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13 सितंबर 2012

ठाठ पर सवाल

वीआईपी कौन होता है? वीआईपी होने का पैमाना क्या है? क्या वीआईपी वही होता है, जो राजनीति में ऊंचे ओहदे पर होता है? अब तक तो यही होता आया है और इस वीआईपी वर्ग के लिए आम आदमी यानि 'मैंगो मैन' को तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। किसी भी शहर में किसी वीआईपी का आना हो तो यह वहां के और वीआईपी लोगों के लिए तो सुखद अहसास लेकर आता है लेकिन आम आदमी को इससे सिर्फ परेशानी ही मिलती है, दिक्कतें ही नसीब होती हैं।
वैसे तो सुप्रीम कोर्ट तक ने पहले ऐसे निर्देश कई बार जारी किए हैं कि किसी भी वीआईपी के लिए कहीं भी आम आदमी का रास्ता न रोका जाए, किसी आम आदमी के कामकाज को बाधित न किया जाए यानि ऐसा कोई काम न किया जाए जिससे आम आदमी को परेशानी हो लेकिन कानून का पालन सुनिश्चित करने वाले  लोग ही इन निर्देशों की हर बार धज्जियां उड़ाते हैं और जहां भी किसी वीआईपी का आगमन हो, बैरिकेट्स लगाकर,  पुलिस जवान खड़ा कर आम आदमी का रास्ता रोक दिया जाता है। किसी को भी किसी भी जरूरी काम से जाना हो, किसी की सुनवाई नहीं होती। कई बार इस तरह के मामले भी सामने आए हैं कि किसी वीआईपी आगमन के दौरान लगे जाम में एंबुलेंस जैसी वाहनें भी फंसी हो और किसी का जीवन संकट में फंस गया हो
लेकिन पुलिस और प्रशासन सब कुछ जानकर भी वीआईपी की सेवा सत्कार में लगा रहता है। यह स्थिति काफी चिंताजनक है।
अब एक खबर आई है उत्तरप्रदेश से। यहां हाईकोर्ट ने वीआईपी को दी जाने वाली सुविधा पर कड़ा एतराज जताया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वीआईपी शहरों को 24 घंटे बिजली देेने के एक मामले की सुनवाई करते हुए अफसरों को लताड़ लगाई है और कहा है कि वे इस संबंध में कोर्ट में 20 सितम्बर तक हलफनामा प्रस्तुत करे। इस संबंध में एक मामला दायर किया गया था जिस पर सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से पेश किए गए रोस्टर में कहा गया कि प्रदेश के छह जिले ऐसे हैं जहां आए दिन अतिविशिष्ट लोगों का आना होता रहता है इसलिए वहां चौबीसों घंटे बिजली का इंतजाम किया जाता है। बता दें कि उत्तरप्रदेश में बिजली संकट हावी है और कई इलाकों में घंटो बिजली बंद रहती है जबकि प्रदेश के रायबरेली, अमेठी, इटावा, मैनपुरी रामपुर और कन्नौज में चौबीसों घंटे बिजली की आपूर्ति की जाती है। इन इलाकों में निर्बाध बिजली आपूर्ति का कारण यह है कि इटावा, मैनपुरी और कन्नौज मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, उनके पिता मुलायम सिंह यादव और सांसद पत्नी डिंपल यादव का क्षेत्र है जबकि रामपुर को प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री आजम खान के कारण वीआईपी दर्जा मिला हुआ है। अमेठी और रायबरेली सोनिया गांधी और राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण वीआईपी सुविधा भोग रहे हैं। इस असमानता को लेकर हाईकोर्ट में मामला दायर किया गया था।
वीआईपी के नाम पर अलग तरह की सुविधा, वीआईपी के लिए आम आदमी को परेशान करने का काम निरंतर जारी है और कोर्ट की सख्ती के बाद भी इस पर कहीं कोई रोक, बंदिश नहीं लगाई जा रही है जो एक तरह से न्यायालय की अवमानना है और इस तरह की अवमानना तकरीबन हर दिन हो रहा है। पर अफसोस कि कानून का पालन करने और कराने वाले लोग सब कुछ देखकर भी आंखों पर पट्टी बांधे बैठे हैं।

15 अगस्त 2012

सवाल स्वतंत्रता को लेकर...?


हमें आजाद हुए 65 साल हो गए और छैंसठवें वर्ष में हम प्रवेश कर गए। यह वक्त सोचने का है कि इतने वर्षों में हम क्या हासिल कर पाए? जिन ख्वाबों को लेकर, जिन उम्मीदों को लेकर आजादी के दीवानों ने रण में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए, क्या उन उम्मीदों पर हम खरा उतरे हैं? वास्तविकता तो यह है कि हम और भी पीछे जा रहे हैं। 1947 को देश की जमीन का बंटवारा हुआ था और अब इस दौर में इंसानों में, भावनाओं में और हर उस चीज में बंटवारा निरंतर जारी है, जिसका मानवीय सरोकार है।
मौजूदा दौर में सत्ता की लड़ाई इस कदर हावी हो  गई है कि इसके सामने सब कुछ बौना नजर आने लगा है। आम आदमी की क्या जरूरतें हैं, इस पर किसी का ध्यान नहीं है, बस सब के सब अपना वोट बैंक मजबूत करने के काम में लगे हुए हैं। इस आपाधापी में आम भारतवासी की उम्मीदें, आम भारतवासी की भावनाएं कितनी आहत हो रही हैं, इस दिशा में सोचने की किसी को फुर्सत नहीं।
हाल के दिनों में देश ने दो बड़ा आंदोलन देखा। दोनों आंदोलन को देश की दशा और दिशा बदलने वाला बताया गया। एक आंदोलन की शुरूआत एक योगी ने की। लोगों को योग सिखाने वाले बाबा रामदेव ने देश के बाहर जमा काला धन को वापस देश में लाने की मांग को लेकर आंदोलन का आगाज किया और उन्होंने सपना दिखाया कि इससे भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी, देश में महंगाई खत्म हो जाएगी और देश के हर आम आदमी को आसानी से दो वक्त की रोटी नसीब होगी। उनके आंदोलन में लोग जुटे। फिर अचानक उनके आंदोलन को कुचल दिया गया। बाबा दोबारा रामलीला मैदान में पूरी ताकत के साथ आए और पांच दिनों तक उनकी लीला चलती रही। अपनी रणनीति को गोपनीय रखने की बात कहकर खूब भीड़ जमा की और आखिर में कांग्रेस को 'निपटाने' के संकल्प के साथ उन्होंने अपना अनशन खत्म कर दिया।
इन सबके बीच उभरे अन्ना हजारे। भारतीय सेना के पूर्व जवान और मौजूदा समय में बूढ़े हो चले अन्ना हजारे ने देश के लिए लडऩे का एक जज्बा  पैदा किया। जन लोकपाल की मांग को लेकर लड़ाई शुरू की। उनका भी उद्देश्य था, भ्रष्टाचार का खात्मा, पर धीरे धीरे उनका जादू खत्म होता गया। इसके पीछे उनकी ही टीम के लोग शामिल थे। उनकी टीम के लोगों ने एक ऐसा मायाजाल बिछाया कि जनता पहले तो उसमें फंसती चली गई और जब जनता को होश आया तो इस टीम से उसका मोह भंग हो गया। आखिर में राजनीतिक दल के गठन की बात कर अन्ना का आंदोलन समाप्त हो गया और जनता एक बार फिर ठगी रह गई। अब टीम अन्ना भंग हो गई है और सब अलग अलग राग गा रहे हैं।
कितने दुर्भाग्य की बात है कि एक का आंदोलन राजनीतिज्ञों के सहयोग के साथ खत्म हो गया और दूसरे का आंदोलन राजनीतिक दल बनाने की बात को लेकर समाप्त हो गया। यदि सब कुछ राजनीति से ही संभव है तो फिर राजनीति को लेकर इतनी कड़वाहट क्यों दिखाई इन लोगों ने? क्यों देश की संसद को, क्यों देश के संविधान को कोसने का काम किया गया? इसका जवाब आने वाले वक्त में अन्ना हजारे की टीम और बाबा रामदेव को देना होगा।
बात अन्ना और रामदेव से हटकर करें तो सरकार भी क्या कर रही है। सिर्फ जनता को ठगने के अलावा कुछ नहीं किया जा रहा है। पिछले 65 सालों से देश में जनता के लिए वो सारी चीजें सपने की तरह हैं, जो आजादी के समय देखी और दिखाई गई थीं। आज भी देश की पूरी आबादी को दो वक्त का खाना मयस्सर नहीं हो रहा है और भ्रष्टाचार जो पहले सैकड़ों और हजारों में था, उसने करोड़ों और अरबों, खरबों तक का सफर तय कर लिया है।
महंगाई चरम पर है। पुराने समय में कहा जाता था कि जेब में रूपए ले जाएं और बाजार से थैला भर सामान लाएं पर अब स्थिति यह है कि थैले में रूपए ले जाने पर जेब भर सामान ही आ पाता है। दाल, रोटी, चावल का भाव आसमान को छू रहा है। जो गरीब हैं, उनको सब्सिडी में सब कुछ दिया जा रहा है। अमीरों को महंगाई से खास फर्क नहीं पड़ रहा है और इन सब के बीच पिस रहा है मध्यमवर्ग।
दंगोंं में कोई कमी नहीं आई है। देश के तकरीबन हर हिस्से में जात पात, ऊंच नीच के नाम पर अत्याचार हो रहे हैं। मुंबई जल रहा है। दिल्ली अछूती नहीं। गुजरात के दंगे पूरे देश का अमन छीन लेते हैं। असम में बोडो उग्रवाद का आतंक है तो छत्तीसगढ़ सहित देश के आधे से ज्यादा राज्य नक्सलवाद की खूनी क्रांति में जल रहे हैं। लिंग भेद हावी है। बेटियों को जलाया जा रहा है।
आज के दौर में सब कुछ महंगा है, सस्ती है तो इंसानी जान!
आज स्वतंत्रता की वर्षगांठ है। यह अवसर आत्ममंथन का है। यह विचारने का है कि देश में व्याप्त तमाम तरह की विसंगतियों से किस तरह छुटकारा पाया जा सके? किस तरह उन सपनों को साकार किया जा सके, जिसे आजादी के दीवानों ने देखा था। आखिर में सब अच्छा हो, इसी उम्मीद के साथ, इसी कामना के साथ स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं...