकर सरकार की कमजोरियों और कारगुजारियों को रख सकती है। पर जो काम सदन में हो सकता है, वह सड़क में नहीं हो सकता। लोकतंत्र में भरोसा रखने वाले और चुनकर लोकसभा और राज्यसभा में जाने वाले लोग यदि सदन को इस तरह बाधित करने का काम करेंगे तो यह न ही सदन की मर्यादा के लिए उचित है और न देश के लिए। कोल ब्लाक को लेकर यदि कुछ गलत हुआ है तो इसे सदन में चर्चा कर भी सुधारा जा सकता था लेकिन सदन की कार्रवाई ठप होने से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा?

28 जून 2012

भारत के नक्‍शे में करांची और पाकिस्‍तान...

सरबजीत सिंह
एक पुरानी कहावत है, चोर चोरी से जाए, पर हेराफेरी से न जाए। पाकिस्तान का भी यही हाल है। किसी समय भारत की दया पर जिंदा रहने और भारत की वजह से ही अपने वजूद को हासिल करने वाले पाकिस्तान ने समय-समय पर अपनी कमीनी हरकतों से दुनिया को रू ब रू कराया है और इस समय भी जब उम्मीद की जा रही थी कि वह सद्भावना के रास्ते को आगे बढ़ाने का काम करेगा, उसने अपनी हरकतों से अपनी औकात और अपनी जात बताने का काम किया है।
कुछ दिनों पहले भारत ने अजमेर की एक जेल में बंद पाकिस्तानी वैज्ञानिक खलील चिश्ती को रिहा किया था। हालांकि पहले दोनों देशों के बीच यह  तय हुआ था कि चिश्ती को भारत से रिहा किया जाए और बदले में पाकिस्तान अपनी जेल में बंद भारतीय सबरजीत सिंह को रिहा करेगा। यह रिहाई अगस्त 2014 में होनी थी। उस समय यह काम रूक गया था और बाद में इस पर फिर विचार किया गया। दोनों देश के राजनयिकों के बीच बात हुई और आखिरकार चिश्ती को भारत ने रिहा कर दिया। भारत के इस कदम का  अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वागत किया गया और इसके बाद इंतजार किया जाता रहा कि पाकिस्तान भी सबरजीत को रिहा करेगा।
मंगलवार को ही यह खबर आई कि पाकिस्तान सबरजीत को रिहा करने वाला है और उसकी फांसी की सजा को पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने उम्र कैद में तब्दील कर दी है। इस फैसले के बाद 22 सालों से पाकिस्तान के जेल में रह रहे सबरजीत की रिहाई की उम्मीद बढ़ गई। मंगलवार शाम और रात तक इस बात के कयास लगाए जाते रहे कि सबरजीत सिंह एक-दो दिन में रिहा होकर वतन लौट आएंगे, पाकिस्तानी सरकार ने भी इस संबंध में सकारात्मक जवाब ही दिया था, लेकिन कहते हैं कि हरामखोरी जाती नहीं। पाकिस्तान ने देर रात साफ कर दिया कि सबरजीत सिंह रिहा नहीं होंगे।
पाकिस्तान के इस धोखेबाजी भरे फैसले से पूरा हिंदूस्तान हतप्रभ है। मंगलवार की शाम से आ रही खबरों से उत्साहित और खुश सरबजीत के परिवार के लोग उस समय अवाक रह गए जब देर रात पाकिस्तान की ओर से खबर आई कि सरबजीत को रिहा नहीं किया जाएगा। पाकिस्तान ने सरबजीत के बजाय करीब 30 सालों से पाकिस्तान के जेल में रह रहे सुरजीत सिंह को रिहा करने की बात की है। सुरजीत सिंह का रिहा होना भी उसके परिवार के लिए एक अच्‍छी खबर है लेकिन सोमवार रात से रिहाई की आस लगाए सरबजीत के परिवार पर यह धोखा कुठाराधात की तरह है।
बताते हैं कि पाकिस्तानी सरकार ने सरबजीत की रिहाई के फैसले को इस वजह से बदला क्योंकि सरबजीत की रिहाई होने पर पाकिस्तान में एक तबके ने विद्रोह की चेतावनी दी थी। पाकिस्तान की सरकार अपने आवाम की उस नाजायज बात पर अपने वादे से मुकर गई,  जो उसे सरासर दोगला बता सकता था।
 मेरा मानना है कि पाकिस्तान भरोसे के काबिल देश है ही नहीं। हरामखोरों की फौज यहां भरी पड़ी है। जिस समय दोनों देशों के नेता (भारत की ओर से तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ) शिमला में दोनों देशों में शांति-सौहाद्र पर बात कर रहे थे, यह नापाक देश करगिल में हमले की योजना बना रहा था। हर बार युद्ध के मैदान में भारत से धूल चाट चुके पाकिस्तान ने करगिल में भी मात खाई।
युद्ध किसी भी मसले का हल कतई नहीं होता, लेकिन मेरा मानना है कि जो भूत बातों से नहीं मानते, उनको लातों से ही मनाना चाहिए। पाकिस्तान को एक बार फिर करारा जवाब देना चाहिए और कड़े फैसले लेकर एक बार में सारे विवाद हल कर देने चाहिए। फिर भारत के नक्शे में इस्लामाबाद और कराची भी शामिल हो जाएगा।