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| गोवा के समुद्र तट पर ढलते सूरज के साथ मेरी तस्वीर |
कविता से मैंने अपने ब्लाग की शुरूआत की थी और इसके जन्मदिन पर भी एक कविता पेश है.....
एक नई सुबह...........
आज सूरज फिर लौटेगा
इसी यकीन के साये में
स्याह रात को
चिढाया मैंने
यूं ही
खुद को बहलाया मैंने
लेकिन सूरज नहीं लौटा.....!
शायद
रात ने
सूरज को
न लौटने की
कीमत दे दी हो...... !
और उसे
आगोश में ले लिया हो अपने
लेकिन,
यह कैसे संभव है....?
हर रात के बाद
लौटना होता है
सूरज को....।
रात यानि तिमिर,
अंधकार,
दासता,
दाग.........
और सूरज......
सूरज यानि रौशनी,
उजाला, आजादी,
पाक साफ..........
नहीं..... नहीं......
सूरज नहीं बिक सकता.....
वह लौटेगा जरूर....
और तब,
फैलेगा उजाला
फिर होगी सुबह
एक नई सुबह.......................।

