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22 मार्च 2015

चुनाव पत्रकारों का और कत्ल की रात!



आपने अखबारों में अक्सर पढ़ा होगा, फलां चुनाव में बंटने के लिए आई दारू पकड़ाई... मतदाताओं को रिझाने के लिए उम्मीदवारों ने दारू बांटा... कंबल बांटा...साड़ी, बिछिया और न जाने क्या क्या बांटे जाने की खबरें आपने अखबारों में पढ़ी होंगी। हर खबरों के बाद चिंतन करने का मन भी किया होगा कि क्या हो गया है, लोकतंत्र का? मतदान के एक दिन पहले यह सारा खेल होता है.... इस एक रात को ‘’कत्ल की रात’’ कहा जाता है!
अब यह ‘’कत्ल की रात’’ क्या होती है, यह  मुझे बीते दिनों महसूस हुआ।
दरअसल, मैं भी चुनाव लड़ रहा था। जी नहीं! मैं किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं। मैं तो एक सीधा और सज्जन इंसान हूं। राजनीतिक दल से मेरा दूर दूर से कोई नाता नहीं। मैं पत्रकारों का चुनाव लड़ रहा था। मुझे लगा था कि मैं इस चुनाव में अपनी पत्रकारिता के दम पर बेहतर प्रदर्शन कर सकता हूं, लेकिन मुझे नहीं मालूम था कि मेरा सारा बेहतर प्रबंधन उस एक ‘’कत्ल की रात’’ को तार-तार हो जाएगा और चुनाव में मुझे चारों खाने मात खानी पड़ जाएगी। जनाब मैं चुनाव हार गया!! पर मैं आपकी बधाईयां चाहता हूं कि मैं ‘’कत्ल की रात’’ का भागीदार होने से बच गया!!!
चुनाव। पिछले साल अप्रैल-मई में देश की सरकार चुनने के लिए चुनाव। इसकी खुमारी उतरी नहीं कि नवंबर में विधानसभा के चुनाव। यह खुमारी जाए इससे पहले इस साल की शुरूआत में नगरीय निकाय और फिर पंचायत चुनाव। कसम से अवसर पर अवसर... अब आप पूछेंगे कैसा अवसर, अरे जनाब अपना जनप्रतिनिधि चुनने का अवसर नहीं, अवसर तो कुछ और होता है। कहने को अपना देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन यहां चुनाव होते ही दूसरे गणित होने शुरू हो जाते हैं। गुणा भाग शुरू हो जाता है! सबके सब लग जाते हैं, इस कोशिश में कि कौन उनको ज्यादा से ज्यादा उपकृत कर सकता है...! .... और जब एक के बाद एक चार चुनावों की खुमारी हावी हो तो मीडिया के चुनाव में भी इसका असर दिखना लाजिमी था। सो कुछ जनाब लग गए ‘’कत्ल की रात’’ के इंतजार में...!
मेरे अपने शहर में पत्रकारों का चुनाव था। मैं भी एक दावेदार था। एक पत्रकार सज्जन(?) मेरे पास आए और कहने लगे कि मैंने और मेरे कुछ साथियों ने मतदाता यूनियन बनाया है और हमारी कुछ मांगे हैं, आपको इन मांगों को पूरी करनी है, फिर आपकी जीत पक्की!!!! जीत पक्की सुनकर मैं खुश हो गया लेकिन उनकी मांगों ने मुझे डरा दिया... वही ‘’कत्ल की रात’’। अब कोई आम चुनाव तो था नहीं कि ‘’कत्ल की रात’’ एक होती, जनाब की मांग थी कि चुनाव तो एक दिन का है, पर आपको ‘’कत्ल की रात’’ के ‘अवसर’ उनको ‘अक्सर’ उपलब्ध कराने होंगे!
कसम से मैं तो डर ही गया और उसी दिन मेरी हार हो गई... चुनाव हुए, परिणाम भी आए, मैं हार गया, क्योंकि मेरे पास ‘’कत्ल की रात’’ का इंतजाम नहीं था, पर मुझे उम्मीद नहीं थी कि बुद्धिजीवियों के चुनाव में भी ‘’कत्ल की रात’’ होती है, मुझे लगता था कि यह तो राजनीतिक दलों के चोचले हैं, पर मैं गलत था क्योंकि जब भी चुनाव होगा, ‘’कत्ल की रात’’ भी होगी....!


27 सितंबर 2013

हर एक ''वोट'' जरूरी होता है.....




साभार : फेसबुक पेज 'प्रतिज्ञा'
मत का दान भले ही हमने 18 वर्ष (पहले यह 21 वर्ष था) की उम्र से किया हो, पर प्रायमरी स्‍कूल में ही यह पढने मिल गया था, कि मताधिकार हर नागरिक का अधिकार है... कर्तव्‍य  है। वैसे तो मतदाताओं के लिए एक सुविधा यह भी थी कि वह यदि चुनाव मैदान में उतरे उम्‍मीदवारों में से किसी को पसंद नहीं करता तो वह उनमें से किसी को भी नहीं चुनने के अपने अधिकार का इस्‍तेमाल कर सकता है। ऐसा करने के लिए वह मतदान केन्‍द्र में जाकर मतदान की सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद पीठासीन अधिकारी से अपनी बात कह उससे एक फार्म की मांग कर सकता है, जिसे फार्म 49 ‘ओ’ के नाम से जाना जाता है। हालांकि ज्‍यादा जागरूकता नहीं होने के कारण और इस तरह के मतदान होने पर उसकी गिनती नहीं होने पर यह ज्‍यादा प्रचलन में नहीं आ पाया लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने मतदाताओं के इस ‘अधिकार’ को लेकर एक अच्‍छी और बडी पहल की है।
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को ‘राईट टू रिजेक्‍ट’ यानि सभी उम्‍मीदवारों को खारिज करने का अधिकार दे दिया है और चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह वोटिंग मशीनों (ईवीएम) में एक बटन ‘इनमें से कोई नहीं’ का भी दर्ज करे। शीर्ष अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर एक ऐसा बटन लगाए जिसके जरिए मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज कर सके, यानी मशीन में 'इनमें से कोई नहीं' का विकल्प होना चाहिए। अदालत ने इस तरह की व्यवस्था इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव से ही शुरू करने कहा है और यदि सब कुछ ठीक रहा तो इस फ़ैसले का लाभ इस साल दिसंबर में दिल्ली, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में होने वाले विधानसभा चुनाव में मतदाताओं को मिलेगा। अदालत ने यह फ़ैसला पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी (पीयूसीएल) की 2004 में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। पीयूसीएल ने मतदाताओं के लिए निगेटिव वोटिंग की मांग की थी।
सभी उम्मीदवारों को नकारने की मौजूदा व्यवस्था में मतदाता मतदान केंद्र पर जाकर पीठासीन अधिकारी से 49 ओ नाम के एक फार्म की मांग करता है और उसे भर कर वापस कर देता है, लेकिन इस तरह के फार्म की गिनती नहीं होती है। यही वजह है कि यह प्रक्रिया न ही ज्‍यादा कारगर थी औ न ही इसका ज्‍यादा प्रचार ही हो पाया। साफ है कि मतदाता जागरूक नहीं हो पाए और जो जानते थे, उन्‍होंने भी इसलिए खामोश रहना ही बेहतर समझा कि इससे चुनाव परिणाम पर कोई खास असर तो होगा नहीं और उसका यह प्रयास भी गोपनीय नहीं रह पाएगा, लिहाजा इस तरह की सोच रखने वाले मतदाता, मतदान केन्‍द्र से दूर ही रहे और यही वजह थी कि मतदान का प्रतिशत कभी सौ फीसदी नहीं रह पाया। कई बार  तो मतदान पचास फीसदी से कम ही रहा।  
संयोग की बात है कि अभी छत्‍तीसगढ के राजनांदगांव जिले में एक अभियान शुरू किया गया है।  ‘शत प्रतिशत मतदान बने राजनादगांव का अभिमान’ के नाम से एक अभियान गति पर है। इसका नाम रखा गया है, ‘प्रतिज्ञा’। एक अच्‍छा प्रयास हो रहा है और इसके जरिए कोशिश की जा रही है कि मतदाताओं को जागरू‍क किया जाए मतदान केन्‍द्रों में जाने के लिए ताकि वह अपनी पसंद की सरकार चुनने में अपना योगदान दे सके। जब यह अभियान मेरी जानकारी में आया तो मन में सवाल आया कि आखिर क्‍यों हम उस सीख को भूल जा रहे हैं जो हमने बचपन में ही पढ लिया था, क्‍यों हम चुनाव को लेकर बेरूखी अपनाए रखते हैं और क्‍यों मतदान के अपने अधिकार का इस्‍तेमाल नहीं करते.... जवाब में यही कहा जा सकता है कि कई बार हम चुनाव मैदान में मौजूद उम्‍मीदवारों में से किसी को भी पसंद नहीं करने के कारण मतदान केन्‍द्र तक जाने की जहमत नहीं उठाते तो कई बार हम जान बूझकर इस महत्‍वपूर्ण काम से खुद को दूर कर देते हैं लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए..... यदि किसी की तकलीफ उम्‍मीदवारों को लेकर है तो उनकी यह चिंता तो लगभग दूर होने वाली है, वे सभी उम्‍मीदवारों को दरकिनार करते हुए अपनी बात सामने रख सकते हैं.....
दुनिया के  करीब 25 देशों  ने अपने यहां मतदान अनिवार्य कर रखा है। इन देशों  में आस्ट्रेलिया, अर्जन्टीना, इटली, ब्राजील, मैक्सिको, तुर्की, थाइलैण्ड और सिंगापुर शामिल हैं। इनमें से कुछ देशों ने तो यह व्‍यवस्‍था कर रखी है कि जिस नागरिक के पास मतदान करने का सबूत है, उसे ही सरकारी सुविधाओं, सब्सिडी का लाभ मिल सकता है.....
मतदान को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाने का काम वैसे तो चुनाव आयोग की ओर से लगातार होता है और इस कडी में  राजनांदगांव की ‘’प्रतिज्ञा’’ का प्रयास भी सराहनीय है लेकिन जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने ‘राईट टू रिजेक्‍ट’ की बात की है, उसने भी एक बेहतर कल का संकेत दिया है......

05 सितंबर 2012

फिर आएगी रमन की फिल्म जनदर्शन-2

मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने एक बार फिर जनता को साधने की शुरूआत करने की तैयारी कर ली है। वे फिर से जनदर्शन नाम की पुरानी 'फिल्म' लेकर जनता के पास आ रहे हैं। वैसे तो वे राजधानी में अपने निवास में बरसों से जनदर्शन करते आ रहे हैं लेकिन जनता के पास जाकर जनदर्शन की शुरूआत करने का प्रचार सरकारी अमला इन दिनों पूरी ताकत से कर रहा है लेकिन वास्तविकता यह है कि यह कोई नया काम नहीं है और अपने विधानसभा क्षेत्र में मुख्यमंत्री काफी पहले ऐसा कर चुके हैं और जनता की समस्याएं सुनने का यह तरीका फ्लाप भी हो चुका है। चुनाव नजदीक है, सो फिर से ऐसी कवायद करने की तैयारी की जा रही है।
मुख्यमंत्री ने यहां जनदर्शन की शुरूआत की थी और करीब दर्जन भर बार यह किया भी। कई  समस्याएं आईं। कई का निराकरण हुआ और फिर अचानक यह सब बंद कर दिया गया। अब चुनाव में ज्यादा वक्त नहीं बचा, सो एक बार फिर वे जनता के बीच आ रहे हैं। पूर्व में आई उनकी यह 'फिल्म' कुछ खास नहीं कर पाई थी। अब फिर से इसे  'रिलीज' किया जा रहा है।  मुख्यमंत्री सचिवालय ने उनका जिला मुख्यालयों में जाकर जनता की समस्याएं सुनने (जनदर्शन) का कार्यक्रम तैयार किया है। तारीख तय नहीं हुई है लेकिन जनता को साधने की कोशिश फिर से हो रही है। फिर से जनदरबार लगेगा। जनता याचक के रूप में मौजूद होकर अपनी समस्याएं रखेंगे, इस उम्मीद में कि उनकी समस्याओं का निराकरण हो जाएगा। सरकारी विभाग फिर से एक दो आवेदनों पर होने वाले काम पर विज्ञप्तियां जारी करेंगे। मुख्यमंत्री यहां भी आएंगे और लोगों की समस्याएं सुनेंगे। पर बीते जनदर्शन की बात करें तो अनुभव बेहतर नहीं रहा। न ही जनता का और न ही सरकार का। हालांकि सरकारी आंकड़े कहते हैं कि जनदर्शनों में आने वाली समस्याओं में से ज्यादातर का निराकरण हो गया है और कुछ ही समस्याएं लंबित हैं लेकिन वास्तविकता शायद कुछ और ही हो। मुख्यमंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र में यदि जनदर्शन अच्छा खासा चल रहा था और इसमें जनता की समस्याएं सुनी और उसे सुलझाई जा रही थीं तो फिर अचानक इसे बंद करने का कारण समझ नहीं आया? एक प्रशासनिक अफसर ने कुछ समय पहले संकेत दिया था कि जनदर्शन में ज्यादातर आवेदन शिकायतों के या फिर आर्थिक मदद के आते थे और ऐसे आवेदनों के लिए ही जनदर्शन का औचित्य नहीं था, सो इसे अचानक बंद कर दिया गया।
प्रशासनिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने अपने विधानसभा क्षेत्र में जनदर्शन करने की घोषणा 30 मई 2009 को की थी। इस समय तय किया गया था कि महीने के दूसरे शनिवार को यहां जनदर्शन लगाकर जनता की समस्याएं सुनी जाएंगी। पहला जनदर्शन उनकेे कैम्प कार्यालय में 13 जून 2009 को लगा था। इसमें 832 आवेदन आए। उनके यहां स्थापित कैंप कार्यालय इसे मिलाकर कुल पांच जनदर्शन लगे। दूसरा जनदर्शन 11  जुलाई 2009 को लगा। इसमें महज 104 आवेदन आए। तीसरा 8 अगस्त 2009 को लगा, 874 आवेदन आए। चौथा 12 सितम्बर को लगा जिसमें 1056 आवेदन आए। पांचवा 14 नवम्बर 2009 को लगा जिसमें 996 आवेदन आए।
इसके बाद अचानक जनदर्शन को बंद कर दिया गया। न कोई कारण बताया गया और न किसी प्रकार की जानकारी दी गई। फिर अचानक खबर आई कि मुख्यमंत्री घूम घूमकर जनदर्शन करेंगे। कार्यक्रम भी आ गया। इसी कड़ी में वे 8 मई 2010 को मोखला गांव पहुंचे। यहां 612 आवेदन आए। फिर 10 जुलाई 2010  को शहर के प्यारेलाल स्कूल में मुख्यमंत्री का दरबार सजा, आवेदन आए छह सौ। सुकुलदैहान में 9 अक्टूबर 2010 को लगे दरबार में भी छह सौ आवेदन आए। फिर 13 नवम्बर 2010 को सिंघोला में 750 आवेदन आए। इसके बाद मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में कुछ फेरबदल किया और जनदर्शन को जनसम्पर्क का रूप दिया।  अंजोरा में वे जनसम्पर्क में पहुंचे और उनको मिले 205 आवेदन।
यानि अब तक मुख्यमंत्री की जनता को साधने की कवायद में कुल 9622 आवेदन आए हैं और सरकारी आंकड़े इनमें से 8949 को निराकृत बता रहे हैं। यानि सिर्फ 673 आवेदन लंबित हैं। हालांकि यह आंकड़ा सही नहीं होना चाहिए क्योंकि सरकारी रिकार्ड में उन आवेदनों को भी निराकृत की श्रेणी में डाल दिया जाता है जिनमें विभागों की टीम लिखकर आ जाती है, किसी नियमावली को लेकर। समस्या भले ही यथावत रहे, सरकारी आंकड़ों में इसे निराकृत मान लिया जाता है।
बहरहाल, लोकतंत्र में जनता का वक्त पांच साल में एक बार आता है और इस दौरान वह सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। हमारे लोकतंत्र की बड़ी खासियत यह है कि यहां जनता खुद अपना भाग्यविधाता चुनती है पर कमजोरी यह है कि इस चुनाव में जनता के पास कुछ ज्यादा विकल्प नहीं होता। जनता को उन्हीं में से अपना प्रतिनिधि चुनना होता है, जो राजनीतिक दल उनके सामने पेश करते हैं और वे कैसे भी हों, जनता मजबूर रहती है उनको चुनने। खैर अब देखना होगा कि जनता को साधने की फिर से शुरू हो रही कवायद कितना रंग लाती है? और यह पुरानी फिल्म जनता को कितना पसंद आती है?

20 अगस्त 2012

गजब गोविंदाचार्य...

किसी समय भारतीय जनता पार्टी के थिंक टैंक यानि चाणक्य समझे जाने वाले विचारक केएन गोविंदाचार्य ने बड़ी मार्के की बात की है। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा को साथ मिलकर अगला चुनाव लडऩे की सलाह दी है। उनकी बातों का निहितार्थ समझने की जरूरत है। उन्होंने अपनी बात के जरिए यह बताने की कोशिश की है कि मौजूदा दौर की राजनीति में आम आदमी की आवाज को उठाने वाला कोई नहीं है और देश की दो सबसे बड़ी पार्टियां एक ही रास्ते पर चल रही हैं, सामंतवाद के रास्ते पर और जब दोनों एक ही रास्ते पर हैं तो एक साथ मिलकर चुनाव लडऩे से दोनों का परहेज नहीं करना चाहिए।
गोविंदाचार्य तीखा और कड़वा बोले जाने के लिए जाने जाते हैं। उनकी इसी आदत के कारण वो फिलहाल किसी दल में नहीं हैं। उन्होंने भाजपा से किनारा कर लिया है लेकिन उनकी बातें अब भी सुनी जाती हैं। कारण यह है कि वे सब कुछ ठोंक-बजाकर बोलते हैं और उनकी बातों का मर्म देश की राजनीति में फैली गंदगी को लेकर दर्द ही दर्शाता है। उत्तरप्रदेश के बलिया में गोविंदाचार्य ने कुछ ऐसा बोला कि वह आम आदमी की आवाज बनकर उभरा। यह अलग बात है कि गोविंदाचार्य आज किसी पद पर नहीं हैं, इसलिए उनकी बात मीडिया में इतनी सुर्खियां बटोर नहीं पाई, पर की उन्होंने मार्के की बात।
गोविंदाचार्य कहते हैं कि देश में सत्ता और विपक्ष का भेद खत्म हो गया है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां विदेशी और अमीर परस्त नीतियों को बढ़ावा दे रही हैं और संसद में गरीबों की आवाज नहीं उठ रही है। उन्होंने कहा कि नीतियों में समानता की वजह से भाजपा और कांग्रेस को अगला लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लडऩा चाहिये, ताकि संसद में विपक्ष की जगह खाली हो और गरीबों की चिंता करने वाले दलों के प्रतिनिधि संसद में पहुंचकर निर्धन लोगों की आवाज उठाएं। उनकी बातों में गहरा दर्द है। यह दर्द उन  लाखों-करोड़ों भारतीयों का दर्द है, जो देश की संसद में चुनकर जाने वाले नेताओं की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं कि वे वहां उनसे जुड़े मुद्दे उठाएंगे, पर उन्हें गहरी निराशा तब होती है, जब संसद में पहुंचने के बाद उनके प्रतिनिधि वहां तरह तरह के घोटाले करते हैं और जन समस्याओं से दूर हो जाते हैं।
हमारा मानना है कि विचारक के रूप में गोविंदाचार्य एक अहम स्थान रखते हैं और उनका यह विचार एक आम भारतीय का दर्द होना चाहिए। देश का हर नागरिक अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को संसद में सुर में सुर मिलाता देख यही सोचता होगा? जनहित के मुद्दे पर या किसी ऐसे विधेयक पर जिसमें जनता का भला होता हो, उस पर संसद में घंटों बहस होती है, लेकिन जहां सांसदों के हितों की बात हो, पगार बढ़ाने या भत्ता बढ़ाने की बात हो, पलक झपकते ही बिल पास हो जाता है। संसद में खुले आम नोट उछाले जाते हैं। सवाल पूछने के बदले रूपए लिए जाने के मामले आते हैं। कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों के नेता इन सबमें समान रूप से शामिल होते हैं तो फिर जब दोनों की नीतियां समान हैं तो उन्हें आपस में मिलकर चुनाव लड़ ही लेना चाहिए।

11 जून 2012

लोकतंत्र का मजाक!

 यह लोकतंत्र का कौन सा चेहरा है? लोकतंत्र में बहुदलीय प्रणाली की व्यवस्था है। अलग-अलग दलों के लोग चुनाव मैदान में होते हैं और उनमें से जनता को एक को चुनना होता है। बहस होती है, कि सब के सब भ्र्रष्ट हैं। सब के सब बेकार हैं। जनता के पास विकल्प के नाम पर कुछ खास नहीं होता। जो सबसे कम बुरा हो, उसे चुनने का प्रयास जनता करती है। बहस इस बात पर भी हो रही है कि जनता को 'राईट टू रिकाल'  और 'राईट टू रिजेक्ट'  का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन यहां तो सब के सब धरे रह गए। राजनीति में संघर्ष की समाप्ति का यह उदाहरण कहां ले जाएगा?
बात हो रही है उत्तरप्रदेश की। उत्तरप्रदेश के कन्नौज की। यहां से खांटी समाजवादी मुलायम सिंह की बहू और मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव (मुलायम पुत्र) की पत्नी डिंपल यादव सांसद बन गई हैं। 2009 में फिरोजाबाद में कांग्रेस के राजबब्बर के हाथों शिकस्त खाकर लोकसभा जाने से वंचित हो गई डिंपल ने आखिरकार संसद का रास्ता तय कर लिया और वह भी इस तरीके से जो उसके लिए, उसकी पार्टी के लिए तो दमदार है, पर लोकतंत्र के लिए...? लोकतंत्र के लिए तो यह चिंता का सबब है।
डिंपल के सामने सबसे पहले कांग्रेस ने अपने प्रत्याशी खड़ा नहीं करने का एलान कर दिया। कई दलों की बैसाखी पर चल रही केन्द्र सरकार के सामने इस समय मजबूरी है, अपनी सरकार को चुनाव के समय तक खींचने की और इसमें उसे मुलायम सिंह यादव का सहारा दिख रहा है। अपनी इसी मजबूरी में उसने 2009 में भी कन्नौज से उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था और इस बार भी उसने कन्नौज को छोड़ दिया।
बसपा का तर्क अजीब है। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी से शिकस्त खाकर सत्ता से बाहर हो चुकी मायावती की पार्टी के पास यदि नैतिक साहस होता तो वह कन्नौज में अखिलेश यादव की हारी हुई पत्नी को मैदान में देखकर उसके खिलाफ सीना तानकर खड़ी होती लेकिन उसने घुटने टेक दिए। तर्क दिया कि जिस तरह रायबरेली और अमेठी में  गांधी-नेहरू परिवार काबिज है और उस क्षेत्र में विकास नहीं दिख रहा है, उसी तरह यह क्षेत्र भी विकासविहीन होगा, इसे साबित करने के लिए उसने उम्मीदवार खड़ा नहीं किया। सवाल यह उठता है कि पांच साल तक प्रदेश की सत्ता में वह बैठी रही, उसने इस क्षेत्र के विकास के लिए क्या किया? कन्नौज में  मुख्यमंत्री की पत्नी चुनाव लड़ रही थी, सत्ताधारी पार्टी के सामने खड़े होने में पसीने छूटने लगे बसपा के और उसने डर कर मैदान छोड़ दिया।
भाजपा की स्थिति तो हास्यास्पद हो गई। पहले तो उसने अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करने का फैसला किया और जब पार्टी के भीतर इस फैसले का विरोध हुआ तो आनन फानन में उम्मीदवार तय किया गया। जिसका नाम तय किया गया, उसके पास इतना वक्त  ही  नहीं बचा था कि वह नामांकन दाखिल कर पाता, लिहाजा भाजपा भी मैदान में  नहीं रही।
डिंपल के अलावा दो और उम्मीदवार मैदान में थे जिन्होंने अपना नाम वापस ले लिया। डिंपल निर्विरोध चुन ली गई। समाजवादी पार्टी के लिए यह उपलब्धि का विषय हो सकता है कि उसकी पार्टी के उम्मीदवार, उनकी बहू निर्विरोध चुन ली गई पर यह जनता के लिए तो धोखे की तरह है।
हमारा मानना है कि यह धोखा कांग्रेस ने दिया है, बसपा ने दिया है, भाजपा ने दिया है। चुनाव में उम्मीदवार चुनना जनता का हक है और यह लोकतंत्र का हिस्सा है। लोकतंत्र में जनता से उसका हक छीनने का  अधिकार किसी का नहीं है, लेकिन ऐसा किया गया है।  पार्टियों को इसका जवाब देना होगा।