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03 मई 2012

क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?


सरकार ढोल पीट रही है कि उसने सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन की रिहाई का रास्ता आखिर तय कर लिया। सब कुछ ठीक रहा तो गुरूवार को मेनन सुरक्षित अपने घर भी आ जाएंगे, पर उनका क्या जो गए तो थे नक्सल मोर्चे पर अमन शांति कायम करने की उम्मीद के साथ और घर उनका निर्जीव शरीर लौटा! इस वक्त भी जब सरकार खुशी से फूले नहीं समा रही है, कि उसने कलेक्टर को सुरक्षित लाने में सफलता हासिल कर ली, नक्सलियों ने लाशें बिछाने में देरी नहीं की। क्या जवानों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे मामूली जवान हैं, आईएएस जैसा ओहदा उनके साथ नहीं है? कहां हैं, वे लोग जिन लोगों ने कलेक्टर की रिहाई के लिए कैंडल मार्च किया? रैलियां निकालीं? प्रार्थनाएं कीं? कहां हैं? अफसोस.......!
क्या कर रहे हैं, वे मध्यस्थ जो नक्सलियों का दूत बनकर आए? क्या उन लोगों ने जो मसौदा तैयार किया उसमें ऐसा कुछ था कि कलेक्टर रिहा होना चाहिए, चाहे कुछ भी कीमत लगे? बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं बीडी शर्मा और जी हरगोपाल, सरकारी मेहमान बनकर बैठे हैं सुयोग्य मिश्र और निर्मला बुच। क्या उन लोगों ने ऐसा कुछ ही तय किया था कि कलेक्टर की रिहाई होनी चाहिए, बस! अफसोस.......!
मंगलवार को जब मुख्यमंत्री ने कहा था कि 48 घंटे में कलेक्टर रिहा हो जाएंगे। किसी नक्सली को नहीं छोड़ा जाएगा।  हां, विचाराधीन नक्सली बंदियों को लेकर हाईपावर रिव्यू कमेटी बनाई जाएगी। ... और इस पर जब नक्सलियों के दोनों दूतों ने सहमति जताई थी तो लगा था कि अब नक्सल आतंक से छत्तीसगढ़ को मुक्ति मिल सकती है। एक बेहतर प्रयास हो रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार के इस कदम की हमने सराहना भी की थी, और ऐसा लगा था कि एक नई शुरूआत हो रही है, लेकिन! अफसोस......!
नक्सलियों ने इस सहमति की स्याही भी नहीं सूखी, अपनी औकात दिखा दी है। बस्तर के बचेली के साप्ताहिक बाजार में नक्सलियों की गोली से दो जवानों की मौत हो गई। क्या यही समझौता हुआ था, सरकार और नक्सलियों के दूतों के बीच! क्या समझौता सिर्फ कलेक्टर तक सीमित था? जवानों और आम लोगों की जान की कोई कीमत नहीं रह गई है? अफसोस.....!
सुकमा के अगवा कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन गुरूवार को नक्सली चंगुल से आजाद हो जाएंगे। एक बड़ा सवाल चर्चा में है, कि ऐसा क्या जादू हुआ कि कलेक्टर का अपहरण कर सरकार को बेकफुट पर लाने वाले नक्सली अचानक खुद क्यों बेकफुट पर आ गए? कल तक जो सरकार नक्सलियों के सामने मिमियाती नजर आ रही थी, वह अचानक दहाडऩे कैसे लगी? नक्सलियों ने कलेक्टर का अपहरण कर पहले अपने आठ साथी मांगे, फिर संख्या बढ़कर 17 हुई और फिर 80 के आसपास पहुंची। एक नक्सली भी रिहा नहीं हो रहा है और नक्सली नेता ने एसएमएस कर कहा है कि गुरूवार को वे कलेक्टर को छोड़ रहे हैं! यह चमत्कार कैसे हुआ?
अब जब मेनन रिहा होने वाले हैं और नक्सल वारदातें नहीं थमी हैं, ऐसा लग रहा है, कहीं यह सब सोझी समझी 'स्क्रिप्ट' का हिस्सा तो नहीं! कहीं ऐसा तो नहीं कि नक्सलियों ने किसी बड़े सौदे की प्रत्याशा में कलेक्टर का पहले अपहरण किया और इसी की अगली कड़ी हो कलेक्टर की रिहाई! नक्सली कल जन अदालत लगाएंगे और जन अदालत में कलेक्टर को छोडऩे का फैसला लेंगे... यदि यह खबर सही है तो अभी से कलेक्टर को रिहा करने की बात कैसे आई? फैसला तो जन अदालत में होना है!
बेहतर हो, ऐसा न हो। वरना छत्तीसगढ़ में नासूर बन चुका नक्सलवाद शायद ही कभी थमें। सरकारें  अपने फायदे के लिए नक्सलियों से समझौता करती रहें और इस आग में आम आदिवासी, आम आदमी, आम पुलिस वाला झुलसता रहे तो किसी दिन पूरा छत्तीसगढ़ श्मशान बनकर रह जाएगा और फिर क्या समझौता? कैसी शांति? कैसी रिहाई?

22 अप्रैल 2012

अगवा हुआ ‘सरकार का चेहरा’

अपह़त कलेक्‍टर मेनन 
छत्तीसगढ़ में अब यही देखना बाकी था। प्रदेश के मुखिया गांव-गांव घूमकर विकास का ढोल पीट रहे हैं। गांव,  गरीब, किसान की बात कर रहे हैं और बात कर रहे हैं कि उनके ‘राज’ में सुशासन आया है। सुरक्षा मिली है, सबको! .... और ऐसे में खबर आती है कि एक कलेक्टर का नक्सलियों ने अपहरण कर लिया है! गंभीर चिंतन का विषय है कि जिस प्रदेश में कलेक्टर सुरक्षित नहीं, भरी सभा से नक्सली कलेक्टर को उठाकर ले जाएं, उस प्रदेश में आम नागरिकों की सुरक्षा की क्या उम्मीद की जाए। कलेक्टर अगवा हुए हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है और अब बैठकों, चिंतनों से हटकर सरकार को कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है, वरना  नक्सली कलेक्टर को सामने रखकर फिर अपनी गैरकानूनी मांगें पूरी करने दबाव डालेंगे।
आत्मप्रशंसा, आत्ममुग्धता में घिरी सरकार के लिए यह अवसर सोचने का है कि उसने प्रदेश की जनता को क्या दिया है? गांव-गांव में फोर्स बिठाने के  बाद भी नक्सली किसी कलेक्टर को उठाकर ले जाते हैं और सरकार को नुमाइंदे देखते रह जाते हैं। कलेक्टर कोई बुधारू, समारू या इसी तरह के नाम वाला कोई आम आदमी नहीं होता। वह जिलों में सरकार का चेहरा होता है और जब सरकार के चेहरे तक नक्सलियों की पहुंच हो सकती है तो फिर आम लोग कितने सुरक्षित हैं, आम नागरिकों की जिंदगी कितनी सस्ती है, एक बड़ा सवाल है।
नक्सल आतंक प्रदेश में सिर चढ़कर बोल रहा है। छत्तीसगढ़ की धरती अब तक हजारों जवानों के खून से रंग चुकी है। तकरीबन हर दिन छत्तीसगढ़ के किसी न किसी हिस्से से नक्सल आतंक की खबरें आती हैं। सरकारी सम्पत्ति को नक्सली नुकसान पहुंचाते हैं। आम लोगों को मारते हैं। पुलिस को निशाना बनाते हैं, पर सरकार है कि वह इस आत्मप्रशंसा से नहीं उबर पा रही है कि उसने ‘राम राज’ लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
‘जब रोम जल रहा था, नीरो बंसी बजा रहा था।’ बड़ा चर्चित वाक्य है और यह वाक्य आज फिर याद आ रहा है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री उस वक्त भी गांव-गांव घूम रहे होंगे, जिस वक्त कलेक्टर सुकमा का अपहरण हुआ होगा! मुख्यमंत्री उस वक्त भी अपनी उपलब्धियों का बखान कर रहे होंगे, जिस वक्त कलेक्टर को नक्सली उठाकर ले गए होंगे! बड़ी अचंभे की बात है।  नक्सली एक गांव में पहुंचते हैं। वहां किसान सभा चल रही होती है। वो पूछते हैं, कलेक्टर कौन है? और इसके बाद कलेक्टर के गार्डों को गोली मारकर कलेक्टर को उठा ले जाते हैं। गार्ड गरीब थे, उनकी मौत हो जाती है,  पर कलेक्टर नक्सलियों के चंगुल में पड़ जाते हैं। कलेक्टर का अपहरण सिर्फ नक्सलियों की  दहशत फैलाने की  रणनीति नहीं हो सकता, वो कलेक्टर के गार्ड को मारकर या फिर किसी और को मारकर भी अपनी दहशत का अहसास करा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने कलेक्टर का अपहरण किया। अब शुरू होगा, खेल सौदेबाजी का।
शनिवार को दोपहर बाद साढ़े चार बजे के आसपास नक्सलियों ने कलेक्टर का अपहरण किया है, और नक्सली कलेक्टर को  जंगल की ओर ले गए हैं। हाल ही में नक्सली उड़ीसा के एक विधायक को उठाकर ले गए हैं। विधायक झीना हिकाका के अपहरण के बाद नक्सलियों ने अपने साथियों को छुड़ाने की  मांग की। अब ऐसी ही मांग यहां उठेगी। एक-एक नक्सलियों को पकडऩे सुरक्षा बलों को जान से खेलना पड़ता है और पकडऩे के बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद किसी नक्सली को सजा मिलती है, ऐसे में किसी का अपहरण कर नक्सली अपने साथियों को छुड़ाने की मांग करते हैं, उसमें कामयाब भी रहते हैं, यह भी चिंता का विषय है। राज्य सरकार के चेहरे को इस बार नक्सलियों ने निशाना बनाया है। सरकार के गिरेबान में झांकने का वक्त है यह, और उसे यह करना चाहिए।