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06 मई 2015

सुराखों से झॉंकती बेबसी...



यह सिर्फ एक तस्‍वीर नहीं है। यह आईना है सरकार का! यह आईना है, सरकार के कामकाज का! ! यह आईना है, सरकार के तमाम दावों का! ! ! यह आईना है, सरकार के लंबे चौडे बजट के आंकड़ों का! ! ! ! यह आंकडा है, हर दिन अखबारों में सुर्खियां बनने वाली सरकारी विज्ञप्तियों का! ! ! ! ! यह आंकड़ा है, पूरे सरकारी तंत्र का! ! ! ! ! !
जिस प्रदेश में सरकार तेंदूपत्‍ता बीनने वालों के ‘’पैर’’ का ख्‍याल रखने का ‘’दंभ’’ भरते हुए चरणपादुका बांटने का काम कर अपनी पीठ थपथपाने का काम करती है, उस प्रदेश में यह चप्‍पल अपनी कहानी खुद बयां कर रही है। यह किसके चप्‍पल की तस्‍वीर है, यह तो नहीं मालूम लेकिन कुछ दिन पहले एक पत्रकार साथी श्री रूपेश गुप्‍ता जी और श्री ऋषि मिश्रा जी के माध्‍यम से यह तस्‍वीर मेरे सामने आई तो मैं अवाक रह गया... इस चप्‍पल की तस्‍वीर को देखकर कई तरह के ख्‍याल आए लेकिन जब इस तस्‍वीर को मैंने अपने आसपास के, प्रदेश के, देश के मीडियाजगत से जुडे कुछ प्रबुद्धजनों के सामने प्रस्‍तुत किया तो उन्‍होंने इस तस्‍वीर के साथ अपनी भावनाएं जिस अंदाज में बयां की, उसने मुझे इस पर लिखने, उन प्रबुद्धजनों की भावनाओं को एक साथ पिरोकर एक पूरी पोस्‍ट लिखने मजबूर कर दिया।
अब यह सिर्फ तस्‍वीर नहीं है। एक पूरी कहानी बन गई है। सवाल अब यह नहीं रह जाता कि यह चप्‍पल किसकी है, सवाल यह है कि क्‍यों कर इस स्थिति तक इस चप्‍पल को सहेजा गया... सहेजा गया है तो यह भी तय है कि पहना भी गया होगा और पहना भी जा रहा होगा.... सवाल फिर कि इस स्थिति तक पहुंचने के बाद भी इसे पहनने वाला किस हालात में जी रहा होगा....
गौर कीजिए, ‘मैं भी इन चप्पलों देखकर हिल गया हूं। लगातार सोच रहा हूं कि इन चप्पलों को बचाने वाला कितना मजबूर होगा। क्या यह चप्पल किसी मजदूर की है। एक बेबस मां की भी हो सकती है यह चप्पल।’ तस्‍वीर पर इस तरह की टिप्‍पणी की श्री राजकुमार सोनी जी ने। सोनी जी राजधानी रायपुर में लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वे आगे और इस पर लिखते हैं, ‘भाई यह कोई मामूली चप्पल नहीं है। यह एक दर्द है जिससे मैं जिंदगी भर परेशान रहूंगा शायद।’ आगे और, ‘मुझे परेशान रहना भी चाहिए’, ‘एक क्रूर व्यवस्था की हकीकत भी ये चप्पलें’।’ सोनी जी ने इस तस्‍वीर में वह बात पकड़ी, जिसे शायद ही और किसी ने पकड़ी हो, वे लिखते हैं, ‘चप्पलों को गौर से देखो। इसे पहनने वाले ने इसके पट्टे को बचाने के लिए भी टांके लगवाए हैं। इस चप्पल का मजाक तो बिल्कुल भी नहीं बनाया जा सकता।’
नईदुनिया रायपुर के संपादक श्री रूचिर गर्ग जी इस तस्‍वीर को देखकर कलम चलाते हैं, ‘4 जी की ओर बढ़ते कदम’। लंबे समय से शिक्षकीय कार्य कर रहे और इस समय रायपुर में गरीब बच्‍चों की शिक्षा दीक्षा से जुडे श्री चुन्‍नीलाल शर्मा जी लिखते हैं, ‘ विवशताओं की अंतहीन दास्तां बयां करती चप्पले ...!!’ श्री संतोष जैन जी की कलम कहती है, ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की’। श्री योगेश पांडे जी कम शब्‍दों में बात रखते हैं और लिखते हैं, ‘बेबसी की कहानी’। श्री सतीष कुमार चौहान जी कहते हैं, ‘प्रजातंत्र के सयानों के लिऐ एक सुन्‍दर सार्थक राष्‍ट्रीय पुरष्‍कार’। श्री संजय द्विेवेदी जी का दर्द देखिए, ‘ कुछ कहने में असमर्थ हूं! पीड़ा, दर्द सब इनमें समाया है! भाई... अच्‍छे दिन का सपना कहीं यही तो नहीं? 1947 से 2015 आ गया, ये चप्‍पल वैसी की वैसी क्‍यूं है?
अमर उजाला दिल्‍ली के वरिष्‍ठ पत्रकार श्री विनोद वर्मा जी की कलम भी कम शब्‍दों में बड़ी बात कहती है, ‘ज़मीन से जुड़े पांव’। नक्‍सल समस्‍या से जूझ रहे बस्‍तर के कांकेर में सहारा समय के पत्रकार श्री राजेश शुक्ला जी अपने ही अंदाज में कहते हैं, ‘एक सच्चे पत्रकार की होगी ये’। श्री विजय केडिया जी लिखते हैं, ‘चरण पादुका योजना की सरकारी चप्पल : पहनने के बाद अब मारने के काम आएगी’। श्री अभिज्ञान सिंह जी अंतरिक्ष में इंसानी हलचल से इस तस्‍वीर को जोडते हुए कहते हैं, ‘नई सदी की घिसी चप्‍पल, मंगल की ओर बढते कदम...। मूल रूप से छत्‍तीसगढ़ के निवासी और वर्तमान में देश की राजधानी दिल्‍ली में सहारा समय के पत्रकार श्री सुनील बजारी जी कहते हैं, ‘"अच्छे दिनों" की ओर बढ़ते छत्तीसगढ़ के कदम....’। नक्‍सलवाद से जूझ रहे बस्‍तर के जगदलपुर के एक भावुक पत्रकार रजत वाजपेई  इस चप्‍पल को, ‘5 बेटियो के बाप की चप्पल’ बताते हैं।  श्री विजय केडिया जी इस चप्‍पल पर एक राय और रखते हैं, ‘मंजिल यू ही नहीं मिलती, हौसला अभी बाकी है..!!!’।  श्री अजयभान सिंह जी छत्‍तीसगढ़ के नेताओं के ‘विकास’ पर व्‍यंग्‍य करते हैं, ‘मुझे तो ये छततीसगढ़ के किसी वर्तमान मंत्री की 2003 से पहले की हकीकत लगती है... नाम लेना शायद जरूरी नहीं’।
श्री यश जी छत्‍तीसगढ़ में हर साल चलने वाले ‘सुराज’ अभियान की वास्‍तविक तस्‍वीर दिखाने की कोशिश इस चप्‍पल के माध्‍यम से करते हैं, ‘ग्राम सुराज! शिकायतें देते रहिए, चप्पलें घिसते रहिए’। श्री राजेश दुआ जी लिखते हैं, ‘गौर से देखिए...ये वही चरण पादुकाएँ हैं जिनको सिंहासन में विराजित कर प्रदेश ही नहीं समूचे देश में एक बार फिर से रामराज स्थापित किया जा सकता है’। न्‍यायधानी बिलासपुर में इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के पत्रकार श्री विश्वेश ठाकरे जी कहते हैं, चप्पल चिंतन, वो दिखाते रहे मुझे आसमानों के ख्वाब... इधर पैरों के नीचे से, जमीन भी ले गया कोई...’। श्री यश जी एक बार और शायराना अंदाज में लिखते हैं, ‘अर्जियां सारी हुक्मरानों को देता रहा, पांव चलते रहे और तलवे जलते रहे, कोई आस मिली न मिला आसरा, जो था वो भी गया, हम हाथ मलते रहे’। श्री हर्ष पांडे जी कहते हैं, ‘ क़दमों की चाल नहीं, जीवन का संघर्ष दिखाती हैं ये चप्पलें..., किसी मजबूर की तकदीर की तस्वीर दिखाती हैं ये चप्पलें.., सोचता होगा वह शख्स भी कि काश कमबख्त पेट न होता.., पेट भरने को दिन रात चलाती हैं ये चप्पलें।। श्री रतन जसवानी जी फिल्‍मी अंदाज में अपनी बात करते हैं, ‘चप्पलें घिसने से डर नहीं लगता साब, मिट्टी छिन जाने से लगता है।।’। श्री सुरेश महापात्रा जी लिखते हैं, ‘सुराज ढूंढते चप्पल घिसा, तलुए जमीं पर..’।
राजनांदगाँव में पत्रकार श्री संदीप साहू जी भी इस चप्‍पल को सुराज से जोड़ते हैं और लिखते हैं, ‘नया राज... नया सुराज... अच्‍छे दिनों की जमीनी चप्‍पल’। राजनांदगांव में ही पत्रकार श्री संतोष दुबे जी बडे़ भावुक अंदाज में कहते हैं, ‘यही है जीवन की सच्चाई संघर्ष करके अपने परिवार और अपना जीवन यापन करने वाले कई शख्स आज भी हैं, जिन्होंने एक खुशी, घर वालो के मुस्कान के लिए कभी पैरों के छालों की परवाह नही की। तंगी मे भी उसे सुकून है क्योंकि वही इंसान है जिसमें इंसानियत है। सिर्फ एक ही सपना मैं भले भूखा रहूं, मेरे बच्चो को कम से कम आधी ही सही पर मेहनत की रोटी नसीब हो। सलाम संघर्ष और ईमानदारी को’। श्री विनोद दास जी संक्षेप में लिखते हैं, ‘समृद्ध छत्तीसगढ़’। श्री सुप्रकाश  मलिक मिथू जी लिखते हैं, ‘बहुत कुछ कहना चाहती है ये चप्पल’। राजनांदगांव के पत्रकार श्री हफीज खान ने लिखा, 'मैं भी फटे चप्‍पल पहन चुका हूं, पर इससे कुछ कम फटे होने पर ही चप्‍पल बदलने का अवसर मिलता था'।
अपने व्‍यंग्‍य और रचनाओं के माध्‍यम से हमेशा सोचने पर मजबूर कर देने वाले वरिष्‍ठ साहित्‍यकार, पत्रकार श्री गिरीश पंकज जी के शब्‍दों में, ‘ये चप्पल नहीं एक बयांन है, कि आखिर किस हाल में, ये हिंदुस्तान है’। राजधानी के वरिष्‍ठ पत्रकार श्री जितेन्‍द्र शर्मा जी लिखते हैं, ‘ये चप्पल नहीं पूरी कहानी है एक जीवन के संघर्षों की’। इस तस्‍वीर को पहली बार देखने के बाद मेरे मन में जो आया वह यह था, ‘ये चप्पल गवाह है इस बात का कि मौजूदा दौर में इमानदारी ढूंढ़ने के लिए क्या कीमत चुकानी पड़ जाती है। कहावत भी है, चप्पल घिंस गए इस उम्मीद में कि काम हो जाए!!!
... और आखिर में ‘अखबारों के शीर्षक’ विषय में पीएचडी करने वाले वरिष्‍ठ पत्रकार डा. महेश परिमल जी के शब्‍द, ‘सुराखों से झॉंकती बेबसी...’

06 मई 2011

प्‍यार, प्‍यार, प्‍यार......


http://atulshrivastavaa.blogspot.com
जिंदगी इंसान को कभी कभी ऐसे मोड पर लाकर खडा कर देती है कि इंसान विचारशून्‍य हो जाता है और कोई फैसला लेने की स्थिति में नहीं रहता। मैं भी स्‍वयं को ऐसी ही परिस्थिति में पा रहा हूं और अपने हालात को आप सब से साझा कर रहा हूं। अब आप ही बताईए कि मुझे क्‍या करना चाहिए। मैंने अपनी जिंदगी का फैसला आप पर छोड दिया है। 
मैं आकाश। मैं एक निजी कंपनी में काम करता हूं। मेरी कहानी कोई तीन वर्ष पहले शुरू होती है, जब मेरे कार्यालय में एक लडकी किसी काम को लेकर आई। परेशान थी लेकिन इस स्थिति में भी सुंदरता चेहरे में समेटे उस लडकी का नाम था राजश्री। उसका नाम मुझे उससे दूसरी मुलाकात में पता चला। उससे दूसरी मुलाकात भी इत्‍तेफाकन बस में हुई। पहल शायद उसी ने की। उसने मुझसे अपने कार्य की प्रगति को लेकर जानकारी चाही और इसी क्रम में मुझे उसका नाम भी पता चल गया।
मुझे याद है, एक दिन दफतर में देर तक काम करने के बाद मैं थका मांदा सा घर की ओर जा रहा था कि मुझे चक्‍कर सा आ गया और मैं सडक के किनारे के पार्क में कुछ देर आराम करने की गरज से चला गया और कोने के एक बेंच में आंखे मूंदकर बैठ गया। तभी मुझे अहसास हुआ कि कोई मेरे पास आकर बैठ गया है। मैंने आंखे खोला तो पाया कि वह राजश्री थी। उस मुलाकात में न उसने मुझसे कुछ कहा न मैंने उससे कुछ लेकिन आंखों ही आखों में बहुत बातें हुईं और बस इसी दिन से मेरे और राजश्री के संबंध गहरे होते चले गए। इसके बाद हम तकरीबन रोज मिलने लगे।
हम जब भी मिलते, ढेरों बातें होतीं। मेरे काम से लेकर उसके कालेज की पढाई और भविष्‍य तक की बातें हम करते। उन दिनों की हर एक बात मेरे जेहन में ताजी है। हम घंटों किसी पार्क के किसी कोने में बैठकर बतियाते रहते थे। एक दिन की बात है, मैंने मजाक में यूं ही राजश्री से कह दिया कि मेरा तबादला दूसरे शहर हो गया है, अब हमें एक दूसरे को भूल जाना चाहिए। मुझे आज भी याद है, उस दिन राजश्री ने अपना रौद्र रूप दिखाया था। उसने मुझे चेतावनी भरे लहजे में कह दिया था कि यदि मैंने उससे दूर जाने की कोशिश भी की तो वह अपनी जान दे देगी। ये मैं ही जानता  हूं कि मैने उसे उस दिन कितनी मिन्‍नतें करने के बाद मनाया था।
... लेकिन हम जो चाहें, वही हो ऐसा जिंदगी में अक्‍सर कहां होता है। राजश्री के पिता बैंक में अफसर थे। उनका तबादला दूसरे शहर हो गया और वे सपरिवार दूसरे शहर चले गए। राजश्री ने भी वहां कालेज में प्रवेश ले लिया लेकिन हम दोनों का सम्‍पर्क खतों और टेलीफोन के जरिए बना रहा। छह महीने तो ठीक ठाक बीते लेकिन फिर मैं अपने काम में ऐसे मशरूफ हुआ कि चाहकर भी राजश्री से सम्‍पर्क नहीं कर सका। काम के साथ कुछ पारिवारिक उलझने भी आईं और मैं उस राजश्री से पूरी तरह कट गया जिसके बगैर मैं जिंदगी की कल्‍पना करना भी बेमानी समझता था।
इस बीच राजश्री मुझसे सम्‍पर्क करने का प्रयास बकायदा करती रही लेकिन मैं ही उसे लेकर लापरवाह बना रहा। इमानदारी से कहूं तो इसकी वजह मेरी मशरूफियत के साथ साथ मेरे दफतर में नई नई काम पर लगी चांदनी थी। सुंदर गौरवर्ण चांदनी पर मैं कुछ ऐसे फिदा हुआ कि सब कुछ भूल सा गया। मेरा भी व्‍यक्तित्‍व आकर्षक था, सो चांदनी भी मुझे चाहने लगी। अब मैं राजश्री को पूरी तरह भूलने लगा था और सोचने लगा था कि चांदनी ही मेरे लिए बनी है... लेकिन नसीब को यह भी मंजूर नहीं था।
एक दिन मुझे पता चला कि चांदनी मुझे नहीं किसी और से प्‍यार करती है और उसकी शादी भी तय हो चुकी है। मैंने इस संबंध में चांदनी से बात की तो उसने मुझे दो टूक शब्‍दों  में कह दिया कि जिंदगी  में तो यह सब चलता है। दोस्‍ती करना, प्‍यार करना, इन्‍ज्‍वाय करना अलग बात है और शादी करना अलग बात। शादी के लिए स्‍टेटस भी देखा जाता है। उसकी बातें  सुनकर मैं सन्‍न रह गया।
सच है, मुसीबत में इंसान को अपने सच्‍चे हमदर्द की याद आती है। मुझे भी चांदनी की बेवफाई के बाद राजश्री की बहुत याद आई। उस दिन मुझे महसूस हुआ, किसी के दिल को दुखाने से कितनी तकलीफ होती है लेकिन अब पछताने के अलावा कुछ नहीं बचा था। मैं राजश्री से फिर से कैसे सम्‍पर्क करता। कोई डेढ साल हो गए थे मेरे राजश्री से सम्‍पर्क टूटे। कम से कम मुझमें तो हिम्‍मत नहीं बची थी राजश्री से सामना करने की और फिर यदि उसने मुझे बेइज्‍जत कर चले जाने कह दिया तो....? इसी डर से मैं खामोश हो गया।
राजश्री की मधुर स्‍मृतियों और चांदनी के कडवे अनुभव को मन में बसाए मैं जी र‍हा था कि एक मोड  पर मुझे प्रतीक्षा मिली। मैं न चाहते हुए भी उसकी ओर आकर्षित होता चला गया। आप यकीन कीजिए,  प्रतीक्षा की तरफ मेरा बढता आकर्षण राजश्री के प्रति मेरे दिल में बसे प्‍यार के ही कारण था। बात बेबात शर्त लगाने का प्रस्‍ताव रखना। छोटी सी बात में गुस्‍से से मुंह फुलाना। गाल में  हल्‍की सी चपत लगा देना। गोद में सिर रखकर लेटने  पर बालों में हाथ की कंघी बनाकर फिराना। ये चंद ऐसी आदतें थीं जो राजश्री और प्रतीक्षा में एक जैसी थीं। मुझे चांदनी की बेवफाई और राजश्री से बिछडने के गम को भूलने के लिए प्रतीक्षा मिल गई थी।
एक दिन मैं  दफतर की छुटटी लेकर प्रतीक्षा के घर गया था। मुझे खबर मिली थी कि उसकी तबियत खराब है। उसके घर उस वक्‍त उसकी भाभी बस थी। उसने अपनी भाभी से मेरा परिचय बतौर दोस्‍त कराया लेकिन उसकी भाभी के अर्थपूर्ण मुस्‍कान ने जाहिर कर दिया कि वे हम दोनों के रिश्‍ते को समझ गई हैं। मेरा अनुमान गलत नहीं था, भाभी जब बैठक कक्ष में मुझे और प्रतीक्षा को अकेला छोडकर चाय बनाने गईं तब प्रतीक्षा ने मुझे बताया कि भाभी ने मेरी तस्‍वीर प्रतीक्षा की किताब में देख ली थी।
उस दिन तो मैं प्रतीक्षा के घर  से जल्‍दी चला आया लेकिन एक दिन प्रतीक्षा की भाभी ने मुझे दफतर फोनकर खाने के लिए घर आमंत्रित किया। नियत समय पर प्रतीक्षा के घर पहुंचने पर मुझे मालूम हुआ कि उस दिन प्रतीक्षा का जनमदिन है। मैंने प्रतीक्षा की भाभी से शिकायती लहजे में कहा, आपने मुझे पहले क्‍यों नहीं बताया कि आज प्रतीक्षा का जन्‍मदिन है मैं खाली हाथ ही आ गया तो उन्‍होंने भी शरारती मुस्‍कान के साथ कहा, आप मेरी ननदरानी को अपना जीवनसाथी बनाकर उसे जीवन की सारी  खुशियां देना, उसके  लिए यही सबसे बडा तोहफा होगा।
ऐसे ही एक दिन मैं छुटटी पर था। प्रतीक्षा मुझसे मिलने मेरे घर आई। उस वक्‍त घर में मेरी भाभी और बहन बस थीं। मैंने भी उनसे प्रतीक्षा का परिचय बतौर दोस्‍त  कराना चाहा लेकिन न जाने मेरे भीतर की कौन सी ताकत ने मुझसे यह कहलवा दिया कि, भाभी यह तुम्‍हारी देवरानी है। इतना सुनते ही मेरी छोटी बहन ने प्रतीक्षा से मुखातिब होकर तपाक से कह दिया, नमस्‍ते  भाभी। और प्रतीक्षा.... वह शरमाकर रह गई।
प्रतीक्षा और मेरी मुलाकात का सिलसिला कोई छह महीने चला। इस बीच हमने साथ जीने मरने की कस्‍में खाईं, एक दूसरे के प्रति असीम प्‍यार का इजहार किया और न जाने क्‍या क्‍या ख्‍वाब बुने। हम जब भी मिलते, एक दूसरे के दिल में एक दूसरे के प्रति पहले से ज्‍यादा प्‍यार पाते। मुझे ऐसा  महसूस होने लगा था कि यदि प्रतीक्षा मुझे  नहीं मिलती तो मेरा  जीवन अधूरा रह जाता। एक  दिन प्रतीक्षा मेरे पास आई। डरी सहमी सी, घबराई सी, उसने कहा, ‘आकाश बडे भैया को हमारे संबंधों के बारे में पता चल गया है और उनहोंने मुझे खूब डांटा है। भाभी को भी डांटा है।’
मैंने उसे समझाया और कहा, तुम डरो मत। मैं कल तुम्‍हारे भैया से बात करूंगा। अपनी शादी की चर्चा करूंगा।  प्रतीक्षा की इस धारणा को कि भैया हमारी शादी के लिए राजी नहीं होंगे, खत्‍म करते हुए उसे घर भेजा। प्रतीक्षा के भैया से मिलने पर बात की शुरूआत  कहां से करूंगा इसी उधेडबुन में मैं घर पहुंचा तो भाभी ने मुझे एक पत्र थमा दिया। पत्र में अपने पते की जगह  पर राजश्री के हाथों  की इबारत देखकर मैं सोच में पड गया कि इतने दिनों बाद राजश्री का पत्र! मैं सीधे अपने कमरे में गया और लिफाफे को खोलने के बाद  एक ही सांस  में पूरे पत्र को पढ लिया मैंने। इस पत्र को पाने के बाद मेरे मन में अंतर्व्‍दव्‍द सा मच गया और मैं अनिर्णय की स्थिति में आ गया।
राजश्री व्‍दारा मुझे लिखे पत्र का मजमून इस  प्रकार है,
प्रिय आकाश,
कैसे हो?  तुम मुझे शायद भूल गए होगे पर मैं तुम्‍हे आज भी नहीं भूली। मैं आज भी तुमसे बेइंतहा प्‍यार करती हूं। क्‍या तुम्‍हे याद नहीं कि हमने साथ साथ जीवन बसर करने की कसमें खाई थीं और मेरे शहर छोडकर जाने के बाद  तुम मुझे भूल गए। मैंने कई बार तुमसे सम्‍पर्क करने की  कोशिश की लेकिन मेरी हर कोशिश के बाद तुम मुझसे और दूर होते चले गए।
आकाश, मैं एक बार तुमसे मिलने तुम्‍हारे शहर भी गई थी। तुम्‍हारे घर भी गई थी लेकिन पता चला कि तुम लोगों ने मकान बदल दिया है। मैं निराश होकर वापस आ गई लेकिन तुम्‍हे भूली नहीं। समय दर समय मेरे मन में तुम्‍हारा प्‍यार और गहरा  होता चला गया। मुझे यकीन था, तुम एक न एक दिन मुझसे जरूर मिलोगे और मैं तुम्‍हे अपने प्‍यार की ताकत से फिर से हासिल कर लूंगी। मुझे कहीं से तुम्‍हारा पता मिला और सबसे पहला काम किया तुम्‍हे पत्र लिखने का।
आकाश, तुम्‍हे याद है न मैंने एक दिन तुम्‍हारे छेडने पर कहा था कि यदि हम बिछड गए तो मैं अपने आप को खत्म कर लूंगी। अब तक तो मैं इस उम्‍मीद में जिंदा थी कि तुम मिलोगे। और अब मुझे यकीन है कि तुम अपनी राजश्री को यूं मरने नहीं दोगे। तुमसे दूर होकर और जीया नहीं जाता। इस पत्र के मिलते ही तुम मुझसे मिलने आ जाना। बाकी बातें मिलने पर करेंगे।
तुम्‍हारी ही
राजश्री
सच मानिए राजश्री के इस पत्र ने मुझे अंदर से हिलाकर रख दिया। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा है कि राजश्री मुझ जैसे व्‍यक्ति से इस कदर प्‍यार कर सकती है। मैं राजश्री को जानता हूं। वह कुछ भी कर सकती है। यदि मैं उससे जाकर नहीं मिला तो  वह यहां आकर न सिर्फ कोई बखेडा खडा कर सकती है बल्कि अपनी जान भी दे सकती है। दूसरी ओर प्रतीक्षा है, जो मेरी जीवन संगिनी बनने की आस लिए है।
मैं अपने आप को ऐसे दोराहे पर खडा  पा  रहा हूं, जहां से एक रास्‍ता मेरे पहले प्‍यार की ओर जाता है और दूसरा रास्‍ता उस ओर जाता है जहां प्रतीक्षा खडी है और उसकी जानकारी मेरी भाभी और बहन को भी है। यदि मैं पहले रास्‍ते में जाता हूं तो यह प्रतीक्षा के साथ ही धोखा नहीं होगा  बल्कि अपनी भाभी और बहन की नजर में भी मैं गिर सा जाऊंगा। यदि मैं दूसरे रास्‍ते में जाता हूं तो यह मेरे पहले प्‍यार का खून होगा। मैं फैसला नहीं ले पा रहा हूं कि किस रास्‍ते में जाऊं?  यदि आप मेरी जगह होते तो क्‍या करते.... ?

29 जनवरी 2011

आखिरी खत...


प्रिय मीनू,
          
हो सके तो मुझे माफ कर देना। मैंने कभी भी तुम्‍हारा दिल दुखाना नहीं चाहा था, लेकिन जो कुछ भी हुआ, उसका मुझे जरा सा भी अहसास नहीं था। हां यह जरूर सच है कि उस वाक्‍ये से तुम्‍हे तकलीफ हुई होगी और तुम्‍हारे दिल को ठेस लगी होगी। तुम मुझे बेवफा भी समझ रही होगी। कुछ हद तक यह सच भी है लेकिन वास्‍तविकता क्‍या है इसे सिर्फ और सिर्फ मैं ही जानता हूं। 
मुझे याद है वह दिन, जब हम मिले थे। तुमसे पहले भी कई लडकियां मिलीं लेकिन उनसे सिर्फ दोस्‍ताना रहा। तुममे मुझे एक अलग ही कशिश दिखी। फिर क्‍या था, मैं तुम्‍हारी ओर आ‍कर्षित होता चला गया। हमारी मुलाकातें बढती चली गईं। दिल तो चाहता था कि तुमसे बहुत कुछ कहूं पर तुम्‍हारे सामने आने पर मानो जुबान पर ताले पड जाते। कहते हैं न कि जो बात मुहब्‍बत में जुबान नहीं कह पाती वह नजरें कह जाती हैं। यही हमारे साथ हुआ। समय गुजरता रहा। जुबां खामोश रही। नजरों से बात होती रही। और एक दिन...।
क्‍या तुम भूल सकती हो उस दिन को। हम एकांत में बैठे थे और मैंने हौले से तुम्‍हारे हाथों को अपनी हथेली से दबाकर तुम्‍हारे कानों में अपने प्‍यार का इजहार किया था। इसके बाद हमारे दिलों में प्‍यार का जो लावा था वह फूट पडा था। तुमने भी अपने दिल की बातें कहीं। फिर हमने एक दूसरे के साथ जिंदगी की खुशियां को बांटने की ख्‍वाहिशो और गम को साथ साथ जीने की कसम ली। समय पंख लगाकर उडने लगा। दिन महीनों में और महीनें साल में बदलने लगे। हां पूरे तीन साल हो रहे थे हमें मिले हुए। एक दूसरे के साथ ये तीन साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। इन गुजरे सालों में हमारे दरमियां प्‍यार और तकरार का खेल चलता रहा। एक दूसरे से रूठना और मान जाना, सच में इसका भी अलग ही मजा है।
कितनी हंसी शाम थी वह जब तुम मेरी पसंदीदा रंग की प्‍यारी सी सलवार और कुर्ते में मुझसे मिलने आई थी। साथ में मेरे उसी पसंदीदा गुलाबी रंग की जैकेट और उस पर काले धागे की कसीदाकारी, तुम्‍हे और भी खूबसूरत बनाए दे रही थी। मुझे अच्‍छी तरह याद है, तुम्‍हारा जन्‍मदिन था उस दिन। मैं यह भी नहीं भूला कि जन्‍मदिन पर नायाब तोहफा देने का वादा किया था मैंने तुमसे। मुझे यकीन है, मेरे उस तोहफे को तुमने आज भी सहेज कर रखा होगा। आज भले की हमारे बीच दूरियां बढ गईं हों, लेकिन यह सच है कि हम कभी एक दूसरे के करीब थे, बहुत करीब। वक्‍त गवाह है हमारी मुहब्‍बत का। मैं चाहता था कि तुम्‍हे कभी किसी चीज की कमी न हो। इसके लिए चाहिए था पैसा। पैसे के लिए काम। मैं अब तुम्‍हे कम समय दे पाता था। मेरा अधिकांश समय काम में निकल जाता था। वैसे भी मैं उस पेशे से जुडा था जिसमें समय की कोई पाबंदी या बंदिश नहीं थी पर किसी भी समय कोई काम निकल जाता था और मुझे जाना पडता था। हमें मिले तीन साल तो हो गए थे और तुम्‍हारे घर में भी तुम्‍हारी शादी के लिए दबाव बढता जा रहा था। ऐसे में मुझे जल्‍द ही स्‍वयं को अच्‍छी तरह से स्‍थापित कर तुम्‍हारे घरवालों से बात भी करनी थी।
अब हम पहले की तरह रोज नहीं मिल पाते थे। हमारी मुलाकात मेरी साप्‍ताहिक छुटटी के दिन ही हो पाती थी। एक दिन तुम्‍हारे घर जाने पर मुझे मालूम हुआ कि तुम अपने मामा के घर दूसरे शहर गई हो और अब वहीं रहोगी। तुम्‍हारी सहेलियों से मुझे मालूम चला कि तुमने अपने मामा के शहर के कालेज में प्रवेश ले लिया है। मुझे बहुत आश्‍चर्य हुआ, यह सोचकर कि किस रंग के कपडे पहनूं से लेकर हर काम मुझसे पूछकर करने वाली लडकी ने इतना बडा फैसला ले लिया और मुझे इसकी जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा।
... खैर मैं यह सोचकर चुप हो गया कि शायद तुम्‍हारी कोई मजबूरी रही होगी। मैंने सोचा तुमने मुझे इतने बडे फैसले से अलग क्‍यों रखा यह तो तुमसे मिलने पर ही पता चलेगा। मैंने तुम्‍हारे मामा के घर का पता तुम्‍हारी सहेलियों से लिया और वहां जाने का मन बनाने लगा। एक शाम जब आफिस से लौटकर मैंने घर का दरवाजा खोला तो चौखट पर एक खत पडा मिला। खत के  लिफाफे में तुम्‍हारी लिखावट में अपना नाम और पता देखकर मैंने खुद को एक पल भी रोक नहीं पाया और लिफाफा फाडकर खत को पढने लगा। खत में लिखे एक एक वाक्‍य मुझे कांटों की तरह चुभने लगे और मुझे दुनिया घूमती हुई नजर आने लगी। तुम्‍हारी बेरूखी और मुझ पर बेवफाई का इलजाम लगाने का कारण मुझे समझ नहीं आया। तुम्‍हारे खत का मजनून कुछ ऐसा ही था ना...,

‘’राज ,

मैं तुमसे दूर जा रही हूं। हमेशा हमेशा के लिए। जी तो चाहता है कि खुद को खत्‍म कर लूं और मुक्‍त हो जाऊं इस दुनिया से लेकिन फिर यह सोचकर जीना कबूल किया कि बेवफाई तुमने की तो मैं अपनी जिंदगी क्‍यों समाप्‍त करूं। हां, मैं जीऊंगी और दिखा दूंगी कि प्‍यार में धोखा खाने के बाद भी जिया जा सकता है। एक वह समय था जब हम दोनों रोज मिलते थे, फिर हमारे दरमियां दूरियां बढती गईं। कभी कभी मेरे मन में यह विचार आता था कि कहीं तुम मुझसे ऊब तो नहीं गए फिर एक ही पल में अपने विचारों को झटक देती थी और अपने ही आप से कह उठती, नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मैं यह कैसे सोचने लगी। मैंने तुम्‍हारी हर बात पर आंख बंद कर विश्‍वास किया। मैं यही सोचती कि तुम्‍हारा पेशा ही ऐसा है जिसमें वक्‍त की कोई पाबंदी नहीं रहती, कभी भी काम निकल आता है लेकिन तुम...?

तुम्‍हारी हर गलती को मैं यह सोचकर नजरअंदाज कर देती कि अब तुम सुधर जाओगे। कभी कभी गुस्‍से में आकर तुम मुझे उल्‍टा सीधा कह देते तो मैं अवाक रह जाती। सोचती कि तुम कितने बदल गए हो? हां, बहुत बदल गए थे तुम इन तीन सालों में। तुम्‍हारे स्‍वभाव में मुझे चिडचिडापन साफ झलकने लगा था, फिर भी मैं तुम्‍हारा विरोध नहीं करती थी। आखिर हमने प्‍यार किया था और प्‍यार में सहना पडता है सब। तुम ही कहते थे न कि प्‍यार में ‘मैं’ और ‘तुम’ की भाषा नहीं चलती। प्‍यार में मैं और तुम को मिलाकर हम बनाना पडता है। मैंने तो ‘हम’ में जीना सीख लिया, पर तुम क्‍यों भूलने लगे?

मैं नहीं जानती थी कि तुम बेदर्द होने के साथ साथ बेवफा भी हो सकते हो। उस दिन जब तुम्‍हारे एक दोस्‍त ने मुझे तुम्‍हारे बारे में कुछ बातें बताईं तो मैं सन्‍न रह गई। पूरी बात मैं सुन नहीं सकी और उठकर चली गई। भले ही मैंने पूरी बातें नहीं सुनीं पर सारी बातें स्‍पष्‍ट हो गई थी। तुम्‍हारा वो रूखा व्‍यवहार, तुम्‍हारी चिडचिडाहट, मुझसे बढती दूरियां... और अब सुनने समझने के लिए क्‍या रह जाता है। तुम जानते थे कि मैं सब कुछ सह सकती हूं किंतु यह नहीं सह सकती कि तुम पर मेरे अलावा कोई और अपना हक जताए। तुमने मेरे विश्‍वास को ठेस पहुंचाया है... मैं जा रही हूं... तुमसे दूर... बहूत दूर...। नई जिंदगी की तो अब तलाश नहीं है, लेकिन पुरानी जिंदगी भी काटने लगी है मुझे।

अलविदा।

-मीनू’’

मीनू,

तुमने मुझ पर बेवफाई का इल्‍जाम तो लगा दिया पर एक बार तुम्‍हे मुझसे बात तो करनी थी। इतना बडा फैसला तुमने स्‍वयं ले लिया। क्‍या तुम्‍हे मुझ पर यकीन नहीं था? अरे, तुम कहती हो मैं ‘हम’ को भूल गया, नहीं, मुझे आज भी याद है, शायद तुम भूल गई तभी तो तुम चली गई, अकेले ही फैसला लेकर। जिंदगी में कई मौके ऐसे आते हैं, जब इंसान को कई बातें सुननी पडती हैं। कुछ सही होती हैं, कुछ गलत। दुनिया में बनाने वाले बहुत कम होते हैं जबकि बिगाडने वालों की संख्‍या असंख्‍य होती है। तुमने मुझ पर बेवफाई का इल्‍जाम लगा दिया, कैसी बेवफाई का?  खुलासा तुमने नहीं किया। मेरी समझ में नहीं आता कि मेरे किस दोस्‍त ने तुम्‍हे मेरे खिलाफ भडकाया है। प्‍यार की डोर विश्‍वास के कच्‍चे धागे से बंधी होती है, जो हल्‍की सी चोंट पर टूट जाती है। मैं तुम्‍हे कोई सफाई नहीं दे रहा हूं। सफाई की स्थिति तो तब आती है जब कोई गल्‍ती की गई हो। हां इतना जरूर है कि मेरी जिंदगी में तुम्‍हारे सिवा कोई दूसरी नहीं है।
तुमने लिखा है कि दूर जा रही हूं, बहुत दूर, जबकि मुझे नहीं लगता कि हम दूर हैं। प्‍यार का अहसास हमें एक दूसरे से जोडा हुआ है। यदि तुम्‍हे मेरी बातों का यकीन हो गया हो तो इस खत के मिलते ही मुझे खत लिखना वरना मैं यह समझूंगा कि मेरा यह आखिरी खत है तुम्‍हे।
                                   
                                                              तुम्‍हारा 
                                                                राज