23 दिसंबर 2010

दर्द

मेरे फिक्रमंद
पूछते हैं मुझसे
कभी कभी
कि
क्‍यों है दर्द भरा
इतना
मेरी रचनाओं में...?
उन्‍हें मैं
कैसे समझाऊं?
कि
दर्द
मेरी रचनाओं में नहीं
मुझमे
मेरे अंदर भरा है
जो छलककर
आ जाता है
मेरी कृतियों में
हां यही सच है
सिर्फ यही...!

6 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा है आपने। ये एक जरिया ही तो है अपने आपको लोगो के सामने लाने का।

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  2. दर्द मेरी रचनाओं में नहीं मुझमे, सही कहा है आपने!

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  3. वाकई....दर्द तो रुकने का नाम नहीं लेता है..सब्र से दिल मेरा अब काम नहीं लेता है....

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  4. भवस्पर्शी कविता... | धन्यवाद |

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  5. बेहतरीन भावाभिव्यक्ति,कम शब्दों में व्यापक भाव संजोये हैं |

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