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07 सितंबर 2025

केदार और रेस्ट हाउस

छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री केदार कश्यप को लेकर एक नया बवाल खडा़ हो गया है। केदार पर जगदलपुर के सरकारी रेस्ट हाउस के एक कर्मचारी को पीटने का आरोप लगा है। हालाँकि केदार कश्यप ने खुद पर लगे आरोपों को गलत बताते हुए इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है। 

जगदलपुर रेस्ट हाउस के कर्मचारी जितेन्द्र पांडे ने आरोप लगाया है कि वो बीते 20 साल से दैनिक वेतनभोगी के रूप में काम कर रहा है। उसने कहा है कि जगदलपुर रेस्ट हाउस में पहुंचे मंत्री केदार कश्यप ने कमरा नहीं खोलने का आरोप लगाते हुए उससे मारपीट की और उसे धमकाया। कर्मचारी का कहना है कि मंत्री जी ने उसे बेदम पीटा जबकि वो मंत्री जी के लिए ही भोजन तैयार कर रहा था।

इस मामले में विपक्षी कांग्रेस पार्टी आक्रमक हो गई है और उसने मंत्री केदार कश्यप के इस्तीफे की माँग की है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज का कहना है कि एक गरीब कर्मचारी को पीटना भाजपाई संस्कृति का हिस्सा है। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से मंत्री केदार कश्यप को मंत्रीपद से हटाए जाने की माँग की है।

खुद पर लगे आरोपों पर केदार कश्यप का कहना है कि सब कुछ झूठा है, उन्होंने किसी कर्मचारी को नहीं मारा है। केदार ने इसे कांग्रेस की साजिश करार दिया है।

10 जनवरी 2013

बंद... जनता की उम्मीदों का बलात्कार!!!


बंद। बेहद आसान तरीका है विरोध जताने का। दिल्ली में गैंगरेप हुआ तो भारत बंद का आव्हान कर दिया गया और जब छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चियों से दुष्कर्म की घटना सामने आई, छत्तीसगढ़ बंद का आव्हान कर दिया गया। अंतर सिर्फ इतना था कि पहले वाला बंद कांग्रेस पार्टी के विरोधियों ने किया था और इस बार के बंद का आव्हान कांग्रेस ने किया। बताने की जरूरत नहीं कि पहली घटना कांग्रेस शासित राज्य में हुई इसलिए विरोधियों ने ऐसा किया और छत्तीसगढ़ में अपनी विरोधी पार्टी के खिलाफ मुद्दों की तलाश में पिछले नौ सालों से भटकती कांग्रेस की झोली में एक मुद्दा आकर गिर गया और उसने मत चूको चौहान की तर्ज पर झट से बंद का आव्हान कर दिया। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस बंद का क्या औचित्य? क्या बंद कर देने से बलात्कार जैसी घटनाएं रूक जाएंगी? क्या बंद  कर देने से कुत्सिक मानसिकता वालों में लाज शर्म लौट आएगी? नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद देश भर में प्रदर्शन के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में दो दर्जन से ज्यादा बलात्कार की घटनाएं हुई थीं। ये आंकड़ा पुलिस रिकार्ड से है, वरना कई मामले तो थाने पहुंचने से पहले ही दम तोड़ चुके होंगे।
बंद। राजनीतिक रोटी सेंकने का एक बेहतरीन तरीका। राजनीतिक दलों को आजकल किसी मुद्दे पर दिल से जुडऩे के बजाय इस तरह के प्रदर्शनों में मजा आता है। जनता से जुड़े मुद्दों पर सार्थक पहल करने के बजाय इस तरह बंद का आयोजन कर राजनीतिक दल भले ही अपनी सक्रियता (?) दिखाने की कोशिश कर लें,  लेकिन हकीकत यह है कि वे ऐसा कर जनता को खुद के साथ जोडऩे का काम नहीं कर सकते। बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र कांकेर जिले के नरहरपुर ब्लाक के एक आदिसासी हॉस्टल में करीब दर्जन भर नाबालिग बच्चियों से वहीं का चौकीदार महीनों दुष्कर्म करता रहता है और इस दुष्कृत्य में उसका बराबर का हिस्सेदार एक शिक्षाकर्मी रहता है। बच्चियां भी प्रायमरी स्कूल में पढऩे वाली। ... और जब मामले का खुलासा होता है, तीसरे ही दिन चौकीदार और शिक्षाकर्मी को गिरफ्तार कर लिया जाता है, फिर बंद का औचित्य क्या? दिल्ली के मामले में भी ऐसा ही कुछ था। आरोपी तत्काल गिरफ्तार कर लिए गए थे। उनके खिलाफ धाराएं तय की जा चुकी थीं। फिर उस मुद्दे को लेकर भी इस तरह प्रदर्शन का औचित्य नहीं था। बंद का औचित्य नहीं था। छत्तीसगढ़ के इस मसले पर कांग्रेस ने बंद का आव्हान राज्य सरकार पर इस आरोप के साथ किया था कि प्रदेश में कानून व्यवस्था चौपट हो गई है। जहां तक हमारा मानना है, इस मामले में आदिवासी क्षेत्रों में आश्रम शालाओं में आदिवासी बच्चियों की सुरक्षा में लापरवाही की बात की जा सकती है, लेकिन कानून व्यवस्था चौपट होने की बात करना ठीक नहीं।
बंद। ... और फिर क्या इस तरह बंद कर जनता को अपने साथ जोड़ा जा सकता है? कांग्रेस ने तो ऐसा ही कुछ सोचा होगा लेकिन वह अपने इस मकसद में कामयाब नहीं हो पाई। लोग और दूकानदार उससे ज्यादा समझदार निकले और उसकी लाख कोशिशों के बाद भी बंद का कोई खास असर नहीं देखा गया। लोग यह बात समझ गए कि बंद कर देने से इस तरह की घटनाएं नहीं रोकी जा सकतीं। हाँ, एक राजनीतिक दल की रोटियां जरूर इससे सेंकी जा सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हमें एक भी ऐसा मामला नजर नहीं आया लोगों ने स्वस्फूर्त  होकर बंद किया हो। कांग्रेस के लोग घूमते रहे, खुली दूकानों का शटर खुद बंद कर करते रहे। कांग्रेसियों के हुजूम के जाने के बाद फिर कारोबार शुरू।
बंद। आखिर क्यों? बंद से क्या होने वाला है? ऐसे बंद किसी समस्या का हल नहीं होते। अलबत्ता ये मुसीबत का सबब जरूर  बनते हैं। उनके लिए, जो हर दिन कमाते हैं, हर दिन खाते हैं। उनके लिए जिनकी दो वक्त की रोटी बंद की भेंट चढ़ जाती है और उनके घरों में चूल्हे तक नहीं जल पाते। पर इतना दूर तक सोचने की जरूरत किसे है? सब के सब सेंक रहे हैं अपनी राजनीतिक रोटियां... और कर रहे हैं हर वक्त जनता की उम्मीदों का बलात्कार....!!!!

20 अगस्त 2012

गजब गोविंदाचार्य...

किसी समय भारतीय जनता पार्टी के थिंक टैंक यानि चाणक्य समझे जाने वाले विचारक केएन गोविंदाचार्य ने बड़ी मार्के की बात की है। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा को साथ मिलकर अगला चुनाव लडऩे की सलाह दी है। उनकी बातों का निहितार्थ समझने की जरूरत है। उन्होंने अपनी बात के जरिए यह बताने की कोशिश की है कि मौजूदा दौर की राजनीति में आम आदमी की आवाज को उठाने वाला कोई नहीं है और देश की दो सबसे बड़ी पार्टियां एक ही रास्ते पर चल रही हैं, सामंतवाद के रास्ते पर और जब दोनों एक ही रास्ते पर हैं तो एक साथ मिलकर चुनाव लडऩे से दोनों का परहेज नहीं करना चाहिए।
गोविंदाचार्य तीखा और कड़वा बोले जाने के लिए जाने जाते हैं। उनकी इसी आदत के कारण वो फिलहाल किसी दल में नहीं हैं। उन्होंने भाजपा से किनारा कर लिया है लेकिन उनकी बातें अब भी सुनी जाती हैं। कारण यह है कि वे सब कुछ ठोंक-बजाकर बोलते हैं और उनकी बातों का मर्म देश की राजनीति में फैली गंदगी को लेकर दर्द ही दर्शाता है। उत्तरप्रदेश के बलिया में गोविंदाचार्य ने कुछ ऐसा बोला कि वह आम आदमी की आवाज बनकर उभरा। यह अलग बात है कि गोविंदाचार्य आज किसी पद पर नहीं हैं, इसलिए उनकी बात मीडिया में इतनी सुर्खियां बटोर नहीं पाई, पर की उन्होंने मार्के की बात।
गोविंदाचार्य कहते हैं कि देश में सत्ता और विपक्ष का भेद खत्म हो गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां विदेशी और अमीर परस्त नीतियों को बढ़ावा दे रही हैं और संसद में गरीबों की आवाज नहीं उठ रही है। उन्होंने कहा कि नीतियों में समानता की वजह से भाजपा और कांग्रेस को अगला लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लडऩा चाहिये, ताकि संसद में विपक्ष की जगह खाली हो और गरीबों की चिंता करने वाले दलों के प्रतिनिधि संसद में पहुंचकर निर्धन लोगों की आवाज उठाएं। उनकी बातों में गहरा दर्द है। यह दर्द उन  लाखों-करोड़ों भारतीयों का दर्द है, जो देश की संसद में चुनकर जाने वाले नेताओं की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं कि वे वहां उनसे जुड़े मुद्दे उठाएंगे, पर उन्हें गहरी निराशा तब होती है, जब संसद में पहुंचने के बाद उनके प्रतिनिधि वहां तरह तरह के घोटाले करते हैं और जन समस्याओं से दूर हो जाते हैं।
हमारा मानना है कि विचारक के रूप में गोविंदाचार्य एक अहम स्थान रखते हैं और उनका यह विचार एक आम भारतीय का दर्द होना चाहिए। देश का हर नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को संसद में सुर में सुर मिलाता देख यही सोचता होगा? जनहित के मुद्दे पर या किसी ऐसे विधेयक पर जिसमें जनता का भला होता हो, उस पर संसद में घंटों बहस होती है, लेकिन जहां सांसदों के हितों की बात हो, पगार बढ़ाने या भत्ता बढ़ाने की बात हो, पलक झपकते ही बिल पास हो जाता है। संसद में खुले आम नोट उछाले जाते हैं। सवाल पूछने के बदले रूपए लिए जाने के मामले आते हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों के नेता इन सबमें समान रूप से शामिल होते हैं तो फिर जब दोनों की नीतियां समान हैं तो उन्हें आपस में मिलकर चुनाव लड़ ही लेना चाहिए।