06 अप्रैल 2012

मेरे 'राष्‍ट्रपिता' .........


उत्‍तर प्रदेश की दस साल की ऐश्‍वर्या पराशर ने भारत सरकार के लिए मुश्किलें खडी कर दी है। ऐश्‍वर्या ने पिछले 13 फरवरी को प्रधानमंत्री कार्यालय को 'सूचना के अधिकार' के तरह आवेदन लगाकर जानकारी मांगी थी कि मोहनदास करमचंद गांधी जी को राष्‍ट्रपिता किस आधार पर कहा जाता है? इस संबंध में सरकार के पास जो आदेश है, उसकी प्रति उपलब्‍ध कराई जाए। ऐश्‍वर्या के इस सवाल ने सरकार को मुसीबत में डाल दिया है और अब सरकार की ओर से कोई स्‍पष्‍ट जवाब देते नहीं बन रहा है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने ऐश्‍वर्या की अर्जी को गृह मंत्रालय के पास भेज दिया। गृह मंत्रालय ने इस पर यह लिखते हुए कि यह उसकी जिम्‍मेदारी नहीं है, अर्जी को राष्‍ट्रीय अभिलेखागार के पास भेज दिया। अभिलेखागार ने ऐश्‍वर्या को हाल ही में भेजे जवाब में कहा है उनके पास महात्‍मा गांधी को राष्‍ट्रपिता का दर्जा दिए जाने के संबंध में कोई दस्‍तावेज उपलब्‍ध नहीं है। अभिलेखागार की सहायक निदेशक जयप्रभा रविन्‍द्रन ने ऐश्‍वर्या को लिखे पत्र में कहा है कि अभिलेखागार में महात्‍मा गांधी से जुडे अनेक रिकार्ड मौजूद हैं, लेकिन तमात दस्‍तावेज खंगालने के बाद वांछित सूचना के संबंध में कोई दस्‍तावेज नहीं मिल सका है।
ये तो हुई ऐश्‍वर्या के सूचना के अधिकार के पत्र और उस पर सरकार का जवाब। अब मैं अपनी बात करता हूं। इस पूरे घटनाक्रम ने मुझे उलझाकर रख दिया है। बचपन से स्‍कूलों में जो पढा, बडे बुजुर्गों से जो सुना है, वह एक झटके में हवा होता नजर आ रहा है। ऐश्‍वर्या को सरकार वाजिब जवाब दे देती तो शायद सारे संशय खत्‍म हो जाते पर जब से यह खबर पढी है, दिलो-दिमाग में काफी कुछ कौंध रहा है।
....किसी भी इंसान का पिता कौन हो..... यह वह खुद तय नहीं करता.....। ऊपरवाले ने हर इंसान को इतनी नैमत तो दी है कि वह अपनी जिंदगी के सारे फैसले खुद ले सके, पर माता और पिता तय करने का अधिकार किसी को नहीं है। पर अब मौजूदा घटनाक्रम के बाद लगता है कि मैं भी अपने नजरिए से अपना राष्‍ट्रपिता तय करूं। मैं भी तय करूं कि मैं किसे राष्‍ट्रपिता मानूं।
सूचना के अधिकार के इस पत्र ने एक और सवाल मन में पैदा किया है, कि क्‍या सरकार के पास ऐसे कोई दस्‍तावेज भी होंगे जिसमें भारतीय मुद्रा में गांधी जी की तस्‍वीर लगाने का फैसला लिया गया होगा.....। अब ऐसा लग रहा है कि सरकार से इस संबंध में भी पूछ लिया जाए, हो सकता है, इस पर कोई नई जानकारी मिले जो फिर चौंकाने वाली हो। 
बहरहाल, बात हो रही है राष्‍ट्रपिता को लेकर.... तो मैं इस संबंध में अपना राष्‍ट्रपिता खुद तय करना चाहता हूं। मेरे इस प्रयास को हर कोई अपने नजरिए से देखने के लिए स्‍वतंत्र है, पर मैं ऐसा कर अपने मन के बोझ को हल्‍का करना चाहता हूं। 

........ मेरे राष्‍ट्रपिता हैं आदरणीय सुभाषचंद्र बोस जी।

27 टिप्‍पणियां:

  1. गाँधी और सुभाष दोनों की अपनी भूमिका थी,मेरी दृष्टि से ऐसा कोई प्रयास,जिसमें इस तरह की तुलना की जाय ,उचित नहीं होगा !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बच्ची के प्रश्न ने सबको चौंका दिया मगर इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं लगती। महात्मा गांधी को धीरे धीरे जन जन ने कहना, मानना शुरू कर दिया होगा 'राष्ट्रपिता' वो राष्ट्र पिता हो गये। यह कोई सरकारी उपाधी तो है नहीं कि कब से दी गयी ? बाप को बाप न मानो तो काहेका बाप? कोई जबरी कानून बना कर थोड़े न मनवा सकता है। महात्मा गाँधी तो जन जन के मान्य राष्ट्रपिता हैं।

    आदरणीय सुभाषचंद्र बोस तो सबके प्यारे नेता जी हैं ही। आगे सबके-अपने विचार, अपनी अपनी सोच।

    दोनो अतुलनीय हैं अतुल जी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. @मेरे राष्‍ट्रपिता हैं आदरणीय सुभाषचंद्र बोस जी।

    कैसा संयोग है कि गांधी जी को पहली बार राष्ट्रपिता का दर्ज़ा नेताजी ने ही दिया था। फिर धीरे-धीरे यह शब्द गांधी जी का पर्याय बन गया।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रासंगिक और बढिया जानकारी।
      ऐश्‍वर्या का मासूम सवाल अपनी जगह वाजिब है और इस पर सरकार का ढुलमुल जवाब भी सरकारी तौर तरीका ही है।
      नेताजी ने ही सबसे पहले गांधी जी को राष्‍ट्रपिता कहा था, इस तथ्‍य के बाद भी कहना चाहूंगा कि गांधी जी के विरोध के बाद भी नेताजी कांग्रेस के अध्‍यक्ष चुने गए थे और इसके बाद उन्‍होंने ईस्‍तीफा दे दिया था(यह भी एक तथ्‍य है) यानि ये कहा जा सकता है कि दोनों में वैचारिक मतभेद था।
      किसी की लाईन छोटी करने के बजाय अपनी लाईन बडी करने का काम होना चाहिए...... मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि मेरे राष्‍ट्रपिता सुभाष जी।

      हटाएं
  4. बताया जाता है कि नेताजी ने ही बापू को राष्‍ट्रपिता कहा था, थोड़ी तहकीकात कर लें, संयोगवश बोस विशेषज्ञ डॉ़ प्रसाद छत्‍तीसगढ़ में ही हैं, उनसे 9039281581 पर संपर्क कर सकते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. प्रासंगिक और बढिया जानकारी।
      ऐश्‍वर्या का मासूम सवाल अपनी जगह वाजिब है और इस पर सरकार का ढुलमुल जवाब भी सरकारी तौर तरीका ही है।
      नेताजी ने ही सबसे पहले गांधी जी को राष्‍ट्रपिता कहा था, इस तथ्‍य के बाद भी कहना चाहूंगा कि गांधी जी के विरोध के बाद भी नेताजी कांग्रेस के अध्‍यक्ष चुने गए थे और इसके बाद उन्‍होंने ईस्‍तीफा दे दिया था(यह भी एक तथ्‍य है) यानि ये कहा जा सकता है कि दोनों में वैचारिक मतभेद था।
      किसी की लाईन छोटी करने के बजाय अपनी लाईन बडी करने का काम होना चाहिए...... मुझे यह कहने में संकोच नहीं कि मेरे राष्‍ट्रपिता सुभाष जी।

      हटाएं
    2. आभार आप मेरी पोस्‍ट पर आए।
      .... पर पोस्‍ट पर आप अपने मौलिक विचार देते तो ज्‍यादा अच्‍छा लगता।

      हटाएं
  5. अतुल जी,मै तो राहुल सिंह जी की बातों से सहमत हूँ,नेता जी ही ने बापू को राष्ट्रपिता कहा था,

    MY RECENT POST...फुहार....: दो क्षणिकाऐ,...

    उत्तर देंहटाएं
  6. जरनैल सिंह भाटिया
    जिसको जिन्दा या मुर्दा सौंप देने के अनुबन्ध पर अंग्रेजों ने हमको आजादी दी वो शक्स शुभाष चन्द बोस थे । अर्थात बोस जी अंग्रेजो की हीट लीस्ट मे थे और अंग्रेज बोस जी से इतने भयभीत हो चुके थे कि उनकी जिन्दा या मुर्दा गिरफ़तारी की कीमत पर अपनी प्रभावशाली सत्‍ता और हमारे लिये आक्सीजन रुपी आजादी हमे देने राजी हो गये । अग्रेज जिससे डर कर भागे ये तो आप समझ गये ना। तो हमको राष्‍ट्रपिता उसको कहना है जिससे डर कर अंग्रेज हमको आजादी देने राजी हुए या उसको जिसने जिन्दा या मुर्दा बोस जी को अंग्रेजो को सोंपने के लिये अनुबन्ध किया ........... विचारें

    उत्तर देंहटाएं
  7. कैलाश चंद्र शर्मा
    सुभाष चन्द्र बोस का नाम जेहन में आते ही मेरे मन में एक अजीब सा अपराध बोध भर जाता है ..अपनी गौरवमयी अर्वाचीन संस्कृति की दुहाई देने वाले हम क्या इस प्रश्न को अनदेखा कर सकते हैं कि क्या कोई जिन्दा कौम अपने किसी महापुरुष के प्रति इतना कृतग्नता पूर्ण व्यवहार कर सकती है ?????जीते जी लोकतान्त्रिक ढंग से जीते हुए कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटने को मजबूर किये गए .....उनकी मृत्यु का रहस्य एतिहासिक बेशर्मी में आज पर्यंत दफ़न है ...आज देश का कोई बड़ा एवार्ड जैसे भारत रत्ना , कोई बड़ा स्मारक , कोई बड़ी योजना या संस्थान का नामकरण ...कुछ भी तो नहीं है सुभाष के हिस्से में | जिस देश में राष्ट्र के प्रति क़ुरबानी के दावे पे छटवी और सातवी पीढ़ी सत्ता और सम्मान पे दावा थोक रही है वंहा सुभाष के प्रति इसदेश का रवैया निसंदेह यह कहने को मजबूर करता है कि हमारी देश कि विपदाओं के पीछे पितर दोष तो नहीं है ?????

    उत्तर देंहटाएं
  8. अतुल जी किस भी दिन , किस भी समय , कोई भी मुझ से नेता जी या गांधी जी मे से किसी एक को राष्ट्रपिता के रूप मे चुनने को कहेगा तो आप ही की तरह, बिना किसी शक या दिक्कत के मैं हमेशा ही नेताजी का ही नाम लूँगा !

    पर इसमे एक बात आड़े आ जाती है ... जब स्वयं नेताजी ही गांधी जी को राष्ट्रपिता मानते आए हो तो क्या ऐसे मे उनके इस "Direct Order" को न मान हम अपने ही "Head of the State" नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का अपमान नहीं करेंगे ??

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. वैसे सबसे पहले पहले गांधी जी को राष्‍ट्रपिता सुभाष बाबू ने नहीं नेहरू जी ने कहा था। इसके बाद नेताजी ने रंगून में रेडियो के जरिए वो बात दोहराई थी। (यह तथ्‍य मैंने पहले भी कहीं पढा था और अब इस मुद्दे के उठने के बाद आज फिर पढने में आया। दैनिक भास्‍कर अखबार में एन रघुरामन के कालम 'मैनेजमेंट का फंडा' में भी इस तथ्‍य को पढा है मैंने।

      हटाएं
  9. आँखें खोलने में सक्षम आलेख.....

    उत्तर देंहटाएं
  10. maaf kijiega magar is sambandh me mere apne vichaar ye hai ki..baapu ne kabhi nahi kaha wo raashtrpita hai par ye bhi sahi hai ki unhone hi desh k har us varg aur vykti k baare me socha ..jaise koi pita bina bhedbhav k sochta hai...
    he deserves to being FATHER OF OUR NATION

    उत्तर देंहटाएं
  11. अतुल जी , दोनों ही महापुरुस एक दुसरे के पूरक थे,एसा लगता है. नेताजी के गर्म मिज़ाज से अंग्रेज परेशान होकर, गाँधी जी की सहनशीलता से फायदा उठा कर, राज करना चाहते थे. पर गाँधीगिरी के आगे भी उन्हें मात खानी ही पड़ी.
    सुन्दर अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  12. हमने तो बचपन से पढ़ा...समझा.....जाना.........वो दिल में कहीं इतनी गहरे पैठ गया है कि अब राष्ट्रपिता के रूप में गाँधी जी के सिवा कोई भाता नहीं.......
    सुभाष चंद्र बोसे जी की देशभक्ति और बलिदान तो अनमोल है......छोटी उम्र में ही उनकी मृत्यु हो गयी सो उनका जो बिम्ब है वो किसी युवा का सा है...तो पिता के रूप में उन्हें कैसे देखें......
    क्यूँ ना राष्ट्र बंधु कहते हैं उन्हें...

    सादर
    अनु

    नोट-ये टिप्पणी किसी विद्वान ने नहीं की है...अन्यथा ना लें.

    उत्तर देंहटाएं
  13. धीरेन्‍द्र जी, इसी पोस्‍ट पर अपनी पिछली टिप्‍पणी में आप राहुल जी से सहमत थे और अब......
    लगता है, अपने नए पोस्‍ट का लिंक देने के लिए आपने दोबारा अपने अलग विचार व्‍यक्‍त किये.........!!!!!!
    फिर भी मेरी पोस्‍ट पर दोबारा आने के लिए आपका आभार....

    उत्तर देंहटाएं
  14. अतुल सर |||
    आपकी यह पोस्ट बहूत हि विचारणीय है....
    सारी बातो को सोचना समझना है....

    उत्तर देंहटाएं
  15. वह तो बच्ची है ......दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल | साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल || गाँधी जी के योगदान को याद दिलाना पड़े यह देश का दुर्भाग्य है | सवाल उठाना आसान होता है ...पर सवालों की भी मर्यादा होनी चाहिए .......कल को कोई ये भी आ टी आई से पूछ ले की अमुक व्यक्ति किस आधार पर मेरा बाप है ......थोड़ी मुस्किल होगी पर सच सच तो सच ही होता है | गाँधी के बलिदान और त्याग पर प्रश्न करना आसमान में थूकने की तरह ही है |

    उत्तर देंहटाएं
  16. सर्वप्रथम बैशाखी की शुभकामनाएँ और जलियाँवाला बाग के शहीदों को नमन!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  17. हा हा हा , देखिएगा अतुल जिम, कहीं गांधीवादी आप पे हमला न कर दें ,

    उत्तर देंहटाएं