10 जनवरी 2013

बंद... जनता की उम्मीदों का बलात्कार!!!


बंद। बेहद आसान तरीका है विरोध जताने का। दिल्ली में गैंगरेप हुआ तो भारत बंद का आव्हान कर दिया गया और जब छत्तीसगढ़ में आदिवासी बच्चियों से दुष्कर्म की घटना सामने आई, छत्तीसगढ़ बंद का आव्हान कर दिया गया। अंतर सिर्फ इतना था कि पहले वाला बंद कांग्रेस पार्टी के विरोधियों ने किया था और इस बार के बंद का आव्हान कांग्रेस ने किया। बताने की जरूरत नहीं कि पहली घटना कांग्रेस शासित राज्य में हुई इसलिए विरोधियों ने ऐसा किया और छत्तीसगढ़ में अपनी विरोधी पार्टी के खिलाफ मुद्दों की तलाश में पिछले नौ सालों से भटकती कांग्रेस की झोली में एक मुद्दा आकर गिर गया और उसने मत चूको चौहान की तर्ज पर झट से बंद का आव्हान कर दिया। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इस बंद का क्या औचित्य? क्या बंद कर देने से बलात्कार जैसी घटनाएं रूक जाएंगी? क्या बंद  कर देने से कुत्सिक मानसिकता वालों में लाज शर्म लौट आएगी? नहीं भूलना चाहिए कि दिल्ली गैंगरेप की घटना के बाद देश भर में प्रदर्शन के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में दो दर्जन से ज्यादा बलात्कार की घटनाएं हुई थीं। ये आंकड़ा पुलिस रिकार्ड से है, वरना कई मामले तो थाने पहुंचने से पहले ही दम तोड़ चुके होंगे।
बंद। राजनीतिक रोटी सेंकने का एक बेहतरीन तरीका। राजनीतिक दलों को आजकल किसी मुद्दे पर दिल से जुडऩे के बजाय इस तरह के प्रदर्शनों में मजा आता है। जनता से जुड़े मुद्दों पर सार्थक पहल करने के बजाय इस तरह बंद का आयोजन कर राजनीतिक दल भले ही अपनी सक्रियता (?) दिखाने की कोशिश कर लें,  लेकिन हकीकत यह है कि वे ऐसा कर जनता को खुद के साथ जोडऩे का काम नहीं कर सकते। बस्तर के नक्सल प्रभावित क्षेत्र कांकेर जिले के नरहरपुर ब्लाक के एक आदिसासी हॉस्टल में करीब दर्जन भर नाबालिग बच्चियों से वहीं का चौकीदार महीनों दुष्कर्म करता रहता है और इस दुष्कृत्य में उसका बराबर का हिस्सेदार एक शिक्षाकर्मी रहता है। बच्चियां भी प्रायमरी स्कूल में पढऩे वाली। ... और जब मामले का खुलासा होता है, तीसरे ही दिन चौकीदार और शिक्षाकर्मी को गिरफ्तार कर लिया जाता है, फिर बंद का औचित्य क्या? दिल्ली के मामले में भी ऐसा ही कुछ था। आरोपी तत्काल गिरफ्तार कर लिए गए थे। उनके खिलाफ धाराएं तय की जा चुकी थीं। फिर उस मुद्दे को लेकर भी इस तरह प्रदर्शन का औचित्य नहीं था। बंद का औचित्य नहीं था। छत्तीसगढ़ के इस मसले पर कांग्रेस ने बंद का आव्हान राज्य सरकार पर इस आरोप के साथ किया था कि प्रदेश में कानून व्यवस्था चौपट हो गई है। जहां तक हमारा मानना है, इस मामले में आदिवासी क्षेत्रों में आश्रम शालाओं में आदिवासी बच्चियों की सुरक्षा में लापरवाही की बात की जा सकती है, लेकिन कानून व्यवस्था चौपट होने की बात करना ठीक नहीं।
बंद। ... और फिर क्या इस तरह बंद कर जनता को अपने साथ जोड़ा जा सकता है? कांग्रेस ने तो ऐसा ही कुछ सोचा होगा लेकिन वह अपने इस मकसद में कामयाब नहीं हो पाई। लोग और दूकानदार उससे ज्यादा समझदार निकले और उसकी लाख कोशिशों के बाद भी बंद का कोई खास असर नहीं देखा गया। लोग यह बात समझ गए कि बंद कर देने से इस तरह की घटनाएं नहीं रोकी जा सकतीं। हाँ, एक राजनीतिक दल की रोटियां जरूर इससे सेंकी जा सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। हमें एक भी ऐसा मामला नजर नहीं आया लोगों ने स्वस्फूर्त  होकर बंद किया हो। कांग्रेस के लोग घूमते रहे, खुली दूकानों का शटर खुद बंद कर करते रहे। कांग्रेसियों के हुजूम के जाने के बाद फिर कारोबार शुरू।
बंद। आखिर क्यों? बंद से क्या होने वाला है? ऐसे बंद किसी समस्या का हल नहीं होते। अलबत्ता ये मुसीबत का सबब जरूर  बनते हैं। उनके लिए, जो हर दिन कमाते हैं, हर दिन खाते हैं। उनके लिए जिनकी दो वक्त की रोटी बंद की भेंट चढ़ जाती है और उनके घरों में चूल्हे तक नहीं जल पाते। पर इतना दूर तक सोचने की जरूरत किसे है? सब के सब सेंक रहे हैं अपनी राजनीतिक रोटियां... और कर रहे हैं हर वक्त जनता की उम्मीदों का बलात्कार....!!!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. .विचारणीय विषय ...कम कम इस देश के लिए तो जहाँ रोज़ ही अपनी रोटी कमाने की ज़द्दोज़हद करने वालों की संख्या कम नहीं है

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  2. लगभग हमेशा ही देखने को मिलता है बंद वाले दिन सम्बंधित पार्टी के कुछ दबंग किस्म के कार्यकर्ता मोटरसाइकिल पर जगह जगह घूमकर खुली हुई दुकानें बंद कराते दिखेंगे और उनके जाने के बाद आधा शटर खोलकर डरते डरते दुकानदारी फिर चालू |
    बंद से आखिर ए.सी. लगे महलों में बैठे शाही नवाबों को क्या फरक पड़ने वाला , अगर फर्क पड़ेगा तो उनके घर राशन देने वाले गरीब नौकर को | तो ये बंद किसके लिए आखिर ?

    सादर

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  3. बंद तो फिर भी कभे-कभी झलने वाली बात है, आजकल जो आम आदमी के लिए सबसे दुखदाई हो गया है वह है बात-बात पर हाई-वे को जाम कर देना। पता नहीं प्रशासन कब जागेगा इस नासूर बनते जख्म के बारे में ।

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  4. ये सब राजनीति है ..बंध से कुछ नहीं होता ..मानसिकता बदलने से होता है न ..

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  5. वाह.बेह्तरीन अभिव्यक्ति .

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  6. आज की सच्चाई से रूबरू कराती पोस्ट......

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  7. सहमत हूं,
    आज की असल तस्वीर
    बढिया लेख

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