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05 अक्टूबर 2011

हो गया एक बरस...


गोवा के समुद्र तट पर ढलते सूरज के साथ मेरी तस्‍वीर
.5 अक्‍टूबर। हर दिन की तरह सामान्‍य दिन.... पर यह दिन मेरे लिए खास बन गया। पिछले साल इसी दिन मैंने ब्‍लाग की दुनिया में कदम रखा था। पांच सितम्‍बर को अपने ब्‍लाग में पहली पोस्‍ट के रूप में अपनी '' दो कविताएं ''  पोस्‍ट करते समय यह अहसास नहीं था कि आगे मुझे इस जगत का इतना प्‍यार मिलेगा। मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि अपने पंद्रह-सोलह साल के पत्रकारिता जीवन में मैंने जितना कुछ पाया था... जितने संबंध मेरे बने थे.... ब्‍लाग  की दुनिया के साल भर उस पर भारी पडेंगे। मुझे इस जगत में कुछ बडे भाई जैसे लोग मिले, जो मुझे समय समय पर मार्गदर्शन देते रहे..... कुछ बहनें मिलीं.....  जिनका सहयोग हर कदम पर मिला.... अच्‍छे दोस्‍त मिले.... ढेरों शुभचिंतक मिले..... एक दो कडवे अनुभवों को यदि छोड दूं तो इस एक साल में मुझे बेहतरीन माहौल यहां मिला। एग्रीगेटरों ने भी मुझे स्‍थान देकर मेरा हौसला बढाया तो साझा ब्‍लागों में भी मुझे सहभागिता के लिए आमंत्रित किया गया। कुल मिलाकर ये साल मुझे काफी कुछ सीखने.... काफी कुछ पढने मिला और कोशिश करूंगा कि आगे भी यह क्रम जारी रहे। मेरे ब्‍लाग में आकर टिपियाने वाले, आकर बगैर टिपियाए चले जाने वालों और मेरे फालोवर्स की सूची में शामिल ब्‍लागर बंधुओं का आभार............... बस हौसला अफजाई के लिए आपका साथ चाहिए..................... 

कविता से मैंने अपने ब्‍लाग की शुरूआत की थी और इसके जन्‍मदिन पर भी एक कविता पेश है..... 


एक नई सुबह...........

आज सूरज फिर लौटेगा
इसी यकीन के साये में
स्‍याह रात को
चिढाया मैंने
यूं ही
खुद को बहलाया मैंने
लेकिन सूरज नहीं लौटा.....!
शायद
रात ने
सूरज को
न लौटने की
कीमत दे दी हो...... !
और उसे
आगोश में ले लिया हो अपने
लेकिन,
यह कैसे संभव है....?
हर रात के बाद
लौटना होता है
सूरज को....।
रात यानि तिमिर,
अंधकार,
दासता,
दाग.........
और सूरज......  
सूरज यानि रौशनी,
उजाला,   
आजादी,
पाक साफ..........
नहीं..... नहीं......
सूरज नहीं बिक सकता.....
वह लौटेगा जरूर....
और तब,
फैलेगा उजाला
फिर होगी सुबह
एक नई सुबह.......................।

30 अप्रैल 2011

बरगद और मैं....


सेकंड,
मिनट,
घंटा,
दिन,
महीना,
और साल.....।
न जाने
कितने कैलेंडर
बदल गए
पर मेरे आंगन का
बरगद का पेड
वैसा ही खडा है
अपनी शाखाओं
और टहनियों के साथ
इस बीच
वक्‍त बदला
इंसान बदले
इंसानों की फितरत बदली
लेकिन
नहीं बदला  तो
वह बरगद का पेड....।
आज भी
लोगों को 
दे रहा है
ठंडी छांव
सुकून भरी हवाएं.....
कभी कभी
मैं सोचता हूं
काश इंसान भी न बदलते
लेकिन
फिर अचानक
हवा का एक  झोंका आता है
कल्‍पना से परे
हकीकत से सामना होता है
और आईने में
खुद के अक्‍श को देखकर
मैं शर्मिंदा हो जाता हूं